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हिचकोले खाती एयर एशिया

एयर एशिया की शुरुआती मुश्किलों से टाटा समूह की उड्डयन में महत्वाकांक्षी वापसी पर संदेह के बादल मंडरा रहे हैं. एयर इंडिया का नियंत्रण गंवाने के दशकों बाद क्या समूह इस एयरलाइन को बचा सकेगा?

मंजूनाथ किरन/गेट्टी इमेजेज
मंजूनाथ किरन/गेट्टी इमेजेज
अपडेटेड 17 सितंबर , 2018

उस दिन 6 दिसंबर, 2012 की तारीख थी. यह टाटा संस के चेयरमैन रतन टाटा के रिटायर होने और उनके उत्तराधिकारी सायरस मिस्त्री के कमान संभालने के हफ्तों पहले की बात है. टाटा ने 95 साल पुरानी औपनिवेशिक इमारत बॉम्बे हाउस के अपने समूह के मुख्यालय में आनन-फानन बोर्ड की बैठक बुलाई. इसमें तपे-तपाए टाटा के वफादार मसलन आर. गोपालकृष्णन, इशात हुसैन, आर.के. कृष्ण कुमार, फारूख कवराना और अरुण गांधी शामिल हुए. टाटा ने कुआलालंपुर (मलेशिया) की सस्ती एयरलाइन एयर एशिया बरहद का एक कारोबारी प्रस्ताव पेश किया.

एयर एशिया हिंदुस्तान में एक नई एयरलाइन शुरू कर रही थी और चाहती थी कि टाटा इस कंपनी में 30 फीसदी या 90 लाख डॉलर (तकरीबन 63 करोड़ रुपए) तक का निवेश करें. कुछ ही मिनटों बाद एयर एशिया के चेयरमैन टोनी फर्नांडीस दाखिल हुए और उन्होंने प्रेजेंटेशन देकर बताया कि किस तरह यह कारोबार मुफीद रहेगा. बैठक खत्म होते-होते इस एयरलाइन में निवेश करने का फैसला ले लिया गया.

साथ ही कुछ शर्तें जोड़ दी गईः नई कंपनी में टाटा संस का निवेश 90 लाख डॉलर से ज्यादा नहीं होगा, टाटा ग्रुप की तरफ से गारंटियों का कोई सहारा नहीं दिया जाएगा (ताकि कारोबार के लिए बैंकों से लिए गए कर्ज की रकम के लिए उन्हें जिम्मेदार न ठहराया जा सके), और आखिर में यह कि नई कंपनी के बोर्ड में टाटा संस की मुनासिब नुमांइदगी होगी.

वैसे तो सॉल्ट (नमक) से सॉफ्टवेयर तक बनाने वाले 100 अरब डॉलर के विशाल समूह की मालिक कंपनी टाटा संस की इस बैठक को भी सालाना होने वाली अन्य बैठकों की तरह सामान्य बैठक ही माना जाता.

मगर अक्तूबर 2016 में सायरस मिस्त्री को चेयरमैन पद से हटा दिए जाने के बाद छिड़े अजीबोगरीब घमासान ने इसे सामान्य नहीं रहने दिया. मिस्त्री ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) में जो मामला दायर कियाए उसमें आरोप लगाया कि 6 दिसंबर, 2012 को बुलाई गई बैठक में टाटा ने ऐसे हालात पैदा कर दिए, जिनमें चीजें पहले ही तय की जा चुकी थीं और वहां मौजूद लोगों के पास उन्हें स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था.

जब इंडस्ट्री में उथलपुथल मची थी, ऐसे दौर में एयरलाइन के कारोबार में दाखिल होने के टाटा ग्रुप के फैसले पर सवाल खड़े करते हुए मिस्त्री ने एयर एशिया इंडिया (जून 2014 में बनाई गई कंपनी) से जुड़े अहम मामलों में सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के मैनेजिंग ट्रस्टी आरण् वेंकटरमण या वेंकट की दखलअंदाजी का भी मुद्दा उठायाए जबकि वे टाटा संस के बोर्ड के सदस्य भी नहीं थे. मिस्त्री ने एयर एशिया के सौदे का फैसला लेने से पहले ठीक तरीकेसे आकलन नहीं करने का भी आरोप लगाया और एयर एशिया इंडिया के प्रबंधन में विसंगतियों को सामने रखा.

