बतौर कप्तान एडिलेड में ही उसका पदार्पण हुआ. और एडिलेड में ही वह महानता की देहरी पर लडख़ड़ा गया. इस तिलिस्मी अस्थायी कप्तान की तरफ से हर पारी में शतक जड़े जाने के बावजूद पांचवें दिन की शाम भारत सिर्फ 48 रन से हार गया. यह दर्द उसे जीवन भर सालता रहेगा. अपने मन पर रक्तरंजित घाव लिए पवेलियन तक का लंबा रास्ता तय करने के कुछ ही मिनट बाद शोकमग्न ड्रेसिंग रूम में पहुंचकर विराट कोहली का एक नया रूप खिल उठा. उसने चैंपियन की तरह बल्लेबाजी की थी और अब सेनापति की तरह अपने साथियों में दिलेरी भरने लगा. ड्रेसिंग रूम में वह अपने साथियों से कह रहा था कि उनके सामने दो रास्ते हैं या तो वे अपनी पीठ थपथपाएं और पहले टेस्ट के पांचवें दिन गजब के जवाबी हमले के लिए नैतिक जीत का दावा करें या फिर यह पता लगाने की कोशिश करें कि जीत की दहलीज पर आकर उनके कदम क्यों लडख़ड़ा गए. साफ जाहिर था कि कोहली उन्हें अधिक बेचौन करने वाले दूसरे विकल्प पर दिमाग लगाने के लिए उकसा रहा था.
ड्रेसिंग रूम में कोहली के इस सवाल पर किसी के मुंह से एक शब्द नहीं निकला, किसी ने पलक तक नहीं झपकाई. टीम, कोचिंग स्टाफ और चोट के कारण टेस्ट से बाहर रहे कप्तान महेंद्र सिंह धोनी भी साफ देख रहे थे कि युवराज ने अपने राज्याभिषेक का बिगुल बजा दिया है. एक खिलाड़ी ने इंडिया टुडे को बताया, ‘‘उसका भाषण उस दिन उसकी बल्लेबाजी से भी बेहतर था. अपने आउट होने और मैच हारने के बाद सबसे अधिक दुखी उसे होना चाहिए था लेकिन उसने पूरे ड्रेसिंग रूम में नई जान डाल दी.’’
कोहली के सामने ‘‘अगर’’ का प्रश्न कभी नहीं था, सवाल बस इतना था कि ‘‘कब.’’ धोनी ने 2014 का पटाक्षेप टेस्ट क्रिकेट से अपने संन्यास की घोषणा से किया और टीम की लगाम कैप्टन कूल से कैप्टन दबंग के हाथ में आ गई. एकदिवसीय मैचों के मामले में भी भविष्य के अपने इरादों का संकेत देते हुए चयनकर्ताओं ने 2015 विश्वकप टीम के बारे में राय जानने के लिए ऑस्ट्रेलिया में कोहली को फोन किया जबकि धोनी और कोच डंकन फ्लेचर ने आधिकारिक रूप से वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए चयन समिति की बैठक में हिस्सा लिया था.
कोहली के बतौर कप्तान उदय का मतलब भारतीय क्रिकेट में बड़ा पीढ़ीगत बदलाव है और उसने अभी से अपने साथियों को संकेत दे दिया है कि वे आगे बड़े सांस्कृतिक बदलाव के लिए तैयार हो जाएं. उसने साफ कह दिया है कि उन्हें ऑस्ट्रेलिया की तरह खेलना और मुकाबला करना होगा और विदेशों में टेस्ट मैच जीतने होंगे. भारत के पूर्णकालिक टेस्ट कप्तान के रूप में पहले ही मैच में कोहली ने सिडनी में चौथे टेस्ट की टीम से शिखर धवन और चेतेश्वर पुजारा को बाहर कर दिया. दोनों ही टेस्ट क्रिकेट में जूझ रहे थे.
देश के एक सबसे सफल कप्तान सौरभ गांगुली ने सिडनी से कहा, ‘‘यह कोहली की टीम होगी. उसे अपने ड्रेसिंग रूम को नए सिरे से तैयार करना होगा. मैं उसकी बल्लेबाजी का और खेल के प्रति उसके नजरिए का बड़ा प्रशंसक हूं. इसलिए मुझे उसे शानदार खिलाड़ी से कप्तान बनते देखने में बड़ा मजा आएगा. भारत की कप्तानी बहुत जल्द ही अपने भारी तनाव से लोगों के बाल सफेद कर सकती है. अगर वाकई टेस्ट जीतना ही उसकी प्राथमिकता हुई तो मुझे बहुत खुशी होगी.’’
