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पंजाब: तबाही के बादल

पंजाब में सिखों और किसानों के बड़े वर्ग में नाराजगी से अकाली दल के पैरों के नीचे से जमीन खिसक रही है.

अपडेटेड 10 नवंबर , 2015
लखनऊ में पिछले 31 अक्तूबर को अखिलेश यादव के मंत्रिमंडल में शामिल किए गए पांच नए मंत्रियों में पूर्व केंद्रीय समाज कल्याण मंत्री बलवंत सिंह रामूवालिया की अप्रत्याशित मौजूदगी पंजाब में सत्ताधारी शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) के लिए तगड़ा झटके की तरह है. ऐसा लगता है कि बस यही कसर बाकी थी. पार्टी के लिए यह बुरे वक्त में एक आफत की तरह आया, जब मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और उनके बेटे तथा उप-मुख्यमंत्री सुखबीर बादल राज्य में तेजी से फैल रहे असंतोष और उपद्रव को थामने के लिए जुटे हुए हैं. रामूवालिया का अकाली दल से जाना भले ही उन्हें पार्टी के भीतर दरकिनार किए जाने से निजी हताशा का नतीजा हो, लेकिन राज्य में पहले से चले आ रहे किसान और धर्मपरायण सिखों के उग्र प्रदर्शनों के बीच इसने आग में घी का काम किया है. इससे बादल की अपने गढ़ में पकड़ अचानक ढीली होने लगी है. 

पंजाब की सड़कों पर पिछले महीने भर से फैला नजारा अस्सी के दशक की वापसी की आहट दे रहा है. नारे लगाते और राजमार्गों को जाम किए हजारों की संख्या में सिख प्रदर्शनकारी, लगातार हो रही हिंसा की छिटपुट घटनाएं, प्रदर्शनों के बीच अचानक उभर आने वाले खालिस्तान के पोस्टर या बैनर, पुलिस और हथियारबंद अर्धसैन्य बलों का फ्लैग मार्च सब कुछ वैसा ही नजर आ रहा है.

राज्य में इस तनाव का सिलसिला 7अक्तूबर को शुरू हुआ जब इस मौसम में कपास की फसल को टिड्डियों से हुए नुक्सान की भरपाई करने में नाकाम रही सरकार के खिलाफ नाराज किसान सड़कों पर उतर आए. आरोप लगाए गए कि नेताओं और भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से कपास उत्पादकों को नकली कीटनाशकों की आपूर्ति की गई थी. धीरे-धीरे किसानों का प्रदर्शन तो थम गया लेकिन यह थोड़ी-सी मोहलत ही साबित हुआ. अचानक 12 अक्तूबर को फरीदकोट जिले के बरगाड़ी गांव में गुरु ग्रंथ साहिब को अपमानित किए जाने की एक खबर फैली और फिर लंबे समय से सुलग रहा असंतोष सड़कों पर उतर आया. सिख पवित्र ग्रंथ को अपमानित किए जाने की घटना को माफ  करने को तैयार नहीं थे.

पंजाब की आबादी में 60 फीसदी हिस्सा रखने वाले सिखों ने नाराजगी में सड़कों का रुख कर लिया. उनका मानना था कि सत्ताधारी शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी की गठबंधन सरकार दोषियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रही है. कई प्रदर्शनकारियों का मानना था कि अकाली नेतृत्व इस घटना और पंजाब के अन्य हिस्सों में घटी दर्जन भर ऐसी ही घटनाओं के लिए जिम्मेदार है. 

नाराजगी भड़काने में अकाल तक्चत के 24 सितंबर के विवादास्पद हुकुमनामे की भी भूमिका थी. इस हुकुमनामे में सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के मुखिया गुरमीत राम रहीम सिंह को 'माफ' कर दिया गया था, जिनके खिलाफ इसी तख्त ने 2007 में ''सामाजिक और धार्मिक बहिष्कार'' का ऐलान किया था. डेरा प्रमुख के खिलाफ यह आरोप लगा था कि उन्होंने सिखों के दसवें गुरु गोबिंद सिंह की नकल करने की कोशिश की थी जिसके चलते उनके खिलाफ  कार्रवाई की गई थी.