टाटा समूह को हैरान-परेशान करते हुए इस साल मई में सीबीआइ ने प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआइआर) दर्ज की जिसमें कहा गया कि फर्नांडीस और टाटा संस ने अपने मनोनीत शख्स वेंकटरमण के जरिए सरकार के भीतर लॉबीइंग करके तमाम मंजूरियां हासिल कर लीं.

इनमें विदेशी निवेश प्रोत्साहन बोर्ड (एफआइपीबी) की मंजूरी और अंतरराष्ट्रीय संचालन के मौजूदा नियम 5ध्20 को बदलना या हटाना भी शामिल है. (भारतीय विमानन नियमों के मुताबिक, विदेशी उड़ानों की इजाजत केवल उन्हीं कंपनियों को दी जाती है जिन्होंने घरेलू उड़ान संचालन में पांच साल पूरे कर लिए हैं और जिनके पास 20 हवाई जहाजों का बेड़ा है.)

इसके बाद सीबीआइ ने जून की शुरुआत में आरोपियों के ठिकानों पर अचानक छापे डाले और उनके लैपटॉप, मोबाइल और कंप्यूटर की हार्ड ड्राइव जब्त कर लीं. वेंकट ने कहा कि वे तो एयर एशिया इंडिया के गैर-कार्यकारी डायरेक्टर हैं और संचालन के मामलों से उनका ज्यादा वास्ता नहीं है.

परिचालन के मामलों में उन्हें गलत ढंग से आरोपी बनाया गया है. एक प्रेस बयान में उन्होंने यह भी कहा, "यह बात हर कोई जानता है कि मौजूदा आरोपों... की जड़ उन बेबुनियाद तोहमतों में है जो सायरस पी. मिस्त्री और शापूरजी पलोनजी ग्रुप ने अपनी "बदले की'' कानूनी कार्रवाई में टाटा ट्रस्ट के न्यासियों (मुझ सहित) और टाटा संस के खिलाफ लगाई हैं.''

अलबत्ता मिस्त्री को उस वक्त झटका लगा जब जुलाई की शुरुआत में एनसीएलटी की मुंबई बेंच ने पाया कि उनके आरोपों में कोई सच्चाई नहीं थी और उन्हें खारिज कर दिया. इनमें एयर एशिया से जुड़े आरोप भी थे. एनसीएलटी के आदेश में कहा गया, "याचिकाकर्ता आरोपों के पक्ष में मजबूत दलील सामने रखने में बुरी तरह नाकाम रहे हैं, ये सब निराधार आरोप हैं जो एक प्रतिष्ठित शख्स पर लगाए गए हैं और यह जाने बगैर उछाले गए हैं कि जब इतने अपमानजनक आरोपों के समर्थन में ठोस दस्तावेज नहीं हों तो इनके क्या नतीजे होते हैं.''

मिस्त्री ने मुंबई पीठ के फैसले के खिलाफ नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (एनसीएलएटी) का दरवाजा खटखटाया. एनसीएलएटी फिलहाल इस पर सुनवाई कर रहा है. मगर एनसीएलटी के मामले और सीबीआइ की जांच ने उड़ान के टाटा के नए उद्यम को चर्चा में ला दिया है. आखिर, मिस्त्री की चिंताएं कितनी जायज हैं और टाटा ग्रुप के लिए विमानन क्षेत्र में क्या संभावनाएं हैं?

