डोकलाम में 72 दिन के तनाव के बाद भारत इस प्रकरण को भुला देना चाहता है लेकिन लगता है, बीजिंग ऐसा करने की जल्दी में बिल्कुल नहीं है. एक महीना से ज्यादा बीत जाने के बाद बीजिंग से मिलने वाले संकेतों से पता चलता है कि 28 अगस्त को पीछे हटने के पीछे चीन का मकसद था कि उसके यहां आयोजित होने वाला ब्रिक्स का सम्मेलन सफलतापूर्वक संपन्न हो जाए और 18 से 25 अक्तूबर के बीच राष्ट्रपति जी जिनपिंग के लिए महत्वपूर्ण पार्टी सम्मेलन में कोई बाधा न पडऩे पाए.
पिछले हफ्ते चीन ने साफ संकेत दे दिया है कि वह वहां से हटने को कतई तैयार नहीं है. पहले, बीजिंग ने 3 अक्तूबर को तीसरी बार यात्रा को लेकर सलाह जारी की और चीन के नागरिकों को अनुमति के बिना अंडमान निकोबार द्वीप समूह की यात्रा न करने और सीमा पर साजो-सामान व सुविधाओं की तस्वीरें न खींचने के लिए सतर्क किया. इसके अलावा भारत में रह रहे चीनी नागरिकों को अपनी सुरक्षा को लेकर सचेत रहने की भी चेतावनी दी. इसके बाद सरकारी मीडिया ने भारत पर चीन से दवाओं के लिए जरूरी सामग्री के आयात पर प्रतिबंध लगाने के लिए ''राजनीतिक तनावों" का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया.
फिर 9 अक्तूबर को बीजिंग ने भारत की रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन की ओर से नाथू ला सीमा पर सप्ताहांत के दौरे पर सधी हुई प्रतिक्रिया दी, जहां रक्षा मंत्री ने चीन के सैनिकों के साथ दोस्ताना बातचीत की (देखें फोटो) और उन्हें यह भी सिखाया कि नमस्ते कैसे किया जाता है. वह वीडियो चीन में वायरल हो गया और ऑनलाइन उसकी बहुत तारीफ हुई, हालांकि विदेश मंत्रालय ने भारत को यह याद दिलाते हुए जवाब दिया कि ''नाथू ला दर्रा इस का सबसे अच्छा प्रमाण है कि 1890 की ऐतिहासिक संधि से चीन-भारत सीमा के सिक्किम सेक्टर का सीमांकन किया गया है." इसी संधि के आधार पर चीन डोकलाम में सड़क निर्माण को सही ठहराता है.
चीन ने डोकलाम में फिलहाल सड़क निर्माण का काम दोबारा शुरू नहीं किया है लेकिन डोकलाम में उसकी सेना मौजूद है जो अब पहले से कहीं ज्यादा संख्या में है. भारत के विदेश मंत्रालय ने 6 अक्तूबर को कहा कि टकराव की जगह पर ''कोई भी नई गतिविधि नहीं हुई है" और ''इलाके में यथास्थिति कायम है." जाहिर होता है कि नई दिल्ली पठार पर चीन की स्थायी मौजूदगी की कोशिश के मुकाबले सेना की मौजूदा उपस्थिति को लेकर कम चिंतित है. बीजिंग में माना जा रहा है कि डोकलाम दोनों देशों के संबंधों में गिरावट के रुख का सिर्फ लक्षण है.
चीनी पर्यवेक्षकों ने अप्रैल में दलाई लामा के अरुणाचल दौरे और उसके बाद भारत की ओर से जी के बेल्ट ऐंड रोड फोरम के बहिष्कार को दिल्ली के रुख के तौर पर देखा. चीन ने अपनी तरफ से पाक अधिकृत कश्मीर में उसके निवेश या पाकिस्तानी आतंकवादी जैश-ए-मोहम्मद के मुखिया मसूद अजहर के खिलाफ प्रतिबंधों पर अड़ंगा लगाने जैसे विवादित मुद्दों पर नरम पडऩे का कोई संकेत नहीं दिया है. ब्रिक्स में संयुक्त बयान में जैश के जिक्र पर चीन के समर्थन से कुछ उम्मीदें जरूर जगी थीं. अक्तूबर के अंत में अजहर को सूची में शामिल करने के आवेदन पर बीजिंग का जो रुख रहेगा, उससे तय होगा कि भारत से उसके रिश्ते कैसे रहेंगे.

