भारतीय जनता पार्टी की दिल्ली विधानसभा चुनाव में करारी हार के क्या सबक हैं? बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता चेहरे पर मुस्कराहट के साथ कहते हैं, ''जम्मू-कश्मीर में हमारी सरकार बन रही है. फर्क यह आ गया है कि पहले हम अपना मुख्यमंत्री या रोटेशन में मुख्यमंत्री की कुर्सी की शर्त रख रहे थे, लेकिन अब पूरे छह साल के लिए पीडीपी का मुख्यमंत्री होगा और हमारा उप-मुख्यमंत्री.'' वे यह भी जोड़ते हैं कि कश्मीर में बीजेपी के मुकाबले पीडीपी की तीन सीटें ही ज्यादा हैं और यह भी संयोग है कि दिल्ली के चुनाव में पार्टी को 70 में से सिर्फ तीन सीटें ही मिली हैं. यानी वे इशारों में दिल्ली चुनावों के बीजेपी की सियासत पर असर का इजहार कर देते हैं. उनकी बातों से पार्टी नेतृत्व की कार्यशैली के प्रति संगठन में पिछले नौ माह से पनप रहा असंतोष भी झलकता है और व्यंग्य में यह कहने की कोशिश है कि पार्टी के विजय रथ में नेतृत्व से बड़ी भूमिका कार्यकर्ताओं की होती है जिसे नजरअंदाज करने का हश्र दिल्ली में दिखा. हालांकि जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाकर बीजेपी हताशा के माहौल से उबर राष्ट्रीय स्तर पर संदेश देना चाहती है.
हालांकि दिल्ली चुनाव के बाद बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व को एहसास हो गया है कि कॉर्पोरेट शैली में संगठन को नहीं चलाया जा सकता. लेकिन अब पार्टी का बड़ा लक्ष्य बिहार है और संघ भी किसी सूरत में इस मौके को गंवाना नहीं चाहता. इसलिए दिल्ली की हार से सबक लेकर प्रदेश इकाई को साफ निर्देश दिया गया है कि किसी भी बाहरी को पार्टी में शामिल करते वक्त टिकटों का भरोसा न दिया जाए. इतना ही नहीं, दिल्ली की हार के बाद ही बीजेपी ने जेडी (यू) में तोड़-फोड़ की बजाए नीतीश कुमार की सरकार बनने में ज्यादा अड़चनें नहीं डालीं. शाह के एक करीबी नेता कहते हैं, ''अब कार्यकर्ताओं को बोलने का मौका मिल गया है जो अभी तक चुप थे.'' लेकिन संगठन की कार्यशैली में किस तरह का बदलाव लाया जाए, इस बारे में कोई ठोस फैसला दिल्ली की हार की रिपोर्ट पर होली के बाद नागपुर में होने वाली संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक के बाद ही लिया जाएगा.
हार पर मंथन
दरअसल दिल्ली की हार ने पार्टी और संघ परिवार को आत्मचिंतन पर मजबूर कर दिया है. संघ ने रिपोर्ट तलब कर बीजेपी की मुश्किलें बढ़ा दीं. हार की समीक्षा के लिए बीजेपी ने केंद्रीय स्तर पर अभी कोई औपचारिक बैठक नहीं की है. दिल्ली बीजेपी से हार की रिपोर्ट मांगने की बजाए राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने संगठन महासचिव रामलाल से रिपोर्ट बनाने को कहा है. रामलाल ने इस कड़ी में प्रदेश बीजेपी के प्रभारी प्रभात झा, प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय और संबंधित क्षेत्र के सांसदों के साथ सात बैठकें पूरी कर ली हैं. प्रदेश इकाई में गुटबाजी को देखते हुए बड़ी सर्जरी की संभावना जताई जा रही है, नतीजों के बाद दिल्ली बीजेपी के नेताओं के चेहरों पर चिंता की लकीरें देखकर केंद्र की ओर से चुनाव में भूमिका निभाने वाले एक वरिष्ठ नेता ने ढाढस बंधाया, ''कार्यकर्ताओं को ज्यादा चिंता नहीं करनी चाहिए. इस चुनाव के नतीजों ने सबके मुंह पर कालिख पोत दी है और कोई किसी को कुछ कहने की स्थिति में नहीं है.'' इस वरिष्ठ नेता का इशारा साफ था कि दिल्ली में चुनाव में प्रदेश इकाई को कहीं भरोसे में नहीं लिया गया. हालांकि प्रदेश बीजेपी के प्रभारी प्रभात झा चुनावी मंथन पर कुछ भी कहने से इनकार करते हैं. वे कहते हैं, ''मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि हम देश का मूड भांप गए थे, लेकिन दिल्ली का मूड नहीं भांप पाए.'' प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय दार्शनिक अंदाज में कहते हैं, ''जब तूफान आता है तो सब उखड़ जाता है. अभी तो हम उसे समेटने में ही लगे हैं.'' हालांकि हार की वजहों में विधानसभा चुनाव से ठीक माह भर पहले जिले से लेकर मंडल स्तर तक की कमेटियों को बदलने का फैसला भी माना जा रहा है क्योंकि इससे पुरानी टीम नाराज हो गई.