सचिन तेंडुलकर, राहुल द्रविड़, सौरभ गांगुली और वी.वी.एस. लक्ष्मण की महान चौकड़ी के विदा होने के बाद से भारतीय प्रशंसक जिस तरह क्रिकेट से मुंह मोड़ रहे हैं, उनमें नए सिरे से जोश जगाने जैसी कोहली के पास कामयाबी हासिल करने की कई वजहें हैं. उसके तेवर तीखे हैं (आखिरकार वेस्टइंडीज के क्रिस गेल और इंग्लैंड के केविन पीटरसन की गिनती कोहली के सबसे अच्छे दोस्तों में होती है) और अब तक खेल का कोई सत्र ऐसा नहीं गया जब ऑस्ट्रेलियाई खिलाडिय़ों से उसकी गर्मागर्मी न हुई हो. वह अपनी आस्तीन पर टैटू ही नहीं, दिल भी लिए घूमता है. अभिनेत्री अनुष्का शर्मा उसकी गर्लफ्रेंड हैं. इसके बावजूद 26 साल का विराट टेस्ट के लिए मैदान पर जब भी उतरता है, पुराने ढंग की नीली कैप पहने रहता है जिसका साफ मतलब है कि वह परंपराओं का सम्मान करता है.
अपने 33वें टेस्ट में कोहली ने भले ही महानता की बुलंदी को न छुआ हो पर वह उसकी तरफ लंबी छलांग ले रहा है. टेस्ट क्रिकेट में उसकी शुरुआत बेशक धीमी रही. पहली पांच पारियों में उसने सिर्फ 76 रन बनाए. लेकिन चौथे टेस्ट की पहली पारी के बाद से 10 शतक मार चुका है. इसका मतलब हर 3.3 टेस्ट में एक शतक है. यह अनुपात सुनील गावसकर के कॅरियर के इसी दौर के अनुपात से थोड़ा ही पीछे लेकिन तेंडुलकर या राहुल द्रविड़ से कहीं आगे है. सिडनी में पहली पारी के शतक ने कोहली को ऐसा पहला कप्तान बना दिया है जिसने शिखर पर रहते हुए अपनी पहली तीन पारियों में शतक जड़े हैं.
कोहली क्रिकेट की दुनिया में शिखर तक पहुंचेगा, इसका संकेत उसने अपना पहला टेस्ट खेलने से पहले ही दे दिया था. ऑफ स्पिनर हरभजन सिंह ने 2010-11 में दक्षिण अफ्रीका के दौरे पर उन्हें लगभग धमकाते हुए कहा था, ‘‘अगर तूने टेस्ट क्रिकेट में 10,000 रन नहीं बनाए तो फिर देखना.’’
लेकिन कोहली के लिए रास्ता हमेशा आसान नहीं था. वह 9 साल की उम्र में जब पश्चिम दिल्ली में राजकुमार की कोचिंग अकादमी में पहुंचा था तो हमेशा शरारत करता रहता था. अगले चार साल में उसने अपना खेल ऐसा कमाल का सुधारा कि अंडर 14 लीग में दिल्ली की तरफ से सबसे ज्यादा रन बटोरे. इतने शानदार खेल के बावजूद जब वह दिल्ली की अंडर 14 टीम के लिए नहीं चुना गया तो उसे बड़ा झटका लगा था. खुद रणजी खिलाड़ी रह चुके राजकुमार ने गर्व से बताया, ‘‘वह बहुत रोया लेकिन हार मानने की बजाए दोगुनी मेहनत की. दो साल बाद जब दिल्ली की अंडर 17 टीम में खेला तो दो दोहरे शतक मारे.’’
कोहली ने 18 साल की उम्र में 2006 में दिल्ली की तरफ से रणजी ट्रॉफी मैच में कदम रखा. उसके पक्के इरादों की पहली झलक उस समय मिली जब एक दिन पहले पिता की मृत्यु के बावजूद वह कर्नाटक के खिलाफ अपनी बची हुई पारी आगे खेलने मैदान पर उतर आया. उसी मनोदशा में उसने 90 रन बनाए, दिल्ली के लिए गेम बचाया और आंखों में आंसू लिए पिता के अंतिम संस्कार के लिए मैदान से चला गया.
