
भारतीय सेना ने 11 फरवरी को दुनिया के सबसे बड़े सशस्त्र सैन्य गतिरोध क्षेत्र से पहला वीडियो प्रसारित किया. धूसर रंग के चीनी टाइप 99 मुख्य युद्धक टैंक (एमबीटी) का एक स्वाड्रन पूर्वी लद्दाख में कैलाश रेंज की पहाडिय़ों से नीचे उतर रहा था तो भारतीय टी-72 टैंक भी पीछे लौट रहे थे. पांच दिनों के बाद, भारतीय सेना की ओर से आई तस्वीरों की बाढ़ में दिख रहा था कि खुदाई करने वाली मशीनें पीएलए (पीपल्स लिबरेशन आर्मी) के बंकरों और दूसरे सैन्य निर्माणों को ध्वस्त करने के बाद नियंत्रण रेखा के पार अपनी सीमा में लौट रही थीं.
चित्र इस बात के प्रमाण थे कि भारत और चीन ने पूर्वी लद्दाख से सैनिकों को हटाना शुरू कर दिया था, जैसा कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 11 फरवरी को संसद को सूचित भी किया था. उन्होंने दिखाया था कि सीमा पर दोनों पक्षों के टैंक खतरनाक रूप से एक दूसरे के कितने करीब तैनात थे. यह युद्ध टैंकों के एक सदी पहले हुए आविष्कार के बाद अत्यधिक ऊंचाई पर पहली ऐसी मोर्चाबंदी थी जिसमें दो देशों की बख्तरबंद गाडिय़ां एक दूसरे से मात्र कुछ सौ मीटर की दूरी पर आमने-सामने खड़ी थीं.
तस्वीरों से पता चल रहा था कि पीएलए की यह पिछले कई दशकों में किसी अन्य देश की सीमा में सबसे बड़ी घुसपैठ थी और उसने सीमा से काफी करीब अपने तंबू गाड़े, घेराबंदी की, बंकर बनाए और बख्तरबंद वाहन तक तैनात किए. इसने पिछले साल के भारत सरकार के शुरुआती आकलन को खारिज कर दिया कि चीन की हरकतें चिंता की कोई खास बात नहीं थी.
गतिरोध अप्रैल 2020 में शुरू हुआ जब पीएलए ने पूर्वी लद्दाख में 840 किलोमीटर लंबी एलएसी पर अपने वार्षिक ग्रीष्मकालीन सैन्य अभ्यास को स्थाई सैन्य जमावड़े में बदल दिया. लगभग 30,000 सैनिकों को विवादास्पद सीमा बिंदुओं पर टैंक, तोपखाने और पैदल सेना के लड़ाकू वाहनों के साथ तैनात कर दिया था. भारतीय सेना ने लद्दाख में दो अतिरिक्त थल सेना डिविजनों (लगभग 30,000 सैनिकों) को भेजा.

लगभग 10 महीने बाद भी विशाल तैनाती के कारण स्पष्ट नहीं हैं. रक्षा मंत्रालय के एक अधिकारी का मानना है कि यह हरकत, ‘‘हमें धमकाने’’ के लिए की गई थी. 18 दिसंबर, 2020 को इंडिया टुडे को दिए इंटरव्यू में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत ने कहा कि यह संभव ही नहीं कि ''इस प्रकार की और इतनी विशाल सैन्य तैनाती’’ हो और शीर्ष चीनी नेतृत्व को इसकी सूचना ही न हो.

तनाव तब चरम पर पहुंचा जब 15 जून को गलवान घाटी में दोनों देशों के सैनिकों के बीच झड़प में 20 भारतीय सैनिकों और अज्ञात संख्या में चीनी सैनिकों की मौत हुई थी. जानलेवा सर्दियों में जब तापमान शून्य से 20 डिग्री सेल्सियस नीचे चला गया था, दोनों सेनाएं मोर्चे पर जमी रहीं. सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे ने 12 जनवरी को ‘‘जब तक जरूरत हो तब तक’’ जमे रहने का सेना का संकल्प जताया. दोनों पक्षों ने 10 फरवरी को एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसकी घोषणा पहले बीजिंग में चीनी रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने की.
सैन्य-स्तर की वार्ता के दौरान भारतीय सेना की कड़ी सौदेबाजी ने परिणाम दिए हैं. 24 जनवरी को कोर कमांडरों के बीच नौवें दौर की वार्ता के बाद सफलता मिली. भारतीय विश्लेषक चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के जुलाई 2021 शताब्दी समारोह को चीन के पीछे हटने के लिए सहमत होने के एक महत्वपूर्ण कारण के रूप में देखते हैं.

