अठारह जून को दोपहर बाद, गुवाहाटी से अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर के प्रभारी और भारतीय जनता पार्टी के महासचिव राम माधव को बहुत संक्षिप्त फोन कॉल किया था. शाह ने कहा, "हमें कश्मीर पर चर्चा करने की जरूरत है.
कृपया जम्मू-कश्मीर राज्य के हमारे सभी मंत्रियों को दिल्ली बुलाएं. मैं आज रात दिल्ली लौट रहा हूं. हम कल बैठक करेंगे.'' उधर, श्रीनगर में मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को खबर लगी कि भाजपा आलाकमान ने उनके भाजपा के सहयोगियों को दिल्ली तलब किया है तो वजह जानने के लिए उन्होंने मंत्रियों को कई कॉल किए थे, लेकिन सबने अपने होठ सिल रखे थे.

अगले दिन, मुख्यमंत्री श्रीनगर में सचिवालय स्थित अपने कार्यालय में लंबित फाइलें निपटा रही थीं कि उनके मुख्य सचिव भारत भूषण व्यास ने उन्हें गवर्नर एन.एन. वोहरा के दफ्तर से एक कॉल के बारे में बताया.
अभी भाजपा नेतृत्व राज्यपाल को यह संदेश दे ही रहा था कि भाजपा ने जम्मू-कश्मीर की सरकार से अलग होने का फैसला किया है, लगभग तभी राम माधव ने दिल्ली में राज्य के कुछ मंत्रियों के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इस बात की सूचना दी.
माधव ने कहा, "भाजपा के लिए जम्मू-कश्मीर में गठबंधन सरकार के साथ आगे और बने रहना असंभव हो गया है.'' पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के साथ तकरीबन साढ़े तीन साल के गठबंधन के खत्म होने के लिए उन्होंने पीडीपी को ही जिम्मेदार ठहराया.
पूरी कवायद में बहुत सावधानी बरती गई ताकि यह तय किया जा सके कि महबूबा और उनकी पार्टी को इसकी भनक भी न लगे और वे कोई तैयारी भी न कर सकें. यहां तक कि जम्मू कश्मीर पीपल्स कॉन्फ्रेंस के विधायक सज्जाद लोन ने भी माना कि पार्टी ऐसा कदम उठाने जा रही है इसका रत्ती भर भी अंदाजा नहीं था, जो भाजपा के शीर्ष राष्ट्रीय नेतृत्व के करीब माने जाते हैं और भाजपा के आग्रह पर ही उन्हें सरकार में मंत्री के रूप में शामिल किया गया था.
पीडीपी-भाजपा का साथ लंबा नहीं चलने वाला है, यह अंदाजा तो सबको था लेकिन यह इतनी जल्दी होगा इसका अंदाजा न था. हैरानी तो इसके समय और इस पहलू में है कि गठबंधन से किनारा भाजपा ने किया है, पीडीपी ने नहीं.
गठबंधन के दोनों साझीदारों की आपसी खटपट को समझें. जुलाई 2017 में, लश्कर-ए-तैयबा ने एक भयानक हमला करके अमरनाथ यात्रा के बाद घर लौट रहे गुजरात और महाराष्ट्र के आठ तीर्थयात्रियों की हत्या कर दी थी. माधव कम से कम सार्वजनिक रूप से तो गठबंधन को लेकर आशावादी बने रहे. उन्होंने दिल्ली में इंडिया टुडे से कहा था, "हम यह प्रयास करेंगे कि सरकार अपना कार्यकाल पूरा करे.''
इसके कुछ महीने बाद, जब इस साल मार्च में महबूबा ने वित्त मंत्री (और दिल्ली के साथ मध्यस्थ) हसीब द्राबू को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया, तो इसे भाजपा को "कड़े संकेत'' के साथ घाटी में पीडीपी की गिरती साख को बचाने की जद्दोजहद की तरह देखा गया.
तब वरिष्ठ पीडीपी नेताओं ने खुलकर कहना शुरू कर दिया कि "इस गठबंधन के कारण पार्टी (पीडीपी) ने साख खो दी है.'' द्राबू की जगह बनाए गए नए वित्त मंत्री सैयद अल्ताफ बुखारी ने कहा, "हमारी पार्टी विचारधारा के साथ समझौता नहीं करेगी. ऐसी नौबत आती है तो हम गठबंधन तोड़ने में कोई संकोच नहीं करेंगे.''
तो, फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शाह को ऐसा क्यों लगा कि गठबंधन से पल्ला झाड़ने का वक्त आ चुका है?
