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डार्क मोड

सर्दियों में भी दिलाया गर्मी का एहसास

पहले कांग्रेस और फिर आम आदमी पार्टी से टकराव मोल लेकर बीजेपी सरकार ने अपनी मुसीबतें कम करने की बजाए और बढ़ा ली हैं. दूसरी ओर विपक्षी एकता भी मजबूत हुई.

अपडेटेड 23 दिसंबर , 2015

संसद का शीतकालीन सत्र खत्म होने को आया और न तो वह जीएसटी विधेयक पारित हुआ जिसके इतने कसीदे काढ़े गए थे और न ही कोई दूसरा कानून बन सका. जो कानून अटके उनमें भ्रष्टाचार रोकने वाला कानून भी शामिल है. दूसरी तरफ, सत्तारूढ़ बीजेपी और विपक्ष के बीच सियासी गरमागर्मी इस कदर बढ़ गई है कि शुरुआती दिनों के भाईचारे को पूरी तरह भुला दिया गया.

नेशनल हेराल्ड मामले में सोनिया और राहुल गांधी को अदालत में पेश किए जाने के आदेश के बाद कांग्रेस नेता पहले ही आसमान सिर पर उठाए हैं. हेराल्ड मामले को लेकर बीजेपी और कांग्रेस के बीच पैदा हुआ टकराव खत्म भी नहीं हुआ था कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के करीबी सहायक और प्रमुख सचिव राजेंद्र कुमार के खिलाफ सीबीआइ जांच को लेकर बीजेपी और आम आदमी पार्टी के बीच घमासान छिड़ गया.

ऐसा लगता है कि कुमार के खिलाफ मामला इतना बड़ा और गंभीर है कि सीबीआइ ने प्रोटोकॉल का भी पालन नहीं किया. प्रोटोकॉल यह है कि जिस शख्स के खिलाफ छापे मारे जा रहे हैं, ठीक उसके ऊपर के अधिकारी को यह जानकारी देनी होती है. इस मामले में मुख्यमंत्री ही वह अधिकारी थे. ऐसा करने की बजाए सीबीआइ की टीमें 16 दिसंबर को सुबह 9 बजे दिल्ली सचिवालय पर आ धमकीं और सीधे कुमार के दफ्तर को सील कर दिया.

सीबीआइ के मुताबिक छापे में अभी तक दूसरी चीजों के अलावा अच्छी-खासी तादाद में नकदी निकली है. सीबीआइ के मुताबिक कुमार के खिलाफ भ्रष्टाचार का पुख्ता मामला बनता है. गुस्से से आगबबूला केजरीवाल के मुताबिक प्रधानमंत्री “कायर और मनोरोगी” हैं और उनका आरोप है कि सीबीआइ को छापे का फरमान सीधे मोदी से मिला था. इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली जिला क्रिकेट एसोसिएशन को चलाने में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जमकर धांधली की है. 

इस धांधली की फाइलें देखने ही सीबीआइ आई थी. ये फाइलें दफ्तर से गायब हैं और मुख्यमंत्री मामले की जांच करने के लिए आयोग बैठाने का मन बना रहे हैं. कुछ रिपोर्टों के मुताबिक दिल्ली के मुख्यमंत्री को ऐसी कोई जांच बैठाने का अधिकार ही नहीं है. अरुण जेटली के मुताबिक ये आरोप बकवास हैं और सीबीआइ अपना काम करने के लिए पूरी तरह आजाद है.

कभी केजरीवाल के नजदीकी सहयोगी रहे योगेंद्र यादव के मुताबिक “दोनों ही आरोप सही हैं.” वे कहते हैं, “बीजेपी बदले की कार्रवाई की दोषी है और आप की सरकार तमाशा करने की. क्या वे मेहरबानी करके लोगों को बख्शकर राजकाज पर ध्यान दे सकते हैं?” इस लगातार तीखे होते सियासी झगड़े में कोई शर्म-लिहाज बाकी नहीं रह गया है. बिहार में मिली शिकस्त के बाद प्रधानमंत्री संसद के शीतकालीन सत्र के शुरुआती दिनों में विपक्ष की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए दिख रहे थे. यहां तक कि असहिष्णुता पर संसद में हुई बहस के दौरान वे और उनकी पार्टी के नेता विपक्ष की झिड़कियों को खामोशी से सुनते रहे.

