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टेक्सटाइल: जानें कौन बदल रहे हैं सूत-कताई का चेहरा

भारतीय फैशन डिजाइनर परंपरागत कपड़ों में नई अपील तलाश कर रहे हैं और उससे इंकलाब का समूचा ताना-बाना रच रहे हैं.

फैशन डिजाइनर राजेश प्रताप सिंह
फैशन डिजाइनर राजेश प्रताप सिंह
अपडेटेड 22 अगस्त , 2016

दिल्ली के छतरपुर स्थित एक विशाल फार्महाउस में 35 वर्षीय संजय गर्ग हथकरघा के क्षेत्र में किए अपने काम को समझाने के लिए कुछ कपड़े निकालकर दिखाते हैं—एक ब्रोकेड सिल्क प्लेटेड लहंगा, सिल्क की एक लाल अनारकली साड़ी और एक पुराने किस्म की बैंगनी साड़ी. वे कहते हैं, ''मैं साडिय़ों की जरूरत और मांग को वापस बहाल करना चाहता हूं. मैं टेक्सचर को मिलाकर, ब्लाउज को दिलचस्प बनाकर और मोटिफ के साथ छेड़छाड़ कर साडिय़ों की संस्कृति को और प्रासंगिक बनाने की कोशिश कर रहा हूं.''

ऐसा करने वाले गर्ग अकेले नहीं हैं. भारत में फैशन का नया अध्याय डिजाइन से शुरू नहीं होता, बल्कि यह टेक्सटाइल का मामला है. नए किस्म के डिजाइनरों का समूह हथकरघा के समूचे परिदृश्य को बदलने में जुटा हुआ है. डिजाइन में तब्दीली करके इन्होंने शहरवासियों की हथकरघा के प्रति दृष्टि को ही बदल डाला है. फैशन डिजाइन काउंसिल ऑफ इंडिया (एफडीसीआइ) द्वारा पिछले साल आयोजित मेक इन इंडिया कार्यक्रम में 16 डिजाइनरों का काम दिखाया गया था, जिन्होंने बनारसी साड़ी पर काम करके समकालीन और परंपरागत परिधानों की रचना की थी. एफडीसीआइ के चेयरमैन सुनील सेठी कहते हैं कि यह तो बस एक शुरुआत है.

हथकरघा पर काम करने वाले डिजाइनर इस क्षेत्र को महत्वाकांक्षी बनाने में लगे हैं. उनका मानना है कि हथकरघा उद्योग चैरिटी के भरोसे नहीं टिक सकता. फैशन उद्योग ही हथकरघा को 'जनता के परिधान' के अभिशाप से मुक्त करवाएगा, ऐसा वे मानते हैं. डिजाइन के क्षेत्र में यह नया नजरिया अब कारगर हो रहा है. कई डिजाइनरों ने फैशन को हथकरघा के साथ मिलाकर अपना करियर गढ़ा है.
तुलसी की नीरू कुमार कहती हैं, ''बुनकर समुदाय अब कम होता जा रहा है. मशीन के करघे पर बुने कपड़े हथकरघे के मुकाबले काफी सस्ते होते हैं, लेकिन उसमें वह विशिष्टता नहीं होती.'' नीरू कुमार ने हथकरघे को फैशन से जोडऩे का काम अस्सी के दशक में शुरू किया था, जब उन्होंने हैंडीक्राफ्ट ऐंड हैंडलूम एक्सपोर्ट कॉर्पोरेशन ऑफ  इंडिया के साथ काम करते हुए दिल्ली में उससे प्रदत्त छह करघे बिठा लिए थे. वे कहती हैं, ''अगर कपड़ा मजबूत है तो फैशन आसान हो जाता है.''

वैश्विक मंच पर सुकेत धीर ने 2016 का इंटरनेशनल वूलमार्क पुरस्कार हासिल किया, जो दुनिया भर के उभरते हुए डिजाइनरों को मान्यता देता है. राहुल मिश्रा ने 2014 में यह पुरस्कार हासिल किया था. दोनों ने ही अपने कलेक्शन हथकरघे पर तैयार किए थे. इनकी कामयाबी से भारतीय फैशन अब दुनिया के मंच पर जगह पा रहा है. अब्राहम ऐंड ठाकोर के डेविड अब्राहम कहते हैं, ''मेड इन इंडिया उतना ही संभव है जितना मेड इन इटली.'' इसकी ताकत जबरदस्त है. पैंतीस साल के हेमांग अग्रवाल इसका एक सशक्त उदाहरण हैं. वे बनारस में 40 साल पुराना अपना खानदानी कारोबार चलाते हैं और देश के अग्रणी डिजाइनरों के साथ काम करते हैं. पिछले चार साल के दौरान उनका टर्नओवर 300 फीसदी से ज्यादा बढ़ा है.