माधव ने दिल्ली में संवाददाताओं को इसे देशहित में लिया गया निर्णय बताया. उन्होंने कहा, "देश की अखंडता और सुरक्षा के बड़े राष्ट्रीय हितों और इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि जम्मू-कश्मीर भारत का एक अभिन्न अंग है और राज्य की मौजूदा स्थिति को देखते हुए सत्ता राज्यपाल को सौंप दी जाए.
हालात नियंत्रित करने की जिम्मेदारी राज्यपाल को सौंपनी जरूरी है इसीलिए हमने यह फैसला किया है.''
भाजपा महासचिव ने बताया कि रमजान के पवित्र महीने में दिल्ली की तरफ से एकतरफा युद्धविराम की पहल की गई थी लेकिन उग्रवादी और अलगाववादी खेमे ने इस पहल को लेकर "संतोषजनक रवैया'' नहीं दिखाया.
कानून-व्यवस्था के बिगड़ते परिदृश्य और सुरक्षित माहौल में जीने और अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकारों की चिंताजनक स्थिति, श्रीनगर के बीचोबीच दिन-दहाड़े राइजिंग कश्मीर के संपादक शुजात बुखारी की हत्या राज्य में सुरक्षा की चिंताजनक स्थिति और कट्टरपंथ को बढ़ावा मिलने का इशारा करती है.
बताया जाता है कि 10 जून को कश्मीर के मंत्रियों के साथ बैठक में शाह ने कहा कि पीडीपी के साथ राज्य में इस "असफल'' गठबंधन को और आगे बढ़ाया गया तो यह भाजपा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर "त्रासद'' साबित होगा.
भाजपा अध्यक्ष ने उन्हें बताया कि पीडीपी नेतृत्व (महबूबा) केंद्र की ओर से मिल रहे भरपूर समर्थन के बदले में संतोषजनक प्रतिक्रिया देने में असफल रहा है, जिसमें 16 मई को घोषित एकतरफा युद्धविराम जैसे प्रयास भी शामिल हैं.
अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन लगाने के संदर्भ में फैसला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) नेतृत्व द्वारा सर्वसम्मति से लिया गया था. मई में पुणे की एक बैठक में विस्तार से इस पर चर्चा हुई थी.
बैठक में संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का विचार था, "नेतृत्व सर्वसम्मति से ऐसा मानता है कि जम्मू-कश्मीर में गठबंधन के कारण देशभर में भाजपा के कार्यकर्ता नैतिक रूप से हतोत्साहित होंगे.'' वे इस बात से सहमत थे कि "यह गठबंधन 2019 तक जारी रहता है तो भाजपा की राष्ट्रवादी छवि पूरी तरह से मटियामेट हो जाएगी.''
भाजपा नेताओं का कहना है कि महबूबा मुफ्ती रमजान बीतने के बाद भी घाटी के लोगों में विश्वास बहाली के नाम पर युद्धविराम को जारी रखने की जिद कर रही थीं, जिसने गठबंधन के लिए घुटन का ऐसा माहौल बनाया कि हाथ पीछे खींचने के अलावा कोई रास्ता न था.
रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण, सेना और घाटी में तैनात अन्य सुरक्षाबलों के विरोध के बावजूद केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने 16 मई को एक महीने के लिए आतंक विरोधी कार्रवाई पर एकतरफा रोक लगाने की घोषणा कर दी थी. उन्होंने अलगाववादी हुर्रियत नेताओं समेत कश्मीर के सभी जिम्मेदार पक्षों के साथ बातचीत का एक नया दौर शुरू करने की अपील भी की थी.
लेकिन एक महीने में यह साफ हो गया था कि आतंकवादियों ने इस रियायत का भरपूर फायदा उठाया. हालांकि घाटी में पत्थरबाजी की घटनाओं में कुछ कमी तो देखी गई, फिर भी रमजान के महीने में 62 आतंकवादी हमले हुए जिनमें 22 ग्रेनेड हमले और आतंकवादियों द्वारा अंधाधुंध गोलीबारी के 23 मामले शामिल थे. युद्धविराम से पहले के महीने में ऐसी सिर्फ 25 घटनाएं ही देखी गईं थीं.