राम रहीम को 'माफ' किए जाने का फैसला सिख समुदाय को चौंकाने वाला था, क्योंकि इससे उसकी भावनाएं गहरे आहत हुई थीं. लोगों के बीच यह चर्चा आम थी कि इस हुकुमनामे के पीछे सुखबीर बादल का हाथ है, जो एक 'सौदेबाजी' का हिस्सा है, ताकि 2017 के विधानसभा चुनावों में डेरा का समर्थन पार्टी को मिल सके. जनता के भारी दबाव के चलते अकाल तख्त ने हालांकि डेरा प्रमुख को दी गई माफी 16 अक्तूबर को वापस ले ली.

प्रदर्शनकारियों में कई लोगों को यकीन है कि ग्रंथ साहिब को अपमानित करने की घटनाएं राजनीति से प्रेरित हैं. इस नाराजगी और प्रदर्शनों को अलगाववादी सिख धड़ों की शह भी मिल रही है. इसका नेतृत्व पंथप्रीत सिंह, रंजीत सिंह ढडरियांवाले और दलेर सिंह खेरीवाले जैसे कुछ सिख उपदेशक कर रहे हैं जिन्हें अब तक कोई नहीं जानता था. इन प्रदर्शनों में न सिर्फ बड़े ग्रंथियों और शिरोमणि गुरद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रमुखों को हटाने की मांग की जा रही है बल्कि इनका उद्देश्य बादल परिवार की सत्ता को भी पलटना है. जानकारों का कहना है कि बार-बार प्रदर्शनों के भड़कने से ये संकेत एकदम स्पष्टï हो गए हैं कि अपने शासन के नौवें साल में पहुंच कर शिरोमणि अकाली दल के भीतर नेतृत्व का भारी संकट पैदा हो गया है. 

चंडीगढ़ के इंस्टिट्यूट फॉर डेवलपमेंट ऐंड कम्युनिकेशन में निदेशक और राजनैतिक टिप्पणीकार प्रमोद कुमार इन प्रदर्शनों को लोगों की हताशा का परिणाम बताते हैं. वे कहते हैं कि इसका ज्यादा लेना-देना जनता के बीच बन चुकी उस धारणा से है कि राज्य के सत्ताधारी तबके ने—इस मामले में बादल परिवार और उनके वफादार—राजनैतिक सत्ता से लेकर धन-संपदा और यहां तक कि सिख धार्मिक संस्थानों पर भी कब्जा जमा लिया है. 
प्रमोद कुमार कहते हैं कि सत्ताधारी तबके के प्रति लोगों के अविश्वास ने अब तक हाशिए पर पड़े हुए अलगाववादी और कट्टरपंथी सिख समूहों तथा किसान संगठनों के लिए इस आक्रोश को सरकार के खिलाफ मोडऩा आसान बना दिया है. वे कहते हैं, ''लोग इन समूहों में अपने सरोकार देखते हैं. पंजाब के पूर्व पुलिस प्रमुख केपीएस गिल का भी मानना है कि राज्य में रह-रहकर हो रहे अक्सर हिंसक किस्म के ऐसे उभारों के केंद्र में ''सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक कुप्रबंधन व भ्रष्टाचार'' है. 

गिल कहते हैं कि बादल राज में अकाली दल ने ''कट्टरता को बढ़ाने और आस्था के राजनीतिकरण के वातवरण को जन्म देने'' में योगदान किया है. लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन तथा नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी के पंजाब में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिशों से घबराए अकाली दल नेतृत्व ने कभी अपने बहुप्रचारित ''सुशासन और विकास'' के एजेंडे को छोड़कर धार्मिक कार्ड खेलना शुरू कर दिया. 

इस सिलसिले में अकाली दल ने करीब दर्जन भर आतंकवादियों समेत कैद खालिस्तानी आतंकवादियों जैसे देविंदर पाल सिंह भुल्लर और बलवंत राजोआणा की फांसी की सजा माफ  करने जैसे कट्टर एजेंडे को हथियाने की कोशिश की, जिस पर सवाल भी खूब उठे. चंडीगढ़ को अकेले पंजाब की राजधानी बनाने की मांग दोबारा उठाकर उसने आनंदपुर साहब घोषणापत्र को एक तरीके से जिंदा कर दिया, जिसके बारे में माना जाता है कि वहीं से खालिस्तान आंदोलन की चिनगारी भड़की थी. 

