नरेंद्र मोदी कैबिनेट जब 13 मई को बाल श्रम (प्रतिबंध और विनियमन) संशोधन बिल- 2012 को हरी झंडी दिखा रही थी, उससे ठीक एक दिन पहले एक एनजीओ ने राजधानी दिल्ली के दुर्गापुरी इलाके से 40 बाल मजदूरों को मुक्त कराने के लिए छापे की कार्रवाई की. यहां घरों में बच्चे बैग और जूते-चप्पल बनाने का काम कर रहे थे. बच्चों को मुक्त कराया गया, लेकिन महज घंटे भर के भीतर बच्चों के माता-पिता और स्थानीय दबंगों ने मिलकर अफरातफरी का ऐसा माहौल बनाया कि पुलिस की मौजूदगी में भी ज्यादातर बच्चे भाग गए.
यह स्थिति तब है जब बाल मजदूरी प्रतिबंधित है और इसमें मां-बाप से लेकर नियोक्ता पर भी कार्रवाई का प्रावधान है. लेकिन मोदी सरकार जिस संशोधन की दिशा में आगे बढ़ रही है, उसमें न सिर्फ परिवार के कारोबार में बच्चों से काम लेने को कानूनी छूट दी गई है, बल्कि कानून को बेहद नरम किया जा रहा है. हालांकि केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्री बंडारू दत्तात्रेय कहते हैं, “एक तरफ गरीबी है तो दूसरी तरफ सुविधाओं का अभाव, इसलिए हमने माता-पिता को संज्ञेय अपराध की श्रेणी में नहीं लाने का विचार किया है.”
क्यों पड़ी बदलाव की जरूरत
सितंबर 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने बाल मजदूरी को पूरी तरह से प्रतिबंधित करने को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों से पूछा था कि क्यों नहीं ऐसा कदम उठाया जाए. इसके बाद 2012 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने बिल तैयार कर राज्य सभा में पेश किया था. फिर संसद की स्थायी समिति ने इस पर अपनी सिफारिशें दीं, लेकिन यह बिल अंजाम तक नहीं पहुंच सका. अब मोदी सरकार ने उसी बिल में कुछ नए बिंदु जोड़े हैं जिसे संसद के मानसून सत्र में पेश किया जाएगा और बिल पास हुआ तो यह 1986 के कानून की जगह लेगा. पुराने कानून में 14 साल की उम्र तक मजदूरी प्रतिबंधित है, लेकिन सिर्फ 18 व्यवसाय और 65 काम की प्रक्रियाओं में. इसमें नियोक्ता और माता-पिता को सजा का प्रावधान है. लेकिन अब इस कानून को अनिवार्य शिक्षा कानून-2009 के साथ जोड़ा जाएगा. यानी 6 से 14 साल की उम्र तक का बच्चा रोजगार में नहीं जाएगा और अगर अनिवार्य शिक्षा की उम्र में इजाफा होता है तो बाल मजदूरी कानून में भी उम्र की सीमा स्वतः बढ़ जाएगी. पुराना कानून इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन (आइएलओ) के 138वें और 182वें सम्मेलन के मानकों के अनुरूप नहीं था. पहले का कानून 14 साल से आगे की बात नहीं करता था. लेकिन अब किशोरवय (14 से 18 साल) को जोखिम भरे काम से दूर रखा गया है.
मंत्रालय के संयुक्त सचिव धीरज कुमार कहते हैं, “पहले नियोक्ता और माता-पिता के लिए एक तरह की सजा थी. अब माता-पिता के लिए परिवार की परिस्थिति का ध्यान रखा गया है.” उनका कहना है कि बच्चा परिवार में “मदद” करता है तो वह गैर कानूनी नहीं है, लेकिन उसे किसी काम से जोड़ना अपराध माना जाएगा. सरकार ने पहली बार मजदूरी से मुक्त बच्चों के लिए पुनर्वास कोष बनाने की भी व्यवस्था की है.
क्या होगा प्रभाव
इन संशोधनों की जद में सबसे ज्यादा मजबूर परिवार के बच्चे आ सकते हैं. बंधुआ मुक्ति मोर्चा के संस्थापक स्वामी अग्निवेश कहते हैं, “14 साल से कम उम्र के बच्चे का अपना बचपन का अधिकार है. बुनियादी विकास के लिए स्कूल की पढ़ाई के अलावा खेलना-कूदना, सपने बुनना भी हिस्सा होता है. लेकिन इस संशोधन से बच्चों के शोषण का रास्ता खुल जाएगा.” उनका मानना है कि इससे गरीब, पिछड़े, दलित, आदिवासी परिवारों के बच्चे प्रभावित होंगे. इसलिए सामाजिक न्याय का तकाजा है कि ऐसे संशोधन नहीं किए जाएं. वे इसे शिक्षा के मौलिक अधिकारों का हनन भी करार देते हैं. जबकि बचपन बचाओ आंदोलन के कानूनी सलाहकार भुवन रिभू कहते हैं, “यह पूर्ण प्रतिबंध की दिशा में सराहनीय कदम है. हालांकि इसमें और भी बेहतर किया जा सकता था.” उनका मानना है कि मोदी सरकार ने इसमें कुछ नहीं किया है, यह पुराना ही बिल था, जिसे नई सरकार ने नई गति के साथ पेश किया है. लेकिन कामों की सूची बढ़ाई गई तो सरकार को विरोध झेलना पड़ सकता है.
मोदी सरकार ने पूर्ण प्रतिबंध की दिशा में कदम उठाते हुए कुछ सुरक्षात्मक प्रावधान किए हैं ताकि कानून का गलत प्रभाव न पड़े. इन्हीं प्रावधानों में पारिवारिक कारोबार (जोखिम मुक्त) को रखा है. लेकिन सवाल है कि यह कैसे सुनिश्चित होगा कि परिवार में बच्चों का शोषण नहीं होगा. एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि बच्चे-बच्चियों के शोषण में सबसे ज्यादा करीबी लोग ही शामिल होते हैं. जाहिर है, यह बिल भी मोदी सरकार की बड़ी चुनौती होगी.

