scorecardresearch
डार्क मोड

खास रपटः रास्ता बदलती भारतीय रेल

रेलवे ने नकदी संकट से उबरने और भविष्य की बेहतरी के लिए निजी पूंजी पर ध्यान केंद्रित किया है. वैसे तो यह बहुत बड़ा बदलाव है लेकिन सुधारों को तेजी से और स्थिरता के साथ लागू किए बगैर अंजाम तक पहुंच पाना मुश्किल

लीक से हटकर निजी हाथों से संचालित देश की पहली ट्रेन तेजस एक्सप्रेस 4 अक्तूबर 2019 को लखनऊ से दिल्ली के लिए रवाना होने से पहले
लीक से हटकर निजी हाथों से संचालित देश की पहली ट्रेन तेजस एक्सप्रेस 4 अक्तूबर 2019 को लखनऊ से दिल्ली के लिए रवाना होने से पहले
अपडेटेड 18 सितंबर , 2020

केंद्र सरकार ने आखिरकार रेलवे के निजीकरण का पिछले दिसंबर में लिया गया बहुप्रतीक्षित ऐतिहासिक फैसला 3 सितंबर को लागू कर दिया. कैबिनेट की नियुक्ति संबंधी समिति ने 165 साल पुराने संगठन की शीर्ष निर्णायक समिति रेलवे बोर्ड का औपचारिक रूप से पुनर्गठन करते हुए इसके चेयरमैन विनोद कुमार यादव को बोर्ड का पहला सीईओ नियुक्त किया. 114 साल पुराने, आठ सदस्यीय बोर्ड की जगह चार सदस्यीय नए बोर्ड ने ले ली. बुनियादी ढांचा, डिब्बे, वित्त और संचालन की चारों अलग, स्पष्ट भूमिकाओं के साथ. अगुआ सीईओ यादव मानव संसाधन का जिम्मा संभालेंगे. दूसरे सदस्यों की बराबरी के दर्जे वाले चेयरमैन से उलट बोर्ड का सीईओ, किसी मुद्दे पर सहमति न बनने की स्थिति में सदस्यों का फैसला उलट सकता है.


भारतीय रेलवे को एक आधुनिक, सक्षम और मुनाफे वाली सरकारी परिवहन इकाई बनाने के लिए पीयूष गोयल की अगुआई वाले रेल मंत्रालय में सुधारों के लिहाज से बोर्ड का यह नया कॉर्पोरेट ढांचा बेहद अहम कड़ी है. यह पुनर्गठन यूरोप और अमेरिका में रेल संचालन की तर्ज पर हो रहा है. रेलवे में जान डालने के लिए इसमें निजी पूंजी लाने के गोयल के साहसिक कदमों को भी बड़ी जिज्ञासा के साथ देखा जा रहा है.


1 जुलाई को रेल मंत्रालय ने निवेशकों से न केवल निजी पैसेंजर ट्रेनों के डिजाइन, निर्माण, वित्त और संचालन बल्कि खुद उनका मालिकाना हक हासिल करने को आवेदन (रिक्वेस्ट फॉर क्वालिफिकेशन/आरएफक्यू) मांगे थे. 1951 में रेलवे के राष्ट्रीयकरण के बाद से ही पैसेंजर ट्रेनों पर सरकारी एकाधिकार रहा है. अक्तूबर 2019 में रेलवे ने एक पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर नई दिल्ली-लखनऊ रूट पर तेजस एक्सप्रेस ट्रेन के मालिकाने और उसके लिए निजी ऑपरेटर जुटाने के वास्ते अपने ही एक सहायक उपक्रम आइआरसीटीसी (इंडियन रेलवे कैटरिंग ऐंड टुरिज्म कॉर्पोरेशन) को मंजूरी दी थी. इस कॉन्सेप्ट को खास कामयाबी मिल नहीं पाई. अब पैसेंजर ट्रेनों का मालिकाना और संचालन दोनों निजी हाथों में दिए जाने का प्रस्ताव गेमचेंजर साबित हो सकता है.


