कहते हैं कि जैसा जीवन होता है, वैसी ही कला होती है, लेकिन रसिपुरम कृष्णास्वामी लक्ष्मण के मामले में ऐसा नहीं था. देश का यह सर्वाधिक प्रतिष्ठित कार्टूनिस्ट अपनी वास्तविक जिंदगी में उतना मजाकिया नहीं था. वे सामान्यत: गंभीर रहते थे, अक्सर निराश रहते और कभी-कभार तो अप्रिय भी हो जाते थे. यह बात अलग है कि जैसे ही उनके हाथ में स्केच पेन आता, वे एक ऐसे जीनियस में तब्दील हो जाते जो हर परिस्थिति में हास, परिहास और व्यंग्य खोज निकालने की अद्भुत सामर्थ्य रखता था. उन्होंने इस नेमत को 50 साल से भी ज्यादा समय तक इस देश के साथ साझा किया: टाइम्स ऑफ इंडिया में लक्ष्मण का पॉकेट कार्टून ‘‘यू सेड इट’’ और उसका स्थायी पात्र ‘‘कॉमन मैन’’ अखबारी पत्रकारिता के चिरस्थायी प्रतीक बन गए.
मैंने अपनी पेशेवर जिंदगी के शुरुआती छह बरस लक्ष्मण के साथ वाली केबिन में बिताए हैं. वे अपनी ट्रेडमार्क सफेद शर्ट और काली पैंट में सवेरे ठीक नौ बजे दफ्तर पहुंच जाते, तमाम अखबार पलटते, संपादकीय विभाग की बैठक में मौजूद रहते और उसके बाद अपनी बनाई छोटी-सी दुनिया में कहीं गुम हो जाते थे. वह खबरों की एक ऐसी दुनिया थी जिसमें हर ओर पाखंड और सनक का बोलबाला था: मसलन, कोई पुल फिर से टूट कर इसलिए गिर गया क्योंकि नगर निगम के अधिकारियों ने रिश्वत ली थी या फिर कोई नेता भ्रष्टाचार के खिलाफ भड़काऊ भाषण देते हुए अपनी मेज के नीचे नकदी जमा करता जा रहा था. संपादक गंभीर मुद्दों पर सैद्घांतिक बहस करना चाहते थे जिस पर लक्ष्मण सिर्फ मुंह दाब कर हौले से मुस्करा देते थे.
उनका हर कार्टून कला का एक नमूना होता था. ‘‘मेरे लिए हर दिन नया दिन है. मैं हर कार्टून पर उतना ही बेचैन होता हूं जैसे कि वह मेरा पहला कार्टून हो.’’ उन्होंने जब यह कहा तो लगा कि जैसे अपनी औसत से लंबी उम्र का हवाला दे रहे हों. संगीत में लता मंगेशकर या क्रिकेट में सचिन तेंडुलकर की तरह सिर्फ अपने काम में टिकाऊपन ने यह तय कर दिया था कि लक्ष्मण अपने समकालीनों से काफी ऊपर थे.
मैंने उनसे एक बार पूछा था कि अपने ‘कॉमन मैन’ की खोज उन्होंने कैसे की? वे बोले,‘‘मैंने नहीं खोजा, उसने मुझे पा लिया.’’ लक्ष्मण का पात्र: कोट और धोती पहने बूढ़ा चश्माधारी शख्स खामोश बहुसंख्यक जनता का चिरस्थायी प्रतिनिधि बना. इन कार्टूनों ने अनाम लोगों को पहचान दी. जब वह कॉमनमैन भ्रष्टाचार या लालफीताशाही से दो-चार होता, तब उसके चेहरे पर आने वाला हैरत का भाव दरअसल कानून का पालन करने वाले एक आम नागरिक की निस्सहायता और दर्द को दर्शाता था.
जब वे नेताओं के चेहरे नहीं बना रहे होते तो कौवे बनाते थे. आम आदमी की तरह कौवा भी आम पक्षी था. इसके बावजूद लक्ष्मण की कूची से निकलकर इस कौवे की मौजूदगी ऐसी चुंबकीय हो जाती कि आपको यह मानने पर मजबूर कर देती थी कि उसकी काली चोंच किसी पंख खोले हुए मोर से कम खूबसूरत नहीं है. अपने भाई महान लेखक आर. के. नारायण की ही तरह उनके भीतर भी एक सहजता थी और दोनों ही अपनी-अपनी विधाओं में इस सहजता को एक विशिष्ट आकर्षण से भर देते थे.