कई दूसरे डिजाइनरों ने देर से इस क्षेत्र की ताकत को पहचाना है. हैंडलूम जनगणना के मुताबिक, बुनकारी और संबद्ध कामों में लगे लोगों की संख्या 1995-96 के 66 लाख से घटकर 2009-10 में 43 लाख रह गई है, पर 2008-09 में मेगा हैंडलूम क्लस्टरों के विकास के लिए कम्प्रीहेन्सिव हैंडलूम क्लस्टर डेवलपमेंट स्कीम लाई गई थी. पिछले साल नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर इंडिया हैंडलूम ब्रांड का उद्घाटन किया. भुवनेश्वर में डिजाइन सूत्र नाम की एक राष्ट्रीय कार्यशाला का भी आयोजन किया गया, जहां 15 निफ्ट, निजी संस्थानों और 25 बुनकर सेवा केंद्रों ने निफ्ट के कोर्सवर्क को हैंडलूम और हैंडीक्राफ्ट क्लस्टर के साथ जोडऩे का निर्णय लिया.
गर्ग कहते हैं, ''आज डिजाइनर टेक्सटाइल से जुड़कर अपनी पहचान बना रहे हैं. हम टेक्सटाइल को बहाल नहीं कर रहे बल्कि टेक्सटाइल डिजाइनरों को बहाल कर रहा है.''

नई शुरुआत
कपड़ों के साथ फैशन की शुरुआत डेविड अब्राहम और राकेश ठाकोर ने की, जिन्होंने 1992 में दोहरी इकत की बुनकारी का काम शुरू किया था. एका की रीना सिंह कहती हैं कि दो दशक बाद यह साफ हो चुका है कि दुनिया के मंच पर भारत हथकरघा के माध्यम से ही अपनी पहचान बना सकता है, जिसकी और कहीं नकल नहीं की जा सकती. 

यह बदलाव डिजाइनर और क्षेत्र दोनों के लिए लाभकारी है. मसलन, गर्ग ने गुजरात और बनारस के मशरू, मध्य प्रदेश की चंदेरी, बनारस के ब्रोकेड और बंगाल के जामदानी पर काम किया है.

उनका नया कलेक्शन पुराने जमाने की छाप के साथ एक रूमानी एहसास देता है. इसे सिंगापुर, कोलंबो, दुबई और हांगकांग में बेचा जाना है. गर्ग कहते हैं कि अपना लेबल 'रॉ मैंगो' लॉन्च करने के बाद उनका टर्नओवर हजार गुना बढ़ चुका है. उनके मुताबिक, दुनिया भर में उनके लेबल बेचने वाले स्टोरों की संख्या बढ़ती जा रही है.

गर्ग के जैसे अन्य डिजाइनरों ने अपना करियर हथकरघे के सहारे ही खड़ा किया है. हरेक की अपनी विशिष्टता है. मसलन, रीना सिंह साधारण आकृतियों में विश्वास रखती हैं, सामंत चौहान भागलपुरी सिल्क के दीवाने हैं और पेरो की अनीत अरोड़ा के बनाए कपड़े 20 देशों के 60 स्टोरों में मौजूद हैं, जिनका आधार हथकरघा है. उनके एक परिधान में कम से कम 18 किस्म के शिल्प पाए जाते हैं.

