भारत और पाकिस्तान की समुद्री सीमाओं पर एक रहस्यमयी नौका देखी गई. इस पर चार लोग सवार थे. कहा जाता है कि उन्होंने पकड़े जाने के डर से नाव को आग के हवाले कर दिया. इशारों में बताया गया कि 31 दिसंबर को गुजरात की ओर बढ़ रही इस नाव को बीच रास्ते में रोककर 26/11 के मुंबई हमले जैसी बड़ी घटना से देश को बचा लिया गया है. इस बात को उस वक्त और बल मिला, जब 5 जनवरी को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर ने जोर देकर कहा कि नाव पर आतंकवादी सवार थे. उनका कहना था कि सुरक्षा बलों ने ‘सही वक्त’ पर सही काम किया.
तटरक्षक बल के अधिकारी कहते हैं कि यह घटना 26/11 के बाद तटीय सुरक्षा को लेकर उनकी नई मुस्तैदी को जायज ठहराती है. नौसेना और तटरक्षक बल की निगरानी टीमों ने पिछले साल भारतीय समुद्र तटों पर सुरक्षा के प्रति संभावित खतरों को सूंघते हुए 45,000 से ज्यादा नावों और जलपोतों को रोककर उनकी तलाशी ली. एक तटरक्षक अफसर ने इंडिया टुडे से कहा, “हमने खुफिया सूचनाओं का पीछा करते हुए सफल ऑपरेशन की अपनी काबिलियत दिखा दी है. हमारे एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन के सीमांतों पर हम बहुत फुर्ती से संदिग्ध निशानों का पीछा कर सकते हैं और उन्हें पकड़ सकते हैं.”
असल में इस ऑपरेशन की जड़ में है 26 नवंबर, 2008 की शाम मुंबई हमले को अंजाम देने से लश्कर-ए-तय्यबा (विभिन्न एजेंसियों की ओर से) को रोक पाने की नाकाम कोशिश. उस वक्त कम-से-कम 26 चेतावनियां जारी की गई थीं कि आतंकवादी भारत की वित्तीय राजधानी में होटलों सहित कई स्थानों को निशाना बना सकते हैं. इनमें एक चेतावनी बेहद अहम थी, जो 10 हमलावरों के मुंबई से काफी दूर होने पर ही जारी कर दी गई थी. इस पर ध्यान दिया जाता तो जघन्य हमले को रोका जा सकता था.
19 नवंबर, 2008 को इंटेलिजेंस ब्यूरो (आइबी) ने भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल को पूरे एक पन्ने की चेतावनी भेजी थी. इस पर ‘टॉप सीक्रेट, मोस्ट इमीडिएट’ (बेहद गोपनीय, तुरंत ध्यानार्थ) की मुहर लगी थी और आइबी के एक संयुक्त निदेशक के दस्तखत थे. रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग (रॉ) के एक संदेश में लश्कर की एक संदिग्ध नौका के बारे में संकेत दिया गया था कि वह ठीक-ठीक किस स्थान पर होगीः उत्तर में 24 डिग्री 16” 36” और पूर्व में 67 डिग्री 0“ 04” पर. रॉ की इस चेतावनी में कहा गया था कि श्नाव घुसपैठ की कोशिश कर रही थी”. इसमें ‘घुसपैठ को रोकने के लिए जरूरी कार्रवाई’ की सलाह दी गई थी. यह लश्कर की मछली पकडऩे वाली नाव अल-हुसैनी थी, जो चार दिन बाद 23 नवंबर को हथियारों से लैस 10 आतंकी सवारों के साथ अपने मिशन पर निकल पड़ी.
न्यूयॉर्क टाइम्स, प्रोपब्लिका और फ्रंटलाइन पीबीएस की 21 दिसंबर, 2014 की एक पड़ताल में एनएसए के कर्मचारी एडवर्ड स्नोडेन के लीक किए गए वर्गीकृत दस्तावेजों के हवाले से बताया गया है कि मुंबई हमले के लिए लश्कर की तैयारी के बारे में ब्रिटिश और अमेरिकी जासूसी एजेंसियों के पास ढेरों सूचनाएं थीं, लेकिन वे उनका ठीक-ठीक मतलब समझ्ने में नाकाम रहीं. उन्होंने भारत की आतंक-निरोधी जांच एजेंसियों को भेजी गई 18 नवंबर, 2008 की सीआइए की एक रिपोर्ट का जिक्र किया है, जिसमें मुंबई पर लश्कर हमले के खतरे से जुड़ी एक पाकिस्तानी नाव के एक निश्चित स्थान पर होने के बारे में बताया गया था.
