आप राजस्थान की चिंता करिए, मुझे देश की चिंता करने दीजिए.” प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने से पहले 26 मई को करीब 11 से 12 बजे के बीच दिल्ली के गुजरात भवन में हुई मुलाकात में नरेंद्र मोदी ने राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से जब यह बात कही तो साफ संकेत था कि वे अपनी कैबिनेट पर वंशवाद का साया नहीं पडऩे देंगे.
बीजेपी के उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक, मोदी के इस अंदाज की वजह थी राजे की ओर से अपने पुत्र दुष्यंत सिंह को कैबिनेट में शामिल करवाने की जिद. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, ''ऐसा संभव नहीं था क्योंकि मोदी ने अपने पूरे चुनाव प्रचार में मां-बेटे की सरकार (सोनिया गांधी-राहुल गांधी) कहकर कांग्रेस पर खूब तंज कसे थे.”
सूबे की सभी 25 सीटों पर बीजेपी की फतह के बाद सिर्फ निहालचंद को राज्यमंत्री बनाने से राजे की नाराजगी लाजिमी है. लेकिन शपथ ग्रहण के दिन मंत्री पद के दावेदारों को पहले अपने बेटे दुष्यंत के घर बुलाना, फिर शाम को सभी सांसदों को बीकानेर हाउस तलब करने की उनकी रणनीति से बीजेपी आलाकमान की सांसें अटक गई थीं.
शुरुआत में इसे शपथ ग्रहण के बायकॉट की रणनीति के तौर पर देखा गया, जिसके बाद बीजेपी के कुछ नेताओं ने राजे से बात की. सूत्रों का दावा है कि इस दखल के बाद बीकानेर हाउस में हुई बैठक में राजे ने नाराजगी की बजाए कैबिनेट विस्तार में राज्य को समुचित प्रतिनिधित्व मिलने की उम्मीद जताई. तीन से चार मंत्रियों को मंत्रिमंडल में शामिल कराने का अपना इरादा जताने के साथ ही राजे ने इंडिया टुडे को बताया, ''एक अनुसूचित जाति, एक वरिष्ठ, एक योग्यता के आधार पर और एक ऐसा सांसद जो वरिष्ठ एमएलए या राज्य सरकार में मंत्री रहा हो, को मंत्रिमंडल में जगह दी जाए.”

राजे ने इस बात से साफ इनकार किया कि उन्होंने अपने बेटे दुष्यंत के लिए पैरवी की या गुस्से में कोई बैठक बुलाई. बीजेपी के प्रभारी कप्तान सिंह सोलंकी ने बीकानेर हाउस में सांसदों को इकट्ठा किए जाने को एक साथ शपथ ग्रहण में जाने की तैयारी बताया.
सोलंकी मंत्री पद के लिए किसी तरह की जिद या मुख्यमंत्री के अडऩे की बात से इनकार करते हैं. लेकिन वे यह भी कहते हैं, ''कैबिनेट में राजस्थान का प्रतिनिधित्व कम है, इस बात को पार्टी मानती है. पार्टी के कई मंचों पर यह बात उठी है और उम्मीद ही नहीं, हमें विश्वास है कि कैबिनेट विस्तार में राज्य को जगह मिलेगी.” उनकी इस स्वीकारोक्ति से साफ है कि शपथ ग्रहण के दिन राजस्थान को लेकर जिस तरह हाइ-वोल्टेज ड्रामा चला, उससे बीजेपी की मुश्किलें बढ़ गई थीं.
सूत्रों के मुताबिक, राजे ने 22 मई को गुजरात की नई मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल के शपथ ग्रहण समारोह में मोदी से दुष्यंत के लिए निजी तौर पर पैरवी की. इसके बाद राजे ने दुष्यंत को तीसरी बार चुना गया वरिष्ठ सांसद और जाट-राजपूत दोनों सामाजिक समीकरण में मुफीद चेहरा बताकर उनका नाम आगे बढ़ाया. बीजेपी के एक बड़े रणनीतिकार का दावा है, ''जब दुष्यंत के नाम पर मोदी राजी नहीं हुए तो राजे ने हिमाचल से अनुराग सिंह ठाकुर को लेकर सवाल उठा दिए.”
