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खास रपटः फंदा कसता लालफीता

पेचीदा कानून और दोहराव से भरे नियम-कायदों की रोज आती नई-नई शर्तें भारतीय कंपनियों के पैरों में बेडिय़ों की तरह जकड़ गई हैं.

पेचीदा कानून और दोहराव से भरे नियम-कायदे
पेचीदा कानून और दोहराव से भरे नियम-कायदे
अपडेटेड 14 दिसंबर , 2020

लाइसेंस राज से तो देश काफी आगे निकल आया, पर कोई कारोबार शुरू करना और चलाना आज भी दुश्वार बना हुआ है. देश की कंपनियों को जमीन हासिल करने से लेकर श्रम और लाइसेंस कानूनों की परेशानियों और हर वक्त इंस्पेक्टरों तथा अधिकारियों की दबिश के खतरों जैसी कई चुनौतियों से लगातार दो-चार होना पड़ता है.

लिहाजा, इतनी लेट-लतीफी और लागत में इजाफा हो जाता है कि उद्यमी मोहभंग का शिकार होकर कारोबार के माकूल विदेशी ठिकानों की ओर रुख करने लगते हैं. श्रम कानूनों के मद में ही 27,000 मानकों का पालन करना पड़ता है, जो पर्यावरण, स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़े 61 कानूनों के तहत आते हैं (देखें धंधे की राह में रोड़े हजार). (कंप्लाएंस यानी कानूनी नियम-कायदों के पालन में टैक्स अदा करना या पंजीकरण कराना शामिल है. फाइलिंग में कागजात जमा करना और रिकॉर्ड रखना होता है).

नेपाल के अरबपति, चौधरी समूह के चेयरमैन और प्रेसिडेंट बिनोद कुमार चौधरी की ही मिसाल लें. चौधरी समूह होटल और खाद्य क्षेत्र दोनों से जुड़ा है (लोकप्रिय वाइ-वाइ नूडल्स बनाता है). 2010 में उन्होंने सूरत में होटल बनाने के मकसद से जमीन खरीदी, पर मंजूरी के लिए सालों की कोशिशों के बाद हाथ खड़े कर दिए.

अफसोस के साथ वे कहते हैं, ‘‘जमीन लेने और इमारत बनाने की मंजूरी हासिल करने की प्रक्रिया बेहद पेचीदा है. कारोबार में वक्त और मौके की लागत काफी मायने रखने रखती है.’’ उनका अपना अनुभव है कि कारखाना लगाना हो तो राज्य सरकारें बढ़-चढ़कर मदद करती हैं लेकिन होटल वगैरह की बात हो तो मंजूरी पाना बुरे सपने जैसा है. दूसरी मिसाल रोहन शाह की है, जो महाराष्ट्र में एक कारखाना लगाने के लिए महीनों की कोशिशों और परेशानियों की फेहरिस्त ऑनलाइन साझा कर चुके हैं.

छोटे एमएसएमई (लघु, छोटे, मझोले उद्यम) को भी भारी कानूनी पचड़ों से गुजरना पड़ता है. मसलन, उन्हें कम से कम 20 सरकारी विभागों के इंस्पेक्टरों को झेलना पड़ता है. देश में कारोबारी सहूलत मुहैया कराने पर फोकस करने वाली फर्म (टीमलीज की कंपनी) अवांतिस रेगटेक के सह-संस्थापक और सीईओ ऋषि अग्रवाल कहते हैं, ‘‘इंस्पेक्शन की प्रक्रिया इस पर आधारित नहीं कि किसी काम में कितना जोखिम है.’’ उनके मुताबिक, नियम-कायदे सेक्टर का फर्क नहीं देखते, ‘‘किसी आइटी कंपनी को भी कारखाने जैसा ही माना जाता है और इंस्पेक्टर कभी भी आ धमकते हैं.’’ 

धंधे की राह में रोड़े हजार
धंधे की राह में रोड़े हजार

केंद्र और राज्यों के कानूनों को मिलाकर उद्यमों पर 1,536 कानून लागू होते हैं, जिनमें 69,233 नियमों का पालन करना होता है और तकरीबन 6,000 फाइलिंग करनी होती है. किसी मझोले आकार की कंपनी को सालाना 5,000-10,000 नियमों का पालन करना होता है. श्रमिकों के मद में ही 42 तरह के रजिस्टर रखने पड़ते हैं. फिर 5-6 रजिस्टर तनख्वाह के अलग से. अग्रवाल का कहना है कि इन रजिस्टरों की संख्या दस तक सीमित की जा सकती है. फिर दोहरी प्रणाली की भी मिसालें हैं.

