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राजस्थानः राशन की दुकान का बदला रिवाज

अन्नपूर्णा भंडार योजना के जरिए राजे वाजिब मूल्य वाली पारंपरिक राशन दुकानों का चेहरा बदल रही हैं. क्या वे सफल होंगी या फिर यह कवायद एक कारोबारी घराने को फायदे तक सिमट जाएगी?

अपडेटेड 21 जनवरी , 2016

सन् 2013 के दिसंबर में दूसरी बार राजस्थान की कमान संभालने के बाद से ही मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की प्राथमिकता निजी क्षेत्र की मदद से राजकाज के तरीकों में सुधार लाना थी. राज्य में भयानक कुप्रबंधन की शिकार जन वितरण प्रणाली और इसकी सस्ते राशन की दुकानों का कायाकल्प उनकी अगुआई में अब शुरू हो चुका है.

राजे ने पहला साहसिक कदम उठाते हुए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून, 2013 के अंतर्गत सब्सिडीयुक्त गेहंर के लाभार्थियों की संख्या को 1.2 करोड़ पर पहुंचा दिया है. इसके लिए लाभार्थियों की समीक्षा की गई और उन अयोग्य लाभार्थियों को छांटा गया जिन्हें अशोक गहलोत की कांग्रेसी सरकार ने विधानसभा चुनाव से ठीक पहले जोड़ दिया था. इसकी बजाए उन 20 लाख लोगों को लाभार्थियों में जोड़ा गया है जो छूट गए थे.

इस कवायद से राज्य के खजाने को 896 करोड़ रु. की बचत हुई है. राजे के मुताबिक, ''हम चाहते हैं कि हर योग्य नागरिक अपने लिए तय एक-एक पैसे का हकदार हो. उन्हें छांट दिया जाए जो गलत तरीके से यह पैसा पा रहे हैं और उन लोगों का पता लगाने के तरीके खोजे जाएं जो वंचित होते हुए भी इस योजना से महरूम हैं.''









इस समीक्षा में एक प्रशासनिक अधिकारी को भी लाभार्थी के रूप में दर्ज पाया गया. ऐसे लोगों की संख्या छह जिलों की आबादी से भी ज्यादा पाई गई. अकेले किरासन के मामले में अलवर जिले के कोटकासिम में किए गए एक प्रायोगिक अध्ययन के चलते कुल दर्ज लाभार्थियों में से 94 फीसदी को छांट दिया गया और राज्य में कुल 1.56 करोड़ लाभार्थियों में से 40 लाख के नाम सूची से हटा दिए गए.

खाद्य और नागरिक आपूर्ति विभाग के प्रधान सचिव सुबोध अग्रवाल कहते हैं, ''इससे योग्य लाभार्थियों का कोटा पूर्ववर्ती तीन लीटर से बढ़ाकर चार लीटर करने में मदद मिली है.'' उनके मुताबिक, इस साल के अंत तक डिजिटल कार्ड तैयार हो जाने के बाद 20 लाख जाली राशन कार्डों की छुट्टी हो जाएगी. इन डिजिटल राशन कार्डों को 25,000 सस्ते राशन की दुकानों पर लगी पॉइंट ऑफ सेल (पीओएस) मशीनों से जोड़ दिया जाएगा, जिनमें से 9,000 प्रायोगिक तौर पर कार्यरत हैं.

इसके जरिए कोटा जारी करने के लिए लाभार्थी के आधार बायोमीट्रिक्स का सहारा लिया जाएगा. इसे अन्य जगहों पर भी ऑनलाइन किया जाएगा और तीन साल के भीतर डीलर के यहां भी उपलब्धता ऑनलाइन होगी.