इसी सिलसिले में रेलवे के आला अफसरों ने 13 अगस्त को संभावित निवेशकों के साथ दूसरे दौर की वर्चुअल मीटिंग की. आरएफक्यू दस्तावेज के मुताबिक, रेल मंत्रालय की देश भर में 109 मार्गों पर (12 क्लस्टर में) 151 निजी पैसेंजर ट्रेनें चलाने की योजना है. निवेशकों को न केवल रेल भाड़ा निर्धारित करने, बल्कि विज्ञापनों के लिए स्थान देने जैसे अन्य तरीकों से बाजार से अतिरिक्त राजस्व पैदा करने की भी स्वतंत्रता होगी. अगर सब कुछ तय योजना के अनुसार रहा तो 12 निजी रेलगाड़ियों के पहले बैच का परिचालन 2023 तक शुरू हो जाएगा और 2027 के अंत तक सभी 151 निजी रेलगाड़ियां पटरी पर उतर जाएंगी. एक बोली प्रक्रिया के जरिए चुने गए ऑपरेटरों को 35 वर्षों की अवधि के लिए कम से कम 16 डिब्बों वाली अपनी ट्रेनें चलाने की अनुमति दी जाएगी. रेलवे की 2,800 एक्सप्रेस/मेल ट्रेनों से इन निजी ट्रेनों की सीधी प्रतिस्पर्धा होगी.


इस पहल के लिए इससे निर्णायक मौका शायद ही कोई होता. भारतीय रेल का नेटवर्क दुनिया में चौथा सबसे बड़ा है. अपनी 13,523 ट्रेनों से रोज 2.3 करोड़ से ज्यादा मुसाफिरों को ढोने वाला रेलवे भयंकर रूप से नकदी संकट का सामना कर रहा है. यात्री टिकटों की बिक्री से यह परिचालन लागत का यही कोई 57 प्रतिशत ही पूरा करता है. माल ढुलाई से होने वाली कमाई के जरिए क्रॉस सब्सिडी देकर उसकी भरपाई की जाती है. पिछले साल सरकार ने कहा कि रेलवे को अपने चरमराते बुनियादी ढांचे को उन्नत करने के लिए अगले दशक में 50 लाख करोड़ रुपए चाहिए होंगे.


यह भारी-भरकम रकम वर्तमान में सभी क्षेत्रों में मिलाकर सरकार के कुल खर्च की दोगुनी है और केवल सरकारी खजाने से इसका इंतजाम नहीं किया जा सकता. निजी पूंजी की सख्त जरूरत होगी. भारतीय रेलवे निजी निवेश को आकर्षित करने के लिए काफी लचीलापन दिखा रहा है. 21 जुलाई को निवेशकों के साथ आवेदन-पूर्व बैठकों के पहले दौर के बाद, इसने बोली दस्तावेज की जरूरी शर्तों को हल्का कर दिया, जिससे ऑपरेटरों को इंजन और डिब्बों की अनिवार्य खरीद की बजाए ट्रेनों को पट्टे पर देने की अनुमति मिल गई, अधिकतम तीन क्लस्टर के लिए बोली लगाने की बाध्यता हटा दी गई और कई शुल्क संरचनाओं में भी कटौती कर दी गई.

योजना निजी ट्रेनों की
13 अगस्त की बैठक में 23 कंपनियों के हिस्सा लेने के साथ एक अच्छी शुरुआत हुई. इनमें फ्रांस की एल्स्टॉम की भारतीय इकाई, स्पेनिश सीएएफ, कनाडाई कोच-बिल्डर बॉम्बार्डियर ट्रांसपोर्टेशन, भारत फोर्ज, जीएमआर इन्फ्रास्ट्रक्चर और एलऐंडटी इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स, भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड, बीईएमएल और आइआरसीटीसी शामिल थीं. जिन 12 क्लस्टर की योजना बनाई गई है, उनमें से चार मुंबई और दिल्ली (प्रत्येक में दो) और बाकी आठ जयपुर, हावड़ा, चंडीगढ़, बेंगलूरू, पटना, सिकंदराबाद, प्रयागराज और चेन्नै केंद्रित होंगे. रेलवे का साठ फीसद ट्रैफिक इन्हीं मार्गों पर है. रेलवे को उम्मीद है कि पहले दो डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (डीएफसी)—उत्तर प्रदेश के दादरी से मुंबई (पश्चिम) तक और लुधियाना से कोलकाता (पूर्व) के पास डानकुनी तक—दिसंबर 2021 तक शुरू हो जाने पर 70 फीसद मालगाड़ियां उधर शिक्रट हो जाने से और पैसेंजर ट्रेने शुरू करने की जगह बन जाएगी. शीर्ष अफसरों का कहना है कि पैसेंजर और माल यातायात हर साल 4-6 फीसद की दर से बढ़ रहा है. डीएफसी से जाम घटाने में मदद मिलेगी और ट्रैक उपलब्ध होने से पैसेंजर ट्रेन ज्यादा रफ्तार से चल पाएंगी. अफसरों के मुताबिक, हर नई लाइन से क्षमता में 1.6 गुना बढ़ जाती है.