तीन चरणों में सेना को हटाने की प्रक्रिया में अब गति आ गई है. अतिरिक्त सेना को वापस बुला लिए जाने और सत्यापन प्रक्रिया के बाद, सैन्य बलों को हटाने की प्रक्रिया पूरी होने की उम्मीद है. इसमें कई सप्ताह लग सकते हैं. लेकिन भारत और चीन सेनाओं को बुलाने की दिशा में कदम उठाना शुरू कर चुके हैं तो कई सवाल भी खड़े होते हैं.
1. क्या भारत ने लद्दाख में अपना इलाका गंवाया है?
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 11 फरवरी को संसद को बताया, ‘‘हमने कुछ नहीं खोया.’’ पीएलए की घुसपैठ और 134 किमी लंबी बूमरैंग के आकार की झील पैंगोंग त्सो, जिसका करीब 40 फीसद हिस्सा भारतीय सीमा में और शेष चीनी तरफ है, के आसपास के क्षेत्रों से सेना हटाने का काम चल रहा है. झील के उत्तरी किनारे में आठ पहाड़ी संरचनाएं हैं जिन्हें ‘फिंगर्स’ कहा जाता है. भारतीय सेना उत्तरी किनारे को फिंगर 3 तक नियंत्रित करती है और फिंगर 8 तक क्षेत्र में गश्त करती है और इसे अपनी एलएसी मानती है. पीएलए फिंगर 2 तक के इलाके पर अपना दावा करती है.
पहला संघर्ष पिछले साल 5 मई को हुआ था, जब पीएलए ने भारतीय गश्ती दल को फिंगर 4 से आगे बढऩे से रोक दिया था. इसके बाद, पीएलए ने फिंगर 4 और फिंगर 8 के बीच आठ किलोमीटर के इलाके में तेजी से कैंप लगाए, बंकर बनाए और घेराबंदी की. 30 अगस्त को भारतीय सेना की स्पेशल फोर्सेज ने पैंगोंग त्सो के दक्षिण में स्थित कैलाश रेंज की पहाडिय़ों पर कब्जा करने के लिए जवाबी कार्रवाई शुरू की. कैलाश रेंज एलएसी पर भारत की तरफ है और चीन के साथ 1962 के युद्ध के बाद से भारतीय सेना वहां कभी मौजूद नहीं रही.

10 फरवरी के समझौते में दोनों पक्ष अपनी-अपनी सेना की ओर से बनाई अस्थायी बढ़त को छोडऩे को तैयार हुए हैं (भले ही कैलाश रेंज को भारत एलएसी पर अपनी सीमा में मानता है). भारत और चीन आगे की तैनाती को रोकने, फिंगर 3 और फिंगर 8 के बीच एक अस्थायी नो-गो जोन बनाने, सभी नवनिर्मित संरचनाओं को हटाने और पारंपरिक क्षेत्रों में गश्त सहित अस्थायी रूप से सैन्य गतिविधि को रोकने के लिए सहमत हुए.
पूर्व रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने गलवान और पैंगोंग त्सो पर समझौते को ‘‘समर्पण’’ करार दिया. सरकार पर पारंपरिक रूप से भारत द्वारा नियंत्रित क्षेत्रों को से पीछे हटने का आरोप लगाते हुए 14 फरवरी को उन्होंने कहा, ‘‘हम अपने क्षेत्रों से हटकर सरेंडर कर रहे हैं.’’ हालांकि, सरकार दोनों देशों की सेनाओं के एक साथ पीछे हटने को एक जीत मान रही है. नई दिल्ली ने यथास्थिति यानी जो जमीनी स्थिति अप्रैल 2020 में थी, उसकी बहाली के लिए आह्वान किया था. यह हासिल किया गया है. 11 फरवरी को रक्षा मंत्रालय के एक बयान में जोर देकर कहा गया है कि भारत ने अपने किसी भी इलाके पर से अपना आधिपत्य नहीं गंवाया है. बयान में कहा गया, 'इसके विपरीत, इसने एलएसी के सम्मान और निगरानी को लागू कराया है और यथास्थिति में किसी भी तरह के एकतरफा बदलाव को रोका है.’’
2. क्या भारत ने कैलाश रेंज पर हासिल रणनीतिक लाभ गंवा दिया?
30 अगस्त को, भारतीय सेना की स्पेशल फोर्सेज की एक ब्रिगेड (लगभग 3,000 सैनिकों) ने कैलाश रेंज पर कब्जा कर लिया. सेना ने कहा कि चुशुल सब-सेक्टर में एलएसी के भीतर रणनीतिक ऊंचाइयों पर कब्जा करके जमीनी स्थिति को बदलने के चीनी इरादों को विफल कर दिया. सेना ने इसे 'जैसे को तैसा’ कदम कहा, और इससे शत्रु पक्ष दूसरी तरफ से कब्जा करने की हिमाकत नहीं कर पाया और पीछे हटने को विवश हुआ. यह सेना का एक तरह का जुआ था और उसे पता था कि इस कदम से स्थिति या तो बहुत बिगड़ जाएगी या फिर इससे हल भी निकल सकता है.