देश भर में सक्रिय ई-कॉमर्स कंपनियों को हर राज्य में जीएसटी (माल और सेवा कर) पंजीकरण कराना होता है. अवांतिस के मुताबिक, देश में एक कारखाना और 500 कर्मचारियों वाले किसी छोटे उद्यम को करीब 23 लाइसेंस की दरकार होती है, करीब 750 नियम पालन करने होते हैं और सालाना 120 फाइलिंग करनी होती है. मझोले उद्यम (करीब 5,000 कर्मचारियों वाले) को तकरीबन 5,500 नियमों का पालन करना होता है.

उद्योग संगठन फिक्की (भारतीय वाणिज्य और उद्योग परिसंघ) के इस साल जनवरी में जारी एक नोट में सरकार से कानूनी झंझटों को घटाने पर जोर दिया गया था. उसके आकलन के मुताबिक, देसी कंपनियों को 1,984 नियम-कायदों का पालन करना होता है, जिसमें 122 केंद्रीय और राज्य कानूनों के तहत मंजूरी और फाइलिंग शामिल है. कंपनी कानून में ही करीब 286 नियम पालन की बाध्यता है. कारोबारी प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए लाया गया जीएसटी अतिरिक्त बोझ डाल देता है.

खाद्य पदार्थों के कारोबार को ही लें. इस सेक्टर में केंद्रीय, राज्य और बुनियादी तीन तरह के लाइसेंस की जरूरत होती है. हरेक के लिए अलग-अलग फॉर्म भरने होते हैं और संबंधित कागजात जमा करने होते हैं. फिर विभिन्न विभागों से मंजूरी लेनी होती है. बुनियादी एफएसएसएआइ (भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण) लाइसेंस के लिए अलग-अलग फॉर्म भरने होते हैं, राज्य लाइसेंस के लिए 14 और केंद्र के लाइसेंस के लिए 16. एफएसएसएआइ की वेबसाइट के मुताबिक, ये लाइसेंस पाने में ‘60 दिन से ज्यादा’ लगते हैं, इसलिए आवेदक मंजूरी मिलने के पहले ही काम शुरू कर सकते हैं.

धंधे की राह में रोड़े हजार
धंधे की राह में रोड़े हजार

हालांकि लाइसेंस मिलने की कोई गारंटी नहीं, सो पहले काम शुरू कर देने वाली कंपनी को बाद में सारा निवेश पानी में जाता लगेगा. इस बीच उसे अधिकारियों से परेशानी झेलनी पड़ सकती है. कई दूसरे मुद्दे भी हैं. बकौल अग्रवाल, उनमंक रिकॉर्ड रखने की पेचीदा जरूरतें, विभिन्न फाइलिंग को जमा करने की अलग-अलग तिथियां, कई तरह की व्याख्या वाले अबूझ किस्म के नियम और साल भर चलने वाले नियमों में तंग करने वाले फेरबदल हैं (उनकी फर्म का आकलन है कि नियमों में सालाना करीब 2,500 फेरबदल होते हैं).

एमएसएमई फर्मों को भी बेहिसाब प्रशासकीय झंझटों से गुजरना पड़ता है. मसलन, वेतन रजिस्टर के दस अलग-अलग फॉर्मेट हैं, चार अलग-अलग दुर्घटना रजिस्टर और उतने ही हाजिरी रजिस्टर. हालांकि केंद्र सरकार ने हाल में यह बोझ कम करने के कदम उठाए हैं. देश के श्रम कानूनों को सरल बनाया गया है, 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को चार संहिताओं में सीमित कर दिया गया है, जिससे लाइसेंसों, पंजीकरण, मंजूरी और नवीकरण की जरूरतें घट जाने की उम्मीद है. मसलन, वेतनमान के मद में पुरानी व्यवस्था में न्यूनतम वेतन कानून, वेतन भुगतान कानून और बोनस भुगतान कानून के तहत हरेक के लिए एक सालाना रिटर्न दाखिल करना होता था. नई व्यवस्था में ये तीनों फाइलिंग एक अगले सालाना रिटर्न में हो जाएंगी.

