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पीएसयू पुरस्कारः बदलाव और विकास के नए रत्नों का जश्न

इंडिया टुडे पीएसयू पुरस्कार आर्थिक वृद्धि को संचालित करने तथा सरकार की सामाजिक वचनबद्धताओं को पूरा करने में सार्वजनिक उपक्रमों के योगदान को रेखांकित करते हैं.

अपडेटेड 23 दिसंबर , 2015

वर्ष 2012 में वित्तीय सेवा और कारोबारी परामर्श देने वाली प्रतिष्ठित एजेंसी केपीएमजी ने देश के सार्वजनिक उपक्रमों (पीएसयू) के सामने मौजूद विभिन्न बाधाओं की एक सूची पेश की थी. इस रिपोर्ट में कहा गया था, “इधर बीच सामने आए फर्जीवाड़े के कई कथित आरोपों और लोगों में बढ़ी जागरूकता ने केंद्रीय पीएसयू की ओर से लिए जाने वाले फैसलों को अब ज्यादा निगरानी में ला दिया है. इससे तेजी से फैसला लेने की प्रक्रिया सुस्त होती है.” ऐसा लगता है कि तीन साल बाद केंद्र सरकार को यह बात समझ में आई है.

दिल्ली में 14 दिसंबर को इंडिया टुडे समूह के दूसरे पीएसयू पुरस्कार समारोह में ऊर्जा, कोयला और अक्षय ऊर्जा के स्वतंत्र प्रभार वाले केंद्रीय राज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि एनडीए सरकार पीएसयू के अधिकारियों को बंधनों से आजाद करना चाहती है ताकि वे साहसिक और तेजी से फैसले ले सकें. गोयल ने कहा, “विधि मंत्रालय ने सिफारिश की है कि भ्रष्टाचार निरोधक कानून, 1988 में एक संशोधन किया जाए जिससे किसी अधिकारी को उसके किसी फैसले के लिए दंडित किए जाने से पहले उसकी गलत नीयत को सुनिश्चित किया जा सकेगा.”

देश के निर्माण के वृहद् मकसद को हासिल करने की दिशा में पीएसयू के अधिकारियों को सशक्त बनाने का यह नजरिया शायद अब नतीजे देना शुरू कर चुका है. इसे पीयूष गोयल ने आंकड़ों के सहारे साबित करने की कोशिश की, जब उन्होंने बताया कि कोल इंडिया ने 2014 में 3.2 करोड़ टन कोयला उत्पादित किया है, जो 2010 से 2014 के बीच के चार साल में उत्पादित कोयले की मात्रा के मुकाबले ज्यादा है.

इस मौके पर पीयूष गोयल ने मीडिया पर भी टिप्पणी करने का मौका नहीं गंवाया, “पिछले साल अखबारों की सुर्खियां चीख-चीखकर देश में कोयला संकट की बात बता रही थीं. वे तो कोयला आधारित ऊर्जा संयंत्रों के बंद होने की बात तक कह रही थीं. अब देखिए, सारा मामला ही पलट गया है.”

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के बतौर शामिल केंद्रीय संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) के कायाकल्प की दास्तान सुनाई. बीएसएनएल पिछले साल सबसे ज्यादा घाटे में चलने वाली पीएसयू थी लेकिन इस साल इसे 672 करोड़ रु. का कार्यकारी मुनाफा हुआ है. पिछले साल इसने 691 करोड़ रु. का घाटा प्रदर्शित किया था. रवि शंकर प्रसाद ने कहा, “2004 में एनडीए की पहली सरकार का कार्यकाल खत्म होने पर बीएसएनएल 10,000 करोड़ रु. के मुनाफे में थी. लेकिन 2014 में यूपीए के कार्यकाल की समाप्ति पर बीएसएनएल 8,000 करोड़ रु. के घाटे में आ गई थी. ऐसे में मैंने इसके शीर्ष अधिकारियों को बस इतना ही कहा था कि उन्हें कुछ कर दिखाना है क्योंकि वे कर सकते हैं.”

इंडिया टुडे समूह के पीएसयू पुरस्कार कामयाबी की ऐसी ही कहानियों को मान्यता देते हैं और देश के आर्थिक विकास तथा सामाजिक कल्याण में इन सरकारी कंपनियों के योगदान को रेखांकित करते हैं. इस संबंध में काफी जटिल प्रक्रिया के बाद जो नतीजे निकाले गए हैं, वे कंपनियों के बाजार प्रदर्शन को भी प्रतिबिंबित करते हैं. मसलन, महारत्न श्रेणी में तीन पुरस्कार जीतने वाली कंपनी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (आइओसीएल) जून में खत्म तिमाही में 6,436 करोड़ रु. का मुनाफा दर्ज कर के देश की सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाली कंपनी बन गई थी. यह मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज के मुनाफे के मुकाबले 118 करोड़ रु. ज्यादा था.