अलगाववादी भी बातचीत बहाल करने के लिए असंभव-सी पूर्व शर्तें रख रहे थे. आरएसएस नेतृत्व को यह आभास हो रहा था कि इस युद्धविराम से जहां महबूबा की पार्टी को राजनैतिक फायदा हो रहा है, वहीं राष्ट्र-विरोधी अलगाववादियों के प्रति कठोर रुख रखने की भाजपा की राष्ट्रवादी छवि को गहरा झटका लग रहा है. एक भाजपा नेता ने कहा, "जिस युद्धविराम का कोई सकारात्मक लाभ नहीं दिख रहा था, उसे आगे जारी रखने से पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर काफी नुक्सान उठाना पड़ता.''
लेकिन शायद ईद से दो दिन पहले 14 जून को पत्रकार बुखारी और राष्ट्रीय राइफल के सिपाही औरंगजेब की हत्या ने शाह को यह फैसला आनन-फानन लेने को विवश कर दिया. दोनों ही घटनाएं घाटी में शांति बहाली की कोशिशों को नुक्सान पहुंचाने के इरादे से की गई थीं. इन हमलों से भाजपा पर युद्धविराम को समाप्त करने का दबाव बना.
पूर्व उप-मुख्यमंत्री कवींद्र गुप्ता आतंकवाद से निपटने में महबूबा पर "नरम'' रुख अख्तियार करने का आरोप लगाते हैं. भाजपा नेता का आरोप है कि जहां मुख्यमंत्री ने 11,000 पत्थरबाजों से एफआइआर इस तर्क से हटा लिया कि यह उनका पहला गुनाह था और ये बच्चे हैं, वहीं अर्धसैनिक बलों के खिलाफ एफआइआर दर्ज करने की कोशिशें हो रही थीं.
जम्मू में कई भाजपा नेताओं ने 27 जनवरी को शोपियां में पत्थरबाजों की भारी भीड़ पर गोली चलाने की घटना, जिसमें तीन युवा मारे गए थे, में एक अधिकारी समेत कई जवानों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने पर विरोध प्रदर्शन भी किया था.
कई भाजपा नेताओं का मानना है कि जमात-ए-इस्लामी एवं अन्य कट्टरपंथियों के प्रति महबूबा बहुत सहानुभूति और नरम रुख दिखाती थीं क्योंकि इन संगठनों ने 2014 के विधानसभा चुनावों में पीडीपी की सहायता की थी. मुख्यमंत्री के इस रवैए के कारण घाटी में आतंकवादी संगठन स्थानीय लोगों को भर्ती करने और अपनी जड़ें जमाने में कामयाब हो रहे थे.
वे याद दिलाते हैं कि जुलाई 2016 में हिज्बुल कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद मुख्यमंत्री और उनकी पार्टी के नेता बजाए राज्य में बिगड़ते हालात को नियंत्रित करने की गंभीर कोशिशें करने के, रहस्यमय तरीके से आरोप-प्रत्यारोप का खेल खेलने लगे थे.

महबूबा ने दावा किया था कि उन्हें अंदाजा ही नहीं था कि इस मुठभेड़ में वानी को निशाना बनाया जा रहा है और पीडीपी के सांसद मुजफ्फर बेग ने कहा कि सुरक्षाबलों ने जान-बूझकर उनसे यह जानकारी छुपाए रखी. बेग तो यहां तक कह गए कि सुरक्षाबलों ने मुठभेड़ की अनिवार्य प्रक्रिया को नजरअंदाज किया. उन्हें वानी को मुठभेड़ में मार गिराने की बजाए जिंदा पकडऩे की कोशिश करनी चाहिए थी.
विश्लेषकों का भी मानना है कि दक्षिण कश्मीर में अपनी घटती लोकप्रियता को फिर से हासिल करने के लिए पीडीपी ने अलगाववादियों और आतंकवादियों के प्रति नरम रवैया अख्तियार कर लिया था, जिससे घाटी में सुरक्षा की स्थिति लगातार बदतर होती जा रही थी.
जाहिर है, युद्धविराम को आगे जारी रखना सही नहीं था, खासतौर से आगामी अमरनाथ यात्रा के संदर्भ में. 28 जून से शुरू होने वाली 40 दिन की अमरनाथ यात्रा में करीब 3,00,000 हिंदू तीर्थयात्रियों के गुफा मंदिर में वार्षिक दर्शन के लिए आने की उम्मीद है.
एक पूर्व सेना अधिकारी, जो हाल तक घाटी में एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहे थे, का कहना था कि "ऐसी सरकार जो राज्य पुलिस द्वारा जुटाई गई सूचना को सेना और अर्धसैनिक बलों के साथ साझा करने में बाधक बन जाती है, उसके विदा होने से अब आतंकवादी खतरों से निपटने में काफी सहुलियत हो जाएगी.''