फरवरी 2013 में भारतीय विमान कंपनियों में विदेशी एयरलाइन कंपनियों को 49 फीसदी निवेश की इजाजत देने वाली उदार विमानन नीति के बाद एयर एशिया बरहद ने कहा था कि उसने एफआइपीबी में टाटा संस और अरुण भाटिया के टेलेस्ट्रा ट्रेडप्लेस के साथ प्रस्तावित संयुक्त उद्यम (जेवी) के लिए अर्जी दाखिल की है.

टेलेस्ट्रा ट्रेडप्लेस फर्नांडीस के साथ क्वींस पार्क रेंजर्स फुटबॉल क्लब के जरिए जुड़ी है, जिसके वे चेयरमैन हैं. इसमें एयर एशिया की जहां 49 फीसदी हिस्सेदारी होगी, वहीं टाटा संस की 30 फीसदी और अरुण भाटिया की 21 फीसदी. इरादा यह था कि एयरलाइन चेन्नै से काम करेगी और टियर.... और टियर.... शहरों की घरेलू कनेक्टिविटी पर ध्यान देगी.

एयर एशिया का कामकाज हालांकि थाइलैंड और मलयेशिया में हैए पर वह कई आसियान देशों के ठिकानों से चेन्नै, बेंगलूरू, कोच्चि, तिरुचिरापल्ली और कोलकाता के लिए उड़ानें पहले ही संचालित कर रही थी.

फर्नांडीस ने तब कहा था कि "हवाई सफर को बढ़ावा देने और बाजार को बढ़ाने'' वाला एयर एशिया का सस्ती उड़ान का मॉडल लाने के लिए हिंदुस्तान का माहौल एकदम मुफीद है. हैरानी की बात यह थी कि टाटा ग्रुप ने एयरलाइन के कारोबार में तब कदम रखे, जब मात्र एक इंडिगो एयरलाइन के अपवाद को छोड़कर तमाम विमानन कंपनियां भारी घाटे में चल रही थीं. रतन टाटा नेए जो उस वक्त टाटा ग्रुप के चेयरमैन एमेरिटस (सेवामुक्ति) थे, रिटायर होने के कुछ दिन पहले इस क्षेत्र में "विनाशकारी प्रतिस्पर्धा'' की बात कही थी. यह साफ नहीं है कि बाद में उनका विचार क्यों बदल गया.

इस बीच उस वक्त टाटा ग्रुप के जनरल काउंसल भरत वसानी ने मिस्त्री और टाटा संस के दूसरे कर्ताधर्ताओं को जो ई-मेल भेजे, वे वेंकट को भी भेजे जाते रहे. यह बताता है कि एयर एशिया से जुड़े मामलों में उनका कितना भारी असर था.

यहां तक कि एयर एशिया सौदे का आखिरी शेयरधारक समझौता वसानी ने वेंकट की हिदायतों के मुताबिक ही तैयार किया था. वेंकट ने वसानी को सितंबर 2013 में एसआइए के साथ प्रस्तावित जेवी के लिए दो कंपनियां बनाने का निर्देश दिया थाण् एकए टाटा एयरलाइन लिमि. जो पूर्ण-सेवा एयरलाइन के लिए टाटा संस और एसआइए के बीच जेवी का काम करेगी. दूसरी, टीएसएल एविएशन होल्डिंग, जो विमानन क्षेत्र में टाटा समूह के भविष्य के निवेशों को देखेगी.

टाटा के कर्ताधर्ताओं के बीच चर्चा का अहम विषय एफआइपीबी की मंजूरियां भी थीं और यह भी कि भारत सरकार किस तरह हिंदुस्तानी प्रबंधन के ढांचे को लेकर संवेदनशील थी. वसानी ने बाद में समझौते को लाल झंडी दिखा दी, यह कहकर कि मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन (एमओए) "कमजोर समझौता है और इसके एफआइपीबी को संतुष्ट कर पाने की संभावना नहीं'' है. एफडीआइ के नियमों में जरूरी है कि बड़ी हिस्सेदारी और प्रभावी नियंत्रण भारतीय नागरिकों के हाथ में हो.

