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बीजेपी के टीम पुनर्गठन में शाह ने दिखाया दम

बतौर अध्यक्ष दूसरा कार्यकाल नहीं मिलने की अटकलों पर विराम लगाने की कोशिश करते हुए शाह ने टीम पुनर्गठित कर ऐसे चेहरों को दी जगह जो मोदी-शाह के प्रति समर्पित है.

अपडेटेड 29 जून , 2015

बयान बहुत पुराना नहीं है. नरेंद्र मोदी सरकार के एक साल पूरा होने पर 26 मई को बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह उपलब्धियों का पिटारा थामे मीडिया से रू-ब-रू थे. एक घंटे चली इस प्रेस कॉन्फ्रेंस का आखिरी सवाल था- आपको भी अध्यक्ष बने करीब एक साल हो गए, पर आपकी टीम अधूरी है. खिंचे-खिंचे शाह का जवाब था, “पदाधिकारी पूरे हैं, जितनी जरूरत है, उतने हैं हमारे पास.” लेकिन सवाल है कि तीन हफ्ते बाद ही शाह ने रिक्त पदों को भरते हुए 10 पदाधिकारियों की नई सूची क्यों जारी की? शाह के करीबियों की मानें तो शाह की कार्यशैली का यही अंदाज है. वे कभी अटकलबाजी या दबाव में आकर काम नहीं करते और अगर कभी करना भी पड़े तो उसमें देरी करते हैं, जिससे दबाव में न दिखें. उनकी पहचान मुखर कदम उठाने वालों में से है जो अंदरूनी सियासत को खुद के निर्णयों पर हावी नहीं होने देते.
दरअसल शाह ने टीम पुनर्गठन कर दोहरी रणनीति को अंजाम दिया है. बीजेपी में लगातार ये अटकलें लग रही थीं कि बिहार विधानसभा चुनाव में संभावित विपरीत नतीजे शाह की अध्यक्ष पद पर दोबारा ताजपोशी में बाधक बन सकते हैं. इसलिए वे अपनी टीम का विस्तार नहीं कर रहे और अस्थाई टीम से ही काम चला रहे हैं. लेकिन शाह के एक करीबी नेता का कहना है, “वे जिस रफ्तार से काम कर रहे हैं और पार्टी के विस्तार के लिए नए महत्वाकांक्षी काम हाथ में ले रहे हैं, उसमें कहीं यह आशंका नहीं है कि उन्हें अध्यक्ष पद का दूसरा कार्यकाल नहीं मिलेगा. वे पूरे दमखम के साथ आगे भी अध्यक्ष पद पर रहेंगे.” यही आत्मविश्वास शाह ने अपनी अधूरी टीम को पूरा करते हुए भी जतलाने की कोशिश की है.

वरिष्ठों को साधने की नीति
टीम पुनर्गठन में अमित शाह ने जिस तरह अनजान चेहरों को जगह दी है, उससे वरिष्ठ नेताओं को भी साफ संदेश दिया है कि संगठन में उनकी ही चलेगी. सूत्रों के मुताबिक, गृह मंत्री राजनाथ सिंह नहीं चाहते थे कि उनके रिश्तेदार अरुण सिंह को महासचिव बनाया जाए. लेकिन शाह ने उनकी अनिच्छा के बावजूद अरुण सिंह को महासचिव बनाया. सूत्रों का कहना है कि राजनाथ दो वजहों से अरुण सिंह की नियुक्ति नहीं चाहते थे. पहला&उन पर परिवारवाद का आरोप लगेगा और दूसरा&पार्टी का विरोधी गुट राजनाथ के परिवार के भीतर से ही नया राजपूत नेतृत्व उभारकर भविष्य में उनके खिलाफ चुनौती के तौर पर पेश कर सकता है. खुद राजनाथ ने तीन बार पार्टी अध्यक्ष रहते हुए अरुण सिंह को रिश्तेदार होने की वजह से संगठन में कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी. इसी तरह ओम प्रकाश माथुर भी टीम में उपाध्यक्ष के रूप में शामिल होने के पक्ष में नहीं थे. माथुर अध्यक्ष पद के लिए शाह के साथ दौड़ में थे और वे भी प्रधानमंत्री मोदी के करीबियों में माने जाते हैं. राजस्थान से राष्ट्रीय टीम में कोई प्रतिनिधित्व नहीं था इसलिए माथुर को शामिल किया गया है. लेकिन सूत्रों का कहना है कि माथुर अपनी वरिष्ठता के मुताबिक टीम में जगह चाहते थे और इसके लिए फॉर्मूला दिया गया था कि माथुर को महासचिव बनाकर पार्टी की सर्वोच्च नीति निर्धारक संस्था संसदीय बोर्ड में भी शामिल किया जाए ताकि उनके कद के लिहाज से मुनासिब लगे. आम तौर पर संसदीय बोर्ड में एक महासचिव शामिल होता है जो बोर्ड के सचिव के रूप में काम करता है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा जब शाह की टीम में महासचिव थे तो उनके पास भी यही जिम्मेदारी थी. संसदीय बोर्ड की जिम्मेदारियों में शाह ने फिलहाल कोई फेरबदल नहीं किया है. दलील दी जा रही है कि माथुर पहले भी महासचिव रह चुके हैं और उनका नाम अध्यक्ष पद के लिए चला था इसलिए उन्हें उपाध्यक्ष बनाया गया है. लेकिन यह तथ्य है कि अध्यक्ष पद के लिए नड्डा का नाम भी उछला था, लेकिन मंत्री बनाए जाने से पहले वे टीम शाह में महासचिव थे. उनका कद संसदीय बोर्ड में सचिव बनाकर बढ़ाया गया था.