तो, अब जम्मू-कश्मीर में आगे क्या होने वाला है? फिलहाल सभी मुख्य राजनैतिक दलों—नेशनल कॉन्फ्रेंस, कांग्रेस और पीडीपी ने भी किसी भी वैकल्पिक गठबंधन की संभावना को खारिज कर दिया है तो राज्य में राज्यपाल शासन का एक और चरण शुरू होगा.
आजादी के बाद से यह आठवां मौका होगा जब राज्य पर सीधे दिल्ली की हुकूमत चलेगी. पहली बार मार्च, 1977 में राष्ट्रपति शासन लगाया गया था, जब मुफ्ती मोहम्मद सईद की अध्यक्षता में कांग्रेस ने शेख अब्दुल्ला की सरकार से समर्थन वापस ले लिया था. इससे पहले आखिरी बार जनवरी 2016 में राज्यपाल शासन लगाना पड़ा था, जब महबूबा मुक्रती ने अपने पिता के निधन के बाद तीन महीने तक मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली ही रखी थी.
19 जून को श्रीनगर में प्रेस को संबोधित करने से कुछ देर पहले, महबूबा ने राज्यपाल वोहरा को बता दिया था कि "हम (पीडीपी) कोई भी दूसरा गठबंधन बनाने की कोशिश नहीं करना चाहते हैं.'' पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने भी कांग्रेस के साथ मिलकर पीडीपी की अगुवाई वाली सरकार को समर्थन करने के अपने जनवरी 2015 के पुराने प्रस्ताव पर फिर से विचार करने की किसी भी संभावना को खारिज कर दिया.
उमर ने साफ किया कि अब राज्यपाल शासन ही एकमात्र विकल्प है जिसमें स्थिति को सामान्य करने के बाद जल्द से जल्द चुनाव कराए जाएं. कांग्रेस ने भी कुछ ऐसी ही राय जाहिर की. राज्य के पूर्व मुक्चयमंत्री और कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा, "हमारे लिए भाजपा और पीडीपी में अब अंतर नहीं रहा है.''
बहरहाल, उमर जिस जल्दी चुनावों की बात कर रहे हैं, फिलहाल उसकी संभावना कम ही दिखती है. इसे ऐसे समझें—महबूबा मुफ्ती द्वारा अप्रैल, 2016 में मुख्यमंत्री बनने के बाद दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग सीट से इस्तीफा दिए जाने के दो साल बीत चुके हैं पर वहां लोकसभा उपचुनाव नहीं कराया जा सका है. अप्रैल 2017 में श्रीनगर सीट के लिए हुए उपचुनाव में महज 7.1 फीसदी वोटिंग हुई थी और चुनाव के दौरान हुई हिंसा में एक 15 साल के स्कूली बच्चे समेत आठ लोग मारे गए थे.
हालांकि ऐसा कहा जाता है अनंतनाग उपचुनाव को सिर्फ इसलिए टाल दिया गया था क्योंकि महबूबा के पीडीपी के अपने पुराने गढ़ को बचाने की संभावना बहुत कम दिखती थी और वे हार का सामना करने की इच्छुक नहीं थी.
लेकिन इसी बीच श्रीनगर और जम्मू में एक तीसरी संभावना की बातें भी दबी जुबान से हो रही हैं. 2016 में, महबूबा अपने पिता के निधन के बाद तब तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने को राजी न हुईं जब तक कि उन्हें गठबंधन के साझा एजेंडे में किए गए प्रमुख वादों को पूरा करने का पक्का भरोसा नहीं मिला था.
ऐसा बताया जाता है कि उनकी मांगों से नाखुश, भाजपा नेतृत्व ने महबूबा को किनारे करके पीडीपी के 27 में से 22 विधायकों को इस बात के लिए राजी कर लिया था कि वे एक वैकल्पिक मोर्चा बनाकर भाजपा के साथ नए सिरे से गठबंधन की सरकार बनाने को आगे बढ़ें. राज्यपाल वोहरा ने प्रधानमंत्री मोदी और शाह को सलाह दी थी कि महबूबा को सत्ता से हटाकर किसी नई सरकार के गठन की कोशिशों से राज्य के हालात बहुत खराब हो सकते हैं.
