यह मामला 2001 का है. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की अगुआई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार के वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा की मुक्त बाजार की नीतियां स्वदेशी के कट्टर पैरोकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से सीधे टकरा गई थीं.
मुक्त बाजार के पक्के हिमायती सिन्हा बीमा, खुदरा बाजार, शिक्षा और मीडिया जैसे कई क्षेत्रों को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) के लिए खोलने की योजना बना रहे थे. 2001 में मंत्री मुरसोलि मारन के तहत वाणिज्य मंत्रालय ने एकल और मल्टी ब्रांड खुदरा बाजार में 100 फीसदी एफडीआइ को मंजूरी देने का एक नोट भी तैयार कर लिया था.
मुक्त बाजार के पक्के हिमायती सिन्हा बीमा, खुदरा बाजार, शिक्षा और मीडिया जैसे कई क्षेत्रों को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) के लिए खोलने की योजना बना रहे थे. 2001 में मंत्री मुरसोलि मारन के तहत वाणिज्य मंत्रालय ने एकल और मल्टी ब्रांड खुदरा बाजार में 100 फीसदी एफडीआइ को मंजूरी देने का एक नोट भी तैयार कर लिया था.
लेकिन अर्थव्यवस्था को खोलने का इरादा 'आत्मनिर्भरता’ के स्वदेशी दर्शन के विपरीत था. इससे एनडीए सरकार और आरएसएस के बीच रिश्ते कड़वे हो गए, जबकि विचारधारा के मामले में आरएसएस को बीजेपी का पहरुआ माना जाता है. तब सिन्हा की जगह जसवंत सिंह लाए गए.
असल में आरएसएस के कड़े विरोध के कारण ही सरकार बीमा क्षेत्र में 26 फीसदी से ज्यादा एफडीआइ को मंजूरी नहीं दे पाई और इसके लिए शिक्षा क्षेत्र को नहीं खोल पाई.
एनडीए सरकार 2004 में चुनाव हारने के एक दशक बाद फिर सत्ता में लौट आई है. पिछले दस साल के दौरान माहौल काफी बदल गया है. भूमंडलीकरण ने देश के उपभोक्ताओं की आकांक्षाओं को काफी बढ़ा दिया है. इससे घरेलू उद्योग को भी ताकत मिली, जो अब विदेशी कंपनियों से होड़ लेकर आगे बढ़ रहा है. लिहाजा, अर्थव्यवस्था को और अधिक खोलने के मामले में आरएसएस का विरोध मंदा पड़ा है.
नाम न छापने की शर्त पर आरएसएस के एक विचारक कहते हैं, ''पुराने सरोकारों की ऊंची आवाजें अब नहीं सुनाई देतीं लेकिन कुछ आशंकाएं अब भी हैं.” जाहिर है, सरकार की नीतियों पर अब भी खासा असर रखने वाले आरएसएस को एहसास है कि जमीनी हकीकतें काफी बदल गई हैं.

आरएसएस के प्रवक्ता राम माधव के साथ एक मुलाकात से ही इसका संकेत मिल जाता है. उनके नई दिल्ली कार्यालय में पहुंचने वालों का स्वागत रूह अफ्जा या आम के रस से होता है. उनकी मेज पर एक गोल्ड आइफोन, एक लैपटॉप और मों ब्लां का प्लानर शोभा बढ़ा रहा है.
वे देश की आर्थिक स्वायत्तता और विदेशी निवेश के बीच नाजुक संतुलन बनाने की जरूरत की बातें करते हैं. वे कहते हैं, ''हमारा स्वदेशी का विचार काफी व्यापक है. भारत की आर्थिक स्वायत्तता की रक्षा की जानी चाहिए. जिन क्षेत्रों में रोजगार सृजन की संभावना है, उन्हें एफडीआइ के लिए खोला जाना चाहिए.”
एफडीआइ के प्रति आरएसएस की स्वीकार्यता ऐसे वक्त पर आई है जब यह साफ हो चला है कि नरेंद्र मोदी की सरकार व्यावहारिक नीतियां अपनाएगी और कई नए क्षेत्रों को एफडीआइ के लिए खोलने की सोच रही है. वित्त और रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने संकेत दिया है कि सरकार का इरादा रक्षा उत्पादन क्षेत्र में एफडीआइ की सीमा 26 फीसदी से बढ़ाकर 100 फीसदी करने का है.
अभी तक रक्षा मंत्रालय एफडीआइ की सीमा बढ़ाने का कड़ा विरोध करता आया है. सरकार हाइ स्पीड ट्रेन, उपनगरीय ट्रेन कॉरिडोर, ट्रैक और बंदरगाहों तथा खदानों से जुड़ी रेल लाइनों, ई-कॉमर्स और निर्माण क्षेत्र में एफडीआइ को मंजूरी देने की योजना बना रही है.