सबसे अधिक विरोध के सुर मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार में मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को महासचिव बनाए जाने को लेकर उठे. हालांकि उन्हें महासचिव बनाए जाने की चर्चा हरियाणा विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत के बाद ही होने लगी थी क्योंकि उस चुनाव में उन्होंने बतौर प्रभारी अहम भूमिका निभाई थी. इसलिए विजयवर्गीय के बढ़ते कद से मध्य प्रदेश बीजेपी में हलचल लाजिमी थी. सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री चौहान विजयवर्गीय को सरकार में मंत्री बनाए रखने की बात कहकर उन्हें महासचिव बनने से रोकना चाह रहे थे तो दूसरी तरफ लोकसभा स्पीकर और इंदौर से लोकसभा सांसद सुमित्रा महाजन, केंद्रीय इस्पात मंत्री और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर, राज्य के पूर्व प्रभारी और केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्री अनंत कुमार, केंद्रीय सामाजिक न्याय और आधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत सरीखे नेता उनके पक्ष में नहीं थे. लेकिन केंद्रीय सड़क, परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी उनके पक्ष में थे. सूत्रों के मुताबिक, इस मसले पर विरोध की आवाज संघ के सरकार्यवाह भैय्याजी जोशी तक पहुंची और उन्हें इस मामले में दखल देना पड़ा. आखिरी फैसले से पहले शाह ने वित्त मंत्री अरुण जेटली की मौजूदगी में मुख्यमंत्री चौहान के साथ दिल्ली में बैठक की और अपना फैसला सुना दिया. आखिरकार शाह की रणनीति के मुताबिक कैलाश विजयवर्गीय महासचिव बनाए गए.

अमित शाह के निए सिपहसलारअनजान पर युवा लीडरशिप
इसमें कोई संदेह नहीं कि दिल्ली की सियासत में शाह नए हैं. उनकी सांगठनिक क्षमता मुख्य रूप से गुजरात में ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छत्रछाया में आगे बढ़ी है. लेकिन केंद्रीय स्तर पर मोदी-शाह की जोड़ी का कोई अपना गुट नहीं था. इसलिए शाह ने टीम पुनर्गठन में उन्हीं चेहरों को ज्यादा तरजीह दी जो पार्टी में किसी बड़े नेता के गुट विशेष से संबंध नहीं रखते ताकि भविष्य में जरूरत पड़ने पर ये नेता बीजेपी के “नए युग” के साथ खड़े दिखें. शाह की टीम में ही राष्ट्रीय सचिव से उपाध्यक्ष बनाए गए श्याम जाजू कहते हैं, “टीम के लिए जारी 10 नामों की नई सूची में ओम माथुर और मेरे अलावा कोई राष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा पहचान रखने वाला चेहरा नहीं है. अध्यक्ष ने बाकी सभी नए चेहरों को टीम में तरजीह देकर नई पीढ़ी का नेतृत्व उभारने की कोशिश की है क्योंकि इनमें ज्यादातर युवा हैं.”

