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उत्तर प्रदेशः रणछोड़ “बांकुरों” के कंधों पर बीजेपी

यूपी में एमएलसी चुनाव में जिस तरह बीजेपी की फजीहत हुई है, उससे आगामी विधानसभा चुनाव की राह और कठिन हो गई है. बीजेपी प्रत्या​शी प्रतिद्वंद्वी और सत्तारूढ़ सपा को वॉकओवर दे रहे, जो यूपी के राजनैतिक इतिहास में ऐसे मामले पहली बार आए हैं.

अपडेटेड 29 फ़रवरी , 2016

अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव जीतने का सपना देख रही बीजेपी की तैयारियां किस कदर दुरुस्त हैं, उसकी कुछ बानगी देखिए. बात स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन क्षेत्र से विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) की खाली 36 सीटों के चुनाव की है. वाकया मेरठ का है, जहां से प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी आते हैं. एमएलसी चुनाव नामांकन के अंतिम दिन यानी 15 नवंबर से एक दिन पहले सपा नेता वीरेंद्र यादव ने बीजेपी की सदस्यता ली. अगले दिन दोपहर दो बजे यादव बीजेपी एमएलए संगीत सोम समेत कई नेताओं के साथ मेरठ कलेक्ट्रेट पहुंचे और मेरठ-गाजियाबाद एमएलसी सीट के लिए बीजेपी प्रत्याशी के रूप में पर्चा दाखिल किया. पर छह साल पहले यही चुनाव सपा उम्मीदवार के रूप में लड़ चुके यादव को अपनी पुरानी पार्टी से जुदाई बर्दाश्त नहीं हुई. बीजेपी उम्मीदवार के रूप में नामांकन भरने के कुछ घंटे बाद यादव भगवा खेमे को मझधार में छोड़ सपा में वापस लौट गए. और बीजेपी हाथ मलती रह गई.

मेरठ में बाहरी नेता पर दांव लगाना महंगा पड़ा, लेकिन गृह मंत्री राजनाथ सिंह के संसदीय क्षेत्र लखनऊ को समाहित करने वाली लखनऊ-उन्नाव एमएलसी सीट पर बीजेपी कार्यकर्ता ने ही अपनी पार्टी को गच्चा दे दिया. पार्टी ने जीत के बड़े-बड़े दावे करके युवा मोर्चा के नेता अनिरुद्ध चंदेल को अपना उम्मीदवार बनाया. चंदेल का नामांकन भरने लक्ष्मीकांत बाजपेयी, विधान परिषद में नेता हृदय नारायण दीक्षित समेत कई बड़े नेता पहुंचे थे. लेकिन दो दिन के भीतर ही चंदेल का बीजेपी से मोहभंग हो गया. 17 फरवरी की दोपहर वे गुपचुप लखनऊ कलेक्ट्रेट पहुंचे और सपा उम्मीदवार सुनील यादव साजन के पक्ष में नामांकन वापस ले लिया. नतीजतन साजन निर्विरोध जीत गए. चंदेल उनकी खुशी में शामिल ही नहीं हुए, उंगलियों से जीत का निशान बनाते हुए फोटो भी खिंचवाई.

दो वर्ष पहले अपने सहयोगी के साथ यूपी की 73 संसदीय सीटें जीतने वाली बीजेपी की साख एमएलसी चुनाव में धराशायी हो गई है. लोकसभा चुनाव के बाद यूपी में एक करोड़ से ज्यादा सदस्य बनाने का दावा करने वाली पार्टी ऐसे 36 चेहरे भी नहीं ढूंढ सकी जिनके बूते एमएलसी की सभी खाली सीटों पर चुनाव लड़ा जा सके. मुश्किल से पार्टी दो दर्जन से कुछ ज्यादा सीटों पर उम्मीदवार खोज पाई थी. इनमें से तीन नामांकन भरने के बाद पलटी मार गए और कुछ तो नामांकन भरने ही नहीं पहुंचे. हालत यह है कि 36 में से बीजेपी केवल 21 सीटों पर ही लड़ रही है (देखें बॉक्स) और बाकी पर अपनी प्रतिद्वंद्वी और सत्तारूढ़ सपा को वॉकओवर दे दिया है. यूपी के राजनैतिक इतिहास में इस तरह का यह पहला वाकया है.

