अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अक्सर ‘‘बराक और मैं’’ कहते हुए सुना गया. इसकी भी एक छोटी-सी कहानी है. नवंबर में ब्रिस्बेन में हुए जी-20 शिखर सम्मेलन में ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री टोनी ऐबट ने यह राय दी कि सभी नेता एक-दूसरे को उनके पहले नाम से पुकारें. उन्होंने अपने साथी विश्व नेताओं से ब्रिस्बेन में ही इसे आजमाने की गुजारिश करते हुए एक छोटा-सा ऐलान किया. वही पहले नेता थे, जिन्होंने नरेंद्र मोदी को ‘‘नरेंद्र’’ कहने की शुरुआत की. विचार मोदी को खूब जंचा और वे व्लादिमिर, डेविड, टोनी, और जाहिर तौर पर चीनी राष्ट्रपति को भी जिनपिंग कहने लगे.
साफ तौर पर मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ फोन पर बातचीत करते हुए भी यह प्रथा जारी रखी. एक वक्त तो ऐसा आया, जब अमेरिकी अफसरों ने अपने भारतीय समकक्षों से पूछा कि ओबामा के लिए ‘‘नरेंद्र’’ का उच्चारण थोड़ा मुश्किल हो सकता है, फिर भी क्या मोदी अपने पहले नाम से ही पुकारा जाना पसंद करेंगे. सर्वानुमति इस बात पर बनी कि केवल ‘‘मोदी’’ कहने से भी काम चल जाएगा.
अमेरिका के लिए यह कई मायनों में बिल्कुल अलग भारतीय प्रधानमंत्री थे-बेशक विद्वान और मृदुभाषी मनमोहन सिंह या राजनेता किस्म के अटल बिहारी वाजपेयी दोनों से बिल्कुल अलग. मनमोहन सिंह ने मुश्किल से ही कभी अपनी तरफ से अमेरिकी राष्ट्रपति को फोन किया था. इससे उलट, ब्रिस्बेन और नै पई तॉ में हुई दो बार की बातचीत के अलावा, यात्रा की तैयारियों और नतीजों की व्यग्रता के लिए मोदी ने ओबामा को अपनी ओर से दो बार फोन मिलाया. उन्होंने गणतंत्र दिवस परेड के लिए ‘‘नारी शक्ति’’ थीम चुनने से लेकर ओबामा के साथ ‘‘मन की बात’’ रेडियो कार्यक्रम करने तक इस यात्रा की एक-एक योजना बड़ी मेहनत से तैयार की.
अगर और सबूतों की जरूरत हो, तो वे ओबामा की 52 घंटे की यात्रा के संपन्न होने पर सामने आए नतीजों में देखे जा सकते हैः परमाणु जवाबदेही के मसले पर छह साल से चला आ रहा गतिरोध टूट गया, प्रतिरक्षा संबंध ज्यादा मजबूत जमीन पर टिके हैं, जलवायु परिवर्तन की अड़चनों को फिलहाल टाल दिया गया है और यह भी कम बड़ी बात नहीं है, एशिया के भू-रणनीतिक दृष्टिकोण को लेकर विचारों में समानता आई है. जो लोग यह सोचते थे कि भारत की गणतंत्र दिवस परेड में ओबामा का मुख्य अतिथि होना ही एक किस्म का तख्तापलट है, उन्हें चौंकाने के लिए मोदी और ओबामा की झोली में और भी बहुत कुछ था. दोनों नेताओं ने अपने देशों के संबंधों में नाटकीय बदलाव की पटकथा लिख दी. एक ऐसी पटकथा, जो अमली जामा पहनने के लिए दोनों पक्षों के हुनर का इम्तिहान लेगी और अगर वे कामयाब हो गए, तो मोदी को अपने चुनावी वादे पूरे करने में अच्छी-खासी मदद करेगी.
