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डार्क मोड

भारत-रूस रिश्तेः नई मजबूती की आस

प्रधानमंत्री मोदी रूस की अपनी पहली सरकारी यात्रा पर मॉस्को के लिए रवाना हो चुके हैं. उम्मीद है कि दोनों देश अपने रणनीतिक सहयोग को और मजबूत करने के लिए बड़े कदम उठाएंगे.

अपडेटेड 23 दिसंबर , 2015

भारत किसी देश को अगर अपना स्थायी दोस्त कहना चाहेगा, तो इस दौड़ में रूस सबसे आगे होगा. रूस ने हमें कश्मीर में बेशर्त सहयोग दिया है. हमने जब परमाणु परीक्षण किया, तब भी वे हमारे पीछे खड़े रहे. करगिल की जंग के दौरान वे हमारे साथ थे. हमारे परमाणु ऊर्जा संयंत्रों और पनडुब्बी परियोजनाओं में मदद की. हमारे रक्षा क्षेत्र को अत्याधुनिक हथियार मुहैया करवाए. भारत भी लगातार रूस के पीछे मजबूती से खड़ा रहा है. हमने 1979 में अफगानिस्तान पर रूस के कब्जे के दौरान कभी उसकी निंदा नहीं की. पिछले साल जब उसने क्रीमिया पर कब्जा किया तब भी हमने बाकी देशों के निंदा अभियान में अपना सुर नहीं मिलाया. आज भी हम सीरिया में उसकी संलिप्तता को समर्थन दे रहे हैं.

इसके बावजूद हालिया अतीत में दोनों देशों के रिश्तों में कुछ उतार-चढ़ाव आए हैं. इसकी आंशिक वजह यह रही है कि भारत और अमेरिका के बीच परमाणु सौदे के बाद अमेरिका के साथ भारत के रणनीतिक रिश्ते लगातार बढ़े हैं. दूसरी वजह यह रही है कि व्लादिमिर पुतिन के शासन में रूस ने अमेरिका और यूरोप को चुनौती दी है और ऐसा करने की प्रक्रिया में उसने भारत के शाश्वत प्रतिद्वंद्वी चीन के साथ करीबी बढ़ाई है तो पाकिस्तान के साथ भी रिश्ते मधुर किए हैं.

जब 24 दिसंबर को मॉस्को में सालाना शिखर सम्मेलन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रपति पुतिन से मिलेंगे, तो उनका एक उद्देश्य रूस को इस बात से दोबारा आश्वस्त करना होगा कि लगातार पश्चिम में की अपनी यात्राओं के बावजूद भारत उनका मजबूत दोस्त बना हुआ है. वे इस बात को जाहिर करने की भी कोशिश करेंगे कि पिछले साल दिल्ली में पुतिन के साथ किए गए द्रुझबा-दोस्ती विजन पर वे तेजी से आगे बढ़ रहे हैं ताकि अगले दशक में द्विपक्षीय रिश्तों को और सशक्त तथा विस्तारित किया जा सके.

भारत और रूस दोनों ने ही इस बात को महसूस किया है कि वैश्विक शक्ति का दर्जा हासिल करने की तलाश में दोनों के लिए अपरिहार्य हो गया है कि वे अंतरंग दोस्ती के माहौल को बरकरार रखें. रूस को भारत की जरूरत इसलिए है क्योंकि उसे अपने माल के लिए यहां का बाजार चाहिए ताकि उक्रेन में की गई कार्रवाई की वजह से पश्चिम के प्रतिबंधों को वह बेअसर कर सके. इसके अलावा, अमेरिका के आगामी ट्रांस अटलांटिक ट्रेड और निवेश सौदे की सूरत में रूस अपने बाजार के लिए यूरोप के पार भी नजरें घुमाने को मजबूर होगा.

ऐसे में भारत उसका स्वाभाविक पार्टनर होगा. चीन के साथ अपने बहाल रिश्तों के बावजूद रूस को जल्द ही बीजिंग से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा क्योंकि चीन अब अमेरिका के साथ खुद को नए जी2 का हिस्सा मान रहा है. ऐसे में रूस को जो बहुध्रुवीय सहयोग चाहिए, उसमें भारत उसकी मदद कर सकता है.