डीलरों के एक धड़े ने धरने-प्रदर्शन के जरिए इस पहल का विरोध किया है और सरकार को कुछेक प्रस्तावों पर पीछे हटने को बाध्य किया है, जिनके तहत कंप्यूटर साक्षर स्नातकों को डीलर रखा जाना था. लेकिन राजे ने सस्ते राशन की दुकानों के मामले में एक और परियोजना शुरू कर दी है. वे कहती हैं, ''अंधेरे कोनों में बनी, केवल तीन अनाज देने वाली और लंबी कतारों को जमा करने वाली ऐसी छोटी दुकानों की जगह हम इन्हें मिनी डिपार्टमेंटल स्टोर बनाने की कोशिश में हैं, जिससे इनके मालिकों की आय में इजाफा हो और दूरदराज में रहने वाले उपभोक्ताओं को भी उम्दा उत्पाद मिल सकें.''

सरकार इस काम में कोई निवेश नहीं कर रही. उसकी भूमिका केवल मध्यस्थ की है. इसके तहत 25,000 सस्ते राशन की दुकानों को अन्नपूर्णा स्टोर नाम दिया जाएगा और यहां दाल, चावल, साबुन, रोजमर्रा के सामान समेत 225 से 350 ब्रांडेड उत्पाद मौजूद होंगे जो निजी रिटेल दुकानों को टक्कर दे सकें. इसके लिए दो बार बोली मंगवाई जा चुकी है और अकेले किशोर बियाणी की फ्यूचर कंज्यूमर एंटरप्राइजेज को 5,000 दुकानों का ठेका मिल गया है. राज्य का खाद्य और नागरिक आपूर्ति निगम फ्यूचर की आधार होलसेल ट्रेडिंग ऐंड डिस्ट्रिब्यूशन को मदद दे रहा है ताकि अन्नपूर्णा परियोजना को सफलतापूर्वक लागू किया जा सके.

साल भर पहले आधा दर्जन दुकानों पर किए गए प्रयोगों के नतीजों की समीक्षा के बाद 31 अक्तूबर, 2015 को राजे ने इस योजना का उद्घाटन किया. अब तक 80 सस्ते राशन की दुकानों को अन्नपूर्णा स्टोर में बदला जा चुका है और जून तक इसे 5,000 दुकानों तक विस्तारित करने का लक्ष्य है. राज्य में फ्यूचर समूह के दस बिग बाजार मौजूद हैं, जिसका अकेले किराना कारोबार में 35 करोड़ रु. सालाना का टर्नओवर है.

इसके मालिक किशोर बियाणी का लक्ष्य ऐसे उपभोक्ताओं को अपने से जोडऩा है जिन्हें गुणवत्तापूर्ण उत्पाद खरीदने के लिए लंबा सफर करना पड़ता है. अन्नपूर्णा के माध्यम से सस्ते गल्ले के रिटेलरों की कमाई को 7,000 रु. मासिक से दोगुना करने की राजे की यह योजना अगर कामयाब हो जाती है, तो बियाणी को 5,000 दुकानों से बिग बाजार की कमाई का 20 गुना कारोबार मिल पाएगा. इसके लिए हर पक्ष को धैर्य बरतना होगा, क्योंकि राशन की दुकानों के मालिक एकाधिकार के आदी हो चुके हैं और उनमें वह कौशल नहीं है कि वे कम आय वाले उपभोक्ताओं को माल बेच सकें. इनमें से ज्यादातर माल भले ही परंपरागत दुकानों से महंगा होगा पर बिग बाजार से सस्ता पड़ेगा.

