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बुलेट ट्रेन पर सवार रिश्ते

खूबसूरत शहर न्न्योटो में—गगनचुंबी इमारतों, सदियों पुराने मंदिरों, गीशा (जापान में नृत्य-गायन में पारंगत महिलाएं) घरों और हरियाली से अटा पड़ा शहर क्योटो. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन चंद विश्व नेताओं में हैं जिन्हें यहां लोग बखूबी पहचानते हैं

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और शिंजो अबे कावासाकी हेवी इंडस्ट्री के कारखाने में
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और शिंजो अबे कावासाकी हेवी इंडस्ट्री के कारखाने में
अपडेटेड 14 सितंबर , 2017

खूबसूरत शहर न्न्योटो में—गगनचुंबी इमारतों, सदियों पुराने मंदिरों, गीशा (जापान में नृत्य-गायन में पारंगत महिलाएं) घरों और हरियाली से अटा पड़ा शहर क्योटो. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन चंद विश्व नेताओं में हैं जिन्हें यहां लोग बखूबी पहचानते हैं. यहां तक कि टैक्सी ड्राइवर भी इंडिया टुडे की इस रिपोर्टर को, ‘‘मोदी के देश से आए यात्री’’ के रूप में संबोधित करता है. रेल कार बनाने वाली कंपनी कावासाकी हैवी इंडस्ट्रीज के कोबे शोरूम में जापानी प्रधानमंत्री शिंजो अबे और मोदी की तस्वीरें लगी हैं जो पिछले साल नवंबर में मोदी के यहां आने के दौरान खींची गईं थीं.

 परिवहन विभाग के अधिकारी, शिक्षाविद् और कंपनियों के उच्चाधिकारी, सभी मोदी को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखते हैं जिसमें दूरदर्शिता है और जो किसी भी काम को पूरा करने के प्रति दृढ़ संकल्प है. इंटरनेशनल हाइ-स्पीड रेल एसोसिएशन (आइएचआरए) के अध्यक्ष मसाफुमी शुकुरी कहते हैं, ‘‘मुझे लगता है कि अबे और मोदी के बीच भरोसे का रिश्ता है. इसके अलावा जापान की नीति अब भारत पर ज्यादा केंद्रित हो गई है.’’

मसाफुमी अहमदाबाद और मुंबई को जोडऩे वाली हाइ स्पीड रेल परियोजना के सिलसिले में बातचीत करने के लिए जापान गए भारतीय नेताओं की फोटो दिखाते हैं. भारत और जापान के नेताओं में एक दूसरे के प्रति प्रशंसा का एक बड़ा चिर-परिचित सा भाव रहा है. मोदी तो अबे की अर्थनीति (अबेनॉमिक्स) के तभी से बड़े प्रशंसक रहे हैं जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे.

दोनों देशों के बीच व्यापार संबंध लगातार बढ़ रहे हैं. भारत में जापानी निर्यात वर्ष 2005 के 22,900 करोड़  रुपए (388 अरब येन) से बढ़कर 2015 में 57,800 करोड़ रुपए (981 अरब येन) हो गया. अभी करीब 1,305 जापानी कंपनियों की भारत में शाखाएं हैं. भारत में छोटी कार क्रांति में जापान सबसे आगे रहा है और दिल्ली मेट्रो में भी इसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. आज, यह भारत को अलग फ्रेट कॉरिडोर बनाने और हाइ स्पीड रेल लाने में मदद कर रहा है.

जानकारों का मानना है कि एशियाई देशों के ये दोनों नेता एक-दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने में अपने दूरगामी हित देखते हैं. भारत अपने उद्योगों और बुनियादी ढांचे को बेहतर करने के अलावा उन्नत जापानी तकनीक का इस्तेमाल करना चाहता है. जबकि जापान अपनी वृद्ध होती आबादी के आर्थिक दुष्परिणामों को झेल रहा है और भारत के विशाल बाजार और भरपूर मानव संसाधन को देख उत्साहित है. यह एक प्रमुख कारण है कि वर्ष 2011 में भारत-जापान व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते पर हस्ताक्षर किए गए. समझौते में लक्ष्य रखा गया है कि दस साल के भीतर भारत-जापान में जिन वस्तुओं का व्यापार होता है, उनमें 94 प्रतिशत से अधिक को शुल्कमुक्त कर दिया जाए. जब से भारत ने जापानियों के लिए वीजा-ऑन अराइवल सुविधा शुरू की है, जापान के लिए भारत में काम करना आसान हो गया है.