इस कायापलट के बीज हालांकि महीनों पहले तभी रोप दिए गए थे, जब चुनावों में जीत हासिल करने के फौरन बाद मोदी ने अमेरिका के प्रति गर्मजोशी दिखाई थी. उन्होंने न्यूयॉर्क और वाशिंगटन की अपनी यात्रा से अपने इरादों की दोटूक झलक दे दी थी. सबसे पहला सवाल विश्व व्यापार संगठन से जुड़ा गतिरोध सुलझाने का था. मोदी ने जुलाई में अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी से कह दिया था कि अगर अमेरिका कृषि सब्सिडी पर भारत को कुछ छूट देता है, तो वे व्यापार सुविधा समझौते के रास्ते में नहीं आएंगे. इसी से बातचीत का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह दोनों देशों को स्वीकार्य समझौते तक पहुंचा.
इसी तरह, ओबामा ने जब बीते सितंबर में दोनों की पहली बातचीत में प्राथमिकता दिए जाने वाले विषयों के तौर पर परमाणु जवाबदेही का मुद्दा और प्रतिरक्षा सहयोग में ढीलेपन (खास तौर पर प्रतिरक्षा व्यापार और प्रौद्योगिकी पहल) का मसला उठाया, तो मोदी ने अपनी न्यूनतम मांग बगैर किसी लाग-लपेट के उनके सामने रख दी. उन्होंने ओबामा से कहा कि भारत हरेक उद्योग या क्षेत्र में बेहतरीन परिपाटियों के साथ चलना चाहता है और यही बात परमाणु ऊर्जा के मामले में भी लागू होती है. लेकिन भारत सिविल परमाणु क्षति जवाबदेही कानून (सीएनएलडीए) 2010 में संशोधन नहीं कर पाएगा. मोदी ने साफ कर दिया कि वह परमाणु जवाबदेही को तय करने वाली वैश्विक व्यवस्था-परमाणु क्षति के लिए विएना अनुपूरक क्षतिपूर्ति सम्मेलन (सीएससी) के अनुरूप समाधान खोजने के लिए तैयार हैं.
जवाबदेही की गांठ सुलझी
लगता है, अमेरिकी ढंग की सौदेबाजी मोदी को बड़ी रास आती है. अगर उनकी पहले से तय शर्तों का सम्मान किया जाए तो वे चार कदम आगे बढऩे के लिए तैयार रहते हैं. वाशिंगटन को इससे निराशा भी होती थी. वे कहते थे कि मनमोहन सिंह की सरकार तो अहम वादों खासकर परमाणु करार पर हमेशा ढुलमुल रहती थी. लिहाजा जब भारत ने परमाणु दुर्घटना होने की स्थिति में आपूतिकर्ता को जवावदेह बनाने का अधिकार परमाणु संयंत्र के ऑपरेटर (संचालक) को दे दिया, तो वाशिंगटन ने भारतीय संयंत्रों में अमेरिकी परमाणु सामग्री की निगरानी की मांग उठा दी. यह द्विपक्षीय सुरक्षा-उपायों के बराबर था, जिसका भारत-अमेरिकी परमाणु करार में कोई जिक्र नहीं था. इससे भी बदतर बात यह कि जापान ने भी, मानो अमेरिकी इशारे पर, ठीक यही मांग की थी, जिसकी वजह से पिछले साल मोदी की टोक्यो यात्रा से पहले एक समझौता होने की संभावना को ग्रहण लग गया था.
हल निकालने का पहला तकाजा यह था कि सभी साझेदारों को एक संपर्क समूह में लाया जाए. इसमें दो अमेरिकी कंपनियोंकृजीई और वेस्टिंगहाउस के प्रतिनिधि थे. भारत की तरफ से इसमें विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के साथ कानून मंत्रालय, भारतीय परमाणु ऊर्जा निगम लिमिटेड (एनपीसीआइएल) और परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) के अधिकारियों को रखा गया. समूह की बातचीत में हुए समझौते की अहम बातें एक्सक्लूसिव तौर पर केवल इंडिया टुडे को देखने को मिली हैः
आपूर्तिकर्ता की जवावदेही
(अनुच्छेद 17बी)
भारत ने एक जोखिम प्रबंधन प्रस्ताव रखा, जो डीएई के और जनरल इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन के नेतृत्व में सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियों के तैयार जोखिम की संभावना के आकलन पर आधारित था. यह बताया गया कि किसी भी स्थिति में सप्लायर (आपूर्तिकर्ता) की जवाबदेही ऑपरेटर की जवाबदेही से ज्यादा नहीं हो सकती, जो खुद कानून में ही 1,500 करोड़ रु. आंकी गई है. एनपीसीआइएल ऑपरेटर के तौर पर अधिकतम प्रीमियम का भुगतान करेगी, जो पूरी परियोजना के लिए प्रति वर्ष 90 करोड़ रु. के बराबर है. दूसरे स्तर पर जीई या वेस्टिंगहाउस सरीखे परमाणु भट्टी सप्लायरों के लिए यह धनराशि 1 करोड़ से 3 करोड़ रु. के बीच आती है.