पूर्व एनडीए सरकार के दौर के विपरीत अब स्वदेशी अर्थशास्त्र के पैरोकार बुनियादी संरचना और रक्षा जैसे क्षेत्रों में एफडीआइ की जरूरत से सहमत हैं. इन क्षेत्रों में रोजगार सृजन और देश में टेक्नोलॉजी के आधार को व्यापक करने की संभावना है.
लेकिन विभिन्न क्षेत्रों में किस हद तक एफडीआइ को मंजूरी दी जाए, इसे लेकर कुछ आशंकाएं-आपत्तियां हैं. आरएसएस के नेताओं से कई दौर की बातचीत से पता चलता है कि 100 फीसदी एफडीआइ के मामले अपवाद ही होने चाहिए और अगर उनकी चली तो वित्तीय सेवा और शिक्षा के क्षेत्र को विदेशी निवेश से बाहर रखा जाएगा.
लॉर्ड मेघनाद देसाई जैसे मुक्त बाजार के पैरोकार तो आधुनिक दौर के भारत में स्वदेशी के विचार को कतई उपयोगी नहीं मानते, बल्कि उसके प्रति हिकारत का भाव रखते हैं. वे कहते हैं, ''स्वदेशी समय की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं है. अर्थशास्त्र का विचार यह है कि आप चीजों के उत्पादन की चिंता छोड़कर बेहतर बनाने पर अपना ध्यान केंद्रित करें. आरएसएस का एक हिस्सा स्वदेशी पर अटका है मगर आधुनिक विचारों वाले आगे बढ़ चुके हैं. तथाकथित हिंदू राष्ट्रवादी सरकार 100 फीसदी एफडीआइ की बात कर रही है जबकि कभी ये लोग ही विदेशी टेक्नोलॉजी के धुर विरोधी थे.”

बदलाव के साथ
बीजेपी के पूर्व संस्करण जनसंघ और कई अन्य राजनैतिक पार्टियों ने 1970 के दशक में बैंकों में नई तकनीक के इस्तेमाल का कड़ा विरोध किया था. उनकी दलील थी कि इससे बहुत-से क्लर्कों की नौकरी चली जाएगी. इसके विपरीत अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी 'डिजिटल भारत’ निर्माण और आइटी से लैस शहरों की बात करने लगे हैं.
प्रधानमंत्री मोदी प्रशासन में टेक्नोलॉजी को अपनाने वाले पहले नेताओं में हैं. उन्होंने गुजरात में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने से लेकर गांवों के समस्या निवारण के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का इस्तेमाल किया. फिर, देश के इतिहास में पहली दफा अत्याधुनिक प्रचार अभियान चलाया.

आज, आरएसएस के कई विचारक यह दलील देने लगे हैं कि वे हमेशा ही उदारीकरण के पक्षधर रहे हैं. हालांकि आरएसएस की आर्थिक विचारों की शाखा स्वदेशी जागरण मंच (एसजेएम) ने भारत के विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) का सदस्य बनने का विरोध किया था. उसका कहना है कि आरएसएस हमेशा से नेहरूवादी समाजवाद का विरोध करता रहा है और मुक्त बाजार तथा लाइसेंस-कोटा राज के खात्मे का पक्षधर रहा है.

मुक्त उद्यम की पैरोकारी के ही कारण जनसंघ को धनी लोगों की पार्टी कहा जाता था. लेकिन मुक्त बाजार की पैरोकारी के बावजूद बीजेपी हमेशा आर्थिक अंकुश कायम रखने की हिमायती रही है. पूर्व एनडीए सरकार के दौरान पार्टी खासकर जरूरी जिंसों और कृषि तथा पूंजीगत सामान के आयात का विरोध करती रही है.
एसजेएम के सह-संयोजक और आर्थिक विचारक एस. गुरुमूर्ति का मानना है कि बेरोकटोक आयात ही देश में चालू खाते में फायदे से घाटे की स्थिति में पहुंच जाने की एक मुख्य वजह रही है. चालू खाता देश के विदेशी लेन-देन की स्थिति को बताता है. चालू खाते में घाटा बढऩे से महंगाई बढ़ सकती है और देश की मुद्रा का अवमूल्यन हो सकता है. पूर्व एनडीए सरकार के दौरान 1978 के बाद पहली दफा चालू खाता 22 अरब डॉलर फायदे में था.
कांग्रेस की अगुआई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के दौरान 2012-13 में चालू खाते में 89 अरब डॉलर का कारोबार दर्ज किया गया, जो किसी एक वित्त वर्ष में रिकॉर्ड था. यूपीए सरकार ने इसकी वजह सोने और तेल आयात में तेजी बताई. लेकिन गुरुमूर्ति की दलील है कि ऐसा पूंजीगत वस्तुओं के भारी आयात की वजह से था, जो एनडीए के राज में औसतन प्रति साल 10 अरब डॉलर से यूपीए राज के नौ साल (2004/05 से 2012/13) में बढ़कर 65 अरब डॉलर हो गया.
