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समृद्ध दुनिया के नए रक्षक

एक युवा ने बिहार, ओडिशा, बंगाल, यूपी तक सीमित निजी सुरक्षा एजेंसी को महज 13 साल में बनाया आधुनिक और 22 करोड़ रु. से 4,000 करोड़ रु. की टर्नओवर वाली अंतरराष्ट्रीय कंपनी.

अपडेटेड 14 दिसंबर , 2015

तब वे सिर्फ 23 साल के थे, जब उन्होंने सेक्युरिटी ऐंड इंटेलिजेंस सर्विसेज (एसआइएस) लि. की कमान संभाली. उससे ठीक पहले 2001 में अमेरिका में 9/11 की घटना से सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बन गया था. पिता आर.के. सिन्हा ने उनसे भारत लौटकर कारोबार संभालने को कहा. ऋतुराज सिन्हा उस पल को याद करते हैं, “पिताजी ने कहा कि हम सरकारी स्कूल में पढ़े हैं और तुम दून स्कूल में. स्वाभाविक रुप से हमारी कार्यशैली में भिन्नता होगी, सो मैं प्रोफेशनल टीम बनाता हूं और  तुम उसका नेतृत्व करो.” लंदन में हैलीफैक्स बैंक के शुरुआती स्तर वाली एसोसिएट की नौकरी छोड़ कारोबार संभालने वाले ऋतुराज को भले 22 करोड़ की कंपनी विरासत में मिली लेकिन कम उम्र का होने के कारण उनकी चुनौती बड़ी थी.

2002 में कंपनी संभालने के बाद वे कामकाज की शैली में आमूल-चूल बदलाव चाहते थे. लेकिन मुश्किल था निजी सुरक्षा में लगे कंपनी के पूर्व सैनिकों, पूर्व नौकरशाहों को बदलाव के लिए समझा पाना. उस वक्त ऋतुराज कंपनी में इकलौते ऐसे शख्स थे जिनके पास लैपटॉप था. 2004 में उन्होंने तीन बड़ी पहल की&कंपनी के पूरे तंत्र की रीइंजीनियरिंग की नींव रखी, हर साल 5-10 नई शाखा खोलने का लक्ष्य रखा और गार्डिंग के साथ सुरक्षा के तमाम पहलुओं का विस्तार करने का फैसला किया. इन फैसलों का असर हुआ कि कंपनी 22.40 करोड़ रु. से 146 करोड़ रु. के टर्नओवर पर पहुंच गई. यहीं से ऋतुराज को कंपनी के भीतर और बाहर के लोगों की तवज्जो मिलनी शुरू हुई. वे बताते हैं, “उन पांच साल में अलग-अलग प्रांतों में कारोबार की विभिन्नता और परिस्थिति को करीब से समझने का मौका मिला और भारत को पहली बार घूमकर देखा.”

ऋतुराज ने चुनौती को अवसर में बदलने की मिसाल तब पेश की जब 2007 में उन्होंने देश से बाहर भी पांव पसारने की सोची. लेकिन यह ऐसा निर्णय था, जिससे पूरी कंपनी दांव पर लग गई. उस वक्त ऑस्ट्रेलिया में चब सिक्युरिटी निजी सुरक्षा क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी और एसआइएस से सात गुना बड़ी थी. लेकिन अपनी जिंदगी के 29वें साल यानी जुलाई 2008 में ऋतुराज ने चब सिक्युरिटी को खरीद कर रातोरात एसआइएस को 150 करोड़ रु. से 1,000 करोड़ रु. वाली कंपनी की लीग में पहुंचा दिया. लेकिन चुनौती यहां खत्म नहीं हुई. इसी साल दुनिया में आर्थिक मंदी का दौर शुरू हो गया और बैंकों ने कर्ज देने में आनाकानी शुरू कर दी. वे बताते हैं, “बैंकों में अजीबोगरीब सवाल पूछे जाते थे. मेरी उम्र क्या है? कभी किसी प्रकार की कंपनी खरीदी है? भारत के सिक्युरिटी इंडस्ट्री के इतिहास में किसी भारतीय कंपनी ने विदेश में कारोबार किया है? सही मायने में एसआइएस या भारतीय मूल की किसी कंपनी ने ऐसा नहीं किया था. मैं उन कुछ महीनों के तनाव को शब्दों में बयान नहीं कर सकता.” उन्हें यहां तक ताने सुनने को मिले कि सिन्हा साहब को बिहार से दिल्ली आने में 25 साल लग गए और अब बेटा पांच साल में ऑस्ट्रेलिया का ख्वाब देख रहा है.