नियंत्रण को लेकर सवाल एयर एशिया के प्रभावी नियंत्रण और कानूनों का पालन नहीं करने को लेकर शुरू से दिक्कतें थीं. भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने 2013 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की और एयर एशिया इंडिया प्रा.लि. को दी गई मंजूरी रद्द करने की मांग की.

स्वामी ने कहा कि सरकार की मंजूरी सितंबर की उस नीति का उल्लंघन थी जिसमें विदेशी एयरलाइनों को हिंदुस्तानी एयरलाइन कंपनियों में निवेश की इजाजत दी गई थी. हाल ही में एक इंटरव्यू में स्वामी ने कहा, "मंत्रिमंडल ने एफडीआइ की मंजूरी सिर्फ मौजूदा एयरलाइनों के लिए दी थी.

एयर एशिया ने किसी भी मौजूदा एयरलाइन में निवेश नहीं किया है. इसके उलट हिंदुस्तानी निवेशकों ने एक ऐसी कंपनी में निवेश किया है जो एयर एशिया के नाम से देश में खोली गई है. यह पूरी तरह गैरकानूनी है और यह मामला दिल्ली हाइकोर्ट में आखिरी चरणों में है.'' उन्होंने आरोप लगाया, "उस वक्त मैंने यह भी सुना था कि रिश्वत दी गई है. साथ ही एक और नीति में बदलाव किया गया जिसकी तस्दीक इस बात से होती है कि एफआइपीबी की भी मंजूरी दे दी गई जबकि यह कतई नहीं दी जानी चाहिए थी.''

एयर एशिया ने कोई भी गलत काम करने से इनकार किया है. कंपनी ने 29 मई को मीडिया को दिए गए एक बयान में कहा, "एयर एशिया इंडिया लिमि. (एएआइएल) कोई भी गलत काम करने से इनकार करती है और सही तथ्य रखने के लिए तमाम नियामकों तथा एजेंसियों के साथ सहयोग कर रही है.''

उसने यह भी कहा, "नवंबर 2016 में एएआइएल ने अपने पूर्व-सीईओ के खिलाफ आपराधिक आरोप दर्ज करवाए हैं और साथ ही इन अनियमितताओं के लिए बेंगलूरू में दीवानी कार्रवाई भी शुरू की है.'' पूर्व सीईओ मिट्टू चांडिल्य ने भी तमाम आरोपों से इनकार करते हुए 2016 में अदालत का दरवाजा खटखटाया और एयर एशिया तथा कंपनी की ऑडिटर डेलॉइट से हर्जाने की मांग की.

गलत वक्त?

यह कोई राज की बात नहीं है कि टाटा को विमानन क्षेत्र से मुहब्बत रही है. वे खुद लाइसेंसधारी कमर्शियल पायलट हैं और बरसों पहले उन्होंने सिंगापुर एयरलाइंस को हिंदुस्तान लाने की संभावनाएं टटोली थीं. वे तो कामयाब नहीं हुईं, पर 2013 में समूह ने सिंगापुर एयरलाइंस के साथ उसके घरेलू उद्यम विस्तारा की 51 फीसदी मिल्कियत खरीदने के लिए समझौता किया.

जनवरी 2015 में अपनी शुरुआत के दो से कुछ ज्यादा साल बाद सितंबर 2017 में विस्तारा की बाजार हिस्सेदारी 3.8 फीसदी थी. 38.2 फीसदी हिस्सेदारी के साथ इंडिगो बाजार की अगुआ थीए उसके बाद जेट एयरवेज (15.3 फीसदी), स्पाइसजेट (13.8 फीसदी), एयर इंडिया (13.5 फीसदी) और गोएयर (8.4 फीसदी) थे, एयर एशिया की हिस्सेदारी 4.1 फीसदी थी.

