उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के बहेड़ी गांव में 26 जनवरी की दोपहर तक कुछ खास नहीं था. 35 साल के देवेंद्र सैनी अपनी पत्नी सुमन और दो बच्चों के साथ गन्ने के खेत में मसरूफ थे. तभी उनकी 12 साल की बेटी आकर पिता के गले से लिपट गई. देवेंद्र ने प्यार से बेटी के गाल पर चपत लगाई और कहा, ‘‘चल काम करने दे.’’ पूरा परिवार मुस्करा दिया.
बिटिया कुलांचें भरती दूर चली गई. लेकिन यह क्या? दो घड़ी बाद उसने नजर उठाई तो देखा कि पिता देवेंद्र गायब. 14 साल का बेटा खोजने गया तो कोई 200 कदम दूर खून से सना देवेंद्र का स्वेटर पड़ा था. पूरे परिवार को सांप सूंघ गया. वे जानते थे कि यह वक्त रोने का नहीं है. सब पीछे लौट गए. उनके सिर पर मौत मंडरा रही थी. हो न हो, यह नरभक्षी बाघिन का काम था.
आधा किलोमीटर तक बदहवास भागने के बाद सुमन की आंख से पहला आंसू टपका औैर परिवार मदद के लिए चिल्लाया. आसपास के खेतों से लोग जमा हो गए. शोर मचाया. लोग खेतों से सटे जंगल के इलाके की तरफ बढ़े. थोड़ी दूर खून से लथपथ देवेंद्र की लाश मिली. उसका पेट और जांघ खाई जा चुकी थी.
अब किसी को कोई शक नहीं था कि 26 दिसंबर 2013 से संभल जिले से शुरू हुआ नरभक्षी बाघिन का मौत का सफर उनके दरवाजे तक आ चुका था. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव के संसदीय क्षेत्र वाले जिले संभल, उत्तर प्रदेश के कद्दावर मंत्री आजम खान के गृह जिले रामपुर, क्रिकेट के महारथी मोहम्मद अजहरुद्दीन के संसदीय क्षेत्र वाले जिले मुरादाबाद और मुख्यमंत्री हरीश रावत के उत्तराखंड के कालागढ़ टाइगर रिजर्व के बाद बिजनौर में यह बाघिन का आठवां शिकार था.
और हर शिकार की तरह इस बार भी बाघिन ऐसे छलावे की तरह आई कि उसकी सरसराहट या कदमों की आहट तक कोई नहीं सुन पाया. यहां तक कि इस 200 किलो की किलिंग मशीन के सामने मरने वाला आखिरी चीख तक नहीं निकाल सका. बाद में पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि बाघिन को देखकर देवेंद्र इस कदर डर गया कि हमला होने से पहले ही हार्ट अटैक से उसकी मौत हो गई. वही बाघिन अब तक दो नेशनल हाइवे, कई छोटी-छोटी नदियों, गन्ने के हजारों खेतों और 150 किमी का खूनी रास्ता तय कर जिम कॉर्बेट पार्क के मुहाने पर थी.

(इन्हीं रास्तों में बरपाया बाघिन ने कहर)
खामोश, कातिल गश्त पर है
वन विभाग के हाथ-पैर फूल गए. लोग गुस्से से उबल पड़े. विभाग के आला अफसर उन्हें समझाने आए, लेकिन बात बिगड़ गई. आखिर हो भी क्यों न. बिजनौर जिले की बढ़ापुर और साहूवाला वन रेंज उत्तराखंड के कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से सटी हैं. इस इलाके से ही घने वनों से लदी शिवालिक की पहाडिय़ां शुरू होती हैं. यह एक भौगोलिक सरहद है जहां गन्ने के खेतों से पटे मैदान अचानक खत्म होते हैं और एक झटके में जंगल शुरू हो जाता है.
आदमी का मुंह खेत की ओर तथा पीठ जंगल की तरफ होती है. छोटी-छोटी बस्तियां इसी तरह बसी हैं. किसी बाघिन के लिए यह सबसे महफूज शिकारगाह है. जब जी चाहे, जंगल से छलांग लगाए. खेत में काम करते किसान, मवेशी चराते चरवाहे या लोकगीत गाती देहाती महिलाओं पर घात लगाए, और पलक झपकते जंगल के सन्नाटे में गुम हो जाए.