2015 में प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान भारत में जापान के प्रत्यक्ष निवेश के साथ-साथ भारत में काम कर रहीं जापानी कंपनियों की संक्चया को 2019 तक दोगुना करने पर सहमति बनी. अबे ने घोषणा की कि उनका लक्ष्य सरकारी विकास सहायता के अंतर्गत दी जाने वाली धनराशि समेत भारत में होने वाले सरकारी और निजी निवेश तथा वित्तपोषण को 2.1 लाख करोड़ रुपये (3.5 खरब येन) के स्तर तक पहुंचाना है. आसान कारोबारी माहौल की जापान की अपेक्षाएं पूरा करने के लिए भारत ने वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय में जापानी कंपनियों की समस्याओं को एक ही जगह से हल करने के लिए ‘जापान प्लस’ कार्यालय की स्थापना की है.

दोनों देशों के बीच व्यापार का स्तर गिरा है

दोनों देशों के कारोबारी रिश्तों में अब तक सारा जोर भारत से जापान को निर्यात किए जाने वाले पेट्रोलियम उत्पाद, वस्त्र और एक्सेसरीज, लोहा और इस्पात उत्पाद और टेक्सटाइल धागे पर केंद्रित रहा है जबकि भारत को होने वाला जापानी निर्यात मशीन टूल्स, परिवहन उपकरण और इलेक्ट्रॉनिक सामान पर. अब मुंबई-अहमदाबाद हाइ स्पीड रेल परियोजना के रूप में दोनों देशों का व्यापारिक सहयोग एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है. सितंबर के मध्य में अपनी आगामी भारत यात्रा के दौरान जापानी प्रधानमंत्री शिंजो अबे के सबसे पहले अहमदाबाद जाने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हाइ स्पीड रेल परियोजना के कर्मचारियों के लिए खुलने जा रहे प्रशिक्षण केंद्र के उद्घाटन समारोह में वीडियो लिंक के जरिए भाग लेने की उम्मीद है. यह केंद्र वडोदरा में खुलना है.

इस परियोजना से जापान की छोटी-बड़ी तमाम कंपनियों में उत्साह का माहौल है. लेकिन एक पहलू है जो इस उत्साह को थोड़ा ठंडा करता है. मोदी और अबे के बीच तमाम सौहार्द-गर्मजोशी और इनके बीच की हर बैठक के बाद दोनों पक्षों की ओर से की गईं बड़ी-बड़ी घोषणाओं के बावजूद अधिकारियों का कहना है कि हाइ स्पीड रेल परियोजना की वास्तविक प्रगति धीमी है.

जापान के अधिकारियों का कहना है कि बातचीत के शुरुआती मसले को तो सुलझा लिया गया है और कुछ कंपनियों ने शिंकानसेन प्रणाली की तर्ज पर भारत में हाइ स्पीड रेल प्रणाली विकसित करने में दिलचस्पी भी दिखाई है, फिर भी कई कंपनियां इसमें शामिल होने में हिचक रही हैं. वे भारत में लालफीताशाही, नौकरशाही के कारण होने वाले विलंब और भारत में अच्छे व्यापार भागीदार खोजने में पेश आने वाली दिक्कत का हवाला देने के साथ-साथ भारत के भूमि और श्रम कानूनों को पेचीदा और कारोबार में बाधक बताती हैं. चिंता की एक और वजह यह है कि जापानी और भारतीय कंपनियों के बीच कई बड़े-बड़े साझेदारी समझौते अचानक और परस्पर मतभेद के कारण टूट गए.

भारतीय अधिकारियों में भी हाइ-स्पीड रेल के प्रति कुछ प्रतिरोध-सा दिखता है. जब इसकी बात की जाती है, तो वे अक्सर हाइ स्पीड रेल परियोजना और रेलवे सुरक्षा पर खर्च होने वाली राशियों की तलुना करते हैं. उनका कहना है कि 20 अगस्त की ट्रेन दुर्घटना में 23 यात्रियों के मारे जाने के बाद जापान के अधिकारी भी चिंतित हो गए हैं. उन्हें भी यह चिंता सताने लगी है कि दुर्घटना के कारण एक बार फिर से हाइ स्पीड रेल परियोजना बनाम रेलवे सुरक्षा के खर्च की बहस छिड़ जाएगी. नाम जाहिर न करने की शर्त पर एक अधिकारी ने कहा, ‘‘जब आपके प्रधानमंत्री ने फैसला कर लिया है (परियोजना को आगे बढ़ाने का) तो फिर बार-बार पीछे जाकर बहस में पडऩे का क्या मतलब?’’