बकौल गुरुमूर्ति, पूंजीगत वस्तुओं के अत्यधिक आयात से उत्पादन क्षेत्र लगभग ठप्प हो गया. वाकई, यूपीए सरकार के पहले चार वर्षों (2004/05 से 2007/08) में औद्योगिक उत्पादन वृद्धि की दर औसतन 11.5 फीसदी रही, जबकि उसके बाद पांच साल में यह वृद्धि दर गिरकर करीब 5 फीसदी पर आ गई. इस बीच, इस अवधि में पूंजीगत वस्तुओं का आयात बढ़ गया.
यह नौ साल के कुल 587 अरब डॉलर में उन पांच साल में ही 407 अरब डॉलर था. ऐसे आंकड़ों से पता चलता है कि उत्पादित सामान का आयात बड़े पैमाने पर हुआ और घरेलू उत्पादन गिर गया. यह स्वदेशी की आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था के बिल्कुल विपरीत है. स्वदेशी कृषि अर्थशास्त्री देविंदर शर्मा कहते हैं, ''हमने आयात को मंजूरी देकर उत्पादन क्षेत्र को चौपट कर लिया. देश में उत्पादन और सेवा क्षेत्र की क्षमता बरकरार रहनी चाहिए.”
लेकिन खासकर खुली अर्थव्यवस्था के पैरोकार कई अर्थशास्त्री उनसे सहमत नहीं हैं. क्रिसिल में मुख्य अर्थशास्त्री तथा वरिष्ठ निदेशक डी.के. जोशी देश में उत्पादन क्षेत्र में गिरावट की वजह पूंजीगत वस्तुओं के आयात को नहीं मानते. वे कहते हैं, ''देश के उत्पादन क्षेत्र में गिरावट की वजह काबिलियत में कमी है, चाहे वह बुनियादी संरचना का मामला हो या बिजली का. हमें अपने उद्योगों को प्रतिस्पर्धी बनाने की जरूरत है.”
नए दौर का स्वदेशी
देश के सकल घरेलू उत्पाद में 50 फीसदी योगदान अब भी असंगठित क्षेत्र का है. 2013-14 के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, करीब 1.14 करोड़ लोग ही कॉर्पोरेट क्षेत्र में काम कर रहे हैं. करीब 90 फीसदी रोजगार असंगठित, अनौपचारिक, गैर-कॉर्पोरेट क्षेत्र में है जो मोटे तौर पर आपसी रिश्तों से चलता है, औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से नहीं. इसी असंगठित क्षेत्र के लिए व्यापक माहौल तैयार करना स्वदेशी का एक अहम पहलू है.
अर्न्स्ट ऐंड यंग से जुड़े नीति परामर्शदाता तथा अर्थशास्त्री डी.के. श्रीवास्तव कहते हैं, ''रक्षा के क्षेत्र में एफडीआइ को मंजूरी देकर वे स्वदेशी की तिलांजलि नहीं दे रहे हैं. रक्षा में एफडीआइ घरेलू उत्पादन की क्षमता बढ़ाएगा, ताकि वह आयात की पूर्ति कर सके. स्वदेशी का आधुनिक स्वरूप अत्याधुनिक घरेलू उत्पादन क्षमता हासिल करना है. बीजेपी ने मान लिया है कि अब भूमंडलीकरण की प्रक्रिया को पलटा नहीं जा सकता इसलिए स्वदेशी का आधुनिक संस्करण सामने है.”
आरएसएस के ज्यादातर वरिष्ठ नेता यह मानते भी हैं. आरएसएस के एक विचारक कहते हैं, ''हम एकल ब्रांड खुदरा कारोबार में विदेशी ब्रांड को मंजूरी देंगे. लेकिन मल्टी ब्रांड खुदरा कारोबार में एफडीआइ को मंजूरी अभी कम-से-कम कुछ वर्षों तक देना जल्दबाजी होगी, उसके बाद ही पर्याप्त आर्थिक अंकुश के साथ इस पर गौर किया जा सकता है.” ऐसे विदेशी निवेश जिनसे छोटे व्यापारियों और बढ़ई, राजमिस्तरी जैसे कारीगरों के काम को नुकसान हो, स्वदेशी की अवधारणा के विपरीत माना जाता है.
गुरुमूर्ति कहते हैं, ''रक्षा में स्वदेशी का विदेशी निवेश से कोई मतलब नहीं है, बल्कि विदेशी टेक्नोलॉजी से है. भारत सबसे बड़े हथियार आयातकों में एक है, लेकिन क्रय क्षमता का इस्तेमाल वह टेक्नोलॉजी खरीदने में नहीं करता है. अगर आप हथियारों के उत्पादन का काम नहीं शुरू करते तो टेक्नोलॉजी पाना संभव नहीं है. विदेशी निवेश से आपके पास टेक्नोलॉजी आ जाती है और उसमें विकास होने लगता है तो फिर कोई मुद्दा नहीं है.”