मलेशिया में 2008 में यूथ वर्ल्डकप में विजेता भारत की अंडर 19 टीम का नेतृत्व करने के बाद वह मुख्य चयनकर्ता दिलीप वेंगसरकर की नजर में चढ़ गया. उन्होंने कोहली को फौरन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के अखाड़े में उतार दिया. उसने श्रीलंका में एकदिवसीय मैच में भारत के लिए सलामी बल्लेबाज के रूप में अपने कॅरियर की शुरुआत की जबकि वह क्लब मैचों में भी कभी ओपनिंग करने नहीं आया था.
और फिर वह रास्ता भटक गया.
सबको उसके रवैये और ऐशो-आराम की जिंदगी की चाहत से फिक्र होने लगी. इंडियन प्रीमियर लीग में विजय माल्या की भड़कीली रॉयल चैलेंजर्स टीम की तरफ से खेलते हुए वह बंगलुरू में जम गया. रास्ता भटकने के बाद उसे भारतीय टीम से निकाल दिया गया और शायद संभावनाओं से भरे खिलाड़ी का ठप्पा लगाकर दरकिनार कर दिया गया होता, जो उम्मींदों पर खरा नहीं उतर सका. राजकुमार ने माना, ‘‘वह पटरी से उतर गया था और मेरी भूमिका उसके कोच की बजाए बड़े भाई की हो गई. मैं उसे फटकार लगाता था. उसके पीछे लगना पड़ता था और हमेशा कहता रहता था कि अभ्यास करो, अभ्यास करो. हालांकि इस तरह पस्त और हारने के बाद उसे फिर एहसास हो गया कि क्रिकेट ही उसकी एकमात्र प्राथमिकता है और अनुशासन तथा लगन उसके सबसे अच्छे दोस्त हैं. धीरे-धीरे उसे लय मिल गई और मन में प्रेरणा भी वापस आ गई.’’
नए सिरे से टीम में वापसी के फौरन बाद कोहली एकदिवसीय क्रिकेट में भारत का मुख्य आधार बन गया. 2012 में एडिलेड में पहला टेस्ट शतक जमाने के बाद वह टेस्ट क्रिकेट में भी खुलकर हाथ आजमाने लगा. पिछले साल इंग्लैंड में कुछ सुस्ती आई जब वह 10 पारियों में एक भी अर्धशतक नहीं लगा सका. आज कोहली की गिनती विश्व क्रिकेट में ऐसे बल्लेबाजों में होने लगी है जिससे गेदबाजों को सबसे ज्यादा डर लगता है.
पूर्व कप्तान कपिल देव ने कोहली को तब पहचाना था जब वह बेंगलुरू में नेशनल क्रिकेट अकादमी के डायरेक्टर थे. कपिल देव को लगता है कि नए भारतीय कप्तान में सभी गुण हैं, ‘‘वह अक्लमंद क्रिकेटर है. जब बल्लेबाजी करता है तो ऐसा लगता है कि दिमाग में कम्पास और जेब में कैलकुलेटर लेकर आया है. उसकी सहज प्रवृत्ति हमला करने की है और मुझे खुशी है कि इंग्लैंड की सुस्ती से वह इतनी अच्छी तरह उबर गया है.’’
भारत के एक और सफल कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन का मानना है कि कोहली की कप्तानी का टीम पर अच्छा असर पड़ेगा. लेकिन अजहर कोहली को सावधान भी करते हैं, ‘‘एक तो, उसे मैदान पर अपने गुस्से पर काबू रखना होगा और विरोधियों से टकराव से बचना होगा. दूसरे, अगर टीम ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया तो उसकी बल्लेबाजी पर असर पड़ सकता है क्योंकि कप्तानी का तनाव भारी होता है.’’
कोहली का अगला पड़ाव विश्वकप है. 2011 में विश्वकप के अपने पहले मैच में उसने शतक मारा था. भारत के विश्वकप जीतने के बाद उसने सबसे यादगार लाइन कही थी. उसने तेंडुलकर के लिए कहा था, ‘‘उन्होंने वर्षों तक देश की उम्मीदों को उठाए रखा. अब हमें उन्हें अपने कंधों पर उठाने का वक्त आ गया है.’’ दुनिया में अक्सर चक्र फिर वहीं आ जाता है इसलिए भारत की उम्मीदें अब पूरी तरह कोहली के कंधों पर टिक गई हैं.
भारतीय क्रिकेट टीम में अब आया दबंग कप्तान का दौर
बिंदास और मस्तमौला महेंद्र सिंह धोनी से लेकर दिलेर और दबंग विराट कोहली तक, संकट में फंसी भारतीय टेस्ट टीम को जरूरत के वक्त मिला नया खून.

अपडेटेड 12 जनवरी , 2015
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