लेकिन धीरे-धीरे वह मुलम्मा उतरने लगा, खासकर उस वक्त जब कांग्रेस ने जीएसटी पर सरकार के प्रस्तावों का जवाब देने से इनकार कर दिया और असल में नेशनल हेराल्ड मामले में अपनी मुखालफत को और ऊंचाई पर पहुंचा दिया. अब केजरीवाल के करीबी सहयोगी के दफ्तर पर सीबीआइ के छापों के साथ ही राजनैतिक तबकों में आम धारणा यह है कि बीजेपी को महज इतनी कामयाबी मिली है कि उसने विपक्ष के उन धड़ों को भी एकजुट कर दिया है जो हर मामले में एक दूसरे से आंख नहीं मिला सकते. मिसाल के तौर पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केजरीवाल के इस दावे का समर्थन किया कि कुमार के खिलाफ छापों के पीछे बीजेपी ही थी.

राज्य में 2016 के मध्य में होने वाले विधानसभा के चुनावों में ममता का मुख्य मुकाबला बीजेपी से ही है. नीतीश कुमार के जनता दल (यूनाइटेड) ने भी इस बात का समर्थन किया कि केजरीवाल ही निशाना थे. आप की कट्टर दुश्मन कांग्रेस पार्टी ने भी संसद सत्र  के दौरान कुमार पर छापे डालने के बीजेपी के फैसले की आलोचना की. छापों का समय सियासी लिहाज से वाकई बहुत अनुकूल नहीं कहा जा सकता, इसीलिए लुटियन की दिल्ली में यह मुद्दा खासा गरमाया हुआ है.

ऐसा नहीं है कि कुमार के बारे में सवाल नहीं उठ रहे हैं. लगता है, 2013 की शुरुआत में केजरीवाल की 49 दिन की सरकार के समय एक विधायक ने कई लोगों की मौजूदगी में उनसे कहा था कि कुमार को अपना प्रमुख सचिव बनाने का उनका फैसला भीषण गलती है. उस विधायक ने शिक्षा और आइटी विभाग में कुमार के कार्यकाल के दौरान तथाकथित “भ्रष्टाचार के सबूतों” का हवाला भी दिया था. लेकिन केजरीवाल ने आरोपों को खारिज कर दिया.

केजरीवाल के एक पुराने सहयोगी राजकाज की कीमत पर भारी-भरकम तमाशा खड़ा करने के उनके रवैये को याद करते हैं. ये सहयोगी मानते हैं कि केजरीवाल के पास दिल्ली सरीखे बड़े और पेचीदा शहर की हुकूमत के लिए जरूरी अनुशासन या उसूलों से बंधा दिमाग नहीं है. यही वजह है कि जब दिल्ली की एक गैरकानूनी झुग्गी बस्ती को रेलवे ने साफ करवाया और उसमें एक बच्ची की मौत हो गई, तो केजरीवाल घनघोर लापरवाही का आरोप लगाते हुए उस पर टूट पड़े. जब तक कि यह बिल्कुल साफ नहीं हो गया कि वह बच्ची सफाई अभियान शुरू होने से पहले ही मर चुकी थी. इसी तरह, आप के विधायक जितेंद्र तोमर और उनकी “फर्जी डिग्रियों” के मामले में तोमर की किसी भी आलोचना के खिलाफ केजरीवाल के त्यौरियां चढ़ा लेने की कोई हद ही नहीं थी, लेकिन आखिर में उन्हें मानना पड़ा कि उनके पूर्व साथी गलत थे.

केजरीवाल के आलोचक यह भी मानते हैं कि दिल्ली के मुख्यमंत्री 2019 में होने वाले आम चुनाव तक किसी न किसी तरह अपने को चकाचौंध में बनाए रखेंगे, इन चुनावों में वे अपने को मोदी के मुख्य मुकाबले में खड़ा करना चाहते हैं. ये आलोचक यह भी कहते हैं कि केजरीवाल इस बात से खास खुश नहीं हैं कि नीतीश कुमार ने बिहार में अपनी हैसियत को कायम रखकर उन्हें इस स्थिति से बेदखल कर दिया है. केजरीवाल के हिमायती जोर देकर कहते हैं कि प्रधानमंत्री दिल्ली के मुख्यमंत्री को तभी से नापंसद करते हैं, जब 2014 में वह अहमदाबाद पहुंच गए थे.

उन्होंने गुजरात के तत्कालीन मुक्चयमंत्री नरेंद्र मोदी के दफ्तर की तरफ जाने वाली सड़क का घेराव किया था और राज्य में उनके गैरबराबरी वाले विकास पर सवाल खड़ा करके उन्हें परेशान किया था. मई 2014 के वाराणसी के चुनाव में उस तनाव की तस्दीक हुई और 2015 की शुरुआत में दिल्ली के चुनावों में भी वह जारी रहा, जिसमें मोदी और केजरीवाल के बीच सीधा मुकाबला हुआ था. सियासतदानों का कहना है कि सीबीआइ छापे मोदी-केजरीवाल की पुरानी जंग की नई बानगी भर हैं.