भारत के डब्ल्यूटीओ का सदस्य बनने का विरोध करने पर एसजेएम की कड़ी आलोचना हुई थी. हालांकि उसका दावा है कि उसकी बात सही साबित हुई है क्योंकि डब्ल्यूटीओ की वार्ता कृषि क्षेत्र में सब्सिडी और औद्योगिक दरों पर सहमति के अभाव में टूट गई है. लेकिन अब यह एहसास भी घर करने लगा है कि भारत को बाकी दुनिया से व्यापार करने की जरूरत है और ऐसा उसे अपनी शर्तों पर करना चाहिए.1970 के दशक में जनसंघ के दिनों में भारत का आयात और निर्यात सकल घरेलू उत्पाद का महज 7 फीसदी था जबकि आज वह करीब एक-चौथाई हो गया है.
पहले भारतीय सामान की खपत पर ज्यादा जोर था और पश्चिमी सामान का विरोध होता था. स्वदेशी सिर्फ उत्पादन क्षमता का ही मामला नहीं है, बल्कि उसका सरोकार यह भी है कि क्या उत्पादन होता है. इसके तहत पश्चिमी सामान की खपत पर अंकुश लगाने की बात भी है लेकिन एसजेएम अब इस पहलू पर ज्यादा जोर नहीं देता. अर्न्स्ट ऐंड यंग से जुड़े अर्थशास्त्री श्रीवास्तव कहते हैं, ''उपभोग के तरीके उत्पादन क्षमता के मुकाबले अधिक तेजी से वैश्विक हो रहे हैं. उपभोक्ता सामान अब काफी घुलमिल गए हैं और अब पहले जैसा विरोध नहीं है.”
अब दुनियाभर के देशों के साथ व्यापार और आर्थिक संबंधों पर नए सिरे से विचार करना होगा क्योंकि मोदी सरकार पहले दिन से ही संबंधों को सुधारने पर जोर दे रही है. एनडीए सरकार ने शपथ ग्रहण समारोह में दक्षिण एशिया के प्रमुखों को बुलाया और दौरे पर आए चीनी वित्त मंत्री से व्यापार और आर्थिक विषयों पर बातचीत की. अर्थशास्त्री श्रीवास्तव कहते हैं, ''हम दोनों ही मामलों में दूसरों पर निर्भर हैं. हमें उत्पादन के संसाधनों को लाने की जरूरत है और अपने माल को विदेश में बेचने की जरूरत है.”
भले ही बीजेपी के चुनाव घोषणापत्र में आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए खास योजना नहीं पेश की गई थी, लेकिन मोदी सरकार गुजरात की आर्थिक नीतियों से सबक ले सकती है. वह आर्थिक राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादी आर्थिक एजेंडा अपना सकती है. मोदी के गुजरात में आत्मनिर्भरता के नेहरूवादी मॉडल को अपनाया गया. मजेदार बाद यह है कि उस मॉडल को कांग्रेस ने ढाई दशक पहले छोड़ दिया था. गुजरात के पांच सरकारी उपक्रम दुनिया की 500 सबसे बड़ी कंपनियों में शुमार हैं. गुजरात ने सरकारी उपक्रमों को सफलतापूर्वक चलाने की मिसाल कायम की है. इस तरह मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार चीन की तरह की स्वदेशी नीति पर अमल करेगी, जिससे संघ भी खुश रहेगा.
विरोधी आवाजें
इस तरह स्वदेशी का सिद्धांत बदलती आर्थिक हकीकतों से तालमेल बिठा रहा है. लेकिन स्वदेशी मॉडल के पैरोकारों को कुछ क्षेत्रों में 100 फीसदी एफडीआइ को स्वीकार करने में अभी कुछ वक्त लग सकता है. वैसे, रक्षा क्षेत्र को पूरी तरह खोलने की संभावना से विरोध में आवाजें भी उठने लगी हैं.
आरएसएस के अनुषंगी संगठन भारतीय मजदूर संघ ने राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के प्रस्तावित श्रम सुधारों के खिलाफ प्रदर्शन शुरू कर दिया है. राजे मोदी की करीबी मानी जाती हैं. राजे ने लोगों को नौकरी पर रखने और निकालने के नियमों को आसान बना दिया है. इसका मजदूर यूनियनें भारी विरोध कर रही हैं.
स्वदेशी के पैरोकारों ने कृषि उपकरणों के क्षेत्र को खोलने का भी विरोध किया है, जिसका संकेत प्रधानमंत्री ने दिया था. उनका दावा है कि इससे कृषि का कॉर्पोरेटीकरण शुरू होगा और छोटे किसानों को भारी नुकसान होगा.
मोदी का संतुलन का तरीका
मोदी सरकार अपनी विचारधारा की वजह से नहीं, बल्कि व्यावहारिकतावाद के कारण इतना बहुमत हासिल कर पाई है. और अगर व्यावहारिक अर्थशास्त्र यह कहता है कि ''देश के लिए जो भी अच्छा है” वह स्वदेशी है तो हम विकास के मॉडल को अपना सकते हैं. जैसा कि लॉर्ड देसाई कहते हैं कि स्वदेशी का व्यापक अर्थ सामान्य अर्थव्यवस्था ही है.
