अस्सी करोड़ रु. की फिल्म फितूर दस दिन गुजर जाने के बाद भी देश और दुनिया भर में सिर्फ 39 करोड़ रु. कमा पाई है. इस पर साल की पहली सुपरफ्लॉप का लेबल चस्पां हो गया है. इस फिल्म में बॉलीवुड की ऐसा अदाकारा है, जिसके सिर पर कुछ समय पहले तक नंबर वन का ताज रहा है. अब फिल्म के फ्लॉप होने पर ब्लेम गेम शुरू हो चुका है. प्रोड्यूसर और डायरेक्टर के बीच क्रिएटिव मतभेद खुलकर बाहर आ रहे हैं जबकि हॉल से बाहर निकलती जनता को न तो फितूर की जोड़ी अच्छी लगी और न ही कटरीना कैफ का एक्सप्रेशनलेस चेहरा. अमूमन हर जुबान यह कह रही थी, “कटरीना में इश्क की आग नजर नहीं आई! बिल्कुल प्लास्टिक ब्यूटी.”
उधर, ट्रेड एक्सपर्ट कहते हैं कि कटरीना का अपने बूते फिल्म खींच ले जाने का रिकॉर्ड नहीं रहा है और आदित्य रॉय कपूर इतने बड़े स्टार नहीं हैं कि उन पर 80 करोड़ रु. का दांव खेला जाता. ट्रेड एक्सपर्ट अतुल मोहन कहते हैं, “फिल्ममेकर्स को बेसिक इकोनॉमी को समझना चाहिए. 80 करोड़ रु. की फिल्म प्रॉफिट में तभी आएगी जब 150 से 200 करोड़ रु. तक कमा पाएगी. आदित्य में यह पोटेंशियल नहीं है.”
फिल्मों की नाकामी की यह कयामत सिर्फ कटरीना कैफ और आदित्य रॉय कपूर की दुनिया में ही नहीं आई है. हाल में शाहरुख खान को वितरकों का घाटा पूरा करने के लिए अपनी जेब ढीली करनी पड़ी है जबकि सोनाक्षी सिन्हा रीमेक और कमजोर कहानियों के भंवर में उलझकर दक्षिण तथा बॉलीवुड के बीच में झूल रही हैं. कभी शीरो कही जाने वाली सीनियर ऐक्ट्रेस विद्या बालन अपनी लय ही खो बैठी हैं. रणबीर कपूर इश्क और फिल्म, दोनों ही मोर्चों पर जबरस्त ठोकरें खा रहे हैं. हालात बुलेट राजा सैफ अली खान के भी बहुत अच्छे नहीं हैं. हमशकल्स (2014) की नाकामी के बाद उनकी किस्मत ऐसी सोई कि अब तक नहीं जाग सकी है और वे एक अदद हिट फिल्म के लिए तरस रहे हैं. यह बॉलीवुड के बड़े सितारों का ताजा आलम है.
अधेड़ बनाम जवान
कटरीना कैफ बॉलीवुड में नंबर वन का ताज पहन चुकी हैं लेकिन यह ताज उनके सिर तभी सजा जब वे आमिर खान, अक्षय कुमार, सलमान खान, शाहरुख खान और रणबीर कपूर (उनके अच्छे दौर में) के साथ आईं. वे 2015 में सैफ अली खान के साथ फैंटम में आई थीं लेकिन दर्शकों ने उन्हें सिरे से नकार दिया था और 70 करोड़ रु. में बनी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर लगभग 50 करोड़ रु. ही जुटा सकी. यानी सलमान या आमिर जैसे मजबूत कंधों के हटते ही उनका टॉप का स्थान भी हिल गया. ऐसा होना लाजिमी था क्योंकि वे अपने अच्छे दिनों में ऐक्टिंग और एक्सप्रेशन निखारने की बजाए शोहरत और कामयाबी का लुत्फ लेने में मशगूल हो गईं.
कुछ इसी तरह के सिंड्रोम का शिकार सोनाक्षी सिन्हा भी हुईं. जब तक उन्हें सीनियर ऐक्टर्स का सहारा मिला चाहे दबंग 1-2, राउडी राठौर, सन ऑफ सरदार या 2014 की हॉलिडे हो तब तक सब सही चलता रहा. लेकिन रीमेक के चक्कर में फंस गईं और पहला झटका ऐक्शन जैक्सन (2014) से लगा. फिर उन्हें लगा कि अधेड़ उम्र के हीरो के साथ कई फिल्म हो गई हैं तो उन्होंने नौजवान अर्जुन कपूर का दामन तेवर (2015) में थामा. फिल्म रंग नहीं दिखा सकी. इसी तरह कटरीना ने अपने हिट हीरो से इतर झांका और नौजवान आदित्य रॉय कपूर के साथ फितूर उनके नाम जुड़ गई.
