scorecardresearch

भाजपा ने कलिंग के लिए कसी कमर

उत्तर के राज्यों में चरम पर पहुंची भाजपा अब पूर्वी तटवर्ती राज्यों में जमीन पुख्ता कर रही है जहां मोदी लहर में भी अच्छा नहीं कर पाई. इस रणनीति का लॉन्चिंग पैड बनी भुवनेश्वर कार्यकारिणी.

रोड शोः भुवनेश्वर पहुंचे पीएम मोदी के रोड शो में उमड़ी भीड़
रोड शोः भुवनेश्वर पहुंचे पीएम मोदी के रोड शो में उमड़ी भीड़
अपडेटेड 25 अप्रैल , 2017
"आपने राजनैतिक सफर की शुरुआत द्वारिका नगरी और सोमनाथ (गुजरात) से की, फिर काशी विश्वनाथ की नगरी (वाराणसी) गए, हमारा सौभाग्य होगा अब अगर आप अगला चुनाव महाप्रभु जगन्नाथ की नगरी पुरी से लड़ें." उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक चुनावी जीत के बाद भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में हिस्सा लेने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 अप्रैल को भुवनेश्वर पहुंचे, तो ओडिशा इकाई के नेताओं ने यह प्रस्ताव रखा. आत्मविश्वास से भरे मोदी इस प्रस्ताव पर महज मुस्कराए. इस पर नेताओं ने कहा कि अगर आप नहीं तो राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाहजी को भेज दें.

भारतीय प्रायद्वीप के दक्षिण पूर्वी तटवर्ती क्षेत्र, जिसे कोरोमंडल कहा जाता है, बीजेपी की 2019 की रणनीति में सबसे अहम है. इसलिए ओडिशा की भाजपा इकाई का यह प्रस्ताव मायने रखता है क्योंकि राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद शाह ने जब सदस्यता अभियान चलाया तो खुद इसी सूबे से सक्रिय सदस्य बने. ओडिशा को लेकर शाह का लक्ष्य स्पष्ट है क्योंकि हालिया पंचायत चुनाव में पार्टी ने कांग्रेस और बीजू जनता दल को कमजोर करते हुए दूसरे नंबर की पोजीशन हासिल की है. शाह की रणनीति के बारे में पार्टी के एक नेता कहते हैं, ''शाह किसी भी कीमत पर ओडिशा में भगवा सरकार बनाने में जुट चुके हैं क्योंकि 2014 के आम चुनाव में मोदी लहर के बावजूद पार्टी को 21 लोकसभा सीटों में से महज एक सीट ही मिल पाई थी."

ओडिशा के लिए भाजपा की रणनीतिओडिशा बरास्ता कोरोमंडल पर निगाह
कोरोमंडल क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए भाजपा ने ओडिशा को गेट-वे बनाया है. संगठनात्मक और चुनावी अंकगणित में पार्टी का प्रभाव इन इलाकों में कमतर है, इसलिए चुनाव से दो साल पहले पार्टी ने रणनीति के तहत ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर को राष्ट्रीय कार्यकारिणी (15-16 अप्रैल) के लिए चुना. हाल ही में केसरिया पलटन ने पंचायत चुनाव में लंबी छलांग लगाई है और उसे 34 फीसदी वोट मिले, जिसमें शहरी वोट शामिल नहीं है. भाजपा के एक नेता के मुताबिक, खुद प्रधानमंत्री पंचायत चुनाव को नोटबंदी के बाद की पहली स्वीकार्यता मानते हैं. हालांकि ओडिशा में भाजपा को अपनी संगठनात्मक कमजोरी का भी एहसास है, इसलिए कार्यकर्ताओं को उत्साहित करने के लिए पार्टी ने यूपी की जीत के बाद भुवनेश्वर से संगठनात्मक विस्तार का आगाज कर दिया.