सप्लायर की परिभाषा
इस बात पर रजामंदी कायम हुई कि सप्लायर और फैब्रिकेटर के बीच फर्क किया जाएगा. जब ऑपरेटर निश्चित डिजाइन, इस्तेमाल की गई सामग्री और सभी जरूरी तकनीकी ब्योरों के साथ ऑर्डर देता है, तो उस ऑर्डर को पूरा करने वाली कंपनी को सप्लायर नहीं, बल्कि फैब्रिकेटर माना जाएगा. इस तरह परिभाषा से ही फैब्रिकेटर कानून के तहत जवाबदेह नहीं माना जाएगा. विशेषज्ञों का कहना है कि एनपीसीआइएल के ज्यादातर ठेके इसी श्रेणी में आएंगे.
दूसरे कानूनों के तहत मुकदमा
(अनुच्छेद 46)
इस अनुच्छेद में साफ तौर पर लिखा है कि यह कानून ऑपरेटर को किसी भी दूसरे कानून के तहत मुकदमे का सामना करने से रोकता नहीं है. वहीं अमेरिकी कंपनियों को चिंता थी कि इसकी व्याख्या करते हुए इसे सप्लायर पर भी लागू किया जा सकता है. इस पर, सबूत सामने रखे गए कि कानून के इस अनुच्छेद में ‘‘सप्लायर’’ शब्द को जोडऩे के लिए संसद में संशोधन पेश किया गया था, लेकिन उसे नामंजूर कर दिया गया और भारतीय अदालतें किसी भी कानून की व्याख्या करते हुए संसद के इस तथ्य को ध्यान में रखती हैं. ठीक इसी मोड़ पर लिखित सहमति के तौर पर भारतीय कानूनी व्याख्याओं को दर्ज करने वाले एक आश्वासन स्मरणपत्र (मेमोरेंडम ऑफ एश्योरेंस) का विचार सामने आया. स्मरणपत्र में कुछ बुनियादी आश्वासन होंगेः
कानून की प्रस्तावना में साफ तौर पर कहा गया है कि कानून ‘‘ऑपरेटर के कंधों पर जवाबदेही डालते हुए त्रुटिहीन जवाबदेही व्यवस्था’’ कायम करने की चेष्टा करता है. यह सप्लायर का जिक्र नहीं करता. भारतीय कानून मंत्रालय ने उदाहरणों के साथ दिखाया कि किसी भी कानून के पीछे की भावना की व्याख्या करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी अधिनियम की प्रस्तावना को कितनी महत्ता दी है. उन्होंने कहा कि यही वह बात है, जिसकी वजह से अनुच्छेद 46 की व्याख्या करते हुए इसमें सप्लायर को शामिल नहीं किया जाएगा. ये उदाहरण स्मरणपत्र का एक हिस्सा होंगे.
स्मरणपत्र के दूसरे हिस्से में ऐसे उदाहरणों और आदेशों का संग्रह है जिनमें सुप्रीम कोर्ट ने फैसले दिए हैं कि अगर किसी एक विषय से संबंधित एक निश्चित कानून मौजूद हो तो उसे किसी भी दूसरे व्यापक या सामान्य कानून के ऊपर तरजीह दी जाएगी.