निजी ऑपरेटरों की मदद से रेलवे यहीं पर छिपी संभावनाओं को दुहना चाहती है. ये ऑपरेटर उसे रेलवे ढांचे के उपयोग की एवज में हॉलेज चार्ज, खपत के मुताबिक बिजली-डीजल चार्ज और कुल कमाई का एक हिस्सा देंगे.  रेलवे बोर्ड के चेयरमैन यादव ने इंडिया टुडे को बताया कि मार्च 2021 तक स्वीकृति के पत्र जारी करने का लक्ष्य है, ताकि निजी ट्रेनें अप्रैल 2023 तक परिचालन शुरू कर सकें.


रेलवे का अनुमान है कि निजी ट्रेन ऑपरेटर कम से कम 22,500 करोड़ रु. का निवेश लाएंगे और पैसेंजर ढुलाई की क्षमता भी बढ़ाएंगे. रेलवे की एक रिपोर्ट बताती है कि दिसंबर 2019 में समाप्त हुए कैलेंडर वर्ष में 5 करोड़ यात्रियों की वेटिंग कन्फर्म नहीं हो सकी थी. उनमें से ज्यादातर निजी ट्रेनों के लिए चिन्हित 12 क्लस्टर में हैं. बड़ा लक्ष्य रेलवे परिचालन में भारी निजी पूंजी निवेश आकर्षित करना है और आगे के चरणों में निजी मालगाडिय़ां भी चलाई जाएंगी. यादव की अगुआई में सचिवों का एक समूह इसकी प्रक्रिया तय करने पर काम कर रहा है. इन सबसे निजी क्षेत्र को इंजन और डिब्बों के निर्माण को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है और रेलवे के साथ एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा शुरू होगी जिसके पास इंजन, वैगन और कोच उत्पादन के 11 कारखाने हैं.


रेलवे को अपने बुनियादी ढांचे में निवेश करने और दूरदराज के क्षेत्रों में सेवाओं का विस्तार करने के लिए बड़ी पूंजी की दरकार है. पिछले एक दशक के दौरान, इसका परिचालन अनुपात 90 प्रतिशत से ऊपर रहा है, यानी एक रुपया कमाने को उसे 90 पैसे से ज्यादा खर्चने पड़े हैं. इसकी तुलना में अमेरिका, रूस, चीन और यूरोपीय संघ में रेलवे का परिचालन अनुपात 55-60 प्रतिशत है. लेकिन उनका ढांचा अलग है. मसलन ज्यादातर देशों में माल ढुलाई और यात्री कारोबार अलग-अलग हैं. साथ ही भारतीय रेल रिटायर्ड कर्मचारियों को पेंशन देती है (2003 में पेंशन फंड लाया गया) जिसका उसकी सेहत पर बहुत ज्यादा असर है.

निजी पूंजी से बदल जाएगी रेलवे की सूरत?
विशेषज्ञों का कहना है कि निजी पूंजी क्षमता और सेवाओं में सुधार के लिए जरूरी रकम मुहैया कराके इसके मौके तो दे सकती है लेकिन रेलवे में असल बदलाव व्यापक सुधारों के साथ ही आएगा. एक पूर्व रेल मंत्री का कहना है कि इस जटिल संगठन में सुधार के लिए रेलवे को अपने 13 लाख कर्मचारियों का व्यवहार बदलने की जरूरत होगी. उसे अपने बहुत-से कामों—रेल परिचालन की देखरेख, नीति निर्माण और नियामक के रूप में दोहरी जिम्मेदारी—में कटौती करनी होगी और एक कॉर्पोरेट इकाई की तरह काम करना होगा. पिछले तीन दशक में कम से कम 12 समितियों ने रेलवे के बारे में रिपोर्ट देकर बताया है कि आखिर रेल बीमार क्यों है. हालिया रिपोर्ट जून 2015 में बिबेक देबरॉय पैनल ने दी थी. उसने संरचनात्मक बदलावों, रेल को अपने ऊपरी खर्चों में थोड़ी कमी लाने और इसे निजी पूंजी के लिए खोलने की सिफारिश की थी.