लक्ष्मण के कार्टून हास्यपूर्ण थे लेकिन वे कभी भी आहत नहीं करते थे. उन्होंने एक बार मुझसे कहा था,‘‘स्केच पेन मेरा दोस्त है, हथियार नहीं.’’ यही वजह है कि राजनैतिक बिरादरी के भीतर कोई भी उनका शत्रु नहीं था. मसलन, हर बार जब वे शरद पवार का कार्टून बनाते, तो पवार उसे अपने संग्रह में जोड़ने के लिए उनसे एक प्रति मंगवाते थे. इंदिरा गांधी भले ही उनसे कथित तौर पर इसलिए नाराज रहीं क्योंकि लक्ष्मण अपने कार्टून में उनकी नाक लंबी बनाते थे (तानाशाही का एक प्रतीक) लेकिन इंदिरा ने कभी भी उन पर प्रतिबंध नहीं लगाया. लक्ष्मण के सबसे यादगार कार्टूनों में एक इंदिरा गांधी पर ही है जिसमें 1977 का आम चुनाव हारने के बाद वे एक फ्रेम में युवा संजय गांधी को टहला रही हैं और सूरज डूब रहा है.
शिवसेना के प्रमुख बाल ठाकरे उनके समकालीन थे. एक किस्सा यह है कि दोनों ने 1950 के दशक के आरंभ में टाइम्स ऑफ इंडिया में कार्टूनिस्ट की नौकरी के लिए आवेदन किया था. लक्ष्मण को नौकरी मिल गई और कहते हैं कि इसी घटना ने स्थानीय लोगों और ‘बाहरियों’ के बीच रोजगार प्रतिस्पर्धा के एजेंडे के बीज शिवसेना में बोए. सच यह है कि ठाकरे के मन में लक्ष्मण के प्रति बहुत आदरभाव था. बालासाहब ने उनसे अपनी दोस्ती के बारे में कहा था, ‘‘हम लोग एक कार्टूनिस्ट क्लब हैं!’’
लक्ष्मण के पसंदीदा नेता शायद मोरारजी देसाई थे. एक बार लक्ष्मण ने एक साक्षात्कार में इसकी वजह बताई थी, ‘‘क्योंकि वे हमेशा ऐसे वक्तव्य देते थे जो एक कार्टूनिस्ट के लिए बहुत काम के होते, जैसे लोगों को पीना नहीं चाहिए, देर तक सोना नहीं चाहिए और धूम्रपान नहीं करना चाहिए.’’ जब भी कोई नेता नैतिक शिक्षा देने लगता है, उसकी पोल खोलने का काम एक कार्टूनिस्ट से बेहतर कोई नहीं कर सकता. वे कहते थे, ‘‘अगर राजनैतिक भ्रष्टाचार और झूठ नहीं होते, तो किसी आर. के. लक्ष्मण की जरूरत नहीं होती.’’ चार दशकों तक वे पारखी निगाह से देश के नेताओं को देखते रहे और काली कलम से उन्हें उकेरते रहे. नेताओं को तो उनकी कमी महसूस होगी ही, आम आदमी को भी उनकी बहुत याद आएगी.
राजदीप सरदेसाई टीवी टुडे के सलाहकार संपादक हैं और 2014: दि इलेक्शन दैट चेंज्ड इंडिया नाम की किताब के लेखक हैं
मैंने अपनी पेशेवर जिंदगी के शुरुआती छह बरस लक्ष्मण के साथ वाली केबिन में बिताए हैं. वे अपनी ट्रेडमार्क सफेद शर्ट और काली पैंट में सवेरे ठीक नौ बजे दफ्तर पहुंच जाते, तमाम अखबार पलटते, संपादकीय विभाग की बैठक में मौजूद रहते और उसके बाद अपनी बनाई छोटी-सी दुनिया में कहीं गुम हो जाते थे. वह खबरों की एक ऐसी दुनिया थी जिसमें हर ओर पाखंड और सनक का बोलबाला था: मसलन, कोई पुल फिर से टूट कर इसलिए गिर गया क्योंकि नगर निगम के अधिकारियों ने रिश्वत ली थी या फिर कोई नेता भ्रष्टाचार के खिलाफ भड़काऊ भाषण देते हुए अपनी मेज के नीचे नकदी जमा करता जा रहा था. संपादक गंभीर मुद्दों पर सैद्घांतिक बहस करना चाहते थे जिस पर लक्ष्मण सिर्फ मुंह दाब कर हौले से मुस्करा देते थे.
उनका हर कार्टून कला का एक नमूना होता था. ‘‘मेरे लिए हर दिन नया दिन है. मैं हर कार्टून पर उतना ही बेचैन होता हूं जैसे कि वह मेरा पहला कार्टून हो.’’ उन्होंने जब यह कहा तो लगा कि जैसे अपनी औसत से लंबी उम्र का हवाला दे रहे हों. संगीत में लता मंगेशकर या क्रिकेट में सचिन तेंडुलकर की तरह सिर्फ अपने काम में टिकाऊपन ने यह तय कर दिया था कि लक्ष्मण अपने समकालीनों से काफी ऊपर थे.