तीसरा आश्वासन भी अदालती आदेशों और उदाहरणों की शक्ल में ही है, जो भरोसा दिलाता है कि अगर किसी भी पक्ष के हितों को चोट पहुंचती हो, तो कानून को पिछले प्रभाव से लागू नहीं किया जाएगा. यह इन अमेरिकी चिंताओं को दूर करने के लिए किया गया कि अतीत में हुई किसी भी दुघर्टना के लिए इस कानून की दुहाई दी जा सकती है.
सरकारी सूत्र कहते हैं कि कानून की किसी निश्चित व्याख्या के लिहाज से इन आश्वासनों की कोई कानूनी वैधता नहीं है, लेकिन भविष्य में अपनी दलील को मजबूत बनाने के लिए कोई कंपनी इसे अदालत में पेश कर सकती है. इसी के साथ, अमेरिकी प्रशासन ने अपनी मंजूरी दे दी और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आइएईए) से डाटा हासिल करने पर राजी होकर आखिरकार परमाणु सामग्री की निगरानी की जिद भी छोड़ दी. अलबत्ता सरकारों ने तो मसले को हल कर लिया है, लेकिन इस पर अमल करने वाली तुनुकमिजाज अमेरिकी कंपनियों को भी इसे मानने के लिए राजी करना होगा. यह पुल पार करना अभी बाकी है.
परमाणु जवाबदेही समाधान का चौतरफा असर होगा, क्योंकि अमेरिका भारत को चार टेक्नोलॉजी नियंत्रण व्यवस्थाओं की सदस्यता दिलवाने की प्रक्रिया को तेज करने के लिए राजी हो गया है. ये चार टेक्नोलॉजी नियंत्रण व्यवस्थाएं हैं-न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप, मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (एमटीसीआर), वास्सेनार अरेंजमेंट्स और ऑस्ट्रेलिया ग्रुप. पता चला है कि एमटीसीआर की सदस्यता के लिए भारत मार्च में ही अर्जी लगा देगा.
परमाणु करार से आगे
एक संजीदा सवाल जो ओबामा ने पूछा, वह पाकिस्तान के बारे में था. ‘‘चाय पे चर्चा’’ के दौरान उन्होंने मोदी से कहा कि वे पाकिस्तान के बारे में उनका रुख समझना चाहते हैं. महीने भर पहले विदेश मंत्री जॉन केरी जब वाइब्रेंट गुजरात शिखर सम्मेलन के मौके पर मोदी से मिले थे, तब उन्होंने भी पाकिस्तान के साथ बातचीत दोबारा शुरू करने के बारे में पूछा था. बताया जाता है कि इस पूछताछ से प्रधानमंत्री कुछ असहज हो गए थे और उन्होंने केरी से कहा था कि दोनों पड़ोसी देश एक दूसरे को इतनी अच्छी तरह जानते हैं कि उन्हें पता है क्या करना है.
ओबामा ने हालांकि यह सवाल अलग तरीके से सामने रखा. बताया जाता है कि प्रधानमंत्री ने उनसे कहा कि अमेरिका को इसे भारत-पाक मुद्दे के तौर पर नहीं देखना चाहिए. मोदी के मुताबिक, समस्या खुद पाकिस्तान है; उन्होंने अपने अमेरिकी मेहमान को बताया कि पेशावर के स्कूल पर आतंकी हमले के बाद उन्होंने इस्लामाबाद की तरफ हाथ बढ़ाने की कोशिश की थी और वह एक अच्छा मौका था, लेकिन उसके फौरन बाद 26/11 के सरगना जकी-उर-रहमान लखवी को जमानत देने की नौटंकी के साथ ही पाकिस्तान ने उस पर पानी फेर दिया. चाय पर ज्यादातर बातचीत पाकिस्तान और वहां से संचालित आतंकी गतिविधियों से निबटने को लेकर ही हुई.