छह ऊपर तो आधा दर्जन नीचे
हालांकि इन सुधारों के अमल में चुनौतियां हैं. अग्रवाल बताते हैं कि इसके लिए कई निहितस्वार्थी समूहों से निबटना होगा. सभी बेतुके भी नहीं हैं. मसलन, नई केंद्रीय संहिता में नौकरी पर रखने और हटा देने के आसान प्रावधानों का ट्रेड यूनियन विरोध कर रहे हैं. दूसरे, श्रम समवर्ती सूची का मामला है इसलिए राज्य सरकारें अपने नियम बनाएंगी, जिसका मतलब है कि चार केंद्रीय संहिताओं का गुब्बारा फूलता जाएगा.

इसी तरह, भूमि कानून पेचीदगी भरे और पुराने हैं. जमीन का इस्तेमाल कारोबार के लिए बुनियादी महत्व का मामला है, चाहे कारखाना लगाना हो या कोई इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजना. एक बड़ा मुद्दा यह है कि देश में ज्यादातर जमीन कृषि भूमि के रूप में वर्गीकृत है. विश्व बैंक के डेटा के मुताबिक, करीब 60 फीसद जमीन कृषि भूमि है. कारोबार के लिए इस जमीन के इस्तेमाल की खातिर उसे औद्योगिक ठस्तेमाल की जमीन में बदलने की जरूरत है. कई कारोबारियों का कहना है कि लैंड-यूज बदलवाना अक्सर बेहद उलझाऊ और सरकारी अधिकारियों की उगाही जैसी परेशानियों से गुजरना होता है.

धंधे की राह में रोड़े हजार
धंधे की राह में रोड़े हजार

मंजूरियों की इस अंतहीन प्रक्रिया की एक वजह यह होती है कि उसमें कई मंत्रालय जुड़े हैं. नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पानगडिय़ा अपनी किताब इंडिया अनलिमिटेड—रिक्लेमिंग द लास्ट ग्लोरी में बताते हैं कि 2018 के प्रारंभ में देश में 53 मंत्रालय थे. बड़े 19 देशों में सिर्फ श्रीलंका 51 मंत्रालयों के साथ इसके करीब था. चीन, अमेरिका और जर्मनी सभी में आधे से कम क्रमश: 25, 22 और 13 मंत्रालय थे. इसके बीच संबंध साफ है—अधिक मंत्रालय यानी अधिक अफसरशाही. ज्यादा मंत्रालय होने से निर्णय प्रक्रिया भी शिथिल हो जाती है क्योंकि उनके दायरे एक-दूसरे के क्षेत्र में जाते हैं. सो, एक से ही मामले में कई मंजूरियां लेनी पड़ती हैं.

टीमलीज कंप्लाएंस के एक आकलन के मुताबिक, देश में केंद्र के स्तर पर ही 677 कानून, 25,537 कंप्लाएंस, और 2,282 फाइलिंग की जरूरत है. वित्त और कराधान में ही 54 केंद्रीय और 62 राज्य कानून हैं, जिनमें 945 केंद्रीय कंप्लाएंस, 2,339 राज्य कंप्लाएंस, 254 केंद्रीय फाइलिंग और 736 राज्य फाइलिंग है. विश्व बैंक के आकलन से पता चलता है कि 2018-19 में भारत में कारोबार के लिए कर भुगतान की तैयारी और उसे चुकाने में औसतन 252 घंटे खर्च करने पड़े. सिंगापुर में यह दुनिया में सबसे कम 49 घंटे है.

मोदी सरकार का एक शुरुआती वादा ‘न्यूनतम सरकार’ का था. उसे पूरा करने की कोशिश हुई. जमीन अधिग्रहण कानून में बदलाव और जीएसटी तथा दिवालिया संहिता जैसे नए कानून से कारोबारी प्रक्रिया को सरल बनाने का प्रयास हुआ. लेकिन मंत्रालयों और विभागों की अनेकता ने इसे मुश्किल कर दिया. दस विभाग दस कंप्लाएंस की मांग कर सकते हैं. फिर भी, कारोबारी निवेश का रास्ता साफ करने की सरकारी संस्था इन्वेस्ट इंडिया के एमडी और सीईओ दीपक बागला का कहना है कि सरकार मंजूरी के लिए सिंगल विंडो सिस्टम का इंतजाम कर रही है.

बड़ी तस्वीर
नियम-कायदों के उल्लंघन के डर के चलते भारतीय कारोबारी विदेशों में ठिकाना बनाते हैं और भारत में दुनिया भर की बड़ी कंपनियों को जटिल अनुभवों से गुजरना पड़ता है. वैश्विक फोन कंपनी नोकिया ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उत्पादों के निर्यात के लिए स्थापित चेन्नै का कारखाना 2014 में बंद कर दिया, जब तमिलनाडु सरकार ने उसे 2,400 करोड़ रुपए का टैक्स नोटिस देकर कहा कि वह इस कारखाने में बने फोन घरेलू बाजार में भी बेच रही है.