इसी वजह से ठाकुर ही नहीं, उन सभी नेता पुत्रों का पत्ता कट गया जो उम्मीद पाले बैठे थे. हालांकि राजस्थान से करीब आधा दर्जन नाम कैबिनेट के लिए सुझए गए थे. इनमें दुष्यंत सिंह, सी.आर. चौधरी, सांवरलाल जाट, निहालचंद, राज्यवर्धन सिंह राठौड़, राज्यसभा सांसद रामनारायण डूडी आदि के नाम शामिल थे.
दरअसल राजे ने सामाजिक समीकरण के लिहाज से एक ही समुदाय से दो-दो नाम दिए थे. आदिवासी समाज से एक राज्यमंत्री तय था, लेकिन जाट और राजपूत समाज को लेकर राजे की दलील थी कि इन दोनों समाज से एक साथ मंत्री बनाया जाए वरना इसका गलत संदेश जाएगा. सूत्रों के मुताबिक राजे की रणनीतिक जिद को देखते हुए ही मोदी ने तीन बार के सांसद दुष्यंत की जगह चौथी बार चुने गए निहालचंद को शपथ लेने का न्योता देकर संदेश दे दिया कि मानदंडों से कोई समझैता नहीं होगा.
राजे की नाराजगी की वजह प्रधानमंत्री मोदी की ओर से बीजेपी से निष्कासित और राजे विरोधी नेता जसवंत सिंह को चिट्ठी लिखने की खबरों से भी है. यह भी संयोग है कि 2009 के चुनाव में बीजेपी हारी तो विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष से इस्तीफा देने के मुद्दे पर राजे का राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह से चार महीने तक खुला टकराव चला था और अब राज्य से 25 सांसद जीते हैं फिर भी टकराव की स्थिति बन गई है. अब भले राजस्थान से कुछ और मंत्री बन जाएं लेकिन आने वाले समय में राज्य बीजेपी के राजनैतिक समीकरण में कुछ बदलाव दिख सकते हैं. जाहिर है, इस पूरे प्रकरण में रानी के हठ को ठेस तो लगी ही है.
बीजेपी के उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक, मोदी के इस अंदाज की वजह थी राजे की ओर से अपने पुत्र दुष्यंत सिंह को कैबिनेट में शामिल करवाने की जिद. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, ''ऐसा संभव नहीं था क्योंकि मोदी ने अपने पूरे चुनाव प्रचार में मां-बेटे की सरकार (सोनिया गांधी-राहुल गांधी) कहकर कांग्रेस पर खूब तंज कसे थे.”
सूबे की सभी 25 सीटों पर बीजेपी की फतह के बाद सिर्फ निहालचंद को राज्यमंत्री बनाने से राजे की नाराजगी लाजिमी है. लेकिन शपथ ग्रहण के दिन मंत्री पद के दावेदारों को पहले अपने बेटे दुष्यंत के घर बुलाना, फिर शाम को सभी सांसदों को बीकानेर हाउस तलब करने की उनकी रणनीति से बीजेपी आलाकमान की सांसें अटक गई थीं.
शुरुआत में इसे शपथ ग्रहण के बायकॉट की रणनीति के तौर पर देखा गया, जिसके बाद बीजेपी के कुछ नेताओं ने राजे से बात की. सूत्रों का दावा है कि इस दखल के बाद बीकानेर हाउस में हुई बैठक में राजे ने नाराजगी की बजाए कैबिनेट विस्तार में राज्य को समुचित प्रतिनिधित्व मिलने की उम्मीद जताई. तीन से चार मंत्रियों को मंत्रिमंडल में शामिल कराने का अपना इरादा जताने के साथ ही राजे ने इंडिया टुडे को बताया, ''एक अनुसूचित जाति, एक वरिष्ठ, एक योग्यता के आधार पर और एक ऐसा सांसद जो वरिष्ठ एमएलए या राज्य सरकार में मंत्री रहा हो, को मंत्रिमंडल में जगह दी जाए.”