देश में किसी प्रधानमंत्री से शायद इतनी उम्मीदें और भरोसा कभी नहीं था. तीसरी पीढ़ी के पूंजीपति हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन के अजित गुलाबचंद कहते हैं, ''वे देश के पहले गैर-समाजवादी प्रधानमंत्री हैं. एक ऐसा शख्स आया है जिसकी आंखों में समृद्ध भारत का सपना है.”
यह कहना शायद स्थिति को कम करके आंकना है कि मोदी के सामने विशाल एजेंडा है. फिलहाल तो मोदी कुर्ते और डिजाइनर जैकेट के साथ हिंदी को सरकारी भाषा बनाने पर जोर देने के साथ नीतियों और मुद्दों पर अपनी स्पष्ट राय से सही संतुलन स्थापित करते दिख रहे हैं. लेकिन अभी ये शुरुआती दिन ही हैं.
असल में आरएसएस के कड़े विरोध के कारण ही सरकार बीमा क्षेत्र में 26 फीसदी से ज्यादा एफडीआइ को मंजूरी नहीं दे पाई और इसके लिए शिक्षा क्षेत्र को नहीं खोल पाई.
एनडीए सरकार 2004 में चुनाव हारने के एक दशक बाद फिर सत्ता में लौट आई है. पिछले दस साल के दौरान माहौल काफी बदल गया है. भूमंडलीकरण ने देश के उपभोक्ताओं की आकांक्षाओं को काफी बढ़ा दिया है. इससे घरेलू उद्योग को भी ताकत मिली, जो अब विदेशी कंपनियों से होड़ लेकर आगे बढ़ रहा है. लिहाजा, अर्थव्यवस्था को और अधिक खोलने के मामले में आरएसएस का विरोध मंदा पड़ा है.
नाम न छापने की शर्त पर आरएसएस के एक विचारक कहते हैं, ''पुराने सरोकारों की ऊंची आवाजें अब नहीं सुनाई देतीं लेकिन कुछ आशंकाएं अब भी हैं.” जाहिर है, सरकार की नीतियों पर अब भी खासा असर रखने वाले आरएसएस को एहसास है कि जमीनी हकीकतें काफी बदल गई हैं.

आरएसएस के प्रवक्ता राम माधव के साथ एक मुलाकात से ही इसका संकेत मिल जाता है. उनके नई दिल्ली कार्यालय में पहुंचने वालों का स्वागत रूह अफ्जा या आम के रस से होता है. उनकी मेज पर एक गोल्ड आइफोन, एक लैपटॉप और मों ब्लां का प्लानर शोभा बढ़ा रहा है.
वे देश की आर्थिक स्वायत्तता और विदेशी निवेश के बीच नाजुक संतुलन बनाने की जरूरत की बातें करते हैं. वे कहते हैं, ''हमारा स्वदेशी का विचार काफी व्यापक है. भारत की आर्थिक स्वायत्तता की रक्षा की जानी चाहिए. जिन क्षेत्रों में रोजगार सृजन की संभावना है, उन्हें एफडीआइ के लिए खोला जाना चाहिए.”
एफडीआइ के प्रति आरएसएस की स्वीकार्यता ऐसे वक्त पर आई है जब यह साफ हो चला है कि नरेंद्र मोदी की सरकार व्यावहारिक नीतियां अपनाएगी और कई नए क्षेत्रों को एफडीआइ के लिए खोलने की सोच रही है. वित्त और रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने संकेत दिया है कि सरकार का इरादा रक्षा उत्पादन क्षेत्र में एफडीआइ की सीमा 26 फीसदी से बढ़ाकर 100 फीसदी करने का है.
अभी तक रक्षा मंत्रालय एफडीआइ की सीमा बढ़ाने का कड़ा विरोध करता आया है. सरकार हाइ स्पीड ट्रेन, उपनगरीय ट्रेन कॉरिडोर, ट्रैक और बंदरगाहों तथा खदानों से जुड़ी रेल लाइनों, ई-कॉमर्स और निर्माण क्षेत्र में एफडीआइ को मंजूरी देने की योजना बना रही है.

पूर्व एनडीए सरकार के दौर के विपरीत अब स्वदेशी अर्थशास्त्र के पैरोकार बुनियादी संरचना और रक्षा जैसे क्षेत्रों में एफडीआइ की जरूरत से सहमत हैं. इन क्षेत्रों में रोजगार सृजन और देश में टेक्नोलॉजी के आधार को व्यापक करने की संभावना है.
लेकिन विभिन्न क्षेत्रों में किस हद तक एफडीआइ को मंजूरी दी जाए, इसे लेकर कुछ आशंकाएं-आपत्तियां हैं. आरएसएस के नेताओं से कई दौर की बातचीत से पता चलता है कि 100 फीसदी एफडीआइ के मामले अपवाद ही होने चाहिए और अगर उनकी चली तो वित्तीय सेवा और शिक्षा के क्षेत्र को विदेशी निवेश से बाहर रखा जाएगा.