हालांकि भाजपा की ओर से भी सरकार बनाने की कोशिशों के कोई संकेत तो दिखाई नहीं देते लेकिन भाजपा गठबंधन सरकार बनाने की एक और कोशिश करेगी या नहीं, पीडीपी नेताओं का कहना है कि इसका अंदाजा तो राज्यपाल के फैसले से ही लगाया जा सकता है कि विधानसभा को भंग करते हैं या नहीं. एक वरिष्ठ पीडीपी नेता का कहना है, "कुछ वक्त दीजिए हमारी पार्टी टूटने को तैयार नजर आएगी.''
उत्तरी कमान के पूर्व कमांडर ले. जनरल डी.एस. हुड्डा कहते हैं, "कश्मीर नीति में अब निश्चित रूप से कुछ बदलाव करने की जरूरत है. पिछले तीन साल में आंतरिक हालात बहुत खराब हुए हैं. फिर भी ज्यादा बल प्रयोग की नीति पर चलकर यहां हालात नहीं बदले जा सकते हैं.''
गठबंधन की उठा-पटक
दिसंबर 2014
भाजपा ने जम्मू क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत की और वहां 37 में से 25 सीटें जीत लीं. राज्य में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी
24 फरवरी, 2015
सात हफ्तों की बातचीत के बाद भाजपा-पीडीपी गठबंधन बनाः बकौल महबूबा, "सरकार सत्ता की साझेदारी के लिए नहीं, बल्कि लोगों के दिल जीतने के लिए बनाई.''
मार्च 2015
गठबंधन में दरार के संकेत पहली बार तब मिले जब सरकार ने कट्टरपंथी अलगाववादी नेता मसर्रत आलम को रिहा कर दिया और भाजपा ने उस "एकतरफा'' निर्णय पर कड़ी आपत्ति जताते हुए पीडीपी को चेताया कि ऐसी कोशिशें बर्दाश्त नहीं की जाएंगी
जनवरी 2016
मुफ्ती मोहम्मद सईद का निधन हो गया और महबूबा मुफ्ती पीडीपी की मुखिया बनीं
4 अप्रैल 2016
महबूबा ने राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली
8 जुलाई, 2016
सुरक्षाबलों ने हिज्बुल कमांडर बुरहान वानी को अनंतनाग में एक मुठभेड़ में ढेर कर दिया. कई महीनों तक प्रदर्शनों का दौर चला. 85 लोगों ने जान गंवाई
सितंबर 2016
पीडीपी सांसद तारिक कर्रा ने इस्तीफा दिया; उन्होंने आरोप लगाया कि कश्मीर में जीवन
"नाजी हुकूमत के दौर से भी खराब हालत में है.''
मई 2017
मेजर गोगोई के एक कश्मीरी युवक को जीप से बांधने पर भाजपा-पीडीपी के बीच तनातनी. भाजपा ने कहा सही. पीडीपी ने मानवाधिकारों का सरासर उल्लंघन बताया
जून 2017
अमरनाथ यात्रा पर आतंकी हमला हुआ जिसमें आठ लोग मारे गए. विपक्ष ने आरोप लगाए कि भाजपा-पीडीपी शासन में आतंकी घटनाओं में तेजी आई है
अप्रैल 2018
दो भाजपा विधायकों लाल सिंह और चंद्र प्रकाश गंगा ने कठुआ रेप और हत्या मामले के आरोपियों के समर्थन में आयोजित एक रैली में हिस्सा लिया और उसके बाद उन्होंने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया
जून 2018
राइजिंग कश्मीर के संपादक शुजात बुखारी की हत्या
19 जून, 2018
भाजपा ने पीडीपी सरकार से समर्थन खींच लिया; राम माधव कहते हैं, "सबके साथ विमर्श के बाद हमने इस गठबंधन को भंग करने का निर्णय किया है. पिछले तीन साल में भाजपा ने जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा और विकास का माहौल बनाने के लिए पीडीपी का पूरा सहयोग किया.''
गठबंधन का पटाक्षेप
1 पीडीपी को जरा भी अंदाजा नहीं था कि भाजपा गठबंधन को धता बताने की योजना बना रही है
2 भाजपा को लगा कि गठबंधन कायम रखने से 2019 में देशभर में उसका काडर हतोत्साहित होगा
3 रमजान के महीने में हुई हिंसा और शुजात बुखारी की हत्या ने भाजपा को राज्य में कानून-व्यवस्था खस्ताहाली का अच्छा बहाना पकड़ा दिया
4 भाजपा नेताओं को लगता था कि महबूबा ने आतंकवाद और कट्टरपंथियों को लेकर "नरम'' रुख अख्तियार कर रखा था
5 आजादी के बाद यह आठवां मौका है जब राज्य पर दिल्ली की सीधी हुकूमत चलेगी
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