राजे ने इस बात से साफ इनकार किया कि उन्होंने अपने बेटे दुष्यंत के लिए पैरवी की या गुस्से में कोई बैठक बुलाई. बीजेपी के प्रभारी कप्तान सिंह सोलंकी ने बीकानेर हाउस में सांसदों को इकट्ठा किए जाने को एक साथ शपथ ग्रहण में जाने की तैयारी बताया.
सोलंकी मंत्री पद के लिए किसी तरह की जिद या मुख्यमंत्री के अडऩे की बात से इनकार करते हैं. लेकिन वे यह भी कहते हैं, ''कैबिनेट में राजस्थान का प्रतिनिधित्व कम है, इस बात को पार्टी मानती है. पार्टी के कई मंचों पर यह बात उठी है और उम्मीद ही नहीं, हमें विश्वास है कि कैबिनेट विस्तार में राज्य को जगह मिलेगी.” उनकी इस स्वीकारोक्ति से साफ है कि शपथ ग्रहण के दिन राजस्थान को लेकर जिस तरह हाइ-वोल्टेज ड्रामा चला, उससे बीजेपी की मुश्किलें बढ़ गई थीं.
सूत्रों के मुताबिक, राजे ने 22 मई को गुजरात की नई मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल के शपथ ग्रहण समारोह में मोदी से दुष्यंत के लिए निजी तौर पर पैरवी की. इसके बाद राजे ने दुष्यंत को तीसरी बार चुना गया वरिष्ठ सांसद और जाट-राजपूत दोनों सामाजिक समीकरण में मुफीद चेहरा बताकर उनका नाम आगे बढ़ाया. बीजेपी के एक बड़े रणनीतिकार का दावा है, ''जब दुष्यंत के नाम पर मोदी राजी नहीं हुए तो राजे ने हिमाचल से अनुराग सिंह ठाकुर को लेकर सवाल उठा दिए.”
इसी वजह से ठाकुर ही नहीं, उन सभी नेता पुत्रों का पत्ता कट गया जो उम्मीद पाले बैठे थे. हालांकि राजस्थान से करीब आधा दर्जन नाम कैबिनेट के लिए सुझए गए थे. इनमें दुष्यंत सिंह, सी.आर. चौधरी, सांवरलाल जाट, निहालचंद, राज्यवर्धन सिंह राठौड़, राज्यसभा सांसद रामनारायण डूडी आदि के नाम शामिल थे.
दरअसल राजे ने सामाजिक समीकरण के लिहाज से एक ही समुदाय से दो-दो नाम दिए थे. आदिवासी समाज से एक राज्यमंत्री तय था, लेकिन जाट और राजपूत समाज को लेकर राजे की दलील थी कि इन दोनों समाज से एक साथ मंत्री बनाया जाए वरना इसका गलत संदेश जाएगा. सूत्रों के मुताबिक राजे की रणनीतिक जिद को देखते हुए ही मोदी ने तीन बार के सांसद दुष्यंत की जगह चौथी बार चुने गए निहालचंद को शपथ लेने का न्योता देकर संदेश दे दिया कि मानदंडों से कोई समझैता नहीं होगा.
राजे की नाराजगी की वजह प्रधानमंत्री मोदी की ओर से बीजेपी से निष्कासित और राजे विरोधी नेता जसवंत सिंह को चिट्ठी लिखने की खबरों से भी है. यह भी संयोग है कि 2009 के चुनाव में बीजेपी हारी तो विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष से इस्तीफा देने के मुद्दे पर राजे का राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह से चार महीने तक खुला टकराव चला था और अब राज्य से 25 सांसद जीते हैं फिर भी टकराव की स्थिति बन गई है. अब भले राजस्थान से कुछ और मंत्री बन जाएं लेकिन आने वाले समय में राज्य बीजेपी के राजनैतिक समीकरण में कुछ बदलाव दिख सकते हैं. जाहिर है, इस पूरे प्रकरण में रानी के हठ को ठेस तो लगी ही है.