लॉर्ड मेघनाद देसाई जैसे मुक्त बाजार के पैरोकार तो आधुनिक दौर के भारत में स्वदेशी के विचार को कतई उपयोगी नहीं मानते, बल्कि उसके प्रति हिकारत का भाव रखते हैं. वे कहते हैं, ''स्वदेशी समय की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं है. अर्थशास्त्र का विचार यह है कि आप चीजों के उत्पादन की चिंता छोड़कर बेहतर बनाने पर अपना ध्यान केंद्रित करें. आरएसएस का एक हिस्सा स्वदेशी पर अटका है मगर आधुनिक विचारों वाले आगे बढ़ चुके हैं. तथाकथित हिंदू राष्ट्रवादी सरकार 100 फीसदी एफडीआइ की बात कर रही है जबकि कभी ये लोग ही विदेशी टेक्नोलॉजी के धुर विरोधी थे.”

बदलाव के साथ
बीजेपी के पूर्व संस्करण जनसंघ और कई अन्य राजनैतिक पार्टियों ने 1970 के दशक में बैंकों में नई तकनीक के इस्तेमाल का कड़ा विरोध किया था. उनकी दलील थी कि इससे बहुत-से क्लर्कों की नौकरी चली जाएगी. इसके विपरीत अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी 'डिजिटल भारत’ निर्माण और आइटी से लैस शहरों की बात करने लगे हैं.
प्रधानमंत्री मोदी प्रशासन में टेक्नोलॉजी को अपनाने वाले पहले नेताओं में हैं. उन्होंने गुजरात में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने से लेकर गांवों के समस्या निवारण के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का इस्तेमाल किया. फिर, देश के इतिहास में पहली दफा अत्याधुनिक प्रचार अभियान चलाया.

आज, आरएसएस के कई विचारक यह दलील देने लगे हैं कि वे हमेशा ही उदारीकरण के पक्षधर रहे हैं. हालांकि आरएसएस की आर्थिक विचारों की शाखा स्वदेशी जागरण मंच (एसजेएम) ने भारत के विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) का सदस्य बनने का विरोध किया था. उसका कहना है कि आरएसएस हमेशा से नेहरूवादी समाजवाद का विरोध करता रहा है और मुक्त बाजार तथा लाइसेंस-कोटा राज के खात्मे का पक्षधर रहा है.

मुक्त उद्यम की पैरोकारी के ही कारण जनसंघ को धनी लोगों की पार्टी कहा जाता था. लेकिन मुक्त बाजार की पैरोकारी के बावजूद बीजेपी हमेशा आर्थिक अंकुश कायम रखने की हिमायती रही है. पूर्व एनडीए सरकार के दौरान पार्टी खासकर जरूरी जिंसों और कृषि तथा पूंजीगत सामान के आयात का विरोध करती रही है.
एसजेएम के सह-संयोजक और आर्थिक विचारक एस. गुरुमूर्ति का मानना है कि बेरोकटोक आयात ही देश में चालू खाते में फायदे से घाटे की स्थिति में पहुंच जाने की एक मुख्य वजह रही है. चालू खाता देश के विदेशी लेन-देन की स्थिति को बताता है. चालू खाते में घाटा बढऩे से महंगाई बढ़ सकती है और देश की मुद्रा का अवमूल्यन हो सकता है. पूर्व एनडीए सरकार के दौरान 1978 के बाद पहली दफा चालू खाता 22 अरब डॉलर फायदे में था.
कांग्रेस की अगुआई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के दौरान 2012-13 में चालू खाते में 89 अरब डॉलर का कारोबार दर्ज किया गया, जो किसी एक वित्त वर्ष में रिकॉर्ड था. यूपीए सरकार ने इसकी वजह सोने और तेल आयात में तेजी बताई. लेकिन गुरुमूर्ति की दलील है कि ऐसा पूंजीगत वस्तुओं के भारी आयात की वजह से था, जो एनडीए के राज में औसतन प्रति साल 10 अरब डॉलर से यूपीए राज के नौ साल (2004/05 से 2012/13) में बढ़कर 65 अरब डॉलर हो गया.
बकौल गुरुमूर्ति, पूंजीगत वस्तुओं के अत्यधिक आयात से उत्पादन क्षेत्र लगभग ठप्प हो गया. वाकई, यूपीए सरकार के पहले चार वर्षों (2004/05 से 2007/08) में औद्योगिक उत्पादन वृद्धि की दर औसतन 11.5 फीसदी रही, जबकि उसके बाद पांच साल में यह वृद्धि दर गिरकर करीब 5 फीसदी पर आ गई. इस बीच, इस अवधि में पूंजीगत वस्तुओं का आयात बढ़ गया.
यह नौ साल के कुल 587 अरब डॉलर में उन पांच साल में ही 407 अरब डॉलर था. ऐसे आंकड़ों से पता चलता है कि उत्पादित सामान का आयात बड़े पैमाने पर हुआ और घरेलू उत्पादन गिर गया. यह स्वदेशी की आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था के बिल्कुल विपरीत है. स्वदेशी कृषि अर्थशास्त्री देविंदर शर्मा कहते हैं, ''हमने आयात को मंजूरी देकर उत्पादन क्षेत्र को चौपट कर लिया. देश में उत्पादन और सेवा क्षेत्र की क्षमता बरकरार रहनी चाहिए.”