एक फिल्म विश्लेषक कहते हैं, “इन हीरोइनों ने अपने अच्छे समय का इस्तेमाल अलग पहचान बनाने में नहीं किया. कटरीना ने तो हिंदी से लेकर अपनी ऐक्टिंग तक सुधारने की कोशिश नहीं की. बस वे अपने अफेयर और सलमान की वजह से ज्यादा सुर्खियों में रहीं. सोनाक्षी सिन्हा ने सिर्फ दो ही जवान हीरो रणवीर सिंह और अर्जुन कपूर के साथ हाथ आजमाए हैं और दोनों ही बहुत सफल नहीं रहे हैं.”
यह वही दौर था जब दीपिका पादुकोण और प्रियंका चोपड़ा जैसी हीरोइनों ने विषय आधारित फिल्मों को चुना और दौड़ में आगे निकल गईं. इस बात को प्रियंका ने मैरी कॉम और दीपिका ने पीकू और बाजीराव मस्तानी से सिद्ध भी किया है, जहां उन्हें किसी बड़े ऐक्टर के सहारे के बिना अपने ग्लैमर के अलावा ऐक्टिंग का जलवा दिखाने का मौका मिला.
जोखिम से कोसों दूर
बॉलीवुड सितारों की फिल्मों के असफल होने की बढ़ती संख्या की एक वजह जहां कमजोर पटकथा है, वहीं उनका जोखिम उठाने से बचना भी है. शाहरुख खान को ही लें. उनकी हैपी न्यू ईयर (2014) कहानी के मामले में बेहद कमजोर थी और इसके लिए आलोचना झेलने के बावजूद शाहरुख ने रोहित शेट्टी के साथ कुछ नया करने की बजाए फॉर्मूला फिल्म दिलवाले बना डाली. अतुल कहते हैं, “उन्हें चेन्नै एक्सप्रेस से बेहतर फिल्म करनी चाहिए थी.”
फिल्म को लेकर गलत चुनाव के मामले में बॉलीवुड के नए सुपरस्टार कहे जा रहे रणबीर कपूर भी फंसे हैं. ऋषि कपूर के सुपुत्र की आखिरी हिट फिल्म ये जवानी है दीवानी (2013) थी. उसके बाद बेशर्म (2013), रॉय (2015) और तमाशा (2015) और बॉक्वबे वेलवेट (2015) बॉक्स ऑफिस पर धराशायी होती चली गईं. ऊपर से, कटरीना से दोस्ती टूट गई है, और अब कटरीना की बेरुखी ऐसी है कि उनकी वजह से जग्गा जासूस की शूटिंग भी लटक गई है. अपने दोस्त को नजरअंदाज करके कटरीना जवान हीरो सिद्धार्थ मल्होत्रा के साथ फिल्म बार बार देखो को तवज्जो दे रही हैं. रणबीर ने सभी फिल्में नामवर डायरेक्टरों और बैनरों के तले कीं, लेकिन कमजोर कहानी और नयापन न होने की वजह से उनके सितारे भी गर्दिश में चले गए.
युवा अभिनेता आदित्य रॉय कपूर के करियर को उछाल आशिकी-2 की सफलता से मिला था. लेकिन वे दावत-ए-इश्क (2014) और फितूर के बाद फिर से अपने शुरुआती दौर में पहुंच गए हैं जब लंदन ड्रीम्स (2009), 2010 में आईं एक्शन रिप्ले और गुजारिश जैसी भुला देने वाली फिल्में उनके नाम थीं. उन्होंने कमजोर पटकथा और रोमांटिक हीरो की इमेज में कैद होने की कोशिश की, जो असफल रही. उन पर सोलो हिट का दबाव बढ़ गया है.