कई मायनों में ये खुली और दोटूक चर्चाएं थीं. ओबामा ने कहा कि गणतंत्र दिवस पर पहली बार मुख्य अतिथि के तौर पर एक अमेरिकी राष्ट्रपति को आमंत्रित करने के मोदी के फैसले को उन्होंने सराहा था. अमेरिकी राष्ट्रपति ने दिल्ली से वापसी उड़ान भरने से चंद घंटे पहले अपने आखिरी भाषण में जब धर्म की स्वतंत्रता का सवाल उठाया, तो भारतीय खेमे में किसी ने शिकायत नहीं की. वैसे अच्छी खबर यही है कि दोनों साथ-साथ कदमताल कर रहे हैं. और यह भविष्य की आशाओं के लिए काफी है.
साफ तौर पर मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ फोन पर बातचीत करते हुए भी यह प्रथा जारी रखी. एक वक्त तो ऐसा आया, जब अमेरिकी अफसरों ने अपने भारतीय समकक्षों से पूछा कि ओबामा के लिए ‘‘नरेंद्र’’ का उच्चारण थोड़ा मुश्किल हो सकता है, फिर भी क्या मोदी अपने पहले नाम से ही पुकारा जाना पसंद करेंगे. सर्वानुमति इस बात पर बनी कि केवल ‘‘मोदी’’ कहने से भी काम चल जाएगा.
अमेरिका के लिए यह कई मायनों में बिल्कुल अलग भारतीय प्रधानमंत्री थे-बेशक विद्वान और मृदुभाषी मनमोहन सिंह या राजनेता किस्म के अटल बिहारी वाजपेयी दोनों से बिल्कुल अलग. मनमोहन सिंह ने मुश्किल से ही कभी अपनी तरफ से अमेरिकी राष्ट्रपति को फोन किया था. इससे उलट, ब्रिस्बेन और नै पई तॉ में हुई दो बार की बातचीत के अलावा, यात्रा की तैयारियों और नतीजों की व्यग्रता के लिए मोदी ने ओबामा को अपनी ओर से दो बार फोन मिलाया. उन्होंने गणतंत्र दिवस परेड के लिए ‘‘नारी शक्ति’’ थीम चुनने से लेकर ओबामा के साथ ‘‘मन की बात’’ रेडियो कार्यक्रम करने तक इस यात्रा की एक-एक योजना बड़ी मेहनत से तैयार की.
अगर और सबूतों की जरूरत हो, तो वे ओबामा की 52 घंटे की यात्रा के संपन्न होने पर सामने आए नतीजों में देखे जा सकते हैः परमाणु जवाबदेही के मसले पर छह साल से चला आ रहा गतिरोध टूट गया, प्रतिरक्षा संबंध ज्यादा मजबूत जमीन पर टिके हैं, जलवायु परिवर्तन की अड़चनों को फिलहाल टाल दिया गया है और यह भी कम बड़ी बात नहीं है, एशिया के भू-रणनीतिक दृष्टिकोण को लेकर विचारों में समानता आई है. जो लोग यह सोचते थे कि भारत की गणतंत्र दिवस परेड में ओबामा का मुख्य अतिथि होना ही एक किस्म का तख्तापलट है, उन्हें चौंकाने के लिए मोदी और ओबामा की झोली में और भी बहुत कुछ था. दोनों नेताओं ने अपने देशों के संबंधों में नाटकीय बदलाव की पटकथा लिख दी. एक ऐसी पटकथा, जो अमली जामा पहनने के लिए दोनों पक्षों के हुनर का इम्तिहान लेगी और अगर वे कामयाब हो गए, तो मोदी को अपने चुनावी वादे पूरे करने में अच्छी-खासी मदद करेगी.
इस कायापलट के बीज हालांकि महीनों पहले तभी रोप दिए गए थे, जब चुनावों में जीत हासिल करने के फौरन बाद मोदी ने अमेरिका के प्रति गर्मजोशी दिखाई थी. उन्होंने न्यूयॉर्क और वाशिंगटन की अपनी यात्रा से अपने इरादों की दोटूक झलक दे दी थी. सबसे पहला सवाल विश्व व्यापार संगठन से जुड़ा गतिरोध सुलझाने का था. मोदी ने जुलाई में अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी से कह दिया था कि अगर अमेरिका कृषि सब्सिडी पर भारत को कुछ छूट देता है, तो वे व्यापार सुविधा समझौते के रास्ते में नहीं आएंगे. इसी से बातचीत का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह दोनों देशों को स्वीकार्य समझौते तक पहुंचा.