संघ की पाठशाला
दिल्ली की हार में संघ को लपेटे जाने से संघ के कई नेता आहत थे. इसलिए चुनाव नतीजों के तीसरे दिन खुद सरसंघचालक मोहन भागवत ने सरकार्यवाह भैय्या जी जोशी समेत तीनों सह सरकार्यवाह के साथ बैठक की तो अगले दिन भैय्या जी, बीजेपी के साथ समन्वयक की भूमिका निभा रहे सह सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल और सुरेश सोनी ने बीजेपी महासचिव रामलाल, राम माधव और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा के साथ बैठक की. सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक में भैय्या जी ने दो-टूक पूछ लिया, ''यह संगठन की हार है या सरकार की.'' इस बैठक में संघ ने बीजेपी नेताओं की जमकर क्लास ली. बीजेपी नेताओं से पूछा गया कि सदस्यता अभियान पर पार्टी ने इतना जोर दिया है और वह 5-6 करोड़ सदस्य बना लिए जाने का दावा कर रही है, लेकिन बड़ी पार्टी बनकर क्या लाभ जब वोट ही नहीं मिले. सूत्रों के मुताबिक, इस नेता ने कहा कि बीजेपी की सदस्य संख्या तो ऐसे बढ़ रही है जैसे कोई पहलवान रोजाना अपनी दंड बैठक का आंकड़ा बढ़ा रहा हो. संघ परिवार के सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी ने आखिरी वक्त में बाजी हाथ से निकलते देख वोटिंग से तीन दिन पहले संघ से बूथ प्रबंधन के लिए मदद मांगी थी और इससे यह संदेश गया कि संघ की ताकत झोंके जाने के बावजूद बीजेपी बुरी तरह हारी. संघ नेताओं की दलील थी कि बीजेपी अपनी आंतरिक कलह में संघ को न लाए.
रणनीति पर बना रहा असमंजस
बीजेपी को हार की कोई एक बड़ी वजह नहीं मिली है. लेकिन सूत्रों के मुताबिक, संगठन महासचिव रामलाल की रिपोर्ट में बहुत से ऐसे तथ्य उभरकर आएं हैं जो सीधे केंद्रीय नेतृत्व को कठघरे में खड़ा करते हैं. हालांकि अभी यह तय नहीं है कि पार्टी यह रिपोर्ट जस की तस संघ को सौंपेगी या नहीं. यह तो लगभग सभी मान रहे हैं कि चुनाव के लिए केंद्र, प्रदेश और संघ के स्तर पर बन रही रणनीतियों में कोई तालमेल नहीं था. फिर, 200 सांसदों को उतारने और बाहर के कार्यकर्ताओं-नेताओं को लगाने की रणनीति भी नाकाम रही. बाहर से आने वाले ज्यादातर लोग स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ बॉस जैसा व्यवहार करने लगे. टिकट बंटवारे में भी आम आदमी पार्टी से नकारे गए चेहरों को तरजीह दी गई.
दिल्ली के सांसदों की राय को तवज्जो नहीं दी गई. प्रवेश वर्मा अपने करीबी को टिकट नहीं दिलवा पाए. रमेश विधूड़ी के भतीजे विक्रम विधूड़ी को टिकट मिल गया, लेकिन विधूड़ी चाहते थे कि महरौली सीट से सरिता चौधरी को टिकट न मिले इसलिए उन्होंने वहां से प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय का नाम उछाला. इसी तरह सांसद मनोज तिवारी भी बुराड़ी सीट से अपने सांसद प्रतिनिधि के लिए टिकट मांग रहे थे, उदित राज भी अपने भतीजे के लिए टिकट चाह रहे थे, जबकि सांसद मीनाक्षी लेखी तो केजरीवाल के मुकाबले नुपूर शर्मा को टिकट दिए जाने के खिलाफ थीं. कृष्णानगर से हर्षवर्धन अपने बेटे को टिकट दिलाना चाहते थे. सांसद महेश गिरि ने अपना चुनाव प्रबंधन संभालने वाले हुकुम सिंह को कोंडली से टिकट दिला दिया.
इसके अलावा दिल्ली की आबादी के बदले समीकरण पर भी ध्यान नहीं दिया गया. आम आदमी पार्टी ने 14 पूर्वांचलियों को टिकट दिया और सभी जीतकर आए, लेकिन बीजेपी ने सीटों की बजाए पूर्वांचल का कोटा तय करके टिकट दिया. किरण बेदी को लाने में भी स्थानीय नेताओं को भरोसे में नहीं लिया गया. हर्षवर्धन जैसे वरिष्ठ नेता को भी कृष्णानगर सीट से बेदी को चुनाव लड़ाने की फोन पर जानकारी दी गई.
प्रचार में बीजेपी की सबसे बड़ी भूल कांग्रेस को मुकाबले से बाहर रखकर पूरी रणनीति आप को घेरने के हिसाब से बनाना रही. इससे कांग्रेस के सारे वोट केजरीवाल की ओर मुड़ गए. हार की रिपोर्ट में मुस्तफाबाद, विश्वासनगर जैसे सीटों का जिक्र है जहां कांग्रेस ने अधिक वोट हासिल किए तो बीजेपी की जीत हुई. सूत्रों के मुताबिक, मोदी के 10 लाख वाले सूट का भी गलत संदेश गया और प्रधानमंत्री ने जिस भाषा शैली में केजरीवाल को नक्सली, अराजकतावादी कहा, वह भी लोगों को बुरा लगा. पार्टी ने प्रचार सामग्री में उपद्रवी गोत्र, अण्णा के फोटो पर माला आदि के जरिए रही-सही कसर पूरी कर दी. दिल्ली बीजेपी में यह जुमला खूब चल रहा है कि मोदी और शाह की निरंकुश कार्यशैली से खफा कार्यकर्ताओं ने मिलकर दिल्ली में जवाब दिया.
दिल्ली शिकस्त का 'राष्ट्रीय सबक'
दिल्ली विधानसभा चुनाव की हार का असर बीजेपी की सियासत पर खुलकर दिखने लगा. संघ के तेवरों से कार्यशैली में फेरबदल के आसार.

अपडेटेड 2 मार्च , 2015
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