आजादी के बाद कुल 29 करोड़ रु. के निवेश से देश में पांच केंद्रीय पीएसयू शुरू की गई थीं. आज इनकी संख्या 250 को पार कर गई है और 31 मार्च, 2014 तक इनका कुल वित्तीय निवेश 9,92,971 करोड़ रु. बैठता है. इनमें से 163 पीएसयू का शुद्ध सम्मिलित मुनाफा 1,49,164 करोड़ रु. रहा है. पहली पंचवर्षीय योजना में पीएसयू को देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण के स्तंभों के रूप में देखा गया था. यही वजह थी कि अधिकतर पीएसयू बुनियादी उद्योगों जैसे रेलवे, डाक और तार, आदि में परिचालन करते थे. आज यह तस्वीर बदल चुकी है और देश के पीएसयू स्टील से लेकर इंजीनियरिंग, भारी मशीनरी, पेट्रोरसायन, कपड़ा, विनिर्माण और दवा जैसे विविध क्षेत्रों में परिचालन कर रहे हैं.

इस विस्तार ने हालांकि नई चुनौतियां पैदा की हैं. 1991 में शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण के बाद सरकार ने पीएसयू के लिए आरक्षित क्षेत्रों को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया था जिस वजह से उन्हें घरेलू निजी कंपनियों और विशाल बहुराष्ट्रीय फर्मों से कड़ी प्रतिस्पर्धा मिलने लगी थी. फिलहाल अगर कई पीएसयू मुनाफे में चल रही हैं तो सरकार ने ऐसी 65 सरकारी कंपनियों की भी सूची तैयार की है जो घाटे में हैं. इनमें एयर इंडिया और एमटीएनएल शामिल हैं. केपीएमजी की रिपोर्ट की मानें तो इनमें से कई कंपनियां ढांचागत और कामकाजी बंदिशों से जूझ रही हैं. कई पीएसयू तो बिना किसी प्रमुख के काम कर रही हैं और इनकी मैन पावर में भारी कमी दिखाती है कि यहां सक्षम मूल्यांकन प्रणाली का अभाव है.

इसके अलावा राजनैतिक दखलअंदाजी और पेशेवर कॉर्पोरेट प्रशासनिक ढांचे की गैर-मौजूदगी ने इन कंपनियों की स्वायत्तता और पारदर्शिता को भी प्रभावित किया है. स्टेकहोल्डर्स एंपावरमेंट सर्विसेज (एसईएस) की ओर से शीर्ष पर सूचीबद्ध 27 पीएसयू में इस साल किए गए एक अध्ययन में पाया गया है कि 25 पीएसयू बोर्ड के स्वतंत्र होने की शर्तों को पूरा नहीं करते जबकि 80 फीसदी से ज्यादा ऐसे हैं जहां एक अनुपालक ऑडिट कमेटी और नॉमिनेशन और रिमूनरेशन कमेटी नहीं है.

बेकार और कमजोर प्रदर्शन करने वाले पीएसयू को बहाल करने के लिए एनडीए की पहली सरकार में बनाए गए विनिवेश मंत्रालय से सबक लेते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर कहते रहे हैं कि कारोबार में दखल देने का काम सरकार का नहीं है. इंडिया टुडे के पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए गोयल ने कहा कि मौजूदा एनडीए सरकार किसी नए कारोबार में घुसने से परहेज कर रही है. माना जा रहा है कि यह सरकार सभी क्षेत्रों में घाटे में चल रही पीएसयू को बेचने या बहाल करने के लिए एक नीति को आखिरी रूप देने में लगी है.

इसके तहत विनिवेश आयोग के गठन का प्रस्ताव है जिसका काम यह मालूम करना होगा कि क्या किसी कंपनी को अतिरिक्त अनुदान से जीवित किया जा सकता है, क्या उसमें कुछ हिस्सेदारी बेचकर या निजी हाथों में उसका नियंत्रण सौंप कर उसकी वित्तीय सेहत को बहाल किया जा सकता है या फिर उसे सीधे बेचे जाने की जरूरत है?

केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली पहले ही संकेत दे चुके हैं कि स्थानीय शेयर बाजार में उत्साह की कमी और वैश्विक स्तर पर जिंसों के कारोबार में कमजोरी की वजह से यह संभव है कि सरकार सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचकर इस वित्तीय वर्ष 69,500 करोड़ रु. की राशि जुटाने के अपने घोषित महत्वाकांक्षी लक्ष्य को पूरा न कर पाए. जेटली ने पिछले 12 दिसंबर को कहा, “मैं विनिवेश के लक्ष्यों में पिछड़ रहा हूं. मैं कम कीमतों के दौर में बेचने की गलती नहीं कर सकता.”

