यकीनन सेक्स सर्वेक्षणों का पढऩा पढ़ाकू होने का बहाना बनाकर अपनी कामेच्छाओं को संतुष्ट करने जैसा होता है. इंडिया टुडे दूसरे अन्य क्षेत्रों की तरह सेक्स सर्वेक्षणों के मामले में भी अगुआ रहा है. सेक्स सर्वेक्षण बेहद लोकप्रिय होते हैं. आज कोई भी प्रतिष्ठित प्रकाशन साल में कम से कम ऐसे एक सर्वेक्षण के बिना अपना काम नहीं चला सकता. रिसर्च कंपनियों के पास इसके लिए विशेष विभाग होते हैं और उनके फील्ड वर्करों की फौज देश भर में अजनबियों से उनकी जिंदगी की सेक्स संबंधी अंतरंग बातों के बारे में पूछने का जोखिम उठाती रहती है.
दरअसल, मौजूदा सर्वेक्षण से पता चलता है कि 28 फीसदी भारतीय सार्वजनिक तौर पर सेक्स संबंध बनाने को बेकरार नजर आते हैं, इसलिए वे अपने लिए ज्यादा ही जोखिम उठाने को तैयार हैं. इस सर्वेक्षण का दायरा काफी व्यापक है. अब तक सेक्स के मामले में सक्रिय लगभग हर भारतीय से कम से कम एक बार तो बात हो ही चुकी है.
इस साल मुझे यह गौरव हासिल हुआ है कि 2016 के सेक्स सर्वेक्षण की एक अग्रिम प्रति मुझे मिल गई है. मैंने पिछला हफ्ता इसे पढऩे में बिताया और यथासंभव इसे याद करने की कोशिश की. जाहिर है, इस वजह से मेरे दूसरे काम प्रभावित रहे लेकिन सच को समझना ज्यादा जरूरी है क्योंकि सच ही हमें रटी-रटाई बातों से मुक्ति दिला सकता है.
सचाई जानने का बेहतरीन तरीका इंडिया टुडे सेक्स सर्वेक्षण ही है. यह सभी सेक्स सर्वेक्षणों से काफी आगे है और इसमें नकलची सर्वेक्षण से कहीं व्यापक आंकड़े होते हैं. हालांकि आंकड़े ही सब कुछ नहीं होते. आंकड़ों का बारीक नजरिए से विश्लेषण काफी अहम होता है. इसकी सबसे बड़ी जरूरत भी यही है और यहीं मेरी जरूरत आती है. हम कुछ खास रुझानों पर गौर करते हैं. इसके साथ ही हम हर शहर की खासियतों पर भी गौर करें, ताकि आप जान सकें कि किससे बचना चाहिए.
इस सर्वेक्षण में कई तरह के रुझान सामने आते हैं. पहला रुझान तो यही है कि शहरी भारत काफी खुश है. यह बात समझ में भी आती है. उन्हें इस बात की राहत है कि वे गांवों में नहीं रहते हैं. लेकिन आज भी यह हकीकत आश्चर्यजनक है कि ग्रामीण लोगों के मुकाबले शहरी लोग सेक्स के मामले में ज्यादा संतुष्ट हैं. गांवों में ज्यादा कुछ करने को नहीं होता इसलिए मैं हमेशा यह मानकर चलता हूं कि वे सेक्स ज्यादा करते होंगे.
मुझे यह सोचकर बुरा लगता है कि उनका जीवन कितना कठिन है, फिर यह सोचकर आश्वस्त हो जाता हूं कि वे कम से कम इस मामले में खुशकिस्मत हैं कि उन्हें अक्सर इसका मौका मिलता है.
लेकिन ऐसा मामला नहीं है. इस मामले में शहरी भारत ही ज्यादा सक्रिय है. शहरों में 75 फीसदी लोगों का मानना है कि सेक्स जरूरी है. बाकी 25 फीसदी संभवतः बुजुर्ग हैं जो अपने अच्छे दिनों को ही याद करते रहते हैं. 71 फीसदी अपने जीवनसाथी से संतुष्ट हैं. मतलब यह कि हममें से ज्यादातर लोगों का समय मजे में गुजर रहा है. इससे सुखद एहसास होता है लेकिन क्या वाकई चीजें इतनी आसान हैं?