टैक्स से जुड़े एक अलग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नोकिया इंडिया को आदेश दिया था कि वह एक एस्क्रो या निलंब खाते में 3,500 करोड़ रुपए जमा करे. उस वक्त कंपनी ने कहा था, ‘‘कर विभाग के लगाए एसेट फ्रीज (परिसंत्तियों पर रोक) ने नोकिया को सुस्थापित, पूर्णत: कार्यरत इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को...किसी उत्तराधिकारी को सौंपने का अवसर तलाशने से रोक दिया है.’’

हुरुन ग्लोबल यूनिकॉर्न इंडेक्स 2020 के अनुसार, भारतीयों ने 61 ‘यूनिकॉर्न’—1 अरब डॉलर से ऊपर मूल्य के स्टार्ट-अप—की स्थापना की है पर उनमें से 40 देश से बाहर स्थापित किए गए हैं. जो 21 फर्म भारत में हैं उनका संचित मूल्य 73.2 अरब डॉलर है; और जो विदेशों में हैं उनका मूल्य 99.6 अरब डॉलर. दुनिया की फर्नीचर की सबसे बड़ी रीटेल कंपनी आइकिया ने 2012 में भारत में दुकान खोलने का मंसूबा जताया था, पर जरूरी मंजूरियां और इजाजत लेने में छह साल लगे.

स्टील और मशीन निर्माण की बड़ी कंपनी मुकंद के को-चेयरमैन और एमडी राजेश वी. शाह अनुपालनों की भूलभुलैया के बारे में कहते हैं, ‘‘मूल जड़ यह है कि एक बार वित्तीय (अनियमितता) या (कंपनी की तरफ से) नियम अवहेलना का कोई वाकया होते ही पाबंदियां लगाने और सजा देने वाले नियम-कायदों का नया पुलिंदा आ जाता है और पूरी ताकत से लागू कर दिया जाता है. फिर नए नियमों को उलटना असंभव हो जाता है.’’

गिनती नहीं नियम कायदों की
गिनती नहीं नियम कायदों की

भारत में कारोबार करने की मुश्किलों का बोझ कम करने के लिए सरकार को एक और कोशिश यह करनी होगी कि वह ‘इंस्पेक्टर राज’ से निजात दिलाए. इनमें आयकर विभाग और साथ ही जीएसटी व्यवस्था को फेसलेस असेसमेंट की तरफ ले जाना शामिल है. इन पर काम चल रहा है. कारोबारियों की शिकायत है कि जीएसटी प्लेटफॉर्म इस्तेमाल करने वालों के पूरी तरह अनुकूल नहीं है और इसमें गलतियों की ज्यादा संभावना है.

इसी तरह, भ्रष्टाचार और निजी फायदे की खातिर नीतियों और व्यवस्था से तोड़-मरोड़ कम करने की गरज से लाए जा रहे ‘पारदर्शी कराधान’ कार्यक्रम के नतीजे अभी मिलने हैं. इधर कई कारोबारियों ने वक्त पर कर चुकाने के बावजूद उत्पीडऩ और जोर-जबरदस्ती की शिकायतें की हैं.

फिर भी सरकार ने ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के लिए कई कार्यक्रमों का ऐलान किया है. इनमें स्टार्ट-अप इंडिया और मेक इन इंडिया शामिल हैं जो कर्ज सुलभ बनाने के साथ-साथ कारोबार लगाना और मंजूरी लेने को आसान बनाने के लिए तैयार किए गए हैं. टीमलीज सर्विसेज के चेयरमैन मनीष सभरवाल कहते हैं कि यह सैद्धांतिक तौर पर कानून और उसके अमल के बीच फर्क से पैदा होता है. ‘‘भारत में 60,000 में से करीब 18,000 नियम-कायदों के लिए (पालन न करने पर) जेल मुकर्रर है.’’

इससे भ्रष्ट अफसरों के लिए वसूली आसान हो जाती है. वे आगे कहते हैं, ‘‘हमें सुधारों के लिए कोविड के मौके का इस्तेमाल करना होगा.’’ वे तीन किस्म के सुधार बताते हैं: कलम के एक झटके से हो सकने वाले सुधार, संस्थागत सुधार और क्षमता निर्माण से जुड़े सुधार. उनके शब्दों में, ‘‘क्षमता निर्माण और संस्थागत सुधारों में वक्त लगेगा, कलम के झटके से हो सकने वाले सुधार फौरन लागू होने चाहिए, और कम से कम 75 फीसद नियम-कायदे आपराधिकता की जद से हटा देने चाहिए.’’