भारत को रूस की जरूरत इसलिए है क्योंकि उसके सहारे वह अपनी ऊर्जा की जरूरतें किफायती दाम पर पूरी कर सकता है. अमेरिका, इज्राएल और यूरोप के साथ रक्षा खरीद के अपने सौदों को विस्तार देने के बावजूद भारत को अब भी रूस से गठजोड़ की जरूरत पड़ेगी ताकि अंतरिक्ष समेत भविष्य की तकनीक में वह महारत हासिल कर सके. ऐसा करने से पश्चिम के साथ भारत की हथियारों की सौदेबाजी की क्षमता मजबूत हो सकेगी.

दवा, विनिर्मित उत्पादों, डेयरी उत्पादों, गोमांस और फ्रोजन समुद्री मांस के लिए रूस भारतीय उद्योगों का बड़ा बाजार साबित हो सकता है. भू-राजनैतिक रूप से देखें तो चीन और पाकिस्तान की किसी भी साजिश के खिलाफ  रूस अब भी हमारे लिए संतुलनकारी ताकत की भूमिका में है. जैसा रूस में भारत के राजदूत पी.एस. राघवन कहते हैं, “हमारी दोस्ती दोनों के फायदे में है. हमारी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्वाकांक्षाएं परस्पर सहयोगात्मक हैं&भारत और रूस के बीच कोई भी अंतर्विरोध नहीं है.”

मोदी और पुतिन जब मिलेंगे, तो उन्हें 2025 के लिए तय किए गए 30 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार लक्ष्य पर हुई प्रगति की समीक्षा करनी होगी. फिलहाल यह 10 अरब डॉलर के इर्दगिर्द है और व्यापार को तीन गुना तक बढ़ाना एक भारी काम है. रक्षा क्षेत्र में सहयोग हालांकि अब खरीदार और विक्रेता के द्विपक्षीय संबंध से आगे बढ़कर आधुनिक प्रौद्योगिकियों के संयुक्त शोध, विकास और उत्पादन तक जा चुका है, फिर भी इन परियोजनाओं को काफी तेजी से कार्यान्वित करने की जरूरत होगी. खासकर पांचवीं पीढ़ी के विमानों और हवाई परिवहन कार्यक्रमों से जुड़ी परियोजनाओं तथा भारत में हेलिकॉप्टरों के निर्माण के संबंध में गठजोड़ को तेजी दी जानी होगी.

दोनों देशों में आर्थिक संबंधों को असली प्रोत्साहन देने की जरूरत है. रूस में भारतीय निवेश अब सात अरब डॉलर पहुंच चुका है और मुख्यतः तेल और गैस क्षेत्रों में है. ओएनजीसी-विदेश का सखालिन-1 में 20 फीसदी हिस्सा है और उसने इम्पीरियल एनर्जी तोम्स्क का अधिग्रहण कर लिया है जिसके पास तेल उत्पादन की परिसंपत्तियां मौजूद हैं.

रूस की गैजप्रॉम और गेल ने एलएनजी की आपूर्ति के लिए 20 साल के सौदे पर दस्तखत किए हैं. रोस्नेट ने एस्सार के साथ कच्चे तेल की दीर्घकालिक आपूर्ति के संबंध में समझौता किया है. इसके अलावा टाटा की योजना मिनी लॉरी और बसों के लिए वहां असेंबली लाइन स्थापित करने की है. दवा क्षेत्र में सन समूह, रैनबैक्सी और लुपिन वहां अपना कारोबार विस्तारित कर रही हैं. हीरा, उर्वरक और खाद्य क्षेत्र में वहां भारी संभावनाएं हैं जिसका दोहन भारतीय उद्योगों को करना होगा.

रूस को भी भारत में अपना निवेश बढ़ाने की जरूरत है जो फिलहाल तीन अरब डॉलर के आसपास है. रूसी दूरसंचार कंपनी सिस्टेमा का भारत में संयुक्त उपक्रम श्याम सिस्टेमा टेलीलिंक्स संकटग्रस्त हो गया था जब 2जी स्पेक्ट्रम के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद उसके कुल 22 भारतीय लाइसेंसों में 21 गवां दिए. रूस इस घटना से निराश है.

इस दौरान मोदी के शुरू किए “मेक इन इंडिया” अभियान के तहत रूसी कंपनियों के लिए यहां रक्षा उपकरण, नागरिक विमानन और रेलवे जैसे क्षेत्रों में निवेश के काफी मौके खुल रहे हैं. भारत को रूस की प्रौद्योगिकी को अपनाना सीखना होगा और उसके लिए अफसरशाही के अवरोधों को कम करना होगा. भारत और रूस को अपने रिश्तों में और परिपक्वता लानी होगी ताकि प्रभावशाली और टिकाऊ गठजोड़ कायम किया जा सके.

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