हजारों हेक्टेयर में फैला जंगल और जंगलात महकमे के पास 20-25 आदमियों का मामूली स्टाफ है. कुछ पुरानी जीपें और जंग लगी बंदूकें. यह सब इतना नाकाफी है कि अगर वन विभाग का कोई अफसर फील्ड विजिट पर निकल जाए तो उसी की सुरक्षा में पूरा अमला खर्च हो जाता है. ऐसे में बाघिन को पकड़े या मारे कौन?

(साहूवाला में हाथी से हो रही बाघिन की खोज)
हाथ से फिसला मौका
उम्मीद की किरण जगी, हैदराबाद से आए मशहूर शिकारी 52 वर्षीय नवाब शहाफत अली खान के रूप में. जंगल की दुनिया में इस शिकारी का जाना-पहचाना नाम है. 2009 में इसी शिकारी ने फैजाबाद जिले की अवध फॉरेस्ट रेंज में इसी तरह नरभक्षी हो चुकी एक बाघिन को मार गिराया था. तब नवाब ने लगातार 35 दिन तक बाघिन का पीछा किया और अंत में इस राजसी जानवर की दोनों आंखों के बीच अपनी विनचेस्टर 458 मैग्नम राइफल से गोली मारकर वह काम पूरा किया.
जिसे करने को उनका दिल नहीं चाहता. बाघिन के ताजा हमले के तुरंत बाद नवाब ने कहा, ‘‘हम बाघिन के बहुत करीब पहुंच चुके हैं. यहां पास में एक नदी बहती है, जहां शाम पांच बजे के करीब बाघिन रोज गुजरती है. हमने वह जगह भी तय कर ली है जहां मचान बांधना है. मैं 24 घंटे में बाघिन को मार गिराऊंगा.’’
गांववाले भी देवेंद्र की लाश तब तक नहीं उठाने पर अड़े थे, जब तक कि बाघिन नहीं मर जाती. लेकिन नवाब का बाघिन को मारने का परमिट रद्द कर दिया गया. नवाब ने कहा, ‘‘मैं अपनी आंखों के सामने और मौतें नहीं देख सकता. 5-7 रोज में बाघिन फिर शिकार करेगी.’’ और नवाब चले गए.
मेनका का दबाव
इस बात की तस्दीक आंवला से सांसद और मशहूर पर्यावरणविद् मेनका गांधी करती हैं. मेनका ने इंडिया टुडे को बताया, ‘‘मैंने जैसे तैसे हैदराबाद के शिकारी को वापस कराया, लेकिन अब तो न जाने कितने शिकारी बाघिन को मारने के लिए छोड़ दिए हैं. क्या इनसान जानवर से बदला लेना चाहता है?’’ उन्होंने याद दिलाया कि देश में महज 400 बाघिन बची हैं.
ऐसे में इसे बेहोश कर चिडिय़ाघर में भेज दिया जाए ताकि वह भविष्य में प्रजनन कर सके. वैसे भी यह 3-4 साल की युवा बाघिन है. इसके बाद दुधवा नेशनल पार्क से आई ट्रैंक्युलाइजर टीम पर फिर से फोकस हो गया. अमानगढ़ फॉरेस्ट रेंज से जो दो हथिनी-पुष्पाकली और गंगाकली-कुछ रोज पहले इसलिए मंगाई गई थीं कि नवाब उनकी मदद से बाघिन तक पहुंचें, अब ट्रैंक्युलाइजर टीम को दे दी गईं.
बाघों की रक्षा के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे भोपाल के पर्यावरण कार्यकर्ता अजय दुबे का तर्क है, ‘‘यह बाघिन तो बफर जोन में शिकार कर रही है. आदमी जंगल में घुसता ही जा रहा है तो बाघ क्या करे?’’ देश में पिछले साल 63 बाघ मारे गए और इनमें से 48 अवैध शिकार की भेंट चढ़े.
इस साल के शुरुआती दो महीने में अब तक 10 बाघ मारे जा चुके हैं और इनमें से 9 की मौत के कारणों की अभी जांच ही चल रही है. पर्यावरण कार्यकर्ता अपनी जगह सही हैं और गांववालों की दहशत भी सोलह आने खरी है. ऐसे में वन विभाग से और ज्यादा प्रोफेशनल रवैए की उम्मीद की जाती है, जो कहीं नहीं दिखी.