इस कदम ने चीन से बातचीत करने वाले सेना कमांडरों के हाथों में मोलभाव की ताकत दी. ज्यादा ऊंचाइयों पर बैठे होने का क्या महत्व है, इसे पीएलए से बेहतर कोई नहीं जानता था. पैंगोंग त्सो का क्षेत्र दक्षिण में अपेक्षाकृत सपाट है और यहां सैनिकों की तेजी से आवाजाही संभव है. यह लद्दाख की राजधानी लेह से सिर्फ 100 किमी दक्षिण-पूर्व में है. 1962 के युद्ध के दौरान, पीएलए ने लद्दाख में घुसने के लिए चुशुल गलियारे का उपयोग किया था. कैलाश रेंज और मागर और गुरुंग जैसी पहाडिय़ों पर कब्जा करके, भारतीय सेना मोल्डो में चीनी सैन्य चौकी पर हावी हो सकती है. बौखलाई पीएलए ने जवाब में, भारतीय सैनिकों का सामना करने के लिए अपने सैनिकों और टैंकों को और आगे किया.
कैलाश रेंज से पीछे हटने और अस्थायी नो-गो जोन सुनिश्चित करने पर सहमत होने के बारे में, भारतीय सेना का कहना है कि इसने मई 2020 वाली स्थिति बहाल कर दी है. कैलाश रेंज में भी वही स्थिति रहेगी जो 1962 के युद्ध के बाद से रही है.
3. सेनाओं को पूरी तरह हटने में कितना समय लगेगा और इसकी पुष्टि कैसे होगी?
पीछे हटने की पूरी प्रक्रिया का प्रमुख पहलू यह है कि दोनों पक्षों को यह सत्यापित करना होगा कि वे पीछे हट चुके हैं. प्रक्रिया चल रही है और वरिष्ठ भारतीय और चीनी कमांडरों को इसकी समीक्षा के लिए 22 फरवरी को मिलना है. दोनों पक्षों ने उत्तरी किनारे में सैन्य गतिविधियों पर ‘अस्थायी रोक’ के लिए सहमति व्यक्त की है. बाद के राजनयिक और सैन्य वार्ता में समझौते के बाद ही पैट्रोलिंग फिर से शुरू होगी.
एक वरिष्ठ रक्षा अधिकारी का कहना है कि पिछले साल जून के समझौते के विपरीत 10 फरवरी के समझौते में दोनों पक्ष केवल सैनिक भेजकर जमीनी स्थिति के सत्यापन की बजाए उपग्रहों और ड्रोन से सत्यापन को राजी हुए हैं. अधिकारी ने कहा, ‘‘सत्यापन पर अधिक जोर है और इसे सत्यापित करने के लिए के लिए कुछ लचीलेपन की गुंजाइश बनाकर 'हवा में उडऩे वाले यंत्रों’ के इस्तेमाल पर सहमति बनी है.’’ इसका उद्देश्य गलवान घाटी में 15 जून जैसी घटनाओं से बचना है जब भारतीय सेना यह सत्यापित करने के लिए गई थी कि क्या पीएलए वास्तव में उस पोस्ट से हट गई है जिस पर उसने कब्जा जमाया था.
4. डेपसांग और गोगरा पोस्ट जैसे अन्य विवादित क्षेत्रों में क्या होगा?
चीनियों ने पिछले अप्रैल में एलएसी पर चार स्थानों पर घुसपैठ की थी. जून में सैन्यस्तरीय वार्ता के बाद, वे गलवान घाटी से वापस चले गए, लेकिन गलवान घाटी के उत्तर में पैंगोंग त्सो के उत्तरी किनारे, हॉट स्प्रिंग्स और गोगरा पोस्ट पर डटे रहे. 11 फरवरी को जारी रक्षा मंत्रालय के एक बयान में हॉट स्प्रिंग्स, गोगरा और डेपसांग को अनसुलझे विवाद के इलाकों में रखा और कहा कि पैंगोंग त्सो से पीछे हटने की प्रक्रिया पूरी होने के 48 घंटे के भीतर इस पर भी प्रगति होगी.’’