 सरकार रिटेलरों को प्रोत्साहित कर रही है कि वे दुकानों को सजाने-संवारने समेत माल की पहली खेप हासिल करने के लिए करीब एक लाख रु. का निवेश करें. इस पर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर एक सरकार किसी एक कारोबारी घराने को इकलौता आपूर्तिकर्ता बनने में मदद क्यों कर रही है और सस्ते राशन की दुकानों के मालिकों की, कहीं से भी सस्ता माल खरीदने और बेचने की आजादी क्यों छीन रही है? अग्रवाल कहते हैं कि सस्ते गल्ले की दुकानों को सरकारी दुकानों की तरह देखा जाता है, इसलिए यह राज्य की जिम्मेदारी है कि वहां एक निश्चित गुणवत्ता का माल बिके और ऐसा एक ही वितरक के माध्यम से किया जा सकता है. इसके अलावा वे असंगठित क्षेत्र में हैं इसलिए उनके पास पर्याप्त संसाधन और उद्यम नहीं होगा कि वे अलग-अलग होलसेलरों के पास जाकर गुणवत्तापूर्ण माल खरीद सकें. कुछ रिटेलर बिक्री को लेकर उत्साहित हैं लेकिन कुछ अन्य ऐसे हैं जिन्हें अंदेशा है कि उनकी लागत निकलने में काफी वक्त लग जाएगा.

फ्यूचर समूह के प्रभारी और वरिष्ठ प्रबंधक मनीष पारीक ने अन्नपूर्णा योजना के रिटेलरों के लिए यह काम आसान बना दिया है. वे भुगतान के दस दिन से ज्यादा लंबित होने की अवस्था में 18 फीसदी ब्याज नहीं लेते, बावजूद इसके कि 62 लाख रु. के माल की आपूर्ति हो चुकी है और 18 लाख रु. की वसूली अब भी बाकी है.

वे बचे हुए माल को उठाकर उसकी जगह तेजी से बिकने वाला माल रख देते हैं. गौर तलब है कि इंडिया टुडे की ओर से किए गए अध्ययन के मुताबिक, राजस्थान में जयपुर के इर्दगिर्द 60 किलोमीटर के दायरे में उपभोक्ताओं की पसंद कुछ किलोमीटर पर बदलती रहती है.

भम्भोरी गांव में 55 वर्षीय सुरेश कुमार शर्मा की अन्नपूर्णा दुकान का लोकार्पण राजे ने 31 अक्तूबर को किया था. यहां 350 किस्म के सामान मौजूद हैं. वे बिक्री को लेकर खुश हैं. उनकी दुकान से उपभोक्ता डव साबुन खरीद रहे हैं. फुलेरा के 40 वर्षीय गौरीकांत कहते हैं कि वे उस जगह से अन्नपूर्णा के उत्पाद नहीं बेच सकते जहां वे किरासन और गेहूं बेचते थे, क्योंकि वहां काफी गंध और धूल है. सो उन्होंने 100 गज दूर स्थित अपने नए मकान के सामने वाले दालान के कमरे में अन्नपूर्णा स्टोर खोल लिया है.

हालांकि उन्होंने इसके लिए सुझाया सरकारी रंग अब तक नहीं इस्तेमाल किया है. फिर भी उनकी दुकान दूदू ब्लॉक के मजूमाबाद में बुजुर्ग राम निवास बैरवा की टिन शेड वाली दुकान से कहीं बेहतर है जहां उन्हें इसलिए दुकान खोलनी पड़ी क्योंकि मकान मालिक अन्नपूर्णा की दुकान के लिए ज्यादा किराया मांग रहा था. बैरवा के 1,500 ग्राहक हैं जिनमें कई बहुत दूर से आते हैं. उनमें से कुछ ही अन्नपूर्णा के उत्पाद खरीदते हैं और बैरवा को उनके दाम भी याद नहीं रहते क्योंकि उन्हें मिली पहली सूची अंग्रेजी में थी. इसके अलावा पड़ोस में ही राम नारायण चौधरी की एक और अन्नपूर्णा दुकान है जिसके कारण बैरवा की बिक्री कम रहती है.

 चौधरी का कहना है कि उन्हें ऐसे ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए तंबाकू उत्पाद रखने पड़ते हैं जो फेयर ऐंड लवली की ट्यूब की जगह उसका सैशे चाहते हैं और जिलेट के शेविंग ब्रश की जगह सस्ते ब्रश की मांग करते हैं. अन्नपूर्णा के ज्यादातर दुकानदारों की मांग है कि उन्हें चीनी भी दी जानी चाहिए लेकिन सरकार को डर है कि राशनकी चीनी को अन्नपूर्णा में बेचा जा सकता है, इसलिए अन्नपूर्णा में चीनी नहीं बेचने दी जा रही है.