ओडिशा के तटीय क्षेत्र में भाजपा कमजोर है, जबकि पश्चिमी क्षेत्र में परंपरागत गैर-कांग्रेसी माहौल की वजह से पार्टी मजबूत स्थिति में है. पश्चिमी क्षेत्र में पहले गणतंत्र परिषद, फिर स्वतंत्र पार्टी और बाद में बीजू पटनायक का प्रभाव रहा, अब भाजपा इस क्षेत्र में प्रभावी है. जबकि तटीय क्षेत्र में मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की पार्टी बीजू जनता दल मजबूत है. भाजपा को इस क्षेत्र में बीजू जनता दल में बिखराव की संभावनाएं दिख रही हैं. तटीय क्षेत्र समेत ओडिशा में पार्टी का प्रभाव बढ़ाने में केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान खुद के विभाग समेत केंद्र सरकार की विकास की योजनाओं को अंजाम दे रहे हैं. (देखें ग्राफिक) प्रधानमंत्री मोदी का 2014 से अब तक चार सरकारी दौरे ओडिशा में हो चुका है और मूलतः ओडिशा के प्रधान विकास के एजेंडे के जरिए राजनैतिक संदेश को साकार करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं. भगवा परचम लहराने की स्थिति में प्रधान मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदारों में से भी माने जाते हैं.

2014 के लोकसभा चुनाव में गुजरात, राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भाजपा अपने चरम पर पहुंच चुकी है, जहां अब विस्तार की गुंजाइश बेहद कम है. इसलिए कोरोमंडल और पूर्वोत्तर में सात राज्य असम, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और तमिलनाडु अब भाजपा के एजेंडे पर है. शाह ने कार्यकारिणी के संबोधन में इसका इजहार भी किया, ''2014 में कहा गया भाजपा अपने चरम पर पहुंच गई, 2017 में भी यही कहा गया. लेकिन अभी बीजेपी का चरमोत्कर्ष बाकी है. हमारा संकल्प है कि भाजपा पंचायत से पार्लियामेंट तक हर प्रदेश में होना चाहिए, तभी सही मायने में भाजपा का स्वर्णिम युग आएगा." इसी रणनीति के तहत विस्तारक योजना शुरू की है और 2,470 ऐसे कार्यकर्ता छांटे हैं जो एक साल तो 1,441 ऐसे हैं जो छह माह और 3 लाख 78 हजार कार्यकर्ता 15 दिन का समय पूरी तरह से संगठन के लिए देंगे. पार्टी 2014 में 428 सीटों पर चुनाव लड़ी थी जिसमें से 146 सीटें हारी थी. हारी हुई सीटों में से पार्टी ने 125 लोकसभा सीटों पर फोकस बढ़ाया है, जिनमें पार्टी को संभावनाएं दिख रही है और ज्यादातर इन्हीं राज्यों से आते हैं.

शाह ने अध्यक्षीय भाषण में कहा, ''हमारे बारे में यह धारणा
थी कि कांग्रेस से मुकाबले में जीत जाते हैं और क्षेत्रीय दलों के सामने हार जाते हैं. लेकिन यूपी ने इस मिथक को तोड़ दिया है." इसलिए अब रणनीति के तहत कोरोमंडल क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए भाजपा ने भुवनेश्वर के बाद 15-16 जुलाई को आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में अगली राष्ट्रीय कार्यकारिणी करने का ऐलान कर दिया है.