यहीं गहन विश्लेषण की अहमियत है. एक बात पर हमें गौर करना चाहिए कि क्या सेक्स संतुष्टि के आंकड़े मर्द और औरतों में एक समान हैं? या 99 फीसदी मर्द संतुष्ट होते हैं जबकि 15 फीसदी औरतें ही संतुष्टि पाती हैं? अगर ऐसा है तो मतलब यह है कि मर्दों को प्रदर्शन में अधिक मेहनत की दरकार है. इस तरह सेक्स के मामले में स्त्री-पुरुष अनुभवों को अलग-अलग न करने वाले सामान्य आंकड़े सही तस्वीर छिपा लेते हैं. खुशखबरी यह है कि सेक्स सक्रियता के ये ज्यादातर मामले वैध हैं क्योंकि महज 7.5 फीसदी लोग ही विवाहेतर संबंधों को कबूलते हैं. यानी नैतिकता के पायदान पर हम मजबूती के साथ खड़े हैं.
महानगरों में रहने वाले स्वच्छ जीवन और उच्च विचार में यकीन करते हैं लेकिन दूसरे दर्जे के शहरों में हालात कुछ अफसोसजनक हैं. वहां हमें अचानक नैतिक चरित्र में पतन के दर्शन होते हैं. मसलन, अहमदाबाद 26 फीसदी के साथ व्यभिचार के मामले में अव्वल है और यह भी बिना शराब का सेवन किए. इस मामले में 21 फीसदी के साथ दूसरे नंबर पर कोच्चि है, जिससे बीफ की खपत और नैतिक पतन में निर्विवाद रिश्ता स्थापित होता है! अच्छी बात यह है कि इन शहरों के लोग किसी न किसी तरह के प्यार का एहसास करते हैं. चेन्नै में सर्वेक्षण में शामिल करीब 37 फीसदी ने कहा कि उन्हें प्यार का एहसास बिल्कुल नहीं होता.
हैदराबाद कुछ खुशमिजाज जगह है. वहां 67 फीसदी ने कहा कि वे कैजुअल सेक्स करते हैं जिससे पता चलता है कि सूचना प्रौद्योगिकी किसी शहर में क्या बदलाव ला सकती है. इससे यह भी इशारा मिलता है कि दक्षिण भारत के बारे में सरलीकरण करना कितना गलत होता है.
इंडिया टुडे के सर्वेक्षण में दूसरा दिलचस्प रुझान अनोखे प्रयोग करने का उभरकर आया. देश में लोग कुछ ज्यादा ही नटखट होते जा रहे हैं. हममें से 41.8 फीसदी लोग किसी न किसी प्रकार के डोमिनेशन, सबमिशन या रोल प्ले की कोशिश करते हैं. मायने यह कि स्टुडेंट टीचर्स को आपकी सोच से ज्यादा लुभाने में लगे हुए हैं. इसका सिर्फ हम अंदाजा ही लगा सकते हैं क्योंकि अफसोस, सर्वेक्षण यह नहीं बताता है कि किस तरह का रोल प्ले बंद कमरों में हो रहा है. यह जानना बेहतर होता. छोटा भीम? अरविंद केजरीवाल? रघुराम राजन? जोधा-अकबर? सविता भाभी? मकान मालिक के बेटे? पिज्जा डिलीवरी बॉय? कोई नया क्रिकेट स्टार, जो अभी-अभी टीम में आया हो? मैं उम्मीद करता हूं कि इंडिया टुडे यह गलती सुधार लेगी और अगले साल इस मामले में ज्यादा पड़ताल करेगी
दूसरा दिलचस्प मामला भोग-विलास का है. करीब एक-तिहाई शहरी पुरुष औरतों के साथ भोग-विलास की कल्पनाओं में खोए रहते हैं. इस मामले में भी आंकड़ों के गहरे विश्लेषण से नई समझदारी बनती है. मान लें मामला सिर्फ मर्दों का है और सर्वेक्षण में 50 फीसदी मर्द थे तो देश में 66 फीसदी मर्द भोग-विलास की कल्पना करते हैं.