रश्मि देवी कहती हैं कि जयपुर के शिवाजी नगर में स्थित अन्नपूर्णा की दुकान से कुछ सामान खरीदने में उन्हें आसानी होती है जबकि कमला सैनी जैसी सस्ते राशन की उपभोक्ता को अन्नपूर्णा के सामान महंगे लगते हैं. जब सीमित आय पर जीना ही चुनौती हो, तो ऐसे में गुणवत्ता का सवाल पीछे चला जाता है.

राजे को इन सियासी आरोपों को गंभीरता से लेना होगा कि वे गरीबों को महंगा सामान क्यों बेच रही हैं? बियाणी का मानना है कि वे ग्राहक अन्नपूर्णा स्टोर का स्वागत करेंगे, जो गुणवत्तापूर्ण उत्पाद खरीदना चाहते हैं, पर जिसके लिए उन्हें शहर जाना पड़ता है क्योंकि ऐसे उत्पाद उनके गांव या कस्बे में उपलब्ध नहीं हैं.

राजे का यह काम काफी बड़ा और मुश्किल भरा है क्योंकि 5,000 दुकानों को हर हफ्ते माल पहुंचाने के लिए आधा दर्जन गोदामों से गाडिय़ों को 1,200 चक्कर लगाने होंगे. राशन की कई दुकान के मालिकों के परिवारों को भी इस काम में जोड़ा जा रहा है पर सरकार को अंदेशा है कि कई राशनवाले या तो इसमें आएंगे नहीं या फिर छोड़ जाएंगे. इसीलिए उसने सस्ते गल्ले और अन्नपूर्णा की दुकानों के लिए शिक्षित और इच्छुक उम्मीदवारों को रखे जाने का प्रस्ताव दिया है.

खाद्य और नागरिक आपूर्ति विभाग 2017 तक 600 करोड़ रु. टर्नओवर की उम्मीद कर रहा है. इसमें से एक करोड़ रु. वह ब्रांड के प्रचार और रीटेलरों के कल्याण पर खर्च कर सकेगा. यह योजना भी है कि जब डिब्बाबंद सामग्री का दाम चढ़े तो अन्नपूर्णा की दुकानों से उसे सस्ते में बेचा जाए. राजे को उम्मीद है कि सरकार की ओर से प्रोत्साहित यह वितरण प्रणाली जमीनी स्तर पर खुदरा बाजार में कायापलट करने वाली साबित होगी. पर यह तभी  संभव है जब बियाणी इन ग्राहकों की आदतों को बदल सकेंगे.

जन वितरण क्षेत्र में इस तरह के सुधार या प्रयोग करने के मामले में राजस्थान सबसे आगे नजर आ रहा है. अतीत में छत्तीसगढ़ और कर्नाटक राज्य सरकारों ने उपभोक्ताओं को सस्ते गल्ले की चीजें उन दुकानों से भी खरीदने की अनुमति दी थी, जो उनके लिए पंजीकृत नहीं थीं. कम से कम दस फीसदी दुकानों में पीओएस मशीन सेवा को लागू करने में राजस्थान को नेट कनेक्टिविटी की समस्या से जूझना होगा.

राजस्थान इकलौता राज्य है जिसने अन्नपूर्णा रिटेल चेन शुरू किया है. यहां जल्द ही या फिर बाद में संशोधन करके राशन कार्ड दुकान रिटेलर्स के लिए उम्र सीमा भी तय की जाएगी. ऐसे दुकानदार के बच्चों को सीधे-सीधे इन दुकानों का हस्तांतरण नहीं हो सकेगा. ऐसा लग रहा है कि सरकार की ओर से दबाव की ये तरकीबें सुनिश्चित करेंगी कि राशन दुकानों के मालिक अन्नपूर्णा योजना को अपनाएं.

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