लेकिन खासकर खुली अर्थव्यवस्था के पैरोकार कई अर्थशास्त्री उनसे सहमत नहीं हैं. क्रिसिल में मुख्य अर्थशास्त्री तथा वरिष्ठ निदेशक डी.के. जोशी देश में उत्पादन क्षेत्र में गिरावट की वजह पूंजीगत वस्तुओं के आयात को नहीं मानते. वे कहते हैं, ''देश के उत्पादन क्षेत्र में गिरावट की वजह काबिलियत में कमी है, चाहे वह बुनियादी संरचना का मामला हो या बिजली का. हमें अपने उद्योगों को प्रतिस्पर्धी बनाने की जरूरत है.”
नए दौर का स्वदेशी
देश के सकल घरेलू उत्पाद में 50 फीसदी योगदान अब भी असंगठित क्षेत्र का है. 2013-14 के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, करीब 1.14 करोड़ लोग ही कॉर्पोरेट क्षेत्र में काम कर रहे हैं. करीब 90 फीसदी रोजगार असंगठित, अनौपचारिक, गैर-कॉर्पोरेट क्षेत्र में है जो मोटे तौर पर आपसी रिश्तों से चलता है, औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से नहीं. इसी असंगठित क्षेत्र के लिए व्यापक माहौल तैयार करना स्वदेशी का एक अहम पहलू है.
अर्न्स्ट ऐंड यंग से जुड़े नीति परामर्शदाता तथा अर्थशास्त्री डी.के. श्रीवास्तव कहते हैं, ''रक्षा के क्षेत्र में एफडीआइ को मंजूरी देकर वे स्वदेशी की तिलांजलि नहीं दे रहे हैं. रक्षा में एफडीआइ घरेलू उत्पादन की क्षमता बढ़ाएगा, ताकि वह आयात की पूर्ति कर सके. स्वदेशी का आधुनिक स्वरूप अत्याधुनिक घरेलू उत्पादन क्षमता हासिल करना है. बीजेपी ने मान लिया है कि अब भूमंडलीकरण की प्रक्रिया को पलटा नहीं जा सकता इसलिए स्वदेशी का आधुनिक संस्करण सामने है.”
आरएसएस के ज्यादातर वरिष्ठ नेता यह मानते भी हैं. आरएसएस के एक विचारक कहते हैं, ''हम एकल ब्रांड खुदरा कारोबार में विदेशी ब्रांड को मंजूरी देंगे. लेकिन मल्टी ब्रांड खुदरा कारोबार में एफडीआइ को मंजूरी अभी कम-से-कम कुछ वर्षों तक देना जल्दबाजी होगी, उसके बाद ही पर्याप्त आर्थिक अंकुश के साथ इस पर गौर किया जा सकता है.” ऐसे विदेशी निवेश जिनसे छोटे व्यापारियों और बढ़ई, राजमिस्तरी जैसे कारीगरों के काम को नुकसान हो, स्वदेशी की अवधारणा के विपरीत माना जाता है.
गुरुमूर्ति कहते हैं, ''रक्षा में स्वदेशी का विदेशी निवेश से कोई मतलब नहीं है, बल्कि विदेशी टेक्नोलॉजी से है. भारत सबसे बड़े हथियार आयातकों में एक है, लेकिन क्रय क्षमता का इस्तेमाल वह टेक्नोलॉजी खरीदने में नहीं करता है. अगर आप हथियारों के उत्पादन का काम नहीं शुरू करते तो टेक्नोलॉजी पाना संभव नहीं है. विदेशी निवेश से आपके पास टेक्नोलॉजी आ जाती है और उसमें विकास होने लगता है तो फिर कोई मुद्दा नहीं है.”
भारत के डब्ल्यूटीओ का सदस्य बनने का विरोध करने पर एसजेएम की कड़ी आलोचना हुई थी. हालांकि उसका दावा है कि उसकी बात सही साबित हुई है क्योंकि डब्ल्यूटीओ की वार्ता कृषि क्षेत्र में सब्सिडी और औद्योगिक दरों पर सहमति के अभाव में टूट गई है. लेकिन अब यह एहसास भी घर करने लगा है कि भारत को बाकी दुनिया से व्यापार करने की जरूरत है और ऐसा उसे अपनी शर्तों पर करना चाहिए.1970 के दशक में जनसंघ के दिनों में भारत का आयात और निर्यात सकल घरेलू उत्पाद का महज 7 फीसदी था जबकि आज वह करीब एक-चौथाई हो गया है.