सिर पर मंडराने लगी मौत
ऐसे में नवाब की बात पत्थर की लकीर साबित हुई. नौ दिन बाद 6 फरवरी को बढ़ापुर से सटी साहूवाला रेंज में दिन-दहाड़े मौत की बिजली चमकी. बूढ़ा चरवाहा लाल सिंह गाय-भैंस चराने जंगल में गया था. गोधूलि वेला हुई और मवेशी घर लौट आए, लेकिन लाल सिंह नहीं लौटे. अगले दिन गांववाले खोजने निकले.
जंगल में उसकी लाठी, पगड़ी और फटी हुई धोती मिली. लाश के नाम पर गोश्त के कुछ टुकड़े ही दिखे. बाघिन लाल सिंह को पूरा खा गई थी. इसके बाद दो रोज तक बिजनौर में उसके 11-13 वर्ग सेमी वाले पंजे के निशान नहीं मिले. वन विभाग और क्या चाहता था?

(नजीबाद रेंज में अनमैन्ड एरियल वेहिकल से खोज)
26 जनवरी के बाद से ही बाघिन के लिए जंगलों की खाक छान रहे स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ता आबिद रजा की सुनें, ‘‘यहां तो हर रेंज और हर जिले का वन अफसर यही आस लगाए बैठा है कि भगवान करे, बाघिन उनकी रियासत से निकल जाए. आदमी मरे या जिए, उनकी नौकरी बची रहे.’’
तीन दिन बाद 9 फरवरी को बाघिन उत्तराखंड में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से सटे कालागढ़ टाइगर रिजर्व में अब तक के सबसे खौफनाक अंदाज में नमूदार हुई. मजदूर रामचरण एक ठेकेदार की गाड़ी में बैठकर काम पर जा रहा था. रास्ते में वह पेशाब करने के लिए गाड़ी से उतरा.
वह जैसे ही सड़क किनारे झाडिय़ों में गया कि उसके बाद उसे मुंह में दबाए बाघिन जंगल की तरफ भागती दिखी. अपने नौवें शिकार लाल सिंह का 50 किलो से ज्यादा गोश्त खाने के बाद वह भूखी नहीं थी, इसलिए उसने रामचरण को मार तो डाला, लेकिन खाया नहीं. यानी बाघिन अब पेट भरने के लिए ही नहीं, शौकिया भी शिकार कर रही है.

(बिजनौर जिले की बढ़ापुर रेंज में मचान पर मुश्तैद वनकर्मी)
हाथी, पिंजरा और ड्रोन
लोगों में डर बढ़ता जा रहा है. और वन विभाग बाघिन को पकडऩे का ‘‘पीपली लाइव’’ भी बढ़ाता जा रहा है. 10 से 15 फरवरी के बीच साहूवाला रेंज के कंपार्टमेंट 10 और 11 में बाघिन के पंजों के निशान लगातार देखे गए, लेकिन वन विभाग का पिंजरा बढ़ापुर रेंज के कंपार्टमेंट पांच में ही लगा रहा. हद तो तब हो गई जब पिंजरे से बकरे को निकालकर उसमें एक पुतला रख दिया गया.
इस पिंजरे से कोई 100 कदम दूर पेड़ पर मचान भी बना दिया गया. बढ़ापुर रेंज के 58 वर्षीय रेंजर उम्मेद हसन हाथ में बंदूक लिए डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की गाड़ी से उतरे क्योंकि उनकी इकलौती सरकारी गाड़ी रास्ते में पंक्चर हो गई थी. उन्होंने हांफते हुए बताया कि रिटायरमेंट के करीब की उम्र में उन्हें कितनी मेहनत करनी पड़ रही है. लेकिन वे यह नहीं बता पाए कि जब पांच दिन से बाघिन दूसरे इलाके में है तो पिंजरा यहां क्या नुमाइश के लिए लगाया गया है?
दरअसल, पूरा मामला ऐसे ही चल रहा है. शिकारियों को यह पता नहीं है कि वन विभाग क्या चाहता है, एक जिले के अफसर दूसरे जिले के अफसरों के संपर्क में नहीं हैं और यही हाल एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश के बीच है. ऐसी कोई संयुक्त टीम या कंट्रोल रूम नहीं है जो बाघिन जैसे चालाक जीव को पकडऩे में मुस्तैदी दिखाए.