आइबी की 19 नवंबर की चेतावनी संभवतः सीआइए की इसी रिपोर्ट पर आधारित थी. तटरक्षक बलों ने लश्कर की इस संदिग्ध नाव को खोजने के लिए 19 और 23 नवंबर के बीच गुजरात के समुद्र तट पर डोर्नियर विमानों से खोजी उड़ानें भरी थीं और चार गश्ती नौकाएं तथा एक हॉवरक्राफ्ट भी समुद्र में उतारा था. उन्होंने पश्चिमी समुद्र तट पर 276 नावों को रोककर उनकी तलाशी ली थी, लेकिन जाहिरा तौर पर वे एक भारतीय नौका एमवी कुबेर को पकडऩे में नाकाम रहे, जिस पर सवार होकर आतंकवादी मुंबई में कहर बरपाने निकले थे. कई गुजारिशों के बाद भी आइबी ने तटरक्षक बल को लश्कर की इस नाव के बारे में आगे की सूचनाएं नहीं दीं.
तटरक्षक बल ने जहां फुर्ती से कार्रवाई की, वहीं नौसेना ने उदासीनता बरती. 2 दिसंबर, 2008 को एडमिरल सुरीश मेहता ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि नौसेना को मिली खुफिया चेतावनियां ‘कार्रवाई करने लायक नहीं’ थीं. नौसेना के खुफिया अफसर कहते हैं कि आइबी की चेतावनी में जो जगह बताई गई थी, वह कराची बंदरगाह से महज 30 समुद्री मील दूर थी और पाकिस्तान की समुद्री सीमा के भीतर थी. अहम बात यह है कि नौसेना ने इस चेतावनी पर ‘एनएफए’ (नो एक्शन रिक्वायर्ड) या ‘कार्रवाई की जरूरत नहीं’ की मुहर लगाई और उसे आगे की कार्रवाई के लिए मुंबई स्थित पश्चिमी नौसैनिक कमान को नहीं भेजा. यह भीषण भूल थी क्योंकि उस वक्त पश्चिमी बेड़े के 30 से ज्यादा युद्धपोत ‘गुजरात की प्रतिरक्षा’ के तहत अभ्यास के लिए समुद्र में ही थे.
छह साल बाद एक दूसरी ही कहानी सामने आई. 31 दिसंबर को सुबह 7.30 बजे नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (एनटीआरओ) का एक अलर्ट मिलने के दो घंटे के भीतर ही तटरक्षक बल का एक डोर्नियर गश्ती विमान पोरबंदर हवाई अड्डे से रवाना हो गया. अलर्ट में समुद्र के भीतर एक ‘वस्तु’ के होने का जिक्र किया गया था, जो पाकिस्तानी सेना और समुद्री सुरक्षा एजेंसी के साथ संपर्क में थी. चार और डोर्नियर विमानों ने भी पोरबंदर हवाई अड्डे से दोपहर 12 बजे, शाम 4 बजे, शाम 7 बजे और रात 10 बजे एक के बाद एक उड़ानें भरीं, ताकि एक विमान हमेशा नाव का पीछा करता रहे. रात 10.30 बजे तटरक्षक बल की गश्ती नौका सीजीएस राजरतन ने संदिग्ध नाव को घेर लिया. 600 मीटर की सुरक्षित दूरी से 20 फुट लंबी राजरतन के पीछा करने और रुकने के लिए कहने पर नाव बदहवास भागने लगी. यह पीछा मध्यरात्रि के बाद 3 बजे खत्म हुआ, जब वह नाव आग की तेज लपटों से घिरी दिखाई दी. तटरक्षक बल के अफसर कहते हैं कि नाव पर सवार लोगों ने खुद ही अपने को आग लगा ली. माना जाता है कि नाव पर सवार कम-से-कम दो लोग पानी में कूद गए और डूबकर मर गए. बाकी दो आग से जलकर मर गए. 4 दिसंबर को अलस्सुबह 4 बजे पोरबंदर से पश्चिम में तकरीबन 365 किमी दूर नाव के डूबने के साथ ही आग की लपटों का दिखाई देना बंद हो गया.