पहले भारतीय सामान की खपत पर ज्यादा जोर था और पश्चिमी सामान का विरोध होता था. स्वदेशी सिर्फ उत्पादन क्षमता का ही मामला नहीं है, बल्कि उसका सरोकार यह भी है कि क्या उत्पादन होता है. इसके तहत पश्चिमी सामान की खपत पर अंकुश लगाने की बात भी है लेकिन एसजेएम अब इस पहलू पर ज्यादा जोर नहीं देता. अर्न्स्ट ऐंड यंग से जुड़े अर्थशास्त्री श्रीवास्तव कहते हैं, ''उपभोग के तरीके उत्पादन क्षमता के मुकाबले अधिक तेजी से वैश्विक हो रहे हैं. उपभोक्ता सामान अब काफी घुलमिल गए हैं और अब पहले जैसा विरोध नहीं है.”
अब दुनियाभर के देशों के साथ व्यापार और आर्थिक संबंधों पर नए सिरे से विचार करना होगा क्योंकि मोदी सरकार पहले दिन से ही संबंधों को सुधारने पर जोर दे रही है. एनडीए सरकार ने शपथ ग्रहण समारोह में दक्षिण एशिया के प्रमुखों को बुलाया और दौरे पर आए चीनी वित्त मंत्री से व्यापार और आर्थिक विषयों पर बातचीत की. अर्थशास्त्री श्रीवास्तव कहते हैं, ''हम दोनों ही मामलों में दूसरों पर निर्भर हैं. हमें उत्पादन के संसाधनों को लाने की जरूरत है और अपने माल को विदेश में बेचने की जरूरत है.”
भले ही बीजेपी के चुनाव घोषणापत्र में आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए खास योजना नहीं पेश की गई थी, लेकिन मोदी सरकार गुजरात की आर्थिक नीतियों से सबक ले सकती है. वह आर्थिक राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादी आर्थिक एजेंडा अपना सकती है. मोदी के गुजरात में आत्मनिर्भरता के नेहरूवादी मॉडल को अपनाया गया. मजेदार बाद यह है कि उस मॉडल को कांग्रेस ने ढाई दशक पहले छोड़ दिया था. गुजरात के पांच सरकारी उपक्रम दुनिया की 500 सबसे बड़ी कंपनियों में शुमार हैं. गुजरात ने सरकारी उपक्रमों को सफलतापूर्वक चलाने की मिसाल कायम की है. इस तरह मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार चीन की तरह की स्वदेशी नीति पर अमल करेगी, जिससे संघ भी खुश रहेगा.
विरोधी आवाजें
इस तरह स्वदेशी का सिद्धांत बदलती आर्थिक हकीकतों से तालमेल बिठा रहा है. लेकिन स्वदेशी मॉडल के पैरोकारों को कुछ क्षेत्रों में 100 फीसदी एफडीआइ को स्वीकार करने में अभी कुछ वक्त लग सकता है. वैसे, रक्षा क्षेत्र को पूरी तरह खोलने की संभावना से विरोध में आवाजें भी उठने लगी हैं.
आरएसएस के अनुषंगी संगठन भारतीय मजदूर संघ ने राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के प्रस्तावित श्रम सुधारों के खिलाफ प्रदर्शन शुरू कर दिया है. राजे मोदी की करीबी मानी जाती हैं. राजे ने लोगों को नौकरी पर रखने और निकालने के नियमों को आसान बना दिया है. इसका मजदूर यूनियनें भारी विरोध कर रही हैं.
स्वदेशी के पैरोकारों ने कृषि उपकरणों के क्षेत्र को खोलने का भी विरोध किया है, जिसका संकेत प्रधानमंत्री ने दिया था. उनका दावा है कि इससे कृषि का कॉर्पोरेटीकरण शुरू होगा और छोटे किसानों को भारी नुकसान होगा.
मोदी का संतुलन का तरीका
मोदी सरकार अपनी विचारधारा की वजह से नहीं, बल्कि व्यावहारिकतावाद के कारण इतना बहुमत हासिल कर पाई है. और अगर व्यावहारिक अर्थशास्त्र यह कहता है कि ''देश के लिए जो भी अच्छा है” वह स्वदेशी है तो हम विकास के मॉडल को अपना सकते हैं. जैसा कि लॉर्ड देसाई कहते हैं कि स्वदेशी का व्यापक अर्थ सामान्य अर्थव्यवस्था ही है.
देश में किसी प्रधानमंत्री से शायद इतनी उम्मीदें और भरोसा कभी नहीं था. तीसरी पीढ़ी के पूंजीपति हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन के अजित गुलाबचंद कहते हैं, ''वे देश के पहले गैर-समाजवादी प्रधानमंत्री हैं. एक ऐसा शख्स आया है जिसकी आंखों में समृद्ध भारत का सपना है.”
यह कहना शायद स्थिति को कम करके आंकना है कि मोदी के सामने विशाल एजेंडा है. फिलहाल तो मोदी कुर्ते और डिजाइनर जैकेट के साथ हिंदी को सरकारी भाषा बनाने पर जोर देने के साथ नीतियों और मुद्दों पर अपनी स्पष्ट राय से सही संतुलन स्थापित करते दिख रहे हैं. लेकिन अभी ये शुरुआती दिन ही हैं.