भुवनेश्वर मंे मोदी और धर्मेंद्र प्रधानपिछड़ा कार्ड का दांव
यूपी में सामाजिक समीकरण का बड़ा और सफल पैंतरा आजमा चुकी भाजपा ने भुवनेश्वर कार्यकारिणी में पहली बार ओबीसी को लेकर विशेष प्रस्ताव पास किया, जिसमें मोदी कैबिनेट की ओर से पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने पर वाहवाही लूटने की कोशिश हुई तो राज्यसभा में बिल अटकाने के लिए कांग्रेस को आड़े हाथों लिया. पार्टी ने प्रस्ताव में कहा कि 30 साल से पिछड़ा वर्ग को कांग्रेस ने वोट बैंक के रूप में देखा और उसकी मांग को गंभीरता से नहीं लिया. लेकिन मोदी सरकार पिछड़ा वर्ग को न्याय दिलाने की दिशा में आगे बढ़ रही है. हालांकि इस प्रस्ताव के पीछे भाजपा का दर्द भी है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान जहां पार्टी शासन में है, पिछड़ा वर्ग में आरक्षण की मांग को लेकर हिंसक वारदातें भी हुई है. लेकिन इस प्रस्ताव के जरिए पार्टी ने खुद को पिछड़ों का हिमायती होने का संदेश देने की भरसक कोशिश की है. लोकसभा चुनाव में भाजपा को 2009 के मुकाबले 12 फीसदी अधिक यानी 38 फीसदी पिछड़ा वोट मिला था. पार्टी अपने विस्तार की योजना में इस वर्ग को काडर के तौर पर जोडऩा चाहती है.

पिछड़ा कार्ड दांव के तहत भाजपा मुसलमानों में पिछड़े वर्ग को भी जोडऩे की रणनीति बना रही है. प्रधानमंत्री मोदी ने समापन भाषण में इस पर खास जोर दिया, ''ओबीसी को अपने साथ जोड़ते वक्त हमें मुसलमानों में पिछड़े लोग जिसे पसमांदा कहते हैं उनकी समस्याओं पर ध्यान देकर अपने साथ जोडऩा चाहिए." तीन तलाक पर भी मोदी ने कहा कि इस कुप्रथा को हटाने के लिए जागरूकता फैलानी चाहिए. पार्टी की पिछड़ा रणनीति में ओडिशा और तटवर्ती क्षेत्र भी है. ओडिशा में करीब 30 फीसदी पिछड़ा वर्ग है. इसके अलावा वहां एससी-एसटी 35 फीसदी, अल्पसंख्यक 5 फीसदी और बाकी अन्य समाज के लोग हैं जबकि राजनैतिक प्रस्ताव में भाजपा ने कहा है कि जिस तरह गरीबी दूर करने का मुद्दा इंदिरा गांधी के पास था, अब वह भाजपा के पास है.

विपक्षी नहीं, सत्ताधारी सोच का मंत्र
समाज के तमाम वर्ग को अपने साथ लेने की रणनीति के तहत प्रधानमंत्री मोदी ने कार्यकर्ताओं को मंत्र भी दिया. उन्होंने कहा, ''हम लंबे समय तक विपक्ष में रहे इसलिए परिपक्वता आई, लेकिन अब हमें सत्ताधारी पार्टी की तरह व्यवहार करना चाहिए. लेकिन विजय के बाद उन्माद नहीं होना चाहिए, हमें नम्रता से आगे बढऩा चाहिए." उन्होंने उदाहरण देकर कहा कि अगर 100 किमी सड़क बनती है और उसमें 100 मीटर का टुकड़ा किसी कारण छूट जाता है तो हम उसी कमजोरी पर ध्यान देते हैं और बाकी मुक्चय उपलब्धि को भुला देते हैं. जबकि कमजोरी की बजाए सरकार की बड़ी उपलब्धि को जनता में उछालना चाहिए. मोदी ने संघ की चार पीढिय़ों की कुर्बानी का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा, ''सबसे        ज्यादा हार हमने देखी है, दो सीटें आने पर मजाक भी उड़ाया गया. लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि यहां तक लाने में हमारी चार पीढिय़ों ने कुर्बानी दी है. इसलिए सत्ता परिवर्तन ही नहीं, हमारा साधन है. हमें इस बलिदान को ध्यान में रखकर 2022 तक भय-भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाना है." उन्होंने कार्यकर्ताओं को साफ संदेश दिया कि विपक्ष की आलोचनाओं पर ध्यान न दें क्योंकि वे कौन सी फैक्ट्री में मुद्दे बनाते हैं, समझ नहीं आता. मोदी ने याद दिलाया कि पहले चर्च पर हमले का आरोप, फिर अवार्ड वापसी और अब यूपी की हार के बाद ईवीएम पर ही सवाल उठा रहे हैं.