इस कारोबार में जबरदस्त ऊर्जा है, जो दूसरे को प्रेरित करती है. नया पद संभालने के बमुश्किल 20 दिन बाद केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी ने 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस से पहले वियर हैंडलूम नाम का एक ट्विटर अभियान शुरू किया. यह काफी तेजी से फैला. हथकरघा प्रेमियों ने अपने एक ट्वीट में पांच और लोगों को टैग किया. एफडीसीआइ के सेठी ने हथकरघा दिवस मनाने के लिए ईरानी के साथ बनारस निकलने से पहले अपने डिजाइनरों के समूह को हथकरघा परिधानों में उनकी तस्वीरें पोस्ट करने को कहा. ईरानी ने बनारस में कहा, ''मैं हथकरघे का परिधान पहनती हूं और देशवासियों से आग्रह करती हूं कि वे भी ऐसा ही करें ताकि लाखों बुनकरों को लाभ हो.'' उन्होंने डिजाइनरों से कहा कि वे उनके महंगे कपड़े नहीं खरीद सकतीं, लेकिन उनसे आग्रह किया कि वे अपने दखल से देश में हथकरघे की बहाली में मदद करें.

अगले पांच साल में एक लाख रोजगार पैदा करने और 11 अरब डॉलर का निवेश आकर्षित करने के लिए पिछले जून में कपड़ा विकास के लिए 6,000 करोड़ का बजटीय आवंटन किया गया था. एफडीसीआइ की एक ईमेल में डिजाइनरों से कहा गया है कि वे देश भर के शिल्पकारों को प्रशिक्षित करने के लिए 28 सरकारी क्लस्टरों में अपनी अभिरुचि दर्शाएं. अनिता डोंगरे ओडिशा के बुनकरों के साथ काम करेंगी. रितु कमार ने एक टेक्सटाइल रिवाइवल कलेक्शन लॉन्च किया है. इस अगस्त में होने वाले लैक्मे फैशन वीक में गर्ग की डिजाइनों का प्रदर्शन होगा, जो मशरू और परंपरागत बूटियों वाले सिल्क से बने हैं.

वैश्विक मंच पर डिजाइनर
तमाम बड़े डिजाइनर अब हैंडलूम को फैशनेबल बनाने में जुट गए है. 47 वर्षीय राजेश प्रताप सिंह 20 साल से काम कर रहे हैं और देश के बाहर के बड़े डिजाइनरों में शामिल हैं. उनका अपना करघा नीमराणा में है.

वे ओडिशा की संभलपुरी, आंध्र की दोहरी इकत और कश्मीर की पश्मीना पर काम कर चुके हैं. वे कहते हैं, ''मेरा काम नई चीजें रचना है. मैं शोध और विकास का काम करता हूं, लेकिन मैं कोई एनजीओ नहीं चला रहा और इसीलिए मैं टैग में विश्वास नहीं करता.''

पिछले साल हुए अमेजन फैशन वीक में एफडीसीआइ के मेक इन इंडिया आयोजन के तहत उन्होंने अपने कलेक्शन का एक छोटा-सा अंश प्रस्तुत किया था, जिसमें बनारस के किनखाब का इस्तेमाल किया गया था. वे कहते हैं कि हथकरघे को डिजाइन के नजरिए से उन्नत करना होगा ताकि वह दुनिया भर में बिक सके. ये डिजाइनर अब भी इस धारणा से जूझ रहे हैं कि हथकरघा गरीब आदमी की मजबूरी होता है.

2004 में सामंत चौहान की मां ने जब निफ्ट, दिल्ली में उनके ग्रेजुएशन प्रोजेक्ट के दौरान भागलपुरी सिल्क का बनाया उनका कलेक्शन देखा तो पूछा कि इतने मोटे सिल्क पर काम करने की जरूरत क्या थी. बाद में इसी कलेक्शन के लिए बिहार के इस डिजाइनर को पुरस्कार मिला और जब 2005 में सिंगापुर में उन्होंने अपना कलेक्शन प्रदर्शित किया तो कई लोगों का कहना था कि वह नई सदी में हैंडलूम फैशन के सबसे निर्णायक पलों में एक था.

उन्हें 2006 में एफडीसीआइ की सदस्यता हासिल हो गई. यह एक चुनौतीपूर्ण यात्रा की शुरुआत भर थी, लेकिन दिल्ली के शाहपुर जाट में अपना नया स्टोर खोलने के बाद चौहान कहते हैं कि इसका सारा श्रेय उनके राज्य के उस कपड़े को जाता है, जिसे मोटा कहकर खारिज किया जाता था. वे कहते हैं कि बीते एकाध साल में उनका टर्नओवर दस गुना तक बढ़ गया है. वे न्यूयॉर्क और लंदन में क्रमशः एंथ्रपोलॉजी और आशी ऐंड कंपनी को अपना माल बेचते हैं.

