जब आम चुनाव 2009 में लगातार दूसरी बार हार के बाद बीजेपी अंदरूनी झंझावातों से जूझते हुए शिमला में चिंतन बैठक करने जा रही थी, तब संघ प्रमुख मोहन भागवत ने पार्टी को नसीहत देते हुए कहा था, "बीजेपी की कमान युवा पीढ़ी को सौंपने की आवश्यकता है. यह सार्वभौमिक सत्य है कि युवा पीढ़ी पुरानी पीढ़ी की जगह लेती है और यह बीजेपी को तय करना है कि क्या बदलाव अगली पीढ़ी तक प्रतीक्षा कर सकता है?" उन्होंने औसत आयु के नेतृत्व की वकालत करते हुए 55 से 60 साल तक की सीमा तय की थी. इस रणनीति का असर संघ-बीजेपी समेत, विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों पर दिखा, लेकिन खुद तीन साल पर नागपुर में होने वाली सर्वोच्च नीति निर्धारक संस्था अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की अहम बैठक में संघ खुद इस नसीहत से पीछे हटा है.
संघ की 'साध्य नीति
दरअसल युवा पीढ़ी को तरजीह नहीं देकर संघ ने मोदी सरकार को साधने की कोशिश की है. सरकार्यवाह पद संघ में मुक' कार्यकारी का होता है और इस बात की पुरजोर चर्चा थी कि सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले को इस बार सरकार्यवाह बनाया जाएगा. लेकिन सरसंघचालक मोहन भागवत ने युवा चेहरे की जगह सरकार्यवाह पद के लिए लगातार तीसरी बार भैय्याजी जोशी की नियुक्ति कर मोदी सरकार से अपने समीकरण के स्पष्ट संकेत दे दिए. संघ के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, "संघ एक मातृ संगठन है और सरकार्यवाह पद पर बदलाव से मोदी सरकार के सामने संघ का कद कमजोर हो सकता था." उम्र और वरिष्ठता के लिहाज से संघ की इस 'साध्य नीति का खास महत्व है. दत्तात्रे' होसबाले की उम्र 59 साल है और वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बेहद करीब माने जाते हैं. अगर उन्हें सरकार्यवाह बनाया जाता तो वरिष्ठता के लिहाज से मोदी के मुकाबले वे जूनियर होते.
संघ के शीर्ष नेताओं की सोच थी कि इस बदलाव से मोदी को संघ पर हावी होने का मौका मिल जाएगा और उसकी बड़े भाई वाली भूमिका खत्म हो जाएगी. इसलिए संघ के कट्टर मोदी विरोधी धड़े ने होसबाले की बजाए 67 वर्षीय भैय्याजी को तरजीह दी जो उम्र में संघ प्रमुख भागवत से भी दो साल बड़े हैं. हालांकि दलील दी गई कि भैय्याजी ने 6 साल में संघ के विस्तार के लिए बेहतर काम किया है और लोकसभा चुनाव में भी संघ ने अहम भूमिका निभाई, इसलिए लड़ाई जीतकर तुरंत जनरल नहीं बदला जाना चाहिए. दिलचस्प बात यह रही कि इस तरह का बयान होसबाले की ओर से प्रतिनिधि सभा की बैठक से ठीक पहले दिलवाया गया. बैठक से पहले होसबाले का नाम ही सरकार्यवाह पद के लिए सुर्खियों में था और सूत्रों के मुताबिक, खुद भागवत ने मीडिया में बदलाव की ऐसी खबरों पर हैरानी भी जताई. संघ की आपसी खींचतान उस वक्त भी उजागर हो गई, जब प्रतिनिधि सभा की बैठक के बाद भैय्याजी मीडिया से रू-ब-रू हुए. उन्होंने होसबाले को लेकर पूछे गए सवालों को टाल दिया तो केंद्र में हुए बदलाव का श्रेय मोदी को देने से परहेज करते रहे. भैय्याजी ने लोकसभा में बीजेपी की बड़ी जीत पर कहा, "जनता परिवर्तन चाहती थी इसलिए केंद्र में परिवर्तन हुआ." लेकिन जब उनसे पूछा गया कि संघ इसे मोदी की जीत मानता है या नहीं, तो इस सवाल पर भैय्याजी के साथ मौजूद अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य उखड़ गए, जो संघ की आपसी खींचतान की वजह से सह सरकार्यवाह नहीं बन पाए.