भव्यता के साथ मोदी-शाह शो
ओडिशा का मेगा शो पूरी तरह से पार्टी के बदले युग की कहानी और नई रणनीति को बयां करने वाला रहा. भुवनेश्वर के जनता मैदान में करीब 55-60 हजार वर्ग फुट का वातानुकुलित भव्य पांडाल, जिसमें ओडिशा की कला-संस्कृति की पूरी झलक पिरोई गई थी. मैदान में बैठक स्थल के साथ ही दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय पर आधारित प्रदर्शनी लगाई गई थी जिसमें मोदी सरकार के तीन साल की उपलब्धियों का बखान था तो राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी के विजय रथ की झलक भी थी. भुवनेश्वर की बैठक बीजेपी में बदलाव की पूर्णता का गवाह भी बनी. प्रधानमंत्री ने शाह की जमकर तारीफ की. मोदी ने कहा, ''अमित शाह ने रणनीतिकार शब्द को नई पहचान दी है, जिन्होंने सारे राजनैतिक पंडितों को झुठला दिया." उन्होंने हर बूथ पर एक अमित शाह खड़ा करने का मंत्र भी दिया. शाह ने भी अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रधानमंत्री मोदी को आजादी के बाद का सबसे लोकप्रिय नेता बताया.

मंदिरों की नगरी कही जाने वाली भुवनेश्वर का ऐसा कोई कोना या सड़क नहीं थी जहां भाजपा का झंडा और होर्डिंग्स नहीं हो. सड़कों के किनारे गहरा कर बांस की बल्लियां लगाई गई और उस पर मजबूती से पार्टी का झंडा लहराया गया था जैसी राजनैतिक मजबूती वह 2019 के लोकसभा-विधानसभा चुनाव में चाहती है. व्यवस्था का प्रबंधन कितनी बारीकी से किया गया था इसकी झलक इससे मिलती है कि मोदी की तीन होर्डिंग के बाद शाह की एक होर्डिंग पूरे शहर में लगाई गई थी. कार्यक्रम की भव्यता से गदगद मोदी ने अपने समापन भाषण में पांच मिनट तक व्यवस्था की सराहना की. मोदी ने कहा, ''ओडिशा संगठन में गुणात्मक परिवर्तन अब स्पष्ट रूप से दिख रहा है." उनका इशारा केंद्रीय मंत्री प्रधान की ओर था, जिन्होंने इस भव्य आयोजन की मुख्य कमान संभाल रखी थी.

सरकार में मोदी और संगठन में शाह के अहम रणनीतिकार माने जाने वाले प्रधान ने कम समय में जिस तरह बैठक के लिए माहौल बनाया उससे उनका ग्राफ और बढ़ा है. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''प्रधान अपनी संगठनात्मक और प्रशासनिक क्षमता की वजह से मोदी-शाह दोनों के खास हैं तो ओडिशा के युवाओं में भी उनको लेकर उत्साह दिखता है." व्यवस्था पर निगाह रखने वाले शाह के खास और ओडिशा भाजपा के प्रभारी राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह कार्यकारिणी की सफलता पर कहते हैं, ''संदेश साफ है कि भाजपा को देश में हर जगह सर्वोच्च स्थान पर जाना है और इसके लिए हमें और मेहनत करनी है." 

बीजेपी पूर्वोत्तर और कोरोमंडल के राज्यों की ओर बढ़ चुकी है. शाह ने दो-टूक कहा कि बूथ का गठन या सक्रियता चुनाव के समय नहीं बल्कि इसे हमेशा जीवंत रखना चाहिए. पार्टी केंद्र की सत्ता में होने और मोदी की लोकप्रियता का लाभ उठाकर संगठन का ऐसा मजबूत ताना-बाना बुनना चाहती है, ताकि भारतीय मानचित्र के हर हिस्से में कमल खिलाया जा सके.
Advertisement
Advertisement