बीते कुछ सालों के दौरान सरकार ने विश्व बैंक की ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में भारत की रैंकिंग बढ़ाने की बहुतेरी कोशिश की है. इसमें इन्वेस्ट इंडिया की स्थापना, निवेश के लिए सहूलतें पैदा करना—मंजूरियां, इजाजतें और जमीन हासिल करने में कारोबार की मदद करना, साथ ही केंद्र और राज्य सरकारों के साथ जुडऩे के वास्ते कारोबारों के लिए 'एकल खिड़की’ उपाय लागू करना—शामिल हैं. बागला कहते हैं, ''कारोबार के अवसरों की पहचान और कारोबारी योजनाओं पर निवेशकों के साथ काम करने से लेकर (कारोबार स्थापित करने के लिए) जगह की पहचान करना और तमाम मंजूरियां हासिल करने तक हर चीज में हम मदद करते हैं.’’

उम्मीद है कि इन्वेस्ट इंडिया पारदर्शिता लाएगा, सरकारी महकमों के साथ संवाद आसान बनाएगा और प्रस्तावित परियोजनाओं की व्यवहार्यता के बारे में निवेशकों को पूरा विश्लेषण मुहैया करवाएगा. बागला कहते हैं, ''हमारे यहां रिलेशनशिप मैनेजर हैं, हम (निवेशकों को) न्यू इंडिया दिखाना चाहते हैं. तमाम क्षेत्रों और शीर्ष विश्वविद्यालयों के मेधावी हमारे साथ जुड़े हैं. मेरा पहला लक्ष्य निवेशकों के लिए सिंगल विंडो बनाना और उन्हें जटिलताओं से बचाना है.’’

इस एजेंसी का काम नई नीतियों और पुराने नियमों को सरल बनाने पर सलाह देना भी है. बागला की टीम ने पाया कि केंद्रीय मंजूरियों के लिए तमाम फॉर्मों में करीब 2,000 बातें भरनी पड़ती हैं जिनमें से 1,300 फालतू या दोहराव हैं. वे बताते हैं कि 13 मंत्रालयों की मंजूरियों के लिए एक ही फॉर्म तैयार किया जा रहा है और अगले साल की पहली तिमाही तक तैयार हो जाएगा. एक डिजिटल लॉकर भी विकसित किया जा रहा है जिसमें कागजात और सर्टिफिकेट रखे जा सकते हैं.

विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में नया कारोबार शुरू करने में 29 दिन लगते हैं और 12 प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है. यूरोप और मध्य एशिया में 11.9 दिन, उच्च आय वाले ओईसीडी देशों में नौ दिन और बेहद गरीब अफ्रीकी देशों में करीब 21.5 दिन लगते हैं. कारोबार शुरू करने की प्रक्रियाओं की बात करें तो ओईसीडी देशों में ये 4.9, यूरोप में 5.2 और अफ्रीका में सहारा से दक्षिण के देशों में 7.4 हैं. भारत में कॉन्ट्रैक्ट लागू करने के मामले में भी हालत मायूसी भरे हैं. 2018-19 में यहां इसमें औसतन 1,445 दिन यानी करीब चार साल लगे.

निवेश की पसंदीदा मंजिल की तरह उभरे वियतनाम ने कर्ज की सुलभता बढ़ाने और कारोबारों के लिए रोजमर्रा का कामकाज आसान बनाने पर जोर दिया है. 2019 में अक्तूबर तक वियतनाम में एफडीआइ में सालाना आधार पर 7.4 फीसद का इजाफा हुआ. इस बीच, विश्व बैंक ग्रुप के डूइंग बिजनेस 2020 अध्ययन के मुताबिक, चीन ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के मामले में लगातार दूसरे साल दुनिया की दस शीर्ष सबसे अधिक सुधार करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में आ गया है.

विश्व बैंक के विश्लेषण के मुताबिक, चीन ने छोटे और मझौले उद्यमों के लिए घरेलू कारोबारी माहौल में सुधार लाने पर ध्यान दिया—2019 में उसके बुनियादी सुधारों में भवन निर्माण की इजाजत और बिजली कनेक्शन लेने की प्रक्रिया को आसान बनाना और बिजली शुल्क की दरों में पारदर्शिता बढ़ाना शामिल था. विश्व बैंक के भारत के विश्लेषण से पता चला कि दिल्ली और मुंबई में निर्माण की इजाजत हासिल करना कहीं ज्यादा आसान हो गया था; इन शहरों में निर्माण की इजाजत लेने के लिए 19 प्रक्रियाएं हैं और उनमें करीब 98 दिनों का वक्त लगता है. पूरे दक्षिण एशिया की बात करें तो यह आंकड़ा 149.7 दिन और 14.6 प्रक्रियाओं का है.

