भारत के साथ अचानक सीमा पर बढ़े तनाव का जायजा लेने और उससे निबटने की रणनीति तैयार करने के लिए 10 अक्तूबर को पाकिस्तान की नेशनल सेक्युरिटी कमेटी ने इस्लामाबाद में बैठक रखी, तो प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के पास अपने सैन्य-सुरक्षा प्रतिष्ठान के लिए सिर्फ यही रूखा-सा संदेश थाः “जंग कोई विकल्प नहीं है.”
शरीफ अगर दिल से इसमें भरोसा करते हैं तो उनसे उम्मीद की जाती है कि वे दोनों ओर उबाल मार रही भावनाओं को ठंडा करने की कोशिश भी करेंगे. यह दीगर बात है कि निकट भविष्य में घरेलू बाध्यताओं और भारत में नरेंद्र मोदी की नई सरकार के आक्रामक रुख के चलते वे अमन की कोई पहल नहीं कर पाएंगे.
कश्मीर की सीमा पर लड़ाई कैसे भड़की, इसे लेकर पाकिस्तान में अब भी भ्रम है. हालात ये हैं कि भारत अब पाकिस्तान पर आरोप लगा रहा है कि वह गोलाबारी की आड़ में आतंकवादियों को जम्मू-कश्मीर में भेज रहा है जबकि पाकिस्तानी हुक्मरान भारत के आक्रामक रवैए को दोषी ठहरा रहे हैं जो उसने अपने संकटग्रस्त पड़ोसियों, खासकर पाकिस्तान के प्रति अपना रखा है. शरीफ हमेशा से भारत के साथ अच्छे रिश्तों के हामी रहे हैं. पिछले साल सत्ता में आने से पहले ही उन्होंने भारत के साथ वाणिज्यिक रिश्ते कायम करने का आह्वान किया था, जिसके बारे में उनके आलोचकों का कहना है कि उनकी मूल मंशा देश की बदहाल अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना नहीं, बल्कि खुद अपने कारोबारी साम्राज्य का विस्तार करने की थी.
शरीफ अपने पिछले कार्यकाल में पाकिस्तान की भारत के प्रति नीति के मसले पर फौजी जनरलों के साथ लगातार रार ठाने रहे हैं और इस बार भी सुरक्षा प्रतिष्ठान की सलाह को नजरअंदाज करते हुए वे मई में मोदी के शपथ समारोह में भारत गए थे. उन्होंने कहा है कि 1999 में शांति की प्रक्रिया उनके तख्तापलट के चलते जिस मोड़ पर छूट गई थी, वे वहां से उसे आगे बढ़ाने की ख्वाहिश रखते हैं. पाकिस्तान में हालांकि कई लोगों का मानना है कि यह जल्द होने नहीं जा रहा और इसकी आंशिक वजह पाकिस्तान के प्रति मोदी सरकार का आक्रामक रुख है जिसे विदेश सचिव स्तर वार्ता को अगस्त में रद्द करने के फैसले से समझा जा सकता है.
पाकिस्तानी फौज के पूर्व ब्रिगेडियर और सुरक्षा विश्लेषक महमूद शाह कहते हैं, “नवाज शरीफ की भारत नीति नाकाम रही है. अगर दूसरा पक्ष आपको लगातार हल्के में ले रहा हो तो सुलह की नीति काम नहीं आती.”
पाकिस्तानी फौज के अफसर भारत की ओर से भारी बल प्रयोग से हैरान हैं. उनका कहना है कि पिछले कुछ दशकों में इस बार यह सबसे तीखा हमला है. स्यालकोट सेक्टर में नियंत्रण रेखा—जिसे पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा कहता है—की निगरानी करने वाले पंजाब रेंजर्स के महानिदेशक मेजर जनरल ताहिर जावेद खान कहते हैं कि भारतीय सैन्यबलों ने इस साल 20,000 गोले दागे हैं जबकि दो साल पहले यह संख्या महज 200 थी.
खान का कहना है कि इस बार जब तनाव शुरू हुआ यानी 20 सितंबर से ही वे भारत में बीएसएफ प्रमुख के साथ फ्लैग मीटिंग आयोजित करने की कोशिश में जुटे हैं, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली. आखिर 14 अक्तूबर को दोनों देशों के डीजीएमओ ने हॉटलाइन पर बात की लेकिन इसके कुछ घंटे बाद ही पाकिस्तानी फौज ने खबर दी कि भारत की गोलाबारी से पाकिस्तान में चार बच्चे बुरी तरह जख्मी हो गए हैं.
सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि शरीफ भले ही रिश्ते सुधारने पर जोर देना चाह रहे हों, लेकिन वे यह नहीं चाहेंगे कि उन्हें भारत की आक्रामक नीति के समक्ष लडख़ड़ाया हुआ समझ जाए. 
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र की महासभा में शरीफ के संबोधन में कश्मीर पर की गई टिप्पणी की ओर इशारा करते हुए विश्लेषकों का कहना है कि यह पिछले कुछ वर्षों के दौरान पाकिस्तानी नेताओं के रवैए से अलग था. इसके पहले पाकिस्तानी नेताओं ने कश्मीर पर अपने पक्ष को इस उम्मीद में हल्का कर दिया था ताकि विवाद के हल के लिए भारत को राजी किया जा सके. अपने भाषण में शरीफ ने कश्मीर में संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में रायशुमारी की अपील की थी जिसे भारत लगातार खारिज करता आया है.
विश्लेषकों का कहना है कि कश्मीर पर शरीफ का कड़ा रुख संभव है कि घरेलू राजनीति में विपक्ष और ताकतवर फौज से मिल रहीं चुनौतियों की वजह से हो जिससे पहले भी भारत से रिश्ते सुधारने की कोशिशें नाकाम हुई हैं.
क्रिकेटर से राजनीति में उतरे इमरान खान और मौलाना ताहिर-उल-कादरी ने शरीफ के खिलाफ भारी मुहिम चला रखी है. उनका आरोप है कि पिछले चुनावों में शरीफ के पक्ष में खूब धांधली हुई है. संसद भवन के सामने अपने समर्थकों की भीड़ से खान ने कहा था कि भारत की “आक्रामकता” का जवाब देने के लिए पाकिस्तान को शरीफ से बेहतर नेता की जरूरत है. कुछ लोगों का मानना है कि खान को फौज का समर्थन हासिल है.
इस मामले में अकेले इमरान खान या कट्टरपंथी नेता ही नहीं, बल्कि 2008 के मुंबई हमलों के कथित मास्टरमाइंड हाफिज सईद जैसे आतंकी भी भारत को करारा जवाब देने की मांग उठा रहे हैं. यही क्यों, उदार समझे जाने वाले, भुट्टो खानदान के उत्तराधिकारी तथा पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जैसे नेता भी भारत विरोधी भावनाओं को हवा दे रहे हैं. उन्होंने हाल में कई भारत विरोधी बयान दिए; जिनमें सबसे तीखा था कि दुनिया के देश “कश्मीर पर भारत के बर्बर कब्जे” पर गौर करें और उसके खिलाफ आवाज उठाएं.
सुरक्षा विश्लेषक और स्कॉर्पियंस टेल के लेखक जाहिद हुसैन कहते हैं, “घरेलू सियासी हालात के चलते शरीफ के विकल्प (भारत से शांति बहाली के लिए) सीमित हो गए हैं.” उनका कहना है कि बड़बोले और नफरत फैलाने वाले नारों और बयानों की बात तो दीगर है मगर पाकिस्तानी फौज जब पश्चिम में अफगानिस्तान की सीमा पर इस्लामी आतंकियों के साथ बुरी तरह उलझी हुई है तब वह पूरब में भारत के साथ तनाव बढ़ाना गवारा नहीं कर सकती.
इसी तरह, भारत के लिए भी पाकिस्तान के साथ शांति बहाली बहुत जरूरी है क्योंकि उसका काफी कुछ दांव पर है. पाकिस्तान के स्वतंत्र मानवाधिकार आयोग की पूर्व अध्यक्ष असमा जहांगीर ने 13 अक्तूबर को ट्वीट किया, “भारत और पाकिस्तान, दोनों देशों में शांति के पैरोकारों को दोनों के बीच जारी सीमा पर विवेकहीन हिंसा को रोकने और अमन के लिए वार्ता बहाली का अनुरोध करने के लिए अपनी आवाज उठानी चाहिए.”
उन्होंने लिखा, “इस उपद्वीप में संघर्ष या नफरत फैलाने वाले कट्टर रवैए से शांति और समृद्धि नहीं आएगी. इकलौता विकल्प बातचीत का है जिसमें थोड़ी विनम्रता और मानवीयता हो.”