सचमुच एसआइएस के संस्थापक आर.के. सिन्हा की निजी सुरक्षा क्षेत्र में आने की कहानी दिलचस्प है. सिन्हा पटना में पत्रकार थे, लेकिन जेपी आंदोलन के समय क्रांतिकारी विचारों की वजह से नौकरी से निकाल दिए गए. फिर वे जेपी से मिलकर अपनी व्यथा रखी तो जेपी ने उन्हें कहा कि कुछ ऐसा करो जिससे तुम्हें भी रोजगार मिले और तुम औरों को भी रोजगार दे सको. यह सलाह उन्हें भा गई और 1971 में बांग्लादेश वार करेस्पॉन्डेंट के रूप में सीमा के उनके अनुभव ने इसमें अहम भूमिका निभाई. युद्ध के वक्त उन्होंने बिहार रेजीमेंट के साथ वक्त बिताया था और जवानों के नजदीक आए थे. बाद में 1974 में आर.के. सिन्हा ने उन्हीं में से रिटायर कुछ जवानों को साथ लेकर एसआइएस सिक्युरिटी की नींव रखी. इसे 25 साल की मेहनत से उन्होंने 22 करोड़ रु. की कंपनी बनाया था जो ऋतुराज के जोश में दांव पर लग गई थी.

लेकिन स्वभाव से सहज रहने वाले ऋतुराज ने निराशा को खुद पर हावी नहीं होने दिया. देहरादून के दून स्कूल से पढ़े और बाद में लीड्स यूनिवर्सिटी से बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई कर चुके ऋतुराज ने ऑस्ट्रेलिया में कंपनी के विस्तार और उसके लाभ को 1 से बढ़ाकर 5 फीसदी तक पहुंचा दिया. इसके बाद उन्होंने फिर नया लक्ष्य रखा&सिक्युरिटी सर्विस ही नहीं, कंपनी को हर उस सर्विस से जोडऩा जो कारोबार के लिए जरूरी है. फिर 2010 में यूएसए की सर्विस मास्टर कॉर्पोरेशन के साथ संयुक्त उपक्रम बना फैसिलिटी मैनेजमेंट के कारोबार में प्रवेश किया. 2011 में स्पेन की प्रोसीगोर कंपनी के साथ कैश मैनेजमेंट का करार किया और आज बैंक-एटीएम पर कैश पहुंचाने या लाने के काम में लगी है. उसके बाद 2012 में पेस्ट कंट्रोल की दुनिया की नंबर एक कंपनी टर्मिनिक्स के साथ संयुक्त उपक्रम स्थापित कर एसआइएस ने पेस्ट कंट्रोल के कारोबार में प्रवेश कर लिया.

आज एसआइएस भारतीय मूल की पहली मल्टीनेशनल निजी सुरक्षा एजेंसी बन गई है. जिसका टर्नओवर 4,000 करोड़ रु. का है. भारत में 1,00, 800 स्थायी कर्मचारी हैं, तो ऑस्ट्रेलिया में 4,700. 2002 में कर्मचारियों की संख्या महज 5000 थी. भारत में अब इसकी 231 शाखाएं हैं तो ऑस्ट्रेलिया में आठ. विश्व की 11 वीं और एशिया की दूसरी बड़ी सिक्युरिटी कंपनी के तौर पर स्थापित एसआइएस के सीओओ ऋतुराज को 2012 में फोर्ब्स पत्रिका ने भी प्रमुखता देते हुए “द अपोर्चुनिटी हंटर” कहा था. आम तौर पर पैंट-शर्ट पहनने वाले ऋतुराज कपड़ों के मामलों में आराम को तरजीह देते हैं. जबकि खाने में उन्हें दाल-चावल-आलू की भूजिया-अचार-दही बेहद पसंद है.

निजी संबंधों को तरजीह देने वाले ऋतुराज कारोबार से बचा समय वे अपनी पत्नी पल्लवी, दो बेटियों और बेटा के साथ बिताना पसंद करते हैं. परिवार के साथ वे अन्य निजी संबंधों का ख्याल रखते हैं, इसलिए उनके दोस्तों-शुभचिंतकों की संख्या ज्यादा है. पूरी तरह पेशेवर अंदाज में कंपनी को ऊंचाई तक पहुंचाने वाले ऋतुराज ने कई कारोबार को कंपनी से जोड़कर उसे एसआइएस ग्रुप एंटरप्राइजेज बना दिया है. उनका लक्ष्य कंपनी में 2 लाख लोगों को स्थायी रोजगार देना और खास तौर से अपने गृह प्रदेश बिहार के लिए काम करना चाहते हैं.

कंपनी को एक बड़ा मुकाम दिलाने वाले ऋतुराज फिक्की की सिक्युरिटी सेक्टर कमेटी के को-चेयरमैन हैं. उन्हें हाल ही में ग्लोबल सिक्युरिटी इंडस्ट्रीज के निदेशक मंडल में लिया गया है. वे जेनेवा स्थित 86 साल पुरानी इस संस्था के सबसे युवा और भारतीय मूल के पहले शख्स हैं जिन्हें बोर्ड में शामिल किया गया है.

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