आगे का रास्ता
कई देशों ने ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के एजेंडे पर संगठित तौर पर जोर लगाया है. उन्होंने निर्माण की अनुमतियों, बिजली के कनेक्शन और कर्ज की सुलभता के लिए तेज रफ्तार मंजूरियों पर ध्यान दिया है. भारत में भी कई चीजों पर ध्यान दिया गया है. इसका संघीय ढांचा किसी एक राज्य में वरदान और दूसरे राज्य में अभिशाप हो सकता है. इसकी धीमी रक्रतार से साफ दिखता है कि सरकार में सुधारों पर विशेष जोर देने और उन्हें लागू करने के संकल्प का अभाव है.

उसने श्रम और कराधान से जुड़े कुछ बड़े सुधार अंजाम तक पहुंचाए हैं लेकिन अमल की बारीकियों पर ध्यान दें तो पता चलता है कि इन सुधारों का जमीन पर वांछित नतीजा सामने नहीं आया है. सरकार को उन बड़े क्षेत्रों की पहचान करनी होगी जिनसे कारोबार में रुकावट आती है. रोड़े अटकाने वाले मुद्दों से उसे व्यवस्थित ढंग से निबटना होगा. मसलन, कर्ज आसान बनाना होगा और पक्का करना होगा कि बिजली का कनेक्शन तय समय के भीतर मिल जाए.

जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया आसान बनाने के लिए सरकार ने सितंबर में एक वेबसाइट लॉन्च की जिसमें कुछ राज्यों में मौजूद लैंड-बैंक के ब्योरे हैं, हालांकि केंद्र के दूसरी कोशिशों की तरह ही इस पर भी अभी काम चल ही रहा है. नए कानूनों को मंजूरियां दी गई हैं लेकिन गैरजरूरी कानून रद्द करने की प्रक्रिया धीमी ही है.

इस प्रक्रिया को शुरू करने के लिए 2015 में निरसन और संशोधन अधिनियम पारित किया गया था. सबसे पहले खत्म किए गए कुछ कानूनों में भारतीय मत्स्य कानून 1897 और विदेशी अधिकारिता कानून 1947 थे. भारतीय विधि आयोग ने पुराने और बेकार कानूनों पर अपनी 248वीं, 249वीं, 250वीं और 251वीं रिपोर्टों में 289 कानूनों को रद्द करने की सिफारिश की है, जिनमें राज्य सूची के 62 कानूनों की पहचान की गई थी.

इसी तरह, पीएमओ की बनाई रामानुजम समिति ने 1,741 कानून रद्द करने की सिफारिश की, जिनमें 83 कानून राज्य विधानमंडलों के थे. 2015 में राज्य सरकारों को एक जरूरी चिट्ठी भेजी गई और विभिन्न समितियों के पहचाने गए पुराने और बेकार कानूनों को रद्द करने के लिए कहा गया. केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के मुताबिक, मोदी सरकार 1,458 पुराने और बेकार कानूनों को रद्द कर चुकी है. इनमें शामिल है किराये की बग्घी कानून 1979 और ड्रामैटिक परफॉर्मेंस कानून 1876, जिस दौरान थिएटर का इस्तेमाल ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के लिए किया जाता था.

फिर ढांचागत मुद्दे भी हैं. मसलन, भारत का राजनैतिक पारिस्थितिकीय मंत्र अपनी जटिलताएं लेकर आता है. उनमें से एक है कि मंत्रालयों को खालिस प्रशासनिक एजेंसी की बजाए, ऐसी जागीरों के तौर पर भी देखा जाता है जो राजनैतिक भागीदारों को काम या गठबंधन के एवज में इनाम देने के काम आती हैं. एक और मुद्दा, जो पानगडिय़ा ने किताब में उठाया है, कि भारत में ढेर सारे मंत्रालयों का होना घोर नाकारापन को जन्म देता है.