इस साल जून में जापान की कावासाकी हैवी इंडस्ट्रीज ने स्टील मेट्रो कोच के निर्माण के लिए भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स के साथ तकनीकी सहयोग का समझौता किया. अभी इसपर ही चर्चा चल रही है कि प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण कैसे हो और प्रशिक्षण कैसे दिया जाए. कावासाकी के अधिकारियों का कहना है कि अचानक हाइ स्पीड परिवहन के क्षेत्र में कूद पडऩा उचित नहीं लगता. कावासाकी हैवी इंडस्ट्रीज के रोलिंग स्टॉक कंपनी के एक अधिकारी ने कहा, ‘‘हमें यात्री ट्रेनों और मेट्रो से शुरुआत करनी चाहिए. उसके बाद हम हाइ स्पीड रेलवे पर काम करें. हमें समय की जरूरत है.

इसे तुरंत नहीं कर सकते. हमें लोगों को प्रशिक्षित करना होगा, उन्हें उचित दिशानिर्देश देना होगा. अभी हमने अनुबंध पर हस्ताक्षर किए हैं और इसपर चर्चा कर रहे हैं कि इसे कैसे करें.’’ आइएचआरए अधिकारी भी इस परियोजना में भारत सरकार के केवल तीन बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित करने से चिंतित हैं—समय की पाबंदी, मेक इन इंडिया और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण. वे कहते हैं कि हाइ स्पीड रेल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका निर्माण नहीं बल्कि दुर्घटना से बचाव है.

1964 से चल रहा शिंकानसेन नेटवर्क का एक गौरवशाली सुरक्षा रिकॉर्ड है—53 साल में एक भी दुर्घटना नहीं हुई. उस समय जापान ने एक्सप्रेस-वे नेटवर्क के बजाय हाइ स्पीड रेल गलियारे विकसित कर अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने का एक सोचा-समझा फैसला लिया था. जापानी अकारण ही नहीं सुरक्षा और विश्वसनीयता के प्रति अपनी व्यवस्था पर गर्व करते हैं. उनका हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर पर उतना ही ध्यान था जिसमें ऑपरेशन, रखरखाव, कर्मचारी प्रशिक्षण के अलावा सुरक्षा, ठोस प्रबंधन तथा तकनीकी नवाचार आधारित मानसिकता विकसित करना शामिल था.

आइएचआरए के एक अधिकारी कहते हैं, ‘‘इन सभी पहलुओं को व्यवहार में लाने के बाद ही हमने आगे की राह तय की. हम इसे ‘टोटल सिस्टम अप्रोच’ वे कहते हैं. अगर इनमें से एक भी पैमाने पर चूक जाते तो बगैर हादसे के 53 साल के संचालन का अद्भुत रिकॉर्ड नहीं बना सकते थे.’’ वे कहते हैं, ‘‘पहले हाइ स्पीड रेल बनाएं, और फिर ‘मेक इन इंडिया’ के बारे में सोचें. ऐसा लगता है कि भारत का सारा जोर ‘मेक इन इंडिया’ को लेकर है. ‘समय की पाबंदी’ और ‘मेक इन इंडिया’ में संतुलन बनाना मुश्किल है. यह एक ऐसा मसला है जिसे सुलझाना जरूरी है.’’

भारत में इस परियोजना के विकास और कार्यान्वयन को सुचारु बनाने के लिए हाइ स्पीड रेल कॉर्पोरेशन (एचएसआरसी) की स्थापना की गई है. इसके प्रबंध निदेशक अचल खरे तत्काल निर्णय लेने और समयबद्ध काम करने के लिए जाने जाते हैं. हालांकि, भूमि अधिग्रहण में देरी और राज्य विकास प्राधिकरणों की आपत्तियां बड़ी चुनौती हैं. फिलहाल, निर्माण का काम 2018 में शुरू होने और 2023 से इसके चालू होने की उम्मीद है. परियोजना की कुल लागत का लगभग 80 फीसदी हिस्सा यानी एक लाख करोड़ रु. (1.8 खरब येन) 0.1 प्रतिशत ब्याज पर जापान की अंतरराष्ट्रीय सहयोग एजेंसी से मिल रहा है जिसे 50 वर्ष में चुकता करना है.  