एक मंदिर, एक कुआं, एक श्मशान
संघ प्रमुख ने प्रतिनिधि सभा में साफ तौर से संदेश दिया कि संगठन के विस्तार के लिए यह सबसे अनुकूल समय है और अगले तीन साल तक विशेष जनजागरण अभियान चलाने की जरूरत है. निश्चित तौर पर केंद्र में बीजेपी की सरकार होने का फायदा संघ अपने विस्तार के लिए उठाना चाहता है. लेकिन संघ को देश भर से मिले फीडबैक से संदेश निकला है कि जातियों में जकड़ा समाज उसके विस्तार में आड़े आ रहा है. बैठक में इसको लेकर झारखंड, आंध्र प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में कराए गए सर्वेक्षणों को भी रखा गया, जिसमें यह आकलन था कि किस तरह जात-पांत संघ के विस्तार में रोड़ा बना हुआ है. इसके लिए संघ ने एक बड़ा एजेंडा सामने रखा है, जिसकी नींव विश्व हिंदू परिषद के स्वर्ण जयंती समारोह के उद्घाटन समारोह के दौरान मुंबई में वीएचपी के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष प्रवीण तोगडिय़ा ने रखी थी. तोगडिय़ा ने विजन-2025 शीर्षक से एक प्रजेंटेशन तैयार किया था और भागवत के सामने रखा था. इसकी कॉपी इंडिया टुडे के पास मौजूद है. इसमें सभी हिंदुओं को अपनी जाति से अलग दूसरी जाति में एक हिंदू पारिवारिक मित्र बनाने, एक साथ भोजन करने, त्योहार मनाने और टूर पर भी एक साथ जाने की सलाह दी गई है. तोगडिय़ा ने अपने प्रजेंटेशन में कहा है कि एक गांव में पानी के लिए सभी हिंदुओं का एक कुआं हो, एक मंदिर हो और एक श्मशान हो. प्रतिनिधि सभा ने इस विजन-2025 को स्वीकार करते हुए संगठन का विस्तार करने की दीर्घकालिक योजना बनाई है. इतना ही नहीं, संघ की योजना के मुताबिक मंदिरों को अब एक छतरी के तहत लाने की खास रणनीति बनाई गई है और यह जिम्मा विश्व हिंदू परिषद को सौंपा गया है ताकि हिंदू समाज को एकजुट रखा जा सके.
लेकिन संघ की शीर्ष बॉडी में अमूमन ब्राह्मण-बनिया हावी रहे हैं और इस संगठन को इसी नजरिए से ही देखा जाता रहा है. लेकिन संभवतया यह पहला मौका है जब संघ ने अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) से आने वाले 65 वर्षीय वी. भागय्या को सह सरकार्यवाह बनाया है. इस नियुक्ति से संघ ने साफ संदेश दिया है कि उसका अभियान जात-पांत से परे है और वह नारा बुलंद कर रहा है—अब जाति छोड़ो, हिंदू बनो. इससे संघ का मकसद शाखाओं की संक्चया बढ़ाना है. हालांकि प्रतिनिधि सभा की बैठक में सरकार्यवाह की ओर से रखी गई रिपोर्ट में संघ का दावा है कि पिछले तीन साल में शाखाओं की संख्या 10, 413 बढ़ी है और अब कुल 55, 010 स्थानों तक वह पहुंच चुकी है. संघ के तीसरे सरसंघचालक बालासाहब देवरस के जन्म शताब्दी वर्ष पर 2015-16 में संघ ने देश में 50 हजार जगहों पर सामाजिक समरसता के विशेष कार्यक्रम चलाने का ऐलान किया है. हालांकि बैठक में स्वयंसेवकों की ओर से संघ में प्रवक्ता पद को फिर से बहाल करने की भी मांग उठी. इसके पीछे दलील दी गई कि जिस तरह से सोशल मीडिया और बाकी माध्यमों का भी प्रभाव बढ़ा है उससे नए-नए मुद्दे सामने आ रहे हैं और कई बार स्वयंसेवकों में भी भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है. इसलिए संघ का रुख स्पष्ट करने के लिए आधिकारिक प्रवक्ता होना चाहिए. भागवत ने इस बारे में पुनर्विचार का भरोसा देश भर से आए 1,400 प्रतिनिधियों को दिया.