इसी तरह, ओबामा ने जब बीते सितंबर में दोनों की पहली बातचीत में प्राथमिकता दिए जाने वाले विषयों के तौर पर परमाणु जवाबदेही का मुद्दा और प्रतिरक्षा सहयोग में ढीलेपन (खास तौर पर प्रतिरक्षा व्यापार और प्रौद्योगिकी पहल) का मसला उठाया, तो मोदी ने अपनी न्यूनतम मांग बगैर किसी लाग-लपेट के उनके सामने रख दी. उन्होंने ओबामा से कहा कि भारत हरेक उद्योग या क्षेत्र में बेहतरीन परिपाटियों के साथ चलना चाहता है और यही बात परमाणु ऊर्जा के मामले में भी लागू होती है. लेकिन भारत सिविल परमाणु क्षति जवाबदेही कानून (सीएनएलडीए) 2010 में संशोधन नहीं कर पाएगा. मोदी ने साफ कर दिया कि वह परमाणु जवाबदेही को तय करने वाली वैश्विक व्यवस्था-परमाणु क्षति के लिए विएना अनुपूरक क्षतिपूर्ति सम्मेलन (सीएससी) के अनुरूप समाधान खोजने के लिए तैयार हैं.
जवाबदेही की गांठ सुलझी
लगता है, अमेरिकी ढंग की सौदेबाजी मोदी को बड़ी रास आती है. अगर उनकी पहले से तय शर्तों का सम्मान किया जाए तो वे चार कदम आगे बढऩे के लिए तैयार रहते हैं. वाशिंगटन को इससे निराशा भी होती थी. वे कहते थे कि मनमोहन सिंह की सरकार तो अहम वादों खासकर परमाणु करार पर हमेशा ढुलमुल रहती थी. लिहाजा जब भारत ने परमाणु दुर्घटना होने की स्थिति में आपूतिकर्ता को जवावदेह बनाने का अधिकार परमाणु संयंत्र के ऑपरेटर (संचालक) को दे दिया, तो वाशिंगटन ने भारतीय संयंत्रों में अमेरिकी परमाणु सामग्री की निगरानी की मांग उठा दी. यह द्विपक्षीय सुरक्षा-उपायों के बराबर था, जिसका भारत-अमेरिकी परमाणु करार में कोई जिक्र नहीं था. इससे भी बदतर बात यह कि जापान ने भी, मानो अमेरिकी इशारे पर, ठीक यही मांग की थी, जिसकी वजह से पिछले साल मोदी की टोक्यो यात्रा से पहले एक समझौता होने की संभावना को ग्रहण लग गया था.
हल निकालने का पहला तकाजा यह था कि सभी साझेदारों को एक संपर्क समूह में लाया जाए. इसमें दो अमेरिकी कंपनियोंकृजीई और वेस्टिंगहाउस के प्रतिनिधि थे. भारत की तरफ से इसमें विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के साथ कानून मंत्रालय, भारतीय परमाणु ऊर्जा निगम लिमिटेड (एनपीसीआइएल) और परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) के अधिकारियों को रखा गया. समूह की बातचीत में हुए समझौते की अहम बातें एक्सक्लूसिव तौर पर केवल इंडिया टुडे को देखने को मिली हैः
आपूर्तिकर्ता की जवावदेही
(अनुच्छेद 17बी)
भारत ने एक जोखिम प्रबंधन प्रस्ताव रखा, जो डीएई के और जनरल इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन के नेतृत्व में सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियों के तैयार जोखिम की संभावना के आकलन पर आधारित था. यह बताया गया कि किसी भी स्थिति में सप्लायर (आपूर्तिकर्ता) की जवाबदेही ऑपरेटर की जवाबदेही से ज्यादा नहीं हो सकती, जो खुद कानून में ही 1,500 करोड़ रु. आंकी गई है. एनपीसीआइएल ऑपरेटर के तौर पर अधिकतम प्रीमियम का भुगतान करेगी, जो पूरी परियोजना के लिए प्रति वर्ष 90 करोड़ रु. के बराबर है. दूसरे स्तर पर जीई या वेस्टिंगहाउस सरीखे परमाणु भट्टी सप्लायरों के लिए यह धनराशि 1 करोड़ से 3 करोड़ रु. के बीच आती है.