नाव की पहचान अभी साबित होनी है. 2 जनवरी को रक्षा मंत्रालय के एक बयान में शुरुआती तौर पर इसे मछली पकडऩे वाली नाव कहा गया, जो कराची के नजदीक केटी बुंडर से ‘अरब महासागर में किसी गैरकानूनी काम के इरादे से’ निकली थी. इससे तस्कर ऑपरेशन की संभावना का संकेत मिलता था. एनटीआरओ ने जो संदेश बीच में पकड़े, उनमें बताया गया था कि नाव-सवार तटों पर बैठे अपने संपर्कों के साथ ‘सामान पहुंचाने’ और ‘कम बैंक खातों में जमा करने’ के बारे में बात कर रहे थे. लेकिन इनमें माल के ब्योरे नहीं बताए गए थे.
माना जाता है कि इस रहस्यमयी नाव के साथ चल रही एक और नाव तटरक्षक बल के डोर्नियर विमानों के मोर्चे पर पहुंचने से पहले ही वापस मुड़कर पाकिस्तान की ओर चली गई. इस अफसाने में सबसे अबूझ पहेली आग है. नाव सवारों ने आत्मसमर्पण करने की बजाए मर जाना क्यों पसंद किया? पर्रीकर इसे उन्हें आतंकवादी मानने का सबूत मानते हैं. उन्होंने कहा, “यहां तक कि नशीले पदार्थ ले जा रही एक सामान्य नाव भी नशीले पदार्थ समुद्र में फेंककर समर्पण कर देगी. कोई भी खुद को तब तक नहीं मारेगा, जब तक वह ऐसा करने के लिए आमादा न हो.”
तटरक्षक बल के अफसर अक्तूबर 1999 की एक घटना का जिक्र करते हैं. यह घटना एक जापानी मालवाहक जहाज एमवी एलोंद्रा रेनबो के साथ घटी थी, जिसे इंडोनेशियाई समुद्री लुटेरे हथियाकर अरब सागर में ले आए थे. जब तटरक्षक बल के जहाजों ने उस जहाज को घेर लिया, तो लुटेरों ने उसे तबाह करने के मकसद से उसमें आग लगा दी थी.
तटरक्षक बल के पूर्व महानिदेशक प्रभाकरन पलेरी कहते हैं, “बिल्कुल मुमकिन है कि इस नाव में सवार लोग नाव पर लदे उन सबूतों को नष्ट करना चाहते हों जिनके कारण वे फंस सकते हैं. इसी दौरान आग बेकाबू हो गई.” नाव का मलबा समुद्री सतह से करीब 2,000 मीटर नीचे पड़ा हुआ है, जिसकी वजह से किसी निर्णायक सबूत का मिलना भी मुश्किल हो गया है.
अलबत्ता इस मुद्दे ने राजनैतिक पार्टियों को आपसी युद्घ के लिए काफी गोला-बारूद दे दी है. कांग्रेस के प्रवक्ता अजय कुमार ने सरकार की आतंकी हमले की थ्योरी पर सवाल उठाए तो जवाब में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने उनके ऊपर ‘पाकिस्तान की ओर से लडऩे’ का इल्जाम लगा दिया. तटरक्षक बल के एक अफसर के मुताबिक कांग्रेस यहां एक बात का ख्याल रखने से चूक गई कि 26/11 के बाद तटों की रक्षा के काम में जो भी मुस्तैदी आई है, चाहे वह एजेंसियों के बीच तालमेल हो या तटरक्षक बलों की तादाद को दोगुना करना हो, वह सब यूपीए के शासनकाल की विरासत है. राजनैतिक लड़ाई में ऐसी बातों को भला कौन याद रखे.
जानें पाकिस्तान की रहस्यमयी नौकाओं का पूरा सच
गुजरात से लगे समुद्रतट पर एक रहस्यमयी नौका को रोक पाने में तटरक्षक बल को मिली कामयाबी के पीछे 26/11 की नाकामी है. तब मुंबई में तबाही मचाने वाली लश्कर-ए-तय्यबा की नाव को पकडऩे में वे नाकाम रहे थे.

अपडेटेड 13 जनवरी , 2015
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