यूपी-बिहार में कमजोर बीजेपी
संघ की इस बैठक में स्वयंसेवकों की ओर से जम्मू-कश्मीर में अलगाववादियों की रिहाई के मसले पर सवाल उठाया गया कि जमीनी स्तर पर लोगों को समझाना मुश्किल हो रहा है. सूत्रों के मुताबिक, संघ प्रमुख ने साफ तौर से कहा कि अनुच्छेद 370 का मसला संघ के लिए प्राणवायु रहा है और इससे कोई समझौता नहीं किया जाएगा. सूत्रों के मुताबिक, भागवत ने यहां तक कह दिया, "अगर सरकार विचारधारा से भटक रही है तो संघ को उसे रास्ते पर लाना अच्छी तरह से आता है." संघ ने इस बैठक में बीजेपी को साफ नसीहत दी कि दिल्ली से सबक ले और बिहार-उत्तर प्रदेश में स्थिति ठीक करे. सूत्रों के मुताबिक, संघ ने बीजेपी के साथ बिहार-यूपी को लेकर प्रचारकों की ओर से मिली जमीनी रिपोर्ट को साझा करते हुए बताया है कि बिहार में फिलहाल पार्टी दूसरे नंबर पर जाती दिख रही है तो यूपी में तीसरे नंबर पर.
लेकिन संघ-वीएचपी से जुड़े नेताओं की धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाले बयानों पर भी संघ प्रमुख ने नकेल कसी है. कट्टर बयान देने वाले आनुषंगिक संगठनों को साफ तौर से कहा गया है कि बड़बोला बयान देने की बजाए वे अपने दायरे में रहकर जमीन पर काम करें. संघ को एहसास हो गया है कि राम मंदिर का मुद्दा अब कारगर नहीं रहा. इसलिए प्रतिनिधि सभा में मंथन के बाद सरकार्यवाह भैय्याजी ने कहा, "राम मंदिर जल्द बने, लेकिन यह मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष है, इसलिए इस मुद्दे पर किसी आंदोलन की जरूरत नहीं है." निश्चित तौर पर यह मोदी सरकार के लिए राहत भरी बात है क्योंकि मंदिर मुद्दे पर संघ के आनुषंगिक संगठनों के कई नेता 2019 यानी मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में राम मंदिर बन जाने की बात करते रहे हैं.
जाहिर तौर पर संघ ने मोदी सरकार को राहत दे दी है. लेकिन संघ को एहसास है कि लोकसभा चुनाव में मोदी के नेतृत्व में मिली बड़ी जीत और मोदी के खास अमित शाह के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद बीजेपी के साथ समन्वय के लिए अब सिर्फ सह सरकार्यवाह की बजाए एक टीम बना दी जाए और भैय्याजी जोशी उसकी अगुवाई करें. संघ में शीर्ष स्तर पर कोई बड़ा बदलाव नहीं होने से यह स्पष्ट हो गया है कि कम-से-कम आने वाले तीन साल तक संघ ही मोदी सरकार पर हावी रहने वाला है.