अपहरण का ड्रामा
एमएलसी चुनाव में नामांकन का अंतिम दिन 15 फरवरी था, लेकिन 24 घंटे पहले तक आगरा-फिरोजाबाद स्थानीय प्राधिकारी क्षेत्र से बीजेपी उम्मीदवार की तलाश में जुटी थी. 14 फरवरी को रात डेढ़ बजे आगरा के वरिष्ठ बीजेपी पदाधिकारियों को एसएमएस के जरिए तेजेंद्र प्रताप सिंह के उम्मीदवार बनाए जाने की सूचना दी गई. पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान साइकिल पर सवार रहे तेजेंद्र प्रताप सिंह के नाम की पैरवी कुछ समय पहले बीजेपी में राष्ट्रीय स्तर का पद पाने वाले एक नेता ने की थी.

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के करीबी एक सेवानिवृत्त आइएएस अधिकारी से तेजेंद्र के प्रगाढ़ संबंध हैं. 15 फरवरी की दोपहर तीन बजे तक ही नामांकन होना था, लेकिन दोपहर डेढ़ बजे के बाद तेजेंद्र जैसे ही घर से आगरा कलेक्ट्रेट के लिए निकले, शास्त्रीपुर से उनका अपहरण कर लिया गया. नामांकन का समय बीतने के बाद अपहरणकर्ताओं ने तेजेंद्र को पौने चार बजे कीठम के जंगलों में छोड़ दिया. रिपोर्ट सिकंदरा थाने में दर्ज हुई, लेकिन बात-बात पर बखेड़ा मचाने वाले बीजेपी नेता अपने उम्मीदवार के साथ नहीं थे.

पुलिस को अपहरण का कोई साक्ष्य न मिलने से पूरी कहानी संदिग्ध हो गई है. सपा उम्मीदवार को वॉकओवर मिलने के पीछे बीजेपी नेताओं की “सेटिंग” की आशंका को बल मिला है. सपा को बांदा-चित्रकूट-हमीरपुर सीट पर भी वॉकओवर मिला. यहां पर सपा नेता आनंद त्रिपाठी अचानक बीजेपी के शीर्ष पदाधिकारियों के पसंदीदा बन बैठे. ये वही आनंद त्रिपाठी थे, जिन्होंने 2010 में इसी एमएलसी चुनाव में सपा प्रत्याशी के रूप में बीएसपी नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी की पत्नी हुस्ना सिद्दीकी की नाक में दम कर दिया था.

फेल हुआ चुनावी मैनेजमेंट
प्रदेश अध्यक्ष के चयन और संगठन चुनाव में उलझ चुकी बीजेपी ने इस महत्वपूर्ण चुनाव के लिए कोई संचालन समिति नहीं बनाई और न ही इसके लिए अपने सांसदों, विधायकों, पदाधिकारियों को दायित्व सौंपा. विधानसभा चुनाव की तरह इस चुनाव में उम्मीदवारों को पार्टी की तरफ से कोई आर्थिक मदद नहीं दी गई. इस कारण उन उम्मीदवारों पर दांव लगाया गया, जो चुनाव खर्च खुद उठाने में सक्षम थे. करीब 12 साल  बाद स्थानीय प्राधिकारी से एमएलसी चुनाव लड़ रही बीजेपी नौसिखिया साबित हुई. लखीमपुर खीरी सीट से बीजेपी के घोषित उम्मीदवार नरेश चंद्र वर्मा ने बिना पार्टी से पैसा मिले चुनाव लडऩे से मना कर दिया. वर्मा का तर्क है कि इस चुनाव में करीब डेढ़ करोड़ रु. खर्च होंगे और उनके पास इतना पैसा नहीं है.

दलबदलुओं पर दांव
पिछले वर्ष मई में इंडिया टुडे  को दिए इंटरव्यू में यूपी बीजेपी प्रभारी ओम माथुर ने कहा था कि अगर दूसरे दल से आया व्यक्ति चुनाव जीतने में सक्षम है तो उस उम्मीदवार बनाने में कोई हर्ज नहीं है. एमएलसी चुनाव में जिस तरह सपा से बीजेपी में आए उम्मीदवारों ने पलटी मारी, उसने उसकी रणनीति को आईना दिखा दिया है.