चौहान को लंदन फैशन वीक में 2008 में अपना कलेक्शन प्रस्तुत करने के लिए बुलाया गया था और 2012 में उन्होंने अपना लेबल राजपूताना के नाम से लॉन्च कर दिया. वे कहते हैं, ''आप सहानुभूति या गौरव के भरोसे नहीं बेच सकते. आपका माल प्रतिस्पर्धी होना चाहिए. लोग हल्की चीज नहीं खरीदते.'' उनका ताजा माल हैंडलूम डेनिम है. यह डेनिम क्लब ऑफ  इंडिया के साथ एक प्रोजेक्ट के तहत तैयार किया गया है. वे कहते हैं, ''मेरी इच्छा है कि मैं भागलपुर में एक कारखाना खोलूं, जहां धागे से लेकर तैयार परिधान तक सब कुछ तैयार हो सके.''

34 वर्षीय गौरव जय गुप्ता भी ऐसे ही उत्साही डिजाइनर हैं. वे कहते हैं, ''आप हथकरघे पर अपनी चमड़ी भी सिल सकते हैं.'' वे 2002 में किए अपने काम का पोर्टफोलियो दिखाते हैं, जो उन्होंने लंदन के चेल्सिया कॉलेज ऑफ आर्ट ऐंड डिजाइन में तैयार किया था. उसमें कपड़े की तरह बुने ऑडियो टेप हैं, आपस में बुने हुए बिजली के तार हैं.

डिजाइन की दुनिया में उनका उभार भी 2010 में पेरो की अनीत अरोड़ा, चिनार फारुकी और राहुल मिश्रा की तरह हुआ. वे कहते हैं, ''हम हथकरघे को बचाने के लिए उस पर काम नहीं करते, इसलिए करते हैं क्योंकि हमें वह पसंद है.'' भारत में फैशन जगत पर 2009-10 तक मनीष मल्होत्रा, गौरव गुप्ता और वरुण सरदाना का राज हुआ करता था, लेकिन हैंडलूम फैशन के मुट्ठी भर प्रणेताओं ने इस यथास्थिति को तोडऩा शुरू कर दिया है. वे कहते हैं, ''उस वक्त हर कोई अलेक्जेंडर मक्वीन होना चाहता था.''

वे कहते हैं कि पिछले कुछ साल चुनौतीपूर्ण थे, लेकिन अब वे परिपक्व हो चुके हैं. ऊन, सिल्क, कॉटन, स्टेनलेस स्टील, धातु और जरी के बनाए उनके डिजाइन आज हांगकांग, अमेरिका, यूके, सिंगापुर, जापान और ऑस्ट्रेलिया में बिक रहे हैं.

40 वर्षीया रीना सिंह ज्यादातर हैंडलूम पर काम करती हैं और जानती हैं कि भारतीय फैशन की ताकत कपड़ों की विरासत में पैबस्त है. वे कहती हैं कि आप ज्यां पॉल गॉशियर की कसीदेकारी को टक्कर नहीं दे सकते.

एका के डिजाइन यूएस, यूके, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, इटली, स्पेन, कोरिया और जापान में बिकते हैं. वे कपास, खादी, लिनेन और सिल्क पर काम करती हैं और उनका कहना है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान उनका टर्नओवर 200 फीसदी बढ़ा है.

अग्रणी डिजाइनर
भारतीय कपड़ा क्षेत्र में 61 वर्षीय डेविड अब्राहम वरिष्ठ नामों में एक हैं. ये और ठाकोर दोनों एनआइडी से पढ़े हैं और इन्होंने कॉलेज में बुनकारी सीखी थी. अब्राहम याद करते हैं कि कैसे उन दिनों एक शिक्षिका लाल, काली और सफेद इकत की हैंडलूम वाली साड़ी पहना करती थी और सबसे अलग दिखती थी.