मैंने उनसे एक बार पूछा था कि अपने ‘कॉमन मैन’ की खोज उन्होंने कैसे की? वे बोले,‘‘मैंने नहीं खोजा, उसने मुझे पा लिया.’’ लक्ष्मण का पात्र: कोट और धोती पहने बूढ़ा चश्माधारी शख्स खामोश बहुसंख्यक जनता का चिरस्थायी प्रतिनिधि बना. इन कार्टूनों ने अनाम लोगों को पहचान दी. जब वह कॉमनमैन भ्रष्टाचार या लालफीताशाही से दो-चार होता, तब उसके चेहरे पर आने वाला हैरत का भाव दरअसल कानून का पालन करने वाले एक आम नागरिक की निस्सहायता और दर्द को दर्शाता था.
जब वे नेताओं के चेहरे नहीं बना रहे होते तो कौवे बनाते थे. आम आदमी की तरह कौवा भी आम पक्षी था. इसके बावजूद लक्ष्मण की कूची से निकलकर इस कौवे की मौजूदगी ऐसी चुंबकीय हो जाती कि आपको यह मानने पर मजबूर कर देती थी कि उसकी काली चोंच किसी पंख खोले हुए मोर से कम खूबसूरत नहीं है. अपने भाई महान लेखक आर. के. नारायण की ही तरह उनके भीतर भी एक सहजता थी और दोनों ही अपनी-अपनी विधाओं में इस सहजता को एक विशिष्ट आकर्षण से भर देते थे.
लक्ष्मण के कार्टून हास्यपूर्ण थे लेकिन वे कभी भी आहत नहीं करते थे. उन्होंने एक बार मुझसे कहा था,‘‘स्केच पेन मेरा दोस्त है, हथियार नहीं.’’ यही वजह है कि राजनैतिक बिरादरी के भीतर कोई भी उनका शत्रु नहीं था. मसलन, हर बार जब वे शरद पवार का कार्टून बनाते, तो पवार उसे अपने संग्रह में जोड़ने के लिए उनसे एक प्रति मंगवाते थे. इंदिरा गांधी भले ही उनसे कथित तौर पर इसलिए नाराज रहीं क्योंकि लक्ष्मण अपने कार्टून में उनकी नाक लंबी बनाते थे (तानाशाही का एक प्रतीक) लेकिन इंदिरा ने कभी भी उन पर प्रतिबंध नहीं लगाया. लक्ष्मण के सबसे यादगार कार्टूनों में एक इंदिरा गांधी पर ही है जिसमें 1977 का आम चुनाव हारने के बाद वे एक फ्रेम में युवा संजय गांधी को टहला रही हैं और सूरज डूब रहा है.
शिवसेना के प्रमुख बाल ठाकरे उनके समकालीन थे. एक किस्सा यह है कि दोनों ने 1950 के दशक के आरंभ में टाइम्स ऑफ इंडिया में कार्टूनिस्ट की नौकरी के लिए आवेदन किया था. लक्ष्मण को नौकरी मिल गई और कहते हैं कि इसी घटना ने स्थानीय लोगों और ‘बाहरियों’ के बीच रोजगार प्रतिस्पर्धा के एजेंडे के बीज शिवसेना में बोए. सच यह है कि ठाकरे के मन में लक्ष्मण के प्रति बहुत आदरभाव था. बालासाहब ने उनसे अपनी दोस्ती के बारे में कहा था, ‘‘हम लोग एक कार्टूनिस्ट क्लब हैं!’’
लक्ष्मण के पसंदीदा नेता शायद मोरारजी देसाई थे. एक बार लक्ष्मण ने एक साक्षात्कार में इसकी वजह बताई थी, ‘‘क्योंकि वे हमेशा ऐसे वक्तव्य देते थे जो एक कार्टूनिस्ट के लिए बहुत काम के होते, जैसे लोगों को पीना नहीं चाहिए, देर तक सोना नहीं चाहिए और धूम्रपान नहीं करना चाहिए.’’ जब भी कोई नेता नैतिक शिक्षा देने लगता है, उसकी पोल खोलने का काम एक कार्टूनिस्ट से बेहतर कोई नहीं कर सकता. वे कहते थे, ‘‘अगर राजनैतिक भ्रष्टाचार और झूठ नहीं होते, तो किसी आर. के. लक्ष्मण की जरूरत नहीं होती.’’ चार दशकों तक वे पारखी निगाह से देश के नेताओं को देखते रहे और काली कलम से उन्हें उकेरते रहे. नेताओं को तो उनकी कमी महसूस होगी ही, आम आदमी को भी उनकी बहुत याद आएगी.
राजदीप सरदेसाई टीवी टुडे के सलाहकार संपादक हैं और 2014: दि इलेक्शन दैट चेंज्ड इंडिया नाम की किताब के लेखक हैं