(बढ़ापुर रेंज के बहेड़ी गांव में बाघिन के लिए लगा पिंजरा)
नजीबाबाद के दफ्तर में बैठे बिजनौर के जिला वन अधिकारी (डीएफओ) प्रवीण राघव बड़ी ढिठाई से यह बात स्वीकार करते हैं, ‘‘बाघिन उत्तराखंड में चली जाती है तो वहां का विभाग उसके बारे में देखता है. दोनों राज्यों में कोऑर्डिनेशन कमेटी नहीं बनी है. हम पूरी कोशिश कर रहे हैं.’’ इस सवाल पर कि ट्रैंक्युलाइजर टीम कहीं घूम रही है, शिकारी कहीं और गश्त लगा रहे हैं, पिंजरा कहीं लगा है और आप कहीं और बैठे हैं.
ऐसे में अगर किसी को बाघिन दिख भी जाए तो उसे कैसे मार या पकड़ पाएंगे, डीएफओ साहब का जवाब सुनिए, ‘‘ट्रैंक्युलाइजर करने वाली टीम को तुरंत बुला लिया जाएगा.’’ यही हाल जिम कॉर्बेट पार्क के प्रबंधन का है. पार्क के डिप्टी डायरेक्टर साकेत बडोला कहते हैं, ‘‘बाघिन के होने के कोई संकेत नहीं मिले हैं. पग मार्क भी नहीं देखे गए.’’
अधिकारी यह भी बताने की स्थिति में नहीं हैं कि बाघिन के नरभक्षी होने की संभावित वजह क्या है. शिकारी कुंवर राणा प्रताप ने बाघिन के मुंह में कोई बीमारी होने या फिर उसके पिछले बाएं पैर में चोट होने की आशंका जताई, लेकिन ठोस कुछ नहीं है.
वन विभाग की यह हीला-हवाली जैसे कुछ कम थी. सो, बिजनौर के बीएसपी विधायक महमूद गाजी अपने चितकबरे घोड़े को लेकर खेतों में बंदूक लेकर उतर गए. उनके साथ बंदूकधारियों की टुकड़ी चल रही है. गाजी यह तमाशा तब कर रहे हैं जबकि यह जाना-माना तथ्य है कि घोड़ा शेर को देखते ही भाग जाता है. यह सब ड्रामा चल ही रहा था कि 19 फरवरी को एक विशेष टीम ने अनमैन्ड एरियल वेहिकल को बिजनौर के जंगलों के ऊपर से उड़ाया.
खिलौने जैसे इस छोटे विमान में कैमरे और सेंसर लगे हैं, जो विमान की नीची उड़ान के दौरान बाघिन का सुराग दे सकते हैं. उधर, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बाघिन के हमले में मरे लोगों को एक लाख रु. की बजाए पांच लाख रु. मुआवजा देने की घोषणा की है. लाल सिंह और देवेंद्र के परिजनों को 20 फरवरी को मुआवजा दिया गया.

(बाघ के हमले में मारे गए देवेंद्र की पत्नी सुमन और दो बच्चे)
कैसे होगा खूनी खेल का अंत
लेकिन मुआवजा कोई समाधान नहीं है. बाघिन इस वसंत में तराई के जंगलों में बेखटके घूम रही है. लोग इस कदर डरे हुए हैं कि रात में बिल्ली भी अगर छप्पर के ऊपर से गुजर जाए तो समझते हैं, बाघिन आ गई. वन विभाग बातें बना रहा है. नरभक्षी को मारने का ताव रखने वाला शिकारी वापस जा चुका है. अब जंगलों की खाक वे 5 शिकारी छान रहे हैं जिन्होंने जिंदगी में एक भी बाघ नहीं मारा. अजय दुबे सवाल करते हैं, ‘‘बाघ को मारा ही क्यों जाए? ’’
वे पूछते हैं, ‘‘आखिर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद बाघों के संरक्षण के लिए विशेष फोर्स क्यों नहीं बनाई गई है. जंगलों की कटाई क्यों नहीं रुक रही.’’ देश में 1,706 बाघ ही तो बचे हैं. आदमी के साथ ही अब बाघ की जान भी अनमोल है.
बहरहाल, बाघिन जब तक जिंदा है, उसे अपना पेट भी भरना है. वन विभाग जब तक बाघिन का पता नहीं लगाता, तब तक देवेंद्र और सुमन जैसा हंसता-खेलता परिवार खूनी पंजे की चपेट में न आए, इसकी दुआ ही की जा सकती है. दुआ इसलिए भी करनी पड़ेगी क्योंकि वन विभाग ने दो महीने में कुछ भी ठोस नहीं किया है.