भारत में इस्पात, कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स, इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, खदानों, रसायनों और उर्वरकों के लिए अलग-अलग मंत्रालय हैं. उनके कामकाज में दोहराव होने के अलावा कई मंत्रालयों का एक दूसरे से खरीद-फरोक्चत भी नाकारापन और अक्षमताएं बढ़ाता है. एक ही सेक्टर वाले मंत्रालय घाटा देने वाले और बीमार कई उद्यमों को बंद करने में रुकावट बनते रहे हैं. वे कई मंत्रालयों को चरणबद्ध ढंग से बंद करने और कई अन्य को आपस में मिलाने का सुझाव देते हैं ताकि क्षमताओं में इजाफा किया जा सके.

मसलन, सड़क, जहाजरानी, नागरिक उड्डयन और रेलवे मंत्रालयों के स्थान पर एक परिवहन मंत्रालय हो सकता है. इसी तरह, कोयला, बिजली, पेट्रोलियम और गैस तथा नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालयों की जगह एक ऊर्जा मंत्रालय हो सकता है. अल्पसंख्यक मामलों, आदिवासी मामलों, महिला और बाल विकास और सामाजिक न्याय और सशक्ति करण सरीखे सामाजिक कल्याण मंत्रालयों को एक मंत्रालय में मिलाया जा सकता है. कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय का विलय मानव संसाधन विकास मंत्रालय में किया जा सकता है.

भारत की कुख्यात अफसरशाही और कानूनों के प्रति उनके प्रेम-प्यार पर लगाम कसने के लिए चरणबद्ध नजरिये की जरूरत होगी. इसमें रवैए में बदलाव लाने और जिम्मेदारी तय करने से लेकर मंत्रालयों और महकमों की संख्या में कमी लाना और बेकार तथा पुराने कानूनों को खत्म करना शामिल है. इसके लिए राजनैतिक तौर पर कठिन फैसले लेने और उन्हें अचूक ढंग से लागू करने की जरूरत होगी.

संभरवाल राज्यों में नियम-कायदे संबंधी आयोगों की स्थापना की वकालत करते हैं, जो तमाम दस्तावेजों और नियम-कायदों की प्रासंगिकता की 90 दिनों के भीतर समीक्षा करें. वे कहते हैं कि तमाम बेकार और दोहराव पैदा करने वाली चीजों की पहचान करके उन्हें रद्द कर दिया जाना चाहिए.

सुधार के लिहाज से राजकाज में टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा किया जा रहा है. एक दशक पहले सांसद भी बमुश्किल ही आधिकारिक ई-मेल का इस्तेमाल करते थे. और इनसानी संपर्क के बिंदु जितने कम होते हैं, निजी फायदे के लिए नियमों में तोड़-मरोड़ भी उतनी ही कम हो जाती है. श्रम सुधार और राज्यों के बीच निवेश के लिए प्रतिस्पर्धा भी सुधार के एजेंडे के लिए अच्छे हैं. साथ ही, नीतिगत कार्रवाई मानसिकता में बदलाव के साथ-साथ आई है; चौधरी कहते हैं कि पुराने और घिसे-पिटे कानूनों और मानसिकता का मेल अक्सर जबरदस्त चुनौती पेश करता है.

राज्यों ने दिखाया रास्ता
राज्य स्तर पर कुछ प्रशासन ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में सुधार के लिहाज से अलग और ऊंचे दिखाई देते हैं. तेलंगाना ऐसा ही राज्य है जिसने इंस्पेक्टर राज खत्म करने और कारोबार चलाने में आने वाली तकलीफों को दूर करने में ऊंची छलांग लगाई है. यहां एकल खिड़की स्वीकृति नीति है जहां तमाम मंजूरियां 30 दिनों के भीतर दे दी जाती हैं. अगर कोई महकमा तय समयावधि के भीतर जवाब नहीं देता है तो मान लिया जाता है कि मंजूरी मिल गई है और साथ ही प्रभारी सरकारी अफसर से जुर्माना भी वसूला जाता है.

कर्नाटक ऐसा ही दूसरा राज्य है. राज्य सरकार ने तय किया है कि उद्योग जिला या राज्य स्तर पर संबंधित मंत्रालयों से बुनियादी मंजूरियां मिलने के फौरन बाद, बहुत सारी मंजूरियों का इंतजार किए बगैर, अपना कामकाज शुरू कर सकते हैं. उत्तर प्रदेश एक और राज्य है. सितंबर के पहले हफ्ते में सरकार ने जो सालाना ईज ऑफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग जारी की, उसमें उत्तर प्रदेश ऊंची छलांग लगाते हुए और गुजरात, तेलंगाना, राजस्थान और महाराष्ट्र सरीख राज्यों को पीछे छोड़ते हुए दूसरी पायदान पर आ गया है.