सितंबर 2017 में सुरेश प्रभु से कार्यभार लेने के बाद गोयल ने रेलवे के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण तैयार किया है. उन्होंने सेवाओं का विलय, निजी ऑपरेटरों के लिए ज्यादा जगह और एक कॉर्पोरेट कामकाजी ढांचा जैसे सबसे कठिन सुधारों में से कुछ को लागू करने का बीड़ा उठाया. पर यात्री परिचालन में निजी ऑपरेटरों का प्रवेश आसान बनाने के लिए गोयल को कुछ अहम सुधार तेज करने होंगे, विशेष रूप से एक रेल नियामक की स्थापना, रेलवे बोर्ड को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाना, कार्यबल का एकीकरण, संचालन और निर्माण कार्य को एक कॉर्पोरेट स्वरूप देना, अधिक पारदर्शिता के लिए रेलवे को एक विभागीय उद्यम रखने की बाए उसे सार्वजनिक उपक्रम में बदलना और राजकोषीय खामियों को दूर करना.
 
मुकाबले के लिए बराबर की जमीन
हालांकि रेलवे के साथ निजी क्षेत्र का पिछला अनुभव कड़वा रहा है जब लालू प्रसाद यादव की अगुआई में मंत्रालय ने 2006 में माल ढुलाई को निजी क्षेत्र के लिए खोला था. सोलह निजी ऑपरेटरों ने करीब 6,000 करोड़ रुपए के निवेश के साथ प्रवेश किया. कंटेनर ट्रेन ऑपरेटर्स एसोसिएशन के डेटा से पता चलता है कि अगस्त 2020 तक उन्हें 600 करोड़ रुपए का नुक्सान हुआ था. ऑपरेटर्स इस नुक्सान की मुख्य वजह पिछले 14 साल में हॉलेज चार्ज दोगुना किए जाने को मानते हैं. यह अब उनकी परिचालन लागत का 60-70 प्रतिशत है.


अर्नस्ट ऐंड यंग के एक पार्टनर राजाजी मेश्राम कहते हैं, ''माल ढुलाई ऑपरेटरों के साथ जो हुआ, ऐसे वाकए यात्री ट्रेन में निवेश को उत्सुक निजी ऑपरेटरों के मन में संदेह पैदा करते हैं.'' ऑपरेटर्स ढुलाई प्रभार पर स्पष्टता चाहते हैं. निजी पैसेंजर ट्रेनों के लिए रेलवे ने 2019-20 के लिए 52.31 रुपए प्रति ट्रेन किमी के हिसाब से हॉलेज चार्ज तय किया है जिस पर महंगाई सूचकांक भी प्रभावी होगा. निवेशकों को यह भी चिंता है कि ये ट्रेनें चलाने से उनका राजस्व परिचालन, आवंटित समय, उस रूट पर भीड़ और उनकी तरफ से यात्रियों को दी जाने वाली सुविधाओं पर निर्भर करेगा.


यादव का कहना है कि हितधारकों के साथ विचार-विमर्श के आधार पर बोली दस्तावेजों को बेहतर बनाया जा रहा है. लेकिन अभी तक इस बात को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है कि ट्रेन चलाने के समय के आवंटन में निष्पक्षता कैसे पक्की की जाएगी. अभी ट्रेनों के लिए एक सालाना टाइम-टेबल तैयार होता है. ट्रैफिक और मुनाफे के लिए टाइम स्लॉट को निर्णायक बताते हुए एक सीईओ सवाल करते हैं, ''अगर कोई विवाद खड़ा होता है तो उसे कैसे हल किया जाएगा?''

एल्स्टॉम के भारत और दक्षिण एशिया व्यवसायों के पूर्व एमडी भरत सल्होत्रा का कहना है कि जब तक रेल नियामक नहीं बनाए जाते, तब तक चीजें अप्रत्याशित रहेंगी. अप्रैल 2017 में प्रभु ने किराए और मालभाड़े को तर्कसंगत बनाने, ग्राहकों के हितों की रक्षा करने और प्रदर्शन मानदंड निर्धारित करने के लिए रेल विकास प्राधिकरण जैसे एक नियामक की स्थापना के लिए केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी प्राप्त की थी. हालांकि उस प्राधिकरण का गठन अभी तक नहीं हुआ है. यादव कहते हैं, ''2023 में निजी ट्रेनों के शुरू होने से पहले हम नियामक की रूपरेखा भी बना लेंगे.''

नियामक की भूमिका में यात्री किराए और माल भाड़े को तर्कसंगत बनाने का राजनैतिक रूप से विवादास्पद मुद्दा भी शामिल है. 2012 में, तत्कालीन रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने किराए में दो पैसे प्रति किमी वृद्धि का प्रस्ताव रखा तो मंत्रालय से हाथ धोना पड़ गया था. सरकार यात्री किराए में हर साल बड़े पैमाने पर क्रॉस-सब्सिडी देती है. यात्री परिचालन के घाटे की भरपाई माल ढुलाई से हुई कमाई से की जाती है. पिछले वित्त वर्ष में रेलवे ने अपनी कुल कमाई 1.43 लाख करोड़ रुपए बताई जिसमें से 56,000 करोड़ रुपए ही यात्री किराए से आए. इसने औसतन एक टन माल ढुलाई के लिए प्रति किमी 1.44 रु. कमाए जबकि एक यात्री को एक किमी यात्रा कराने के लिए केवल 35 पैसे वसूले.