800 वर्ग किमी में फैला डेपसांग का बंजर मैदान, लेह से 270 किमी उत्तर पूर्व में स्थित है जो काराकोरम दर्रे के पास 16,700 फुट पर स्थित दौलत बेग ओल्डी के भारतीय सेना के उत्तर के सबसे अंतिम सैन्य अड्डे के साथ लेह को जोडऩे वाली रणनीतिक दरबुक-श्योक-डीबीओ सड़क से सटा है. सेना के अधिकारियों का कहना है कि पीएलए ने चार दशकों से डेपसांग पर कब्जा जमा रखा है. पीएलए की मौजूदा तैनाती 2013 में दोनों पक्षों के बीच गतिरोध से निपटने के लिए की गई व्यवस्था के तहत थी, जिसे चुमार के मैदानों में भारतीय सेना के ‘जैसे को तैसा’ कार्रवाई के बाद हल हो गई थी.
भारतीय सेना के पांच गश्त बिंदु—पीपी10, पीपी11, पीपी11ए, पीपी12 और पीपी13—से डेपसांग मैदानों के केवल 25 प्रतिशत तक पहुंचा जा सकता है. पीएलए कई वर्षों से, भारतीय सेना को इन गश्त बिंदुओं तक जाने नहीं दे रही है. जवाबी कार्रवाई में भारतीय सेना पश्चिम में बुर्तसे के भारतीय बेस के पास के इलाके, जिसे ‘बॉटलनेक’ कहा जाता है और जिसे चीन अपनी गश्ती लाइन बताता है, में पीएलए को जाने नहीं देती है. चिंता यह है कि डेपसांग के मैदानी इलाके पर दबदबा बनाकर पीएलए ‘सब-सेक्टर नॉर्थ’ क्षेत्र और डीबीओ एयरस्ट्रिप तथा सैन्य बेस को जोडऩे वाली डीएसडीबीओ रोड का भारत से संपर्क काट सकती है. 14 कोर के पूर्व जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल राकेश शर्मा कहते हैं, ‘‘डेपसांग के मुद्दे, चाहे जब भी इसे उठाया जाए, गहन बातचीत की जरूरत होगी.’’
5. क्या और गतिरोध हो सकते हैं?
3,448 किलोमीटर लंबी और अनिर्धारित एलएसी की प्रकृति की ऐसी है कि भविष्य के गतिरोधों की पूरी संभावना दिखती हैं. पाकिस्तान के साथ 740 किलोमीटर लंबी नियंत्रण रेखा (एलओसी) का 1972 में दोनों तरफ के जनरलों ने सूक्ष्मता से सर्वेक्षण किया था, जिसके बाद उन्होंने किसी भी संदेह को दूर करने के लिए नक्शों का आदान-प्रदान किया. इसकी तुलना में, एलएसी पर भारत और चीन की धारणाएं अलग-अलग हैं.
दोनों पक्षों ने 1993 में शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए और 1996 में सीमा विवादों को रोकने के लिए विश्वास-निर्माण के उपायों (सीबीएम) को अधिसूचित किया. लेकिन तिब्बत में चीन के बुनियादी ढांचे के निर्माण और गतिरोधों के माध्यम से सीमा को लेकर नए-नए दावों ने संघर्ष की संभावना को खोल दिया है. पैंगोंग त्सो का उत्तरी तट उन नौ क्षेत्रों में से एक है जहां दोनों देशों के दावे अतिव्यापी हैं.
आर्टिलरी के पूर्व महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल पी. रविशंकर का मानना है कि अन्य सभी विवादास्पद स्थानों पर च्कोई अतिक्रमण जोन नहीं की व्यवस्था बनाई जानी चाहिए. वे कहते हैं, ‘‘यह सेनाओं को दूर रखकर संघर्ष की आशंकाओं को कम करेगा.’’
दोनों देश 2003 से सीमा मुद्दे पर चर्चा कर रहे हैं. उनके विशेष प्रतिनिधियों ने 22 दौर की वार्ता की है, आखिर वार्ता 2019 में हुई थी. विशेष प्रतिनिधि ही मानचित्र पर सीमा के सीमांकन और परिसीमन की प्रक्रिया को गति दे सकेंगे. यह एक लंबी प्रक्रिया होगी जिसके लिए दोनों देशों को लंबा रास्ता तय करना होगा. 10 फरवरी का समझौता उस प्रक्रिया के लिए समझौते का मार्ग खोल सकता है. लेफ्टिनेंट जनरल शर्मा का कहना है कि समझौते का दोतरफा असर हो सकता है: ''इसके निष्पादन में कई अड़चनें आ सकती हैं या फिर यह एलएसी के अंतिम सीमांकन और परिसीमन के लिए पहला कदम हो सकता है.’’
''पीछे हटने की प्रक्रिया के निष्पादन में कई अड़चनें आ सकती हैं या फिर यह एलएसी के अंतिम सीमांकन और परिसीमन के लिए पहला कदम हो सकता है’’
ले. जनरल राकेश शर्मा
पूर्व जीओसी, 14 कोर