वहीं, अभिषेक बच्चन को संभवतः ज्यादा लोगों के कंधे की जरूरत होती है. अपने बूते उनकी शायद ही कोई फिल्म बढिय़ा कारोबार कर सकी है. पिछले साल उनकी ऑल इज वेल में उनकी कोशिश बेकार रही. दूसरी ओर, विद्या बालन बॉबी जासूस (2014) और हमारी अधूरी कहानी (2015) में कहानी और डर्टी पिक्चर जैसा जादू नहीं छोड़ पाईं. इन फिल्मों के कमजोर कथानक ने बढिय़ा अदाकारा विद्या की कोशिशों पर पानी फेर दिया.
राजनीति और गलत फैसला
बॉक्स ऑफिस पर 2015 की आखिरी बड़ी लड़ाई शाहरुख खान की दिलवाले और संजय लीला भंसाली की बाजीराव मस्तानी के बीच थी. इसी बीच शाहरुख का असहिष्णुता को लेकर बयान आया और सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ मुहिम चल निकली. फिल्म का कई जगह विरोध हुआ. प्रोडक्शन हाउस की ओर से आए बड़े-बड़े आंकड़ों के बावजूद, वितरकों को हुए घाटे को दूर करने के लिए शाहरुख के उन्हें 25 करोड़ रु. देने की खबर है. फिल्म वितरक जोगिंदर महाजन मानते हैं कि शाहरुख के बयान से फिल्म पर कोई असर नहीं पड़ा. उनके मुताबिक, “जो लोग विरोध प्रदर्शन करने जाते हैं, उनमें फिल्म देखने वाले बहुत ही कम होते हैं. कमजोर कंटेंट को जनता सिरे से नकार देती है.” शाहरुख ने पिछले कुछ समय में कम फिल्में भी की हैं. लेकिन इस साल वे दो फिल्म फैन और रईस लेकर आ रहे हैं.
असहिष्णुता पर बयान देकर सिर्फ शाहरुख ही नहीं फंसे हैं. आमिर खान भी अपनी अगली फिल्म दंगल के लिए सतर्क हो गए हैं. वजहः बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय ने कहा, “एक का इलाज (शाहरुख) हुआ है. दूसरे का बाकी है. दंगल में मंगल करना है. ध्यान रखना सब लोग.” शाहरुख और आमिर, दोनों ही अपनी-अपनी ओर से सफाई दे चुके हैं. लेकिन आने वाला समय उनके लिए आसान तो नहीं ही है.
पीआर की मार
हर छोटा-बड़ा सितारा ब्रांड और बड़ा नाम बनने की हसरत पाले हुए है, जिसके लिए वह एजेंसियों की सेवाएं लेता है, और फिर रोज सुर्खियों में छाने की हसरत रखता है. ये सुर्खियां अच्छे कारणों से कम, अफेयर या अन्य वजहों से ज्यादा मिलती हैं. इससे फिल्म का विषय गौण हो जाता है, और ऐक्टर्स के लटके-झटके अहम हो जाते हैं. हाल ही में आर. माधवन की साला खड़ूस रिलीज हुई थी, ठीक-ठाक कहानी के बावजूद फिल्म कमजोर प्रमोशन की वजह से धराशायी हुई. कुछ दिन पहले उनसे एक शख्स मिला, और वह पूछने लगा कि आपकी साला खड़ूस कब रिलीज हो रही है. फिल्म 28 जनवरी को रिलीज हो चुकी थी.
फिल्म एक्सपर्ट कहते हैं, “ये लोग पीआर कंपनियों के इशारे पर इसलिए नाचते हैं क्योंकि वे इन्हें विज्ञापन की डील दिलाते हैं. जहां तक इमेज की बात है तो वह फिल्मों के साथ बनती बिगड़ती रहती है.” सितारों के गलत फैसले हर हफ्ते उनके नाम एक फ्लॉप फिल्म जोड़ते जा रहे हैं और उनकी साख भी खाक में मिलती जाती है. जब तक कहानी और अदाकारी में जान नहीं होगी तब तक फिल्में यूं ही फ्लॉप होती रहेंगी क्योंकि दर्शक पैसा खर्च करके सिनेमा हॉल में मनोरंजन के लिए जाते हैं, ऊबने नहीं.
सिनेमाः सितारे जमीन पर
बॉलीवुड के नामी सितारे जोखिम न उठाने की अपनी आदत और घिसे-पिटे ढर्रे पर चलने की वजह से दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच पाने में नहीं हो पा रहे सफल.

अपडेटेड 29 फ़रवरी , 2016
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