उच्चतम न्यायालय ने 10 दिसंबर को हरियाणा सरकार के पंचायती राज कानून में किए गए संशोधनों को हरी झंडी दी तो दो जजों की बेंच में शामिल जस्टिस अभय मनोहर सप्रे ने फैसले के साथ खुद को संबद्ध करते हुए अलग से कुछ विचार रखे. पंचायत चुनाव लडऩे के लिए घर में शौचालय होने की अनिवार्य शर्त को संविधान का उल्लंघन नहीं मानते हुए जस्टिस सप्रे की टिप्पणी है, “वक्त का तकाजा है कि जनहित में इसे एक राज्य में सीमित करने की बजाए सुनिश्चित करना चाहिए कि यह पूरे देश में लागू हो.”
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला हरियाणा सरकार की ओर से पंचायती राज कानून में लाए गए संशोधनों को दी गई चुनौती के बाद आया है. पंचायत चुनाव को लेकर गतिरोध खत्म होने के हफ्ते भर के भीतर ही हरियाणा सरकार ने चुनाव की नई तारीखों का एलान कर दिया है. यानी अब पंचायत चुनाव लडऩे के लिए पांच नई शर्तें लागू होंगी&किसी भी अपराध में 10 साल या उससे ज्यादा सजा पाने वाला, सहकारी संस्था, बैंक आदि से कर्ज लेकर डिफॉल्टर घोषित है और बिजली का बिल बकाया हो तो चुनाव नहीं लड़ सकता.
जबकि शैक्षणिक योग्यता की शर्तों में सामान्य श्रेणी के लोगों का 10 वीं पास होना, महिलाओं के लिए 8वीं पास, एससी वर्ग के लिए 8वीं पास, पंच के लिए एससी महिलाओं का पांचवीं पास और सबसे अहम, उम्मीदवार के घर में चालू शौचालय होने की अनिवार्य शर्त जोड़ दी गई है. इसके लिए हरियाणा सरकार ने सबसे पहले अगस्त में अध्यादेश के जरिए पंचायती राज कानून 1994 में संशोधन कर दिया था, जिस पर हाइकोर्ट ने 19 अगस्त को रोक लगा दी. इसके बाद राज्य की मनोहर लाल खट्टर सरकार ने अध्यादेश को वापस लेते हुए 7 सितंबर को विधानसभा से पंचायती राज संशोधन विधेयक 2015 पास करा लिया और अगले दिन ही पंचायत चुनाव का एलान कर दिया गया.
लेकिन चुनावी प्रक्रिया शुरू होने का हवाला देते हुए हाइकोर्ट ने दखल से इनकार कर दिया, जिसके बाद 14 सितंबर को राजबाला, कमलेश और प्रीत सिंह की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई और 17 सितंबर को कोर्ट ने इन संशोधनों पर रोक लगा दी. इसके बाद खट्टर सरकार ने कोर्ट में अपना पक्ष रखने को वक्त मांगा और 22 सितंबर को पंचायत चुनाव पर रोक लग गई. दो महीने की बहस के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 10 दिसंबर को अपना फैसला सुनाते हुए हरियाणा सरकार के पांचों संशोधनों को उचित ठहराया.
लेकिन इस फैसले पर जिस तरह से कानूनी और राजनैतिक बहस शुरू हो चुकी है, उसका असर आने वाले समय में दिख सकता है. सबसे अहम सवाल यह उठ रहा है कि जब देश-राज्य के लिए कानून बनाने वालों पर इस तरह की पाबंदी नहीं है तो सरपंच पर क्यों. कोर्ट में चुनौती देने वालों ने भी अपनी दलील में कहा था कि इससे हरियाणा की 64 फीसदी ग्रामीण आबादी अदालत से महरूम हो जाएगी.
चुनाव लडऩे के फैसले पर सीधी टिप्पणी करने की बजाए याचिकाकर्ताओं के वकील विक्रम मित्तल ने इंडिया टुडे से कहा, “कोर्ट ने अपने फैसले में संशोधनों को भले जायज ठहराया हो, लेकिन शिक्षा को लेकर राज्य सरकार की जवाबदेही तय करने की कोई चर्चा नहीं है जबकि हरियाणा के 50 फीसदी से ज्यादा गांवों में दसवीं तक का भी स्कूल नहीं है.” फैसले को त्रुटिपूर्ण मानते हुए याचिकाकर्ता अदालत में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की रणनीति बना रहे हैं.
सुप्रीम कोर्ट में वकील इंदिरा जयसिंह तो इसे स्वस्थ भारतीय लोकतंत्र को गहरा झटका करार देती हैं. चुनाव लडऩे के लिए शौचालय की अनिवार्यता पर उन्होंने कहा, “ऐसा लगता है कि स्वच्छ भारत अभियान का जो संदेश देश में पहुंचा है, वह अदालत केजेहन में इतनी गहराई तक पैठ गया है कि अदालत खुद इसकी विशेष ब्रांड एंबेसडर बन गई.” सुप्रीम कोर्ट के ही एक अन्य वकील विराग गुप्ता इस फैसले को संवैधानिक संकट के रूप में देखते हैं. वे कहते हैं, “संवैधानिक प्रावधानों की राज्यों के स्तर पर मनमानी व्याख्या से देश में न सिर्फ संघवाद वरन् कानून के शासन को भी खतरा है.