बिटिया कुलांचें भरती दूर चली गई. लेकिन यह क्या? दो घड़ी बाद उसने नजर उठाई तो देखा कि पिता देवेंद्र गायब. 14 साल का बेटा खोजने गया तो कोई 200 कदम दूर खून से सना देवेंद्र का स्वेटर पड़ा था. पूरे परिवार को सांप सूंघ गया. वे जानते थे कि यह वक्त रोने का नहीं है. सब पीछे लौट गए. उनके सिर पर मौत मंडरा रही थी. हो न हो, यह नरभक्षी बाघिन का काम था.
आधा किलोमीटर तक बदहवास भागने के बाद सुमन की आंख से पहला आंसू टपका औैर परिवार मदद के लिए चिल्लाया. आसपास के खेतों से लोग जमा हो गए. शोर मचाया. लोग खेतों से सटे जंगल के इलाके की तरफ बढ़े. थोड़ी दूर खून से लथपथ देवेंद्र की लाश मिली. उसका पेट और जांघ खाई जा चुकी थी.
अब किसी को कोई शक नहीं था कि 26 दिसंबर 2013 से संभल जिले से शुरू हुआ नरभक्षी बाघिन का मौत का सफर उनके दरवाजे तक आ चुका था. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव के संसदीय क्षेत्र वाले जिले संभल, उत्तर प्रदेश के कद्दावर मंत्री आजम खान के गृह जिले रामपुर, क्रिकेट के महारथी मोहम्मद अजहरुद्दीन के संसदीय क्षेत्र वाले जिले मुरादाबाद और मुख्यमंत्री हरीश रावत के उत्तराखंड के कालागढ़ टाइगर रिजर्व के बाद बिजनौर में यह बाघिन का आठवां शिकार था.
और हर शिकार की तरह इस बार भी बाघिन ऐसे छलावे की तरह आई कि उसकी सरसराहट या कदमों की आहट तक कोई नहीं सुन पाया. यहां तक कि इस 200 किलो की किलिंग मशीन के सामने मरने वाला आखिरी चीख तक नहीं निकाल सका. बाद में पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि बाघिन को देखकर देवेंद्र इस कदर डर गया कि हमला होने से पहले ही हार्ट अटैक से उसकी मौत हो गई. वही बाघिन अब तक दो नेशनल हाइवे, कई छोटी-छोटी नदियों, गन्ने के हजारों खेतों और 150 किमी का खूनी रास्ता तय कर जिम कॉर्बेट पार्क के मुहाने पर थी.

(इन्हीं रास्तों में बरपाया बाघिन ने कहर)
खामोश, कातिल गश्त पर है
वन विभाग के हाथ-पैर फूल गए. लोग गुस्से से उबल पड़े. विभाग के आला अफसर उन्हें समझाने आए, लेकिन बात बिगड़ गई. आखिर हो भी क्यों न. बिजनौर जिले की बढ़ापुर और साहूवाला वन रेंज उत्तराखंड के कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से सटी हैं. इस इलाके से ही घने वनों से लदी शिवालिक की पहाडिय़ां शुरू होती हैं. यह एक भौगोलिक सरहद है जहां गन्ने के खेतों से पटे मैदान अचानक खत्म होते हैं और एक झटके में जंगल शुरू हो जाता है.
आदमी का मुंह खेत की ओर तथा पीठ जंगल की तरफ होती है. छोटी-छोटी बस्तियां इसी तरह बसी हैं. किसी बाघिन के लिए यह सबसे महफूज शिकारगाह है. जब जी चाहे, जंगल से छलांग लगाए. खेत में काम करते किसान, मवेशी चराते चरवाहे या लोकगीत गाती देहाती महिलाओं पर घात लगाए, और पलक झपकते जंगल के सन्नाटे में गुम हो जाए.
हजारों हेक्टेयर में फैला जंगल और जंगलात महकमे के पास 20-25 आदमियों का मामूली स्टाफ है. कुछ पुरानी जीपें और जंग लगी बंदूकें. यह सब इतना नाकाफी है कि अगर वन विभाग का कोई अफसर फील्ड विजिट पर निकल जाए तो उसी की सुरक्षा में पूरा अमला खर्च हो जाता है. ऐसे में बाघिन को पकड़े या मारे कौन?