शाह ने अपनी पहली टीम के गठन के वक्त क्षेत्रीय संतुलन के साथ वरिष्ठता को ध्यान में रखा था और उस वक्त बहुत चौंकाने वाले नाम नहीं थे. लेकिन शाह ने उस टीम में नए और युवा चेहरों को बड़ी जिम्मेदारी देकर अपनी कार्यशैली का संदेश दे दिया था. अमूमन बीजेपी में सचिवों की जिम्मेदारी महासचिवों के साथ सहायक की होती है, लेकिन शाह ने सचिवों को स्वतंत्र रूप से राज्यों का प्रभार सौंप दिया. श्याम जाजू हालांकि वरिष्ठता क्रम में आगे थे, फिर भी वे शाह की टीम में इससे पहले सचिव बन पाए थे. लेकिन देर से ही सही, जाजू को पार्टी ने उपाध्यक्ष बनाया है. वे भी सचिव रहते हुए उत्तराखंड के प्रभारी थे. इसी तरह शाह की टीम में पहली बार सचिव बनाए गए श्रीकांत शर्मा को हिमाचल प्रदेश का प्रभारी बनाया गया जहां शांता कुमार, प्रेम कुमार धूमल, जे.पी. नड्डा सरीखे वरिष्ठ नेता हैं. पश्चिम बंगाल की जिम्मेदारी सचिव सिद्धार्थ नाथ सिंह को तो डॉ. अनिल जैन को हरियाणा, अरुण सिंह को ओडिशा की जिम्मेदारी सौंपी थी. जैन और अरुण सिंह अब पदोन्नत होकर महासचिव बन चुके हैं तो जाजू उपाध्यक्ष.

शाह की रणनीति स्थापित नेताओं की जगह नए चेहरों को बड़ी जिम्मेदारी देकर नया नेतृत्व उभारने की है. उपाध्यक्षों और महासचिवों के अलावा चार नए सचिवों की नियुक्ति में शाह की रणनीति खास तौर से झलकती है. ओडिशा के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके सुरेश पुजारी को सचिव की जिम्मेदारी देने से पहले ही शाह ने उन्हें अप्रैल में संपन्न बीजेपी की बेंगलूरू कार्यकारिणी में नए कार्यकर्ताओं और नेताओं की ट्रेनिंग के लिए बनाई गई विशेष कमेटी का सदस्य बनाया था. जबकि असम के प्रभारी के रूप में काम कर रहे उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ नेता महेंद्र सिंह को भी सचिव बनाया गया है जिनका नाम पार्टी हलकों में यूपी में मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल चेहरों में शुमार किया जाता है. दिल्ली से सांसद महेश गिरि और जम्मू-कश्मीर के पूर्व आइपीएस अधिकारी फारूक खान बेहद तेजी से टीम शाह के सदस्य बनने में सफल हो गए हैं.
भले शाह टीम में काम के हिसाब से जरूरी लोग होने की दलील देकर खाली जगहों को भरने से इनकार करते रहे हों, लेकिन हकीकत यह है कि पदाधिकारियों की कमी की वजह से शाह की सबसे महत्वाकांक्षी महासंपर्क  अभियान की गति पर असर पड़ रहा था. इसलिए टीम गठित होने के बाद शाह ने सभी 10 पदाधिकारियों को महासंपर्क अभियान में झोंक दिया है और उन्हें प्रवास का निर्देश दिया है. एक वरिष्ठ नेता का कहना है, “लोगों की कमी का असर काम पर दिखने लगा था. महासचिव भूपेंद्र यादव के बिहार चुनाव में व्यस्त हो जाने के बाद महज तीन लोगों से यह काम सहज नहीं था, इसलिए शाह ने टीम का विस्तार किया है.”

हालांकि इस टीम पुनर्गठन के बाद भी शाह की टीम में कुछ पद खाली हैं. बीजेपी के संविधान के मुताबिक 13 उपाध्यक्ष, 9 महासचिव, एक संगठन महासचिव, 15 सचिव और एक कोषाध्यक्ष की नियुक्ति की जा सकती है. इसके अलावा संगठन महासचिव के साथ एक से अधिक सहायक जोड़े जा सकते हैं. लेकिन पुनर्गठन के बावजूद टीम में उपाध्यक्ष के तीन और महासचिव का एक पद खाली है. जबकि कोषाध्यक्ष की नियुक्ति न तो शाह ने टीम के गठन के वक्त किया और न ही पुनर्गठन में. फिलहाल केंद्रीय ऊर्जा राज्यमंत्री पीयूष गोयल ही अतिरिक्त प्रभार के रूप में कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं.

बीजेपी के मोदी-शाह युग में प्रवेश के बाद स्थापित नेताओं में कुलबुलाहट तो है लेकिन इससे बेपरवाह होकर काम कर रहे हैं. लेकिन क्या शाह के ये प्रयास उन्हें दूसरा कार्यकाल दिलाने में मददगार होंगी? राजनैतिक परिस्थितियां फिलहाल तो ऐसा इशारा नहीं कर रही.

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