प्रमोद कुमार कहते हैं, ''बादल परिवार ने धार्मिक प्रतीकवाद का सहारा लेकर और कट्टरपंथी समूहों के प्रति नरम रुख अख्तियार करके अपने परंपरागत व धर्मपरायण सिख समर्थकों के साथ दोबारा रिश्ते बनाने की खूब कोशिश की. '' ऐसा लगता है कि उनकी यह पहल गलत रास्ते पर चली गई है. अकाली दल के एक बड़े नेता स्वीकार करते हैं, ''ऐसा पहली बार हुआ है कि सिखों का एक बड़ा तबका पार्टी के खिलाफ  हो गया है. '' उन्हें शक है कि इसका असर 2017 के विधानसभा चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन पर पड़ सकता है. 

इस समूचे दौर में सुखबीर बादल के चेहरे पर हवाइयां उड़ती रही हैं और वे लगातार इस संकट को ''कानून-व्यवस्था से जुड़ी अस्थायी हालत'' करार देते रहे हैं. बादल परिवार इसका सियासी हल ढूंढने की बजाए सतही हस्तक्षेपों के माध्यम से असंतोष को शांत करने की कोशिश में जुटा हुआ है. 
बरगाड़ी में गुरु ग्रंथ साहब से छेड़छाड़ की घटना की जांच मुख्यमंत्री ने 1नवंबर को सीबीआइ को दिए जाने की घोषणा कर दी. इससे पहले डीजीपी सुमेध सैनी को बरखास्त कर दिया गया था और 14 अक्तूबर को फरीदकोट के बहबल कलां गांव में हुई पुलिसिया गोलीबारी में मारे गए दो लोगों के मामले में मुकदमा भी दर्ज किया गया था, लेकिन इससे प्रदर्शनकारियों का गुस्सा शांत नहीं हुआ. 

प्रमोद कुमार चेतावनी देते हैं कि कट्टरपंथी समूहों के खिलाफ स्पष्ट पक्ष लेने में बादल सरकार के संकोच या अक्षमता के चलते उनकी स्थिति और मजबूत हो सकती है और इससे और गहरा ध्रुवीकरण जन्म ले सकता है जिससे 1980 के दशक वाले खालिस्तानी आतंकवाद जैसी स्थितियों को बढ़ावा मिल सकता है. 

इस मामले में 'विदेशी हाथ' होने के संकेत भी साफ  दिख रहे हैं जिससे पता चलता है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आइएसआइ और प्रवासी सिखों के बीच कट्टरपंथी तत्वों द्वारा एक सुनियोजित साजिश रची गई है. चरमपंथी प्रवासी सिखों द्वारा सोशल मीडिया पर जारी सिलसिलेवार विवादास्पद पोस्ट में ऐसे तमाम वीडियो शामिल हैं जिसमें नाराज प्रदर्शनकारी खुलेआम सरकार को गालियां दे रहे हैं, लोगों से सड़क पर उतरने का आह्वान कर रहे हैं या फिर अफवाह फैला रहे हैं. 

इस संकट के दौरान पंजाब बीजेपी के नेता संदिग्ध रूप से लगातार शांत रहे हैं. किसी भी राजनैतिक परिणाम से खुद को दूर रखने के चक्कर में जाहिर तौर पर उन्होंने ऐसा किया होगा, लेकिन 20 अक्तूबर को अपनी बैठक में बीजेपी की कोर कमेटी ने दोषियों के लिए 'असामान्य दंड' का आह्वान करते हुए ''समय पर कार्रवाई न करने में प्रशासन (पढ़ें अकाली नेतृत्व) '' की नाकामी को भी रेखांकित किया.

विपक्षी कांग्रेस और आम आदमी पार्टी हालांकि इस मामले में मुखर हैं. स्थितियों के मद्देनजर कह सकते हैं कि अकाली दल को 2017 के चुनावों में इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बहिष्कार और उन्हें सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूर रखे जाने जैसी घटनाओं के आलोक में कुछ विश्लेषक मानते हैं कि ये हालात ऐतिहासिक परिणामों को जन्म दे सकते हैं और बहुत संभव है कि मुख्यधारा की सिख राजनीति में बादल कुनबे के वर्चस्व का हमेशा के लिए अंत हो जाए.

अकाली दल और खासकर बादल परिवार के खिलाफ सिखों के बड़े वर्ग में फैलता असंतोष और भड़कती नाराजगी राज्य में 2017 के विधानसभा चुनावों में पार्टी के लिए भारी पड़ सकती है.
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