यह कोई विशुद्ध परोपकार नहीं है. जापान की कंपनियों को लंबी अवधि के इस ऋण का लाभ तो मिलेगा ही, परियोजना का लंबे समय तक चलना भी उनके लिए फायदे का सौदा होगा. जापान के भूमि, बुनियादी ढांचा, परिवहन एवं पर्यटन मंत्रालय में इंटरनेशनल इंजीनियरिंग अफेयर्स (रेलवे ब्यूरो) के निदेशक, तोमोयुकी नाकानो कहते हैं, ‘‘जापान की कंपनियां आशा करती हैं कि इससे बिक्री बढ़ेगी. पूरी प्रणाली को चालू करने में कई दर्जन कंपनियों को शामिल करना होगा.’’

इस परियोजना में निजी क्षेत्र की भागीदारी के लिए एक टास्क फोर्स भी बनाई गई है. इसमें जापान के विदेश व्यापार संगठन, वित्त मंत्रालय, व्यापार और उद्योग मंत्रालय, भारतीय रेल मंत्रालय और औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया है. रोलिंग स्टॉक और रेलवे पटरियों से संबंधित खरीद के मुद्दों से निबटने और इस परियोजना में सिविल इंजीनियरिंग से जुड़े विभिन्न पहलुओं को सुविधाजनक बनाने के लिए उपसमूह भी स्थापित किए गए हैं.

लेकिन अब भी काफी कुछ किया जाना है. इतनी बड़ी परियोजना के लिए सबसे मुश्किल मसला होता है जमीन का अधिग्रहण. जब जापान ने अपने यहां हाइ स्पीड रेल नेटवर्क का काम शुरू किया तो उसने इसे आक्रामक निजीकरण कार्यक्रम के माध्यम से किया. सबसे पहले 1987 में उसने रेलवे का निजीकरण किया और फिर उसे ग्यारह छोटी-छोटी क्षेत्रीय रेल कंपनियों में बांटा. इस फैसले को लेने में बला के राजनैतिक साहस की जरूरत थी क्योंकि इससे तब बड़ी संक्चया में नौकरियां खत्म हो गई थीं.

जापानी शिंकानसेन नेटवर्क विकसित करने को बड़े बदलाव लाने वाले चुनिंदा नीतिगत फैसले के तौर पर देखते हैं. आइएचआरए के अध्यक्ष शुकुरी कहते हैं, ‘‘इसने लोगों का जीवन बदल डाला. इसके पहले सबसे तेज गति वाली ट्रेन से भी जापान के दो सबसे बड़े शहरों टोक्यो और ओसाका की दूरी तय करने में साढ़े छह घंटे लगते थे. अगर जाना-आना हो तो दो दिन लग जाते थे. शिंकानसेन नेटवर्क के कारण एक ही दिन में आना-जाना संभव हो गया और जाहिर है, इसके काफी आर्थिक फायदे हुए.’’

रेल नेटवर्क उपनगरों के विकास में वरदान साबित हुआ, क्योंकि इसने महानगरों पर प्रवासी आबादी का बोझ कम करने और रेलमार्ग पर व्यापार के महत्वपूर्ण केंद्र बनाने में अहम भूमिका निभाई है. इसने यात्रियों का एक नया वर्ग भी तैयार किया जो सड़क या हवाई मार्ग के विकल्प के तौर पर रेलमार्ग चुनने लगा जिससे दोनों नेटवर्क पर दबाव कम हो गया. इसके अतिरिक्त, लगभग 320 किमी प्रति घंटे की अधिकतम गति के साथ हाइ स्पीड रेल नेटवर्क ने कस्बों और शहरों को एक-दूसरे के नजदीक लाने में भी मदद की है. आज 600 किमी की यात्रा दो घंटों से भी कम समय में पूरी की जा सकती है.  