हिंदुस्तान में एयरलाइन कंपनियां 2008 से 2014 के छह सालों में सामूहिक तौर पर 10 अरब डॉलर (69,000 करोड़ रुपये के आसपास) गंवा चुकी हैं. इंडस्ट्री 16 अरब डॉलर (97,600 करोड़ रुपए) के कर्ज के बोझ से भी लदी है. हिंदुस्तानी विमानन कंपनियों ने 2014-15 में तकरीबन 8,000 करोड़ रुपए का घाटा झेला. इंडिगो अच्छा प्रदर्शन करने वाली अकेली कंपनी थी जिसने 2012-13 में 787 करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया.

यह मुनाफे का इसका लगातार पांचवां साल था, क्योंकि इसने उड़ानें निर्धारित वक्त पर उड़ाईं और फाइनेंस पर बेहतर नियंत्रण रखा. सीएपीए के सीईओ कपिल कौल ने मई 2015 में कहा था, "हिंदुस्तान की एयरलाइनों में रकम गंवाने की भूख दुनिया में सबसे ज्यादा है.''

मौजूदा वक्त में यह बात और अहम हो जाती है, जब हिंदुस्तानी एयरलाइनें ईंधन की बढ़ती लागत, रुपए की गिरती कीमतए हवाई अड्डों की नौवहन की ऊंची फीस और किरायों में कटौती की वजह से उथलपुथल का लगातार सामना कर रही हैं. ताजातरीन चेतावनी जेट एयरवेज की तरफ से आई है जिसने कहा है कि अगर तनख्वाहों में कटौती समेत लागत घटाने के उपाय नहीं किए जाते, तो वह 60 दिन से ज्यादा अपनी उड़ानें जारी नहीं रख पाएगी.

विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रैफिक बढ़ रहा है, ऐसे में एयरलाइनों के पास घोर कुप्रबंधन के अलावा कोई बहाना नहीं बचता. घरेलू ट्रैफिक में 21.2 फीसदी और अंतरराष्ट्रीय यातायात 7.7 फीसदी ही बढ़ा था.''

विशेषज्ञों का कहना है कि हिंदुस्तान में जबरदस्त प्रतिस्पर्धा को कम आंकना, पर्याप्त रकम की कमी और प्रबंधन में गहराई का न होना और टाटा ग्रुप की तरफ से ध्यान न दिया जाना एयर एशिया की बुनियादी परेशानियों में शामिल हैं. एयरलाइन के पहले सीईओ और एमडी मिट्टू चांडिल्य ने दो साल से कुछ कम वक्त काम करने के बाद फरवरी 2016 में इसे अचानक अधबीच छोड़ दियाण् उनके उत्तराधिकारी अमर अबरोल भी इस साल जून में छोड़कर चले गएण् तब से एयरलाइन नया सीईओ लाने के लिए हाथ-पैर मार रही है. इसके कामकाज की सीबीआइ जांच ने मामलों को और बदतर ही बनाया है.

विमानन क्षेत्र के जानकार जितेंद्र भार्गव सवाल करते हैं, "टाटा के पास दो एयरलाइन हैं—विस्तारा और एयर एशिया. टाटा का पूरा ध्यान आखिर विस्तारा पर ही क्यों है और एयर एशिया पर क्यों नहीं?'' उनके मुताबिक जब एयर एशिया की उड़ान का उद्घाटन हुआ थाए तब टाटा का एक भी कर्ताधर्ता मौजूद नहीं था.

"यह दिखाता है कि टाटा की शिरकत किस हद तक है... या टोनी फर्नांडीस ने होने दी है. वे (फर्नांडीस) अच्छे शख्स हैं जो खासे वक्त से एयरलाइन चला रहे हैं, पर हिंदुस्तानी बाजार बिल्कुल अलग है.'' वे यह भी कहते हैं कि जिस उद्योग में लोड फैक्टर 85 फीसदी है, वहां एक एयरलाइन अब भी पैसा नहीं बना पा रही हैए यह अकल्पनीय है. उड्डयन क्षेत्र की रफ्तार वैसे भी धीमी हैए लिहाजा टाटा ग्रुप को आगे भी मुश्किल वक्त से गुजरना होगा.

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