भारतीय जनता पार्टी के 2014 लोकसभा चुनाव के घोषणा पत्र ने रक्षा क्षेत्र में सुधार की उसकी योजनाओं का कुछ संकेत दिया था. उसने राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे से सीधे-सीधे निपटने की स्पष्ट योजना बनाने का महत्व बहुत अच्छी तरह समझ लिया था. पार्टी ने राष्ट्रीय खुफिया एजेंसी (एनआइए) को मजबूती देने, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में सुधार लाने, खुफिया एजेंसियों को राजनैतिक हस्तक्षेप से मुक्त करने, सशस्त्र सेनाओं को आधुनिक रूप देने, रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक के विकास के लिए अनुसंधान और विकास का खर्च बढ़ाने का संकल्प लिया था. लेकिन पार्टी में यह समझ् नहीं दिखाई दे रही कि भारत के रक्षा क्षेत्र में ऊंचे स्तर पर ढांचागत खामियां हैं. यह किसी को भी साफ नजर आ सकता है.
रक्षा क्षेत्र में सुधारों के मामले में नरेंद्र मोदी सरकार के कामकाज का आकलन करने के लिए 100 दिन काफी नहीं हैं लेकिन उसके अब तक फैसलों से किसी तरह की आस नहीं जगती. सबसे बड़ी खामी तो यही है कि देश में पूर्णकालिक रक्षा मंत्री नहीं है. अरुण जेटली की योग्यता पर किसी को संदेह नहीं है पर अस्वस्थ जेटली पर रक्षा और वित्त, दोनों विभागों की जिम्मेदारी लाद देना बताता है कि सरकार इस व्यवस्था की कमियों से किस कदर अनजान है. इससे पहले भी कई बार रक्षा मंत्रालय का भार प्रधानमंत्री के पास रहा है लेकिन दैनिक कामकाज चलाने के अधिकार एक अलग मंत्री के हाथ में रहते थे. जेटली को वित्त और रह्ना, दोनों मंत्रालय संभालते हुए चार महीने से ज्यादा बीत चुके हैं और इस बोझ् से उन्हें जल्द मुक्त किए जाने के भी कोई आसार नहीं हैं.
प्रशासन और सेना के संबंधों की खस्ता हालत को पलटने के लिए अलग रक्षा मंत्री होने की सख्त जरूरत है. सच तो यह है कि इन दोनों के संबंधों में सद्भाव तो कभी भी नहीं रहा फिर भी, विशेषकर संकट के दौर में प्रशासन और सेना के बीच अच्छे कामकाजी संबंधों से हमेशा देश का हित सधता रहा है. मिसाल के तौर पर 1971 में रक्षा मंत्रालय और तीनों सेनाओं के मुख्यालयों के बीच बेहतरीन तालमेल से भारत ने पाकिस्तान को धूल चटाई जबकि चीन और अमेरिका पाकिस्तान के साथ थे. इसी तरह करगिल संघर्ष के दौरान सेना और प्रशासन के बीच पूरे तालमेल से नियंत्रण रेखा पर अचानक घुसपैठ कर रही पाकिस्तान की सेना को वापस धकेला गया.
लेकिन आज सेना और प्रशासन के संबंध सबसे निचले स्तर पर हैं. पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह की जन्म तिथि पर विवाद और आपराधिक अवमानना के लिए उन पर मुकदमे की कार्रवाई जैसी घटनाएं इतिहास में पहले कभी नहीं Þईं. सेना के ऊंचे अधिकारियों पर गड़बड़ी और दुराचरण के आरोप-प्रत्यारोप ने सेना के मनोबल को बहुत चोट पहुंचाई है. अब मोदी सरकार में वी.के. सिंह को मंत्री बनाए जाने से उम्मीद जगी है कि सेना मुख्यालयों तथा प्रशासन और सेना के संबंधों में टकराव से उन पर लगे घाव भर जाएंगे, और गहरे नहीं होंगे.