खराब प्रदर्शन करने वाली पीएसयू ने हमेशा ही सरकार को उससे पल्ला झाडऩे को प्रोत्साहित किया है, लेकिन इधर के वर्षों में यह देखा गया है कि अर्थव्यवस्था की वृद्धि में पीएसयू की भूमिका लगातार बढ़ी है. पिछले कुछ साल में निजी क्षेत्र में निवेश के तेजी से नीचे आने के साथ करीब 2,00,000 करोड़ रु. के नकद भंडार पर बैठे कैश के मामले में अमीर पीएसयू अपने पूंजीगत निवेश को बढ़ाने की स्थिति में आ गई हैं.

रिजर्व बैंक की ओर से किए गए एक हालिया अध्ययन में कहा गया है कि निजी क्षेत्र में पूंजीगत व्यय 2014-15 के दौरान 27 फीसदी संकुचित हुआ है. ऐसा लगातार चौथे साल हो रहा है. ऐसे में जेटली और मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने स्वीकार किया है कि अर्थव्यवस्था को बहाल करने का अधिकतर बोझ सार्वजनिक व्यय के कंधे पर आ पड़ा है और सरकार को ही यह भूमिका निभानी होगी.
पीएसयू की प्रासंगकिता अर्थव्यवस्था को सिर्फ ऊंचाई की ओर ले जाने तक सीमित नहीं है.

एक कल्याणकारी अर्थव्यवस्था में पीएसयू का काम सरकार की सामाजिक वचनबद्धताओं को भी पूरा करना होता है. गोयल इसके लिए एनर्जी एफीशियंसी सर्विसेज लिमिटेड (ईईएसएल) का उदाहरण देते हैं. ईईएसएल ऊर्जा मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले कुछ पीएसयू के बीच किया गया एक उद्यम है, जिसने एलईडी बल्ब की बाजार कीमत को 76 फीसदी घटा दिया है. गोयल कहते हैं, “ईईएसएल को घाटा नहीं हो रहा है लेकिन उसका वृहद लक्ष्य सामाजिक कल्याण है. हम पीएसयू को सशक्त कर के सामाजिक लक्ष्य हासिल कर सकते हैं.” और सरकार को इसी पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है कि देश की इन पीएसयू को ज्यादा सक्षम, ज्यादा उत्पादक और स्वावलंबी बनाकर व्यापक सामाजिक कल्याण को सुनिश्चित किया जाए.

तरीका
स र्वश्रेष्ठ सार्वजनिक उपक्रमों (पीएसयू) को लेकर इंडिया टुडे समूह का अध्ययन मार्केटिंग ऐंड डेवलपमेंट रिसर्च एसोसिएट (एमडीआरए) ने किया है जो एक अग्रणी शोध संस्थान है. इस सर्वे में पीएसयू बैंकों और राज्यों के सार्वजनिक उपक्रमों को शामिल नहीं किया गया है. रणनीति, प्रदर्शन और प्रतिस्पर्धा जैसे विभिन्न आयामों के मद्देनजर पुरस्कार की आठ श्रेणियां बनाई गई हैं.
इन आठ श्रेणियों के पुरस्कारों को आगे चार उपश्रेणियों में बांटा गया- महारत्न,
नवरत्न, मिनिरत्न (श्रेणी 1 और 2) और अन्य पीएसयू.

पहले चरण में प्रदर्शन के विभिन्न मानकों पर पीएसयू के मूल्यांकन की कसौटियों को आखिरी रूप दिया गया. इसके बाद इन पैरामीटर्स और सब-पैरामीटर्स को विभिन्न महत्व दिया गया. इसी आधार पर एक प्रश्नावली पीएसयू को भेजी गई. योग्य 160 पीएसयू में से 39 ने समय सीमा के भीतर अपना आवेदन जमा किया और उसका मूल्यांकन किया गया.

प्राप्त सूचनाओं को विश्वसनीयता के लिए दूसरे तरीके से भी जांचा गया. गलत या अपर्याप्त आंकड़े की सूरत में उनसे दोबारा सूचना मांगी गई. वस्तुपरक आवेदन के आधार पर पुरस्कार की पांच श्रेणियां तय करने के अलावा दो अन्य श्रेणियां-फास्टेस्ट ग्रोइंग और मोस्ट वैलुएबल- खुले आंकड़ों के आधार पर बनाई गईं. बेस्ट परफार्मिंग श्रेणी आवेदन से प्राप्त सूचना और खुले आंकड़ों को मिलाकर तैयार की गई ताकि यह ज्यादा समावेशी हो सके. मूल्यांकन के मानकों और महत्व के आधार पर हरेक मानक को स्कोर दिया गया. प्रत्येक श्रेणी में सबसे ज्यादा स्कोर वाली पीएसयू को विजेता घोषित किया गया.

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