(साहूवाला में हाथी से हो रही बाघिन की खोज)
हाथ से फिसला मौका
उम्मीद की किरण जगी, हैदराबाद से आए मशहूर शिकारी 52 वर्षीय नवाब शहाफत अली खान के रूप में. जंगल की दुनिया में इस शिकारी का जाना-पहचाना नाम है. 2009 में इसी शिकारी ने फैजाबाद जिले की अवध फॉरेस्ट रेंज में इसी तरह नरभक्षी हो चुकी एक बाघिन को मार गिराया था. तब नवाब ने लगातार 35 दिन तक बाघिन का पीछा किया और अंत में इस राजसी जानवर की दोनों आंखों के बीच अपनी विनचेस्टर 458 मैग्नम राइफल से गोली मारकर वह काम पूरा किया.
जिसे करने को उनका दिल नहीं चाहता. बाघिन के ताजा हमले के तुरंत बाद नवाब ने कहा, ‘‘हम बाघिन के बहुत करीब पहुंच चुके हैं. यहां पास में एक नदी बहती है, जहां शाम पांच बजे के करीब बाघिन रोज गुजरती है. हमने वह जगह भी तय कर ली है जहां मचान बांधना है. मैं 24 घंटे में बाघिन को मार गिराऊंगा.’’
गांववाले भी देवेंद्र की लाश तब तक नहीं उठाने पर अड़े थे, जब तक कि बाघिन नहीं मर जाती. लेकिन नवाब का बाघिन को मारने का परमिट रद्द कर दिया गया. नवाब ने कहा, ‘‘मैं अपनी आंखों के सामने और मौतें नहीं देख सकता. 5-7 रोज में बाघिन फिर शिकार करेगी.’’ और नवाब चले गए.
मेनका का दबावइस बात की तस्दीक आंवला से सांसद और मशहूर पर्यावरणविद् मेनका गांधी करती हैं. मेनका ने इंडिया टुडे को बताया, ‘‘मैंने जैसे तैसे हैदराबाद के शिकारी को वापस कराया, लेकिन अब तो न जाने कितने शिकारी बाघिन को मारने के लिए छोड़ दिए हैं. क्या इनसान जानवर से बदला लेना चाहता है?’’ उन्होंने याद दिलाया कि देश में महज 400 बाघिन बची हैं.
ऐसे में इसे बेहोश कर चिडिय़ाघर में भेज दिया जाए ताकि वह भविष्य में प्रजनन कर सके. वैसे भी यह 3-4 साल की युवा बाघिन है. इसके बाद दुधवा नेशनल पार्क से आई ट्रैंक्युलाइजर टीम पर फिर से फोकस हो गया. अमानगढ़ फॉरेस्ट रेंज से जो दो हथिनी-पुष्पाकली और गंगाकली-कुछ रोज पहले इसलिए मंगाई गई थीं कि नवाब उनकी मदद से बाघिन तक पहुंचें, अब ट्रैंक्युलाइजर टीम को दे दी गईं.
बाघों की रक्षा के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे भोपाल के पर्यावरण कार्यकर्ता अजय दुबे का तर्क है, ‘‘यह बाघिन तो बफर जोन में शिकार कर रही है. आदमी जंगल में घुसता ही जा रहा है तो बाघ क्या करे?’’ देश में पिछले साल 63 बाघ मारे गए और इनमें से 48 अवैध शिकार की भेंट चढ़े.
इस साल के शुरुआती दो महीने में अब तक 10 बाघ मारे जा चुके हैं और इनमें से 9 की मौत के कारणों की अभी जांच ही चल रही है. पर्यावरण कार्यकर्ता अपनी जगह सही हैं और गांववालों की दहशत भी सोलह आने खरी है. ऐसे में वन विभाग से और ज्यादा प्रोफेशनल रवैए की उम्मीद की जाती है, जो कहीं नहीं दिखी.
सिर पर मंडराने लगी मौत
ऐसे में नवाब की बात पत्थर की लकीर साबित हुई. नौ दिन बाद 6 फरवरी को बढ़ापुर से सटी साहूवाला रेंज में दिन-दहाड़े मौत की बिजली चमकी. बूढ़ा चरवाहा लाल सिंह गाय-भैंस चराने जंगल में गया था. गोधूलि वेला हुई और मवेशी घर लौट आए, लेकिन लाल सिंह नहीं लौटे. अगले दिन गांववाले खोजने निकले.