वर्तमान में बीजेपी के 21 एमएलसी उम्मीदवारों में आधे दूसरे दलों से आए हैं. (देखें बॉक्स) बदायूं सीट से बीजेपी उम्मीदवार जितेंद्र यादव, आपराधिक छवि वाले पूर्व सांसद डी.पी. यादव के भतीजे हैं. जितेंद्र बीएसपी के एमएलसी थे और उनका कार्यकाल इसी वर्ष 15 जनवरी को खत्म हुआ है. बीएसपी से दोबारा टिकट नहीं मिला तो 15 फरवरी को सुबह बीजेपी की सदस्यता ग्रहण की और कुछ देर बाद नामांकन भरा.

गोंडा सीट से बीजेपी उम्मीदवार राजेश सिंह ने 2007 में बीएसपी से विधानसभा चुनाव लड़ा था. 2012 में उनकी पत्नी पीस पार्टी से चुनाव लड़ीं थीं. गोंडा के बगल की बहराइच सीट पर बीजेपी एमएलसी प्रत्याशी रामजी त्रिपाठी पूर्व सांसद लक्ष्मीमणि त्रिपाठी के पौत्र हैं. काफी समय हाथी की सवारी करने के बाद रामजी कमल को थाम एमएलसी चुनाव मैदान में हैं. उनकी सीट के बीजेपी चुनाव प्रभारी अरुण वीर सिंह बीएसपी के एमएलसी थे, जिनका कार्यकाल इसी वर्ष 15 जनवरी को समाप्त हुआ.

15 फरवरी को सुबह अरुण वीर बीजेपी में शामिल हुए और पार्टी ने उन्हें अपने नेताओं से ज्यादा काबिल मानते हुए महत्वपूर्ण दायित्व सौंप दिया. कई विरोधाभासों के बीच बीजेपी ने दुर्गा शक्ति नागपाल प्रकरण और दादरी कांड से विवादों में आए सपा नेता नरेंद्र भाटी को बुलंदशहर सीट से विधान परिषद न पहुंचने देने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है. पार्टी ने यहां प्रशासनिक सेवा छोड़ राजनीति में आए बीजेपी नेता संजय शर्मा को उतारा है.

चुनाव से पहले नेताओं के झगड़े
एमएलसी चुनाव ने बीजेपी नेताओं के बीच आपसी कलह को सतह पर ला दिया है. उन्नाव से बीजेपी सांसद साक्षी महाराज ने प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी और विधान परिषद में पार्टी के नेता हृदय नारायण दीक्षित पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है. साक्षी महाराज कहते हैं, “लक्ष्मीकांत बाजपेयी और हृदय नारायण दीक्षित ने पैसे लेकर एमएलसी टिकट बांटे हैं. इसी से पार्टी की दुर्गति हुई है.” उनके आरोपों ने प्रदेश बीजेपी में हलचल मच गई है. वहीं दीक्षित कहते हैं, “साक्षी महाराज को आरोप सिद्ध करने चाहिए. बीजेपी नेतृत्व और जनता हम लोगों के बारे में ठीक से अवगत है.”

प्रदेश बीजेपी के बड़े नेता भले साक्षी महाराज पर आक्रामक न हों लेकिन प्रदेश प्रवक्ता आइ.पी. सिंह ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. वे कहते हैं, “साक्षी महाराज बीजेपी पर भार बन गए हैं. वे अब सपा की भाषा बोल रहे हैं.” उधर, एमएलसी चुनाव के प्रत्याशी के पलटी मार लेने के बाद मेरठ में घमासान मच गया है. किरकिरी होने के बाद बीजेपी के क्षेत्रीय अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह ने पार्टी के विरुद्ध षड्यंत्र रचने और अनुशासनहीनता का आरोप लगाते हुए नोटिस जारी किया है. सपा नेता वीरेंद्र यादव को बीजेपी में शामिल करने के पीछे क्षेत्रीय महामंत्री जयकरण गुप्ता की भूमिका को देखते हुए पार्टी इन पर भी कार्रवाई की तैयारी कर रही है. मेरठ के बीजेपी संगठन में गुटबाजी चरम पर है.

एमएलसी चुनाव को अगर अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों की रिहर्सल माना जाए तो बीजेपी की कई बीमारियां एक साथ उभरती दिखाई देती हैं. अगर समय रहते इनका इलाज नहीं हुआ तो यही बीमारियां नासूर बन बीजेपी के मिशन-2017 को पलीता लगा देंगी.

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