पहले कैसा होता था
कहीं जाने के लिए ट्रेन का टिकट बुक कराना कुछ साल पहले तक देश के सबसे जहमतभरे कामों में एक माना जाता था. यह बिना बेहोशी की दवा दिए दांत उखड़वाने जैसा काम था. उस वक्त टिकट घरों के आगे लंबी कतारें लगती थीं. कर्मचारियों के आलस्य के चलते समय खराब होने के अलावा किसी चीज की गारंटी नहीं थी.
इंटरनेट के आगमन के बाद इंडियन रेलवे कैटरिंग ऐंड टिकट कॉर्पोरेशन (आइआरसीटीसी) ने अगस्त 2002 में ऑनलाइन सवारी आरक्षण प्रणाली की शुरुआत की.
मामूली शुरुआत
तमाम बड़ी चीजों की तरह इसकी शुरुआत भी छोटी रही—आइआरसीटीसी की ऑनलाइन विंडो से पहले दिन 27 टिकट बिके और पहले माह में कुल 3,343 टिकट बिके. आज यह रोजाना 6 लाख टिकट बेचती है जो कुल टिकट बिक्री का 55 फीसदी से ज्यादा है. पिछले साल इससे हुई बिक्री 22,023 करोड़ रु. की थी, जिसने इसे भारत का सबसे बड़ा ई-कॉमर्स पोर्टल और एशिया का अहम पोर्टल बना दिया. यही कारण है कि हाल में रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने कहा था कि आइआरसीटीसी के पास अमेजन जितना बड़ा होने की क्षमता है.
बड़ी योजनाएं
आइआरसीटीसी के सर्वर को अपग्रेड किया गया है जिससे यह एक बार में 15,000 प्रयोक्ताओं का भार झेल सकता है. यह क्षमता पहले 2000 की थी. इसके अलावा हिंदी में ई-टिकट पोर्टल और मोबाइल ऐप ला दिया गया है. अधिकतम उपयोग के लम्हों में आइआरसीटीसी की साइट घंटे भर में 20 लाख का टिकट तक बना लेती है. 2015 में लाए गए मोबाइल ऐप से रोजाना ढाई लाख लॉगइन हो रहे हैं. धीमी गति और सर्वर क्रैश की शिकायतें आती हैं पर कतार में लगकर टिकट खरीदने के दर्द के मुकाबले यह फिर भी बेहतर है.