ऐसे में आप अपने दफ्तर में किसी मर्द साथी को मुस्कराते देखकर सोचेंगे कि वह भोग-विलास के बारे में सोच रहा होगा. अच्छी बात यह है कि ज्यादातर विकृतियों को सस्ते में ही निबटाने की कोशिश की जाती है. सिर्फ 4 फीसदी लोग ही सेक्स टॉय का इस्तेमाल करते हैं. मतलब यह कि हमारा समाज कृत्रिम सेक्स उपायों के खिलाफ है. या हम घरेलू सामान से ही दूसरा मकसद साधकर पैसे बचा रहे हैं.
सर्वेक्षण में ग्रुप सेक्स के मामले का भी प्रमुखता से जिक्र है. एक तरह से यह स्वाभाविक भी है. नामी सुपरमार्केट और ऑनलाइन शॉपिंग पोर्टल एक के साथ एक या दो के साथ एक मुफ्त की पेशकश कर रहे हैं. ऐसे समीकरण राष्ट्रीय सोच का हिस्सा बनते जा रहे हैं. लिहाजा, ग्रुप सेक्स लोकप्रिय होने लगा है. करीब 57 फीसदी मर्दों को लगता है कि एक से अधिक से प्यार करना संभव है. इससे एक बात साफ हो जाती हैः विवाहित लोगों के लिए इस सर्वेक्षण में अलग से बातचीत करने की दरकार है.
शहरों के रुझानों में कई तरह की दिलचस्पियों का खुलासा होता है. भुवनेश्वर में 31 फीसदी लोग सार्वजनिक स्थलों पर सेक्स से हिचकते नहीं. इस मामले में पटना में 24 फीसदी का भी यही मानना है. इसमें बसों या सार्वजनिक वाहनों से बचना चाहिए क्योंकि हर चार में से एक आदमी आपको घूर रहा होता है. पटना में एक-चौथाई लोग ग्रुप सेक्स में यकीन करते हैं, जिससे बस की सवारी और दिलचस्प हो जाती है. शायद यह बात महागठबंधन को अच्छे से व्याख्यायित कर देती है.
अगर आप यह देखकर कुछ चकित हों कि चंडीगढ़ में दोपहर में सड़कें क्यों सूनी हो जाती हैं तो सर्वेक्षण इसका जवाब मुहैया कराता है. चंडीगढ़ में 55 फीसदी लोगों ने कहा कि वे दिन में किसी भी समय सेक्स कर लेते हैं. लखनऊ में करीब 59 फीसदी लोग अपने सेक्स जीवन से संतुष्ट हैं, अलबत्ता वे शायद संकोच में यह कह गए हों. इस सर्वेक्षण का दूसरा लाभ यह है कि अब हम शहरों को आत्मनिर्भरता के मामले में श्रेणियों में बांट सकते हैं. चेन्नै में 64 फीसदी हस्तमैथुन का सहारा लेते हैं. इस मामले में 56 फीसदी के साथ पुणे दूसरे नंबर पर है.
बहरहाल, यह सर्वेक्षण किसी अच्छी खबर की तरह है. देश सेक्स के मामले में समृद्ध और खुशहाल है. हम मजे में हैं और ज्यादा से ज्यादा मजे की ओर बढ़ रहे हैं. हताशा की कोई वजह नहीं है. सेक्स सुख हमारी मुट्ठी में है. बस, जरूरत है तो रोल प्ले संबंधी अपने हुनर को निखारने और भुवनेश्वर में बसों से दूरी बनाए रखने की.
सेक्स सर्वेः काम की धुन में मदमस्त लोगों का संघ
देश में सेक्सुअल हेल्थ बढिय़ा और जबरदस्त है. मौजूदा सर्वेक्षण से पता चलता है कि 28 फीसदी भारतीय सार्वजनिक तौर पर सेक्स संबंध बनाने को बेकरार नजर आते हैं, इसलिए वे अपने लिए ज्यादा ही जोखिम उठाने को तैयार हैं.

अपडेटेड 29 जनवरी , 2016
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