हालांकि, यह भी देखा गया है, स्थानीय हितों के सामने अक्सर राष्ट्रीय हित गौण हो जाते हैं. महाराष्ट्र में हाइ स्पीड रेलमार्ग के मुकाबले राज्य के अंतरराष्ट्रीय वित्त सेवा केंद्र्र (आइएफएससी) को प्राथमिक माना गया है. सरकार का मानना है कि बांद्रा-कुर्ला कॉम्पलेक्स (बीकेसी) में हाइ स्पीड रेल नेटवर्क के बजाए आइएफएससी को स्थापित करना ज्यादा जरूरी है. रेल मंत्रालय ने मुंबई और अहमदाबाद के बीच चलने वाली हाइ स्पीड ट्रेन के लिए भूमिगत स्टेशन बनाने के लिए बीकेसी में 0.9 हेक्टेयर जमीन की मांग की. मंत्रालय की नजर में यह जगह महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह स्टेशन रेल नेटवर्क का टर्मिनस भी बनेगा. महाराष्ट्र सरकार ने रेल मंत्रालय के अनुरोध को यह कहकर इनकार कर दिया कि बीकेसी का 0.9 हेक्टेयर क्षेत्र आइएफएससी के लिए निर्धारित किया गया है.

इस गतिरोध से निपटने के लिए गठित तीन सदस्यीय समिति के एक सदस्य महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री वरिष्ठ शिवसेना नेता दिवाकर राओते (त्ंवजम) ने 10 अगस्त को कहा कि राज्य सरकार ने रेलवे को स्टेशन के लिए कुछ किमी दूर धारावी में एक वैकल्पिक भूखंड की पेशकश की थी. वे कहते हैं कि शिवसेना का मानना है कि महाराष्ट्र को हाइ स्पीड रेल नेटवर्क से कोई खास फायदा नहीं होगा. उन्होंने यह भी मुद्दा उठाया कि परियोजना के लिए धन कहां से आएगा क्योंकि केंद्र का लागत साझा करने का प्रस्ताव उपयोगी नहीं.

इस प्रस्ताव के तहत लागत का 50 फीसदी केंद्र सरकार वहन करेगी और शेष राशि में महाराष्ट्र और गुजरात सरकारों को आधा-आधा वहन करना होगा. रावत का कहना है कि महाराष्ट्र के लिए यह सही नहीं क्योंकि इस मार्ग के 12 स्टेशनों में से केवल तीन ही महाराष्ट्र में स्थित है. उन्होंने कहा, ‘‘गुजरात को ज्यादा राशि का भुगतान करना चाहिए क्योंकि उसके पास 9 स्टेशन हैं.’’  महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस के कार्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का दावा है कि जमीन देने से इनकार के पीछे सौदेबाजी की रणनीति छिपी है.

वे कहते हैं कि सरकार मुंबई-नागपुर बुलेट ट्रेन परियोजना के लिए जेआईसीए की ओर से वैसा ही वित्त पोषण चाहती है जैसा मुंबई-अहमदाबाद रेल लिंक में हुआ. नए रेल मंत्री पीयूष गोयल को जमीन हस्तांतरण के संबंध में फडनवीस को सहमत करने के लिए पूरा जोर लगाना होगा. इधर सत्तासीन शन्न्तियों के बीच राजनैतिक खेल भारत के भविष्य का क्चयाल किए बगैर जारी है और उधर जापान का धीरज खत्म हो रहा है. अगर भारत के राजनेता वास्तव में देश का विकास देखना चाहते हैं, तो उन्हें काइजेन के जापानी व्यापार दर्शन से सीखने की सक्चत जरूरत है जो कार्य के सभी पहलुओं को सुधारने के लिए स्थिर और लगातार प्रयास पर जोर देता है.

साझेदारी दोनों देशों के फायदे में है और रक्षा जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग की संभावनाएं हैं. आज जबकि सबकी निगाहें उत्तर कोरिया और उसके परमाणु प्रक्षेपास्त्र मिसाइल कार्यक्रम के खतरे की ओर हैं, इसमें संदेह नहीं कि जापान के लिए अपने दोस्तों की संख्या को जितना संभव हो, बढ़ाना जरूरी हो गया है. कुछ और नहीं तो जापान के रक्षा मंत्रालय के बगीचे में हाल ही में तैनात की गई गहरे हरे रंग की मिसाइल एक कठोर चेतावनी की तरह है कि तकनीकी प्रगति एक दोधारी तलवार जैसी है.

 —साथ में किरण डी. तारे

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