उम्मीद होगी कि एक रेल नियामक क्रॉस-सब्सिडी में कटौती करके ऐसी विसंगतियों को दूर करे. इस साल जनवरी में गोयल ने गैर-एसी ट्रेनों का किराया प्रति किमी एक पैसे और एसी ट्रेनों के लिए दो पैसे बढ़ाया. पांच साल में पहली बार हुई इस बढ़ोतरी से 2,312 करोड़ रु. की अतिरिक्त कमाई होगी. रेलवे बोर्ड के एक सदस्य केवल निजी गाडिय़ों के लिए ही एक नियामक बनाने का सुझाव देते हैं, लेकिन सल्होत्रा इसे अव्यावहारिक मानते हैं. रेलवे उनकी जरूरतें कैसे पूरी करता है, निजी खिलाड़ियों के लिए यह अहम मुद्दा होगा. एक अनुमान के अनुसार, 151 निजी गाडिय़ों को चलाने के लिए कम से कम 3,000 नए कोच और 400 इंजनों की समयबद्ध आपूर्ति की आवश्यकता होगी.

गाड़ी पटरी पर लाने की युक्ति
रेलवे की कमाई अपेक्षित रफ्तार से बढ़ नहीं पा रही है. एक रुपया कमाने के लिए लगने वाली उसकी लागत लगातार ज्यादा बने रहना इस ओर भी इशारा है कि वह अपनी क्षमता का ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पा रही. 2019-20 में उसने सिर्फ 3,774 करोड़ रु. का सरप्लस पैदा किया. पूंजी खर्च का 65 फीसद एक्स्ट्रा बजटरी फंड से जुटाया जाता है, जिसे रेलवे ने बाजार से उठाया जाता है. ये ऐसे प्रोजेक्ट हैं, जिन पर रेलवे को निवेश पर दो अंकों में मुनाफा मिलने की उम्मीद है. अब एक नए तरह का बोर्ड गठित हो जाने के बाद भारतीय रेल को देरसबेर एक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (पीएसयू) की शक्ल में आना पड़ेगा. इससे न सिर्फ और निवेश के लिए अवसर पैदा होंगे बल्कि पारदर्शिता, कार्यक्षमता और प्रतिस्पर्धी भावना भी बढ़ेगी.

यादव कहते हैं कि नए ट्रैक, गेज परिवर्तन और विद्युतीकरण में निवेश जारी है. रेलवे ने 58 परियोजनाओं को सबसे महत्वपूर्ण परियोजना के रूप में चिन्हित किया है और उन्हें प्राथमिकता दी है. इनमें से 21 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं और अन्य 3 दिसंबर तक पूरी हो जाएंगी. कोविड के कारण यात्री सेवाएं ठप हो गईं, लेकिन लॉकडाउन ने रेलवे को यार्डों की नए सिरे से मॉडलिंग, पुलों की मरम्मत, उन पर नए गर्डर डालने, रेल लाइनों का दोहरीकरण और विद्युतीकरण और सीजर क्रॉसओवर के नवीनीकरण जैसी पुरानी लंबित परियोजनाओं को पूरा करने के लिए अवसर दे दिया.

निजी खिलाड़ी 12 क्लस्टरों में से सबसे व्यस्त दिल्ली-कोलकाता और दिल्ली-मुंबई मार्गों पर ज्यादा रुचि ले रहे हैं. हरेक के लिए 6,000 करोड़ रु. के बजटीय आवंटन के साथ पिछले दो वर्ष से रेलवे इन रेलखंडों में बुनियादी ढांचा सुधार रहा है. मेश्राम कहते हैं, ''कॉर्पोरेट्स इन मार्गों पर मजबूत यातायात के लिए आश्वस्त हैं. बुनियादी ढांचे को उन्नत किया जाए, तो उस पर अच्छी प्रतिक्रिया मिलेगी.'' भारतीय रेल की पटरियों पर निजी गाडिय़ों को उतारने के उद्देश्य में ये सारी बातें महत्वपूर्ण साबित होंगी.

ADVERTISEMENT
Advertisement