सप्लायर की परिभाषा
इस बात पर रजामंदी कायम हुई कि सप्लायर और फैब्रिकेटर के बीच फर्क किया जाएगा. जब ऑपरेटर निश्चित डिजाइन, इस्तेमाल की गई सामग्री और सभी जरूरी तकनीकी ब्योरों के साथ ऑर्डर देता है, तो उस ऑर्डर को पूरा करने वाली कंपनी को सप्लायर नहीं, बल्कि फैब्रिकेटर माना जाएगा. इस तरह परिभाषा से ही फैब्रिकेटर कानून के तहत जवाबदेह नहीं माना जाएगा. विशेषज्ञों का कहना है कि एनपीसीआइएल के ज्यादातर ठेके इसी श्रेणी में आएंगे.
दूसरे कानूनों के तहत मुकदमा
(अनुच्छेद 46)
इस अनुच्छेद में साफ तौर पर लिखा है कि यह कानून ऑपरेटर को किसी भी दूसरे कानून के तहत मुकदमे का सामना करने से रोकता नहीं है. वहीं अमेरिकी कंपनियों को चिंता थी कि इसकी व्याख्या करते हुए इसे सप्लायर पर भी लागू किया जा सकता है. इस पर, सबूत सामने रखे गए कि कानून के इस अनुच्छेद में ‘‘सप्लायर’’ शब्द को जोडऩे के लिए संसद में संशोधन पेश किया गया था, लेकिन उसे नामंजूर कर दिया गया और भारतीय अदालतें किसी भी कानून की व्याख्या करते हुए संसद के इस तथ्य को ध्यान में रखती हैं. ठीक इसी मोड़ पर लिखित सहमति के तौर पर भारतीय कानूनी व्याख्याओं को दर्ज करने वाले एक आश्वासन स्मरणपत्र (मेमोरेंडम ऑफ एश्योरेंस) का विचार सामने आया. स्मरणपत्र में कुछ बुनियादी आश्वासन होंगेः
कानून की प्रस्तावना में साफ तौर पर कहा गया है कि कानून ‘‘ऑपरेटर के कंधों पर जवाबदेही डालते हुए त्रुटिहीन जवाबदेही व्यवस्था’’ कायम करने की चेष्टा करता है. यह सप्लायर का जिक्र नहीं करता. भारतीय कानून मंत्रालय ने उदाहरणों के साथ दिखाया कि किसी भी कानून के पीछे की भावना की व्याख्या करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी अधिनियम की प्रस्तावना को कितनी महत्ता दी है. उन्होंने कहा कि यही वह बात है, जिसकी वजह से अनुच्छेद 46 की व्याख्या करते हुए इसमें सप्लायर को शामिल नहीं किया जाएगा. ये उदाहरण स्मरणपत्र का एक हिस्सा होंगे.
स्मरणपत्र के दूसरे हिस्से में ऐसे उदाहरणों और आदेशों का संग्रह है जिनमें सुप्रीम कोर्ट ने फैसले दिए हैं कि अगर किसी एक विषय से संबंधित एक निश्चित कानून मौजूद हो तो उसे किसी भी दूसरे व्यापक या सामान्य कानून के ऊपर तरजीह दी जाएगी.
तीसरा आश्वासन भी अदालती आदेशों और उदाहरणों की शक्ल में ही है, जो भरोसा दिलाता है कि अगर किसी भी पक्ष के हितों को चोट पहुंचती हो, तो कानून को पिछले प्रभाव से लागू नहीं किया जाएगा. यह इन अमेरिकी चिंताओं को दूर करने के लिए किया गया कि अतीत में हुई किसी भी दुघर्टना के लिए इस कानून की दुहाई दी जा सकती है.