वे कहते हैं, ''वह समझदारी का एक अहम हिस्सा था. आप अपने माहौल में ही शिल्प से रू-ब-रू होते थे. एक डिजाइनर के लिए यह जायका अद्भुत था. बतौर डिजाइनर हम केवल कट में नहीं बल्कि उस समूचे फैब्रिक में दिलचस्पी लेते थे और उसे बनाना चाहते थे.''
इनका पहला कलेक्शन आज से 20 साल पहले आया था, जो आंध्र प्रदेश की दोहरी इकत पर केंद्रित था. लंदन की कोनरॉन शॉप ने उनके कलेक्शन के 30 पीस खरीदकर इनके काम को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया. आज एऐंडटी कई देशों को अपना माल बेचती है, जिनमें लंदन, न्यूयार्क, टोक्यो, सिंगापुर, रोम और कुवैत शामिल हैं.

37 वर्षीय राहुल मिश्रा को बुनकरों के एक छोटे से सपने का साक्षात्कार करने का मौका मिला, जिसके बाद उन्हें बुनकारी के सुख के बारे में पता चला. आज वे एक स्थापित डिजाइनर बन चुके हैं. बात 2006 की है, जब मिश्रा एनआइडी के एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में केरल गए हुए थे. आज पेरिस फैशन वीक में हिस्सा लेने वाले मिश्रा उस वक्त एनआइडी में पढ़ते थे. वहां उनकी मुलाकात पद्मश्री मास्टर पी. गोपीनाथ से हुई, जिन्होंने केरल के एक गांव में 1000 करघे लगाए थे. इस कपड़े ने उन्हें चमत्कृत किया.

यूपी के मलहौसी नामक गांव में जन्मे मिश्रा ग्रामीण जीवन की बारीकियों से परिचित हैं. वे कहते हैं, ''जब मैं एनआइडी में आया तो मुझे अपैरेल डिजाइन लेना पड़ा क्योंकि मेरे अंक दूसरे विषयों के लायक नहीं थे. आज मैं करीब 700-800 लोगों के साथ काम कर रहा हूं. अब मेरा लक्ष्य उत्तर पूर्व है. मैं वहां के कपड़ों के बारे में जानना चाहता हूं.''

इस डिजाइनर ने बुनकरों के लिए घर वापसी नाम की एक परियोजना भी शुरू की, जिसके तहत इन्होंने 200 शिल्पकारों को उनके गांवों में वापस बसाने का काम किया है. ये बुनकर बंगाल के बोंदपुर गांव के थे, जो धारावी की झुग्गियों में रहते थे. ये लोग आरी, कांठा और जरदोज का मिलाजुला काम करते हैं. वे कहते हैं, ''ये लोग कम से कम 25 फीसदी ज्यादा कमा रहे हैं और अपने गांव और परिवार के करीब हैं.''

हेमांग अग्रवाल की विशेषज्ञता के बगैर हालांकि हैंडलूम फैशन के ये डिजाइनर कहीं नहीं होते. वे ऐसे शख्स हैं, जो बड़े नामों के साथ काम करते हैं और बनारस में रहकर उनकी डिजाइनों में मदद करते हैं. कई साल पहले उनके पिता एक केसरिया रंग की सिल्क रैप स्कर्ट ले आए थे, जो होल्कर घराने की रानी के लिए बनाई गई थी. बुनकर ने इसके केवल दो पीस बनाए थे. करीब 150 साल पुरानी यह स्कर्ट बनारस में बुनी गई थी, जिसके कपड़े पर तिर्यक दिशा में बेलकारी की हुई थी. उस वक्त हेमांग 12 साल के थे.

कई साल बाद निफ्ट में फैशन डिजाइन पढऩे के बाद अपने पिता के चार दशक पुराने कारोबार में काम करने के लिए वे बनारस वापस आए. आज 150 साल पुराने एक मकान में वे किनखाब, शिकरगा, मशरू, सिल्क और तंचुई का काम करते हैं. अग्रवाल ने 2015 में अपना खुद का लेबल शुरू किया और बुनकर शराफुद्दीन अंसारी के साथ अपना काम प्रदर्शित किया, जिन्हें वे बुनकारी का सारा श्रेय देते हैं.
कामयाबी की इन दास्तानों ने भारतीय डिजाइनरों को नया आत्मविश्वास दिया है. अगला कदम स्टेनलेस स्टील, कागज, चांदी और सोने की टेक्सटाइल विकसित करना है. इनकी तलाश की जा रही है और तमाम डिजाइनर वैश्विक फैशन मंच पर भारत की अगुवाई करने में जुटे हुए हैं.

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