इसने उद्योग और आंतरिक व्यापार को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार की तरफ से सुझाए गए 187 में से 186 सुधार लागू कर दिए हैं. उत्तर प्रदेश की एकल खिड़की मंजूरी व्यवस्था, निवेश मित्र पोर्टल को राज्य का सबसे बड़ा सुधार बताया जा रहा है. कई अन्य राज्यों ने भी श्रम कानूनों को आसान बनाने और अपने कारोबारी माहौल में सुधार लाने के लिए कई कदम उठाए हैं.

राजस्थान ने राज्य में निवेश में तेजी लाने के लिए वन स्टॉप ठिकाना स्थापित किया है. उत्तर प्रदेश ने भी एमएसएमई को उनके आवेदन मिलने के 72 घंटे के भीतर अपना कामकाज शुरू करने की इजाजत दे दी है. राज्य ने अपने यहां 100 इंक्यूबेटर स्थापित करने के लिए एक स्टार्ट-अप नीति को भी मंजूरी दी है. अरुणाचल प्रदेश ने 12 श्रम कानूनों के तहत आत्म-प्रमाणन की इजाजत दे दी है.

भारत निवेश की मंजिल के तौर पर उभरे, इसके लिए केंद्र को दूरदर्शिता और विश्वास के साथ अगुआई करनी होगी और राज्यों को नियम-कायदों को आक्रामक ढंग से सरल और कारगर बनाना होगा और पारदर्शिता लानी होगी. कोविड-19 के संकट ने लाल फीते को लाल कालीन से बदलने के एक मौका पेश किया है. 

—साथ में एम.जी. अरुण

केंद्र और राज्यों के नियम-कायदों को जोड़ें तो उद्यमों पर 1,536 कानून लागू होते हैं, साथ में 69,233 शर्तें हैं और 6,000 फाइलिंग करनी पड़ती हैं

भारत में ज्यादातर जमीन खेती वाली मद में है. प्रयोग के लिए किसी फर्म को इसे पहले औद्योगिक इस्तेमाल वाली जमीन में बदलवाना पड़ता है, जहां सब भ्रष्ट बाबुओं की दया पर होता है


नियमों का बोझ इस बात पर निर्भर है कि वह काम कितने मंत्रालयों से जुड़ा है; ज्यादा मंत्रालय यानी ज्यादा नौकशाही, ज्यादा लालफीताशाही
विनोद कुमार चौधरी, चेयरमैन और प्रेसिडेंट, चौधरी ग्रुप

‘‘जमीन और इमारत के लिए मंजूरी लेने की प्रक्रिया बेहद जटिल है. बिजनेस में तो किसी चीज का समय और दूसरे, अवसर की लागत ही तो मायने रखते हैं’’
ऋषि अग्रवाल, सह-संस्थापक और सीईओ, अवांतिस रेगटेक

‘‘निरीक्षण की प्रक्रिया में यह भी नहीं देखा जाता कि किस कंपनी में किस तरह का जोखिम है, है भी या नहीं. उनके लिए आइटी कंपनी भी दूसरी फैक्ट्रियों जैसी है, जहां कोई भी इंस्पेक्टर कभी भी आकर धमक सकता है’’
राजीव वी. शाह, मैनेजिंग डायरेक्टर, मुकंद

‘‘हद से ज्यादा नियम-कायदे बनाए जाने के पीछे की वजह दरअसल यह है कि जब भी कोई वित्तीय अनियमितता या नियमों की अनदेखी होती है तो फटाक से नए प्रतिबंध और दंडात्मक नियम-कायदे बना दिए जाते हैं—इन्हें हटा पाना नामुमकिन है’’
मनीष सभरवाल, चेयरमैन, टीमलीज सर्विसेज

‘‘भारत में 60,000 में से 18,000 नियम-कायदे ऐसे हैं, जिनका पालन न करने पर जेल की सजा का प्रावधान है. इनमें से कम से कम 75 फीसद नियम-कायदों को तो आपराधिक हदों से बाहर निकालना चाहिए’’

गिनती नहीं नियम-कायदों की
-60,000 नियम-कायदों में से 18,000 तो ऐसे हैं, जिन्हें न मानने पर जेल का प्रावधान है हालत यह है कि औसतन आठ नियम यहां रोज बदले जा रहे हैं

हर साल यहां करीब 2,500 नियम-कायदों में बदलाव होता है
स्रोत: अवांतिस रेगटेक

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