सुबह की बैठकों की परंपरा फिर शुरू करने के लिए भी तत्काल एक रह्ना मंत्री की जरूरत है. इस बैठक की शुरुआत भारत-चीन सीमा संघर्ष में भारत की अपमानजनक हार के बाद यशवंतराव चव्हाण ने की थी. उसके बाद टूटे मनोबल और कड़वाहट ने प्रशासन और सेना के संबंधों तथा रक्षा तंत्र को बहुत चोट पहुंचाई. सुबह की इन बैठकों में रक्षा तंत्र के ऊंचे अधिकारियों—मंत्रियों, सचिवों, सेनाध्यक्षों, वित्त अधिकारियों और काफी बाद में रक्षा सचिव—के एक साथ बैठने से फैसले जल्दी लिए जाने लगे और व्यक्तिगत तालमेल भी होने लगा.
भारतीय जनता पार्टी के घोषणा पत्र में यह भी कहा गया है, ''मंत्रालय और सेना मुख्यालयों के बीच इधर से उधर भी तैनाती हुआ करेगी." इस प्रस्ताव की बात ''अक्सर की गई है लेकिन इस पर अमल कभी नहीं हुआ." संयोगवश नरेश चंद्रा समिति ने रक्षा क्षेत्र में सुधार की जो सूची बनाई थी, उसमें यह प्रस्ताव भी शामिल था. इतना ही नहीं, सिविल सेवा के ऊंचे अधिकारियों को रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के विषयों में प्रशिक्षण देना भी जरूरी है. यह सुझव भी एक के बाद एक जांच आयोगों ने दिया, पर कभी अपनाया नहीं गया. इसलिए रक्षा मंत्रालय में सिविल सेवा के अधिकारियों को आम तौर पर रक्षा और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों की पूरी जानकारी नहीं होती. ऐसी कोई नीति भी नहीं है कि उन्हें भी दूसरे कार्यकाल के लिए वापस रक्षा मंत्रालय में नियुक्त किया जाए ताकि सब काम एक जैसा करने की प्रवृत्ति बदली जा सके. ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब रक्षा सचिवों को रक्षा मुद्दों के बारे में किसी तरह के ज्ञान, अनुभव या दिलचस्पी के बिना नियुक्त कर दिया गया और घातक परिणम मिले.
सेना मुख्यालयों में भी सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है. सेनाओं के बीच आपसी सहयोग बहुत कम है. रक्षा मंत्रालय के भीतर समन्वित सेना मुख्यालय का काम-काज अपर्याप्त साबित हुआ है क्योंकि उसके मुखिया को चीफ ऑफ स्टाफ समिति के अध्यक्ष के मातहत रखा गया है. अध्यक्ष का यह पद तीनों सेनाओं को बारी-बारी से मिलता है. रक्षा मंत्री के लिए एक सलाहकार के तौर पर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की नियुक्ति का ''प्राचीन" प्रस्ताव आज भी ठंडे बस्ते में है. आशा है कि नई सरकार कुछ ठोस फैसले करेगी.
सत्तारूढ़ दल के घोषणा पत्र में रक्षा उद्योगों में एफडीआइ सहित निजी निवेश को बढ़ावा देने की बात भी कही गई है. रक्षा उत्पादन के मामले में टेक्नोलॉजी सौंपने को बढ़ावा दिया जाएगा. सैनिक साजो-समान के डिजाइन और उत्पादन में स्थानीय उद्योगों को अधिक हिस्सेदारी मिलेगी. यहां अपने उद्यम कौशल और निजी क्षेत्र पर अधिक भरोसा दिखाया गया है जो राहत देता है. इतना तय है कि निकट भविष्य में उन्नत हथियार प्रणालियों के लिए भारत को आयात पर ही निर्भर रहना होगा. इसलिए रक्षा सौदे करने वाले अधिकारियों के मनोबल को संबल देना बहुत जरूरी है. अभी तो वे फोन उठाते हुए भी डरते हैं कि कहीं अपने राजनैतिक आकाओं के दबाव में लिए गए अपारदर्शी फैसलों के लिए उन्हें बलि का बकरा न बना दिया जाए.
पी.आर. चारी इंस्टीट्यूट ऑफ पीस ऐंड कॉन्फ्लिक्ट स्टडीज में विजिटिंग प्रोफेसर हैं
चाहिए एक पूर्णकालिक रक्षा मंत्री
अरुण जेटली की योग्यता पर संदेह नहीं है, लेकिन उन पर रक्षा और वित्त मंत्रालयों की जिम्मेदारी लादना बताता है कि सरकार इस व्यवस्था की कमियों से कितनी अनजान है.

अपडेटेड 20 अक्टूबर , 2014
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