सरकारी सूत्र कहते हैं कि कानून की किसी निश्चित व्याख्या के लिहाज से इन आश्वासनों की कोई कानूनी वैधता नहीं है, लेकिन भविष्य में अपनी दलील को मजबूत बनाने के लिए कोई कंपनी इसे अदालत में पेश कर सकती है. इसी के साथ, अमेरिकी प्रशासन ने अपनी मंजूरी दे दी और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आइएईए) से डाटा हासिल करने पर राजी होकर आखिरकार परमाणु सामग्री की निगरानी की जिद भी छोड़ दी. अलबत्ता सरकारों ने तो मसले को हल कर लिया है, लेकिन इस पर अमल करने वाली तुनुकमिजाज अमेरिकी कंपनियों को भी इसे मानने के लिए राजी करना होगा. यह पुल पार करना अभी बाकी है.
परमाणु जवाबदेही समाधान का चौतरफा असर होगा, क्योंकि अमेरिका भारत को चार टेक्नोलॉजी नियंत्रण व्यवस्थाओं की सदस्यता दिलवाने की प्रक्रिया को तेज करने के लिए राजी हो गया है. ये चार टेक्नोलॉजी नियंत्रण व्यवस्थाएं हैं-न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप, मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (एमटीसीआर), वास्सेनार अरेंजमेंट्स और ऑस्ट्रेलिया ग्रुप. पता चला है कि एमटीसीआर की सदस्यता के लिए भारत मार्च में ही अर्जी लगा देगा.
परमाणु करार से आगे
एक संजीदा सवाल जो ओबामा ने पूछा, वह पाकिस्तान के बारे में था. ‘‘चाय पे चर्चा’’ के दौरान उन्होंने मोदी से कहा कि वे पाकिस्तान के बारे में उनका रुख समझना चाहते हैं. महीने भर पहले विदेश मंत्री जॉन केरी जब वाइब्रेंट गुजरात शिखर सम्मेलन के मौके पर मोदी से मिले थे, तब उन्होंने भी पाकिस्तान के साथ बातचीत दोबारा शुरू करने के बारे में पूछा था. बताया जाता है कि इस पूछताछ से प्रधानमंत्री कुछ असहज हो गए थे और उन्होंने केरी से कहा था कि दोनों पड़ोसी देश एक दूसरे को इतनी अच्छी तरह जानते हैं कि उन्हें पता है क्या करना है.
ओबामा ने हालांकि यह सवाल अलग तरीके से सामने रखा. बताया जाता है कि प्रधानमंत्री ने उनसे कहा कि अमेरिका को इसे भारत-पाक मुद्दे के तौर पर नहीं देखना चाहिए. मोदी के मुताबिक, समस्या खुद पाकिस्तान है; उन्होंने अपने अमेरिकी मेहमान को बताया कि पेशावर के स्कूल पर आतंकी हमले के बाद उन्होंने इस्लामाबाद की तरफ हाथ बढ़ाने की कोशिश की थी और वह एक अच्छा मौका था, लेकिन उसके फौरन बाद 26/11 के सरगना जकी-उर-रहमान लखवी को जमानत देने की नौटंकी के साथ ही पाकिस्तान ने उस पर पानी फेर दिया. चाय पर ज्यादातर बातचीत पाकिस्तान और वहां से संचालित आतंकी गतिविधियों से निबटने को लेकर ही हुई.
कई मायनों में ये खुली और दोटूक चर्चाएं थीं. ओबामा ने कहा कि गणतंत्र दिवस पर पहली बार मुख्य अतिथि के तौर पर एक अमेरिकी राष्ट्रपति को आमंत्रित करने के मोदी के फैसले को उन्होंने सराहा था. अमेरिकी राष्ट्रपति ने दिल्ली से वापसी उड़ान भरने से चंद घंटे पहले अपने आखिरी भाषण में जब धर्म की स्वतंत्रता का सवाल उठाया, तो भारतीय खेमे में किसी ने शिकायत नहीं की. वैसे अच्छी खबर यही है कि दोनों साथ-साथ कदमताल कर रहे हैं. और यह भविष्य की आशाओं के लिए काफी है.