ऐसे कानूनों की शुरुआत विधायकों-सांसदों से हो तभी गवर्नेंस के मसले हल होंगे और लोकतंत्र स्वस्थ होगा.” उनका कहना है कि जैसे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की “गरीबी हटाओ” मुहिम की विफलता के बाद “गरीब हटाओ” मुहिम शुरू हो गई थी, उसी तरह “सबका साथ, सबका विकास” के नारे पर सत्ता में आई बीजेपी स्वच्छ भारत अभियान को सफल नहीं बना पा रही तो इस तरह के जबरिया कानून थोपने लगी है.
इस फैसले को लेकर कानूनी नुक्ताचीनी ही नहीं, राजनैतिक बहस भी अपने चरम पर है. हरियाणा विधानसभा में विपक्ष के नेता अभय सिंह चौटाला कहते हैं, “जब देश में कोई अनपढ़ राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री बन सकता है तो सरपंच क्यों नहीं? बीजेपी को इस फैसले का खामियाजा भुगतना पड़ेगा. अगर उसे लगता है कि यह फैसला जनहित में लिया गया है तो पार्टी अपने चुनाव चिन्ह पर पंचायत चुनाव लड़ ले, हकीकत का अंदाजा लग जाएगा.”
लेकिन हरियाणा बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. अनिल जैन कहते हैं, “संविधान की व्याख्या करने वाली सबसे बड़ी संस्था सुप्रीम कोर्ट है और हमें उसकी भावनाओं के मुताबिक चलना चाहिए. वैसे भी जब इस तरह के चुनाव सुधार की पहल होती है तो सवाल उठते हैं, पर बाद में सभी उसका खैर मकदम करते हैं.” लेकिन सांसद-विधायक के चुनाव लडऩे पर यह शर्त क्यों नहीं? जैन कहते हैं, “अभी बहस शुरू हुई है. हम नहीं कहते कि ऐसा सांसदों-विधायकों के लिए नहीं होना चाहिए. लेकिन यह भी तथ्य है कि सरपंच चेक पर दस्तखत करते हैं, सांसद-विधायक नहीं. इसलिए चुनाव सुधार की पहल पंचायत स्तर से होती है तो अच्छे बदलाव लाए जा सकते हैं.”
वे बताते हैं कि अभी इसे हरियाणा, राजस्थान ने लागू किया है, अन्य बीजेपी शासित राज्य भी इसे अपना सकते हैं. लेकिन कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय पंचायती राज मंत्री मणिशंकर अय्यर सार्वजनिक तौर से इस फैसले को न्याय को झटका करार देते हुए संसद के दखल देने की मांग कर चुके हैं. उनकी दलील है, “हरियाणा सरकार का फैसला महिला, ओबीसी, एससी-एसटी विरोधी है.” आने वाले समय में बिहार में पंचायत चुनाव होने हैं, लेकिन वहां सत्ताधारी पार्टी जेडी (यू) के महासचिव के.सी. त्यागी इसे संविधान की मूल भावना के खिलाफ करार देते हैं.
वे कहते हैं, “यह गलत फैसला है, गांव और कमजोर तबकों के साथ ज्यादती है. देश में निरक्षरता है या शौचालय नहीं बने हैं तो इसके लिए सरकार दोषी है. हरियाणा सरकार गांव के लोगों को उनके मौलिक अधिकार से वंचित करना चाहती है. गांव में पंचायत न्याय करती है और बहुत सारे मसले सामूहिकता के आधार पर हल होते हैं, जिसके लिए शैक्षणिक योग्यता की जरूरत नहीं है.” वे इस मसले को संसद में उठाने का एलान करते हुए सुप्रीम कोर्ट को भी नसीहत देते हैं, “ संविधान अभिजात” वर्ग के लिए नहीं बना है, अदालत इस फैसले पर पुनर्विचार करे और ऐसे मामलों में फैसला देते वक्त उसे संविधान की भावनाओं को भी ध्यान में रखना चाहिए.”
वैसे इस फैसले पर छिड़े कानूनी-राजनैतिक महाभारत में बीजेपी समाजवादी पार्टी के तेवरों से थोड़ा सुकून महसूस कर सकती है. सपा के राष्ट्रीय महासचिव नरेश अग्रवाल कहते हैं, “सुप्रीम कोर्ट कह चुका है तो विचार करना चाहिए. यूपी में पंचायत चुनाव हो चुके हैं. अगली बार जब चुनाव हों तो सरकार को इस पर विचार करना चाहिए क्योंकि निरक्षर लोगों को काम करने में दिक्कत आती है.”
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद चुनाव और राजनीति के अपराधीकरण को खत्म करने की बहस फिर शुरू होगी और इसे पंचायत तक सीमित करने की बजाए संसद तक लागू करने की मांग उठेगी. ऐसे में आने वाले समय में यह मुद्दा बीजेपी के लिए सिरदर्द बन सकता है.
पंच बनने की पांच शर्तों पर छिड़ी बहस
हरियाणा पंचायत चुनाव पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने चुनाव सुधार की बहस को एक नया आयाम दिया. पर अब सवाल उठ रहा है कि समुचित व्यवस्था किए बगैर अगर यह फैसला सही है तो क्या इसे देशभर में हर स्तर पर लागू करने के लिए कदम उठाए जाएंगे?

अपडेटेड 21 दिसंबर , 2015
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