जहां तक मोदी की बात है, बहुतेरे लोग मानते हैं (और आप नेता आशुतोष ने कहा कि सियायत में महत्व इसी बात का है कि लोग क्या मानते हैं) कि छापे की कार्रवाई को अंजाम देने से पहले मोदी की इजाजत मांगी गई थी. इसी के साथ बीजेपी और विपक्ष के बीच तनाव अचानक बहुत तीखा हो उठा है. संसद के मानसून सत्र की तरह शीतकालीन सत्र भी बगैर कोई विधेयक पारित किए खत्म हो जाएगा. इस कटुता के 2016 में पश्चिम बंगाल, असम और तमिलनाडु की राज्य विधानसभाओं के चुनाव अभियानों के दौरान और फिर 2017 में पंजाब और उत्तर प्रदेश के अभियानों के दौरान भी और ज्यादा उग्र और तीखे होने की ही संभावना है.

शराफत की जबान पहले ही कुछ समय से सियासत की भेंट चढ़ चुकी है, लेकिन राजेंद्र कुमार पर छापों ने उसे एक नई गर्त में पहुंचा दिया है. केजरीवाल ने प्रधानमंत्री को “मनोरोगी” करार दिया, तो अरुण जेटली ने जोर देकर कहा कि वे “बकवास” पर कुछ कहने के लिए इतना नीचे नहीं गिरेंगे, जिसके जवाब में फिर केजरीवाल ने कहा कि वे “झूठ बोल रहे” हैं. वहीं केरल में मोदी ने एक रैली में कहा कि कांग्रेस ध्वंस, तोडफ़ोड़ और विनाश के रास्ते पर चल रही है, इसलिए संसद को ठप कर रही है.

जब सियासत इतनी कड़वाहट के साथ बंटी हो, तब संसद के लड़ाई-झगड़ों का अखाड़ा बने रहने की ही संभावना ज्यादा है. सियासी पंडितों को हैरत है कि ऐसे में कहीं सरकार कैफियत, समझाइश, मान-मनौव्वल और सर्वानुमति की बजाए हुक्मनामों और अध्यादेशों के दम पर हुकूमत करने को मजबूर न हो जाए. कुमार का तो जो होना है होगा, मगर हकीकत यह है कि उनके मामले ने सियासी जमात की एक दूसरे से बात करने की काबिलियत में गहरी दरारें उजागर कर दी हैं.

विवाद का केंद्र बिंदु
यह शख्स अरविंद केजरीवाल और केंद्र सरकार के बीच विवाद की वजह बना
 राजेंद्र कुमार
जन्म की तारीख
16 दिसंबर, 1966
एजीएमयूटी काडर के 1989 बैच के आइएएस अधिकारी
आइआइटी दिल्ली के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के पूर्व छात्र
फरवरी 2015 में उन्हें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का प्रमुख सचिव नियुक्त किया गया
कुमार ने 2014 में मुख्यमंत्री के तौर पर केजरीवाल के पहले कार्यकाल में भी उनके सचिव के रूप में काम किया था
शीला दीक्षित के उनकी पिछली तैनातियों में दिल्ली ट्रांस्को लिमिटेड के अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक, दिल्ली यातायात प्राधिकरण के सचिव-सह-आयुक्त, सचिव (स्वास्थ्य), आयुक्त (व्यापार और कर) शामिल हैं.
उन्हें 2007 में लोक प्रशासन में उत्कृष्टता के लिए प्रधानमंत्री के अवार्ड से नवाजा गया
कुमार को केजरीवाल के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के दिनों से ही उनका नजदीक माना जाता रहा है

आरोप
आरोप है कि उन्होंने कंपनियां बनाईं और उन्हें टेंडर के बगैर सरकारी ठेके दिलवाए. उनके खिलाफ की गई शिकायत के मुताबिक इसकी वजह से दिल्ली सरकार को वित्तीय नुक्सान उठाना पड़ा. सीबीआइ ने उनके खिलाफ आपराधिक साजिश और कदाचरण का मुकदमा दर्ज किया है.

दिल्ली सरकार की भ्रष्टाचार विरोधी शाखा ने उनसे 100 करोड़ रु. के सीएनजी फिटनेस घोटाले में उनकी कथित भूमिका के लिए पूछताछ की थी. आप की सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और उपराज्यपाल नजीब जंग की इस घोटाले में भूमिका होने का आरोप लगाया है.
-राकेश रंजन

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