जंगल में उसकी लाठी, पगड़ी और फटी हुई धोती मिली. लाश के नाम पर गोश्त के कुछ टुकड़े ही दिखे. बाघिन लाल सिंह को पूरा खा गई थी. इसके बाद दो रोज तक बिजनौर में उसके 11-13 वर्ग सेमी वाले पंजे के निशान नहीं मिले. वन विभाग और क्या चाहता था?

(नजीबाद रेंज में अनमैन्ड एरियल वेहिकल से खोज)
26 जनवरी के बाद से ही बाघिन के लिए जंगलों की खाक छान रहे स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ता आबिद रजा की सुनें, ‘‘यहां तो हर रेंज और हर जिले का वन अफसर यही आस लगाए बैठा है कि भगवान करे, बाघिन उनकी रियासत से निकल जाए. आदमी मरे या जिए, उनकी नौकरी बची रहे.’’
तीन दिन बाद 9 फरवरी को बाघिन उत्तराखंड में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से सटे कालागढ़ टाइगर रिजर्व में अब तक के सबसे खौफनाक अंदाज में नमूदार हुई. मजदूर रामचरण एक ठेकेदार की गाड़ी में बैठकर काम पर जा रहा था. रास्ते में वह पेशाब करने के लिए गाड़ी से उतरा.
वह जैसे ही सड़क किनारे झाडिय़ों में गया कि उसके बाद उसे मुंह में दबाए बाघिन जंगल की तरफ भागती दिखी. अपने नौवें शिकार लाल सिंह का 50 किलो से ज्यादा गोश्त खाने के बाद वह भूखी नहीं थी, इसलिए उसने रामचरण को मार तो डाला, लेकिन खाया नहीं. यानी बाघिन अब पेट भरने के लिए ही नहीं, शौकिया भी शिकार कर रही है.

(बिजनौर जिले की बढ़ापुर रेंज में मचान पर मुश्तैद वनकर्मी)
हाथी, पिंजरा और ड्रोन
लोगों में डर बढ़ता जा रहा है. और वन विभाग बाघिन को पकडऩे का ‘‘पीपली लाइव’’ भी बढ़ाता जा रहा है. 10 से 15 फरवरी के बीच साहूवाला रेंज के कंपार्टमेंट 10 और 11 में बाघिन के पंजों के निशान लगातार देखे गए, लेकिन वन विभाग का पिंजरा बढ़ापुर रेंज के कंपार्टमेंट पांच में ही लगा रहा. हद तो तब हो गई जब पिंजरे से बकरे को निकालकर उसमें एक पुतला रख दिया गया.
इस पिंजरे से कोई 100 कदम दूर पेड़ पर मचान भी बना दिया गया. बढ़ापुर रेंज के 58 वर्षीय रेंजर उम्मेद हसन हाथ में बंदूक लिए डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की गाड़ी से उतरे क्योंकि उनकी इकलौती सरकारी गाड़ी रास्ते में पंक्चर हो गई थी. उन्होंने हांफते हुए बताया कि रिटायरमेंट के करीब की उम्र में उन्हें कितनी मेहनत करनी पड़ रही है. लेकिन वे यह नहीं बता पाए कि जब पांच दिन से बाघिन दूसरे इलाके में है तो पिंजरा यहां क्या नुमाइश के लिए लगाया गया है?
दरअसल, पूरा मामला ऐसे ही चल रहा है. शिकारियों को यह पता नहीं है कि वन विभाग क्या चाहता है, एक जिले के अफसर दूसरे जिले के अफसरों के संपर्क में नहीं हैं और यही हाल एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश के बीच है. ऐसी कोई संयुक्त टीम या कंट्रोल रूम नहीं है जो बाघिन जैसे चालाक जीव को पकडऩे में मुस्तैदी दिखाए.

(बढ़ापुर रेंज के बहेड़ी गांव में बाघिन के लिए लगा पिंजरा)
नजीबाबाद के दफ्तर में बैठे बिजनौर के जिला वन अधिकारी (डीएफओ) प्रवीण राघव बड़ी ढिठाई से यह बात स्वीकार करते हैं, ‘‘बाघिन उत्तराखंड में चली जाती है तो वहां का विभाग उसके बारे में देखता है. दोनों राज्यों में कोऑर्डिनेशन कमेटी नहीं बनी है. हम पूरी कोशिश कर रहे हैं.’’ इस सवाल पर कि ट्रैंक्युलाइजर टीम कहीं घूम रही है, शिकारी कहीं और गश्त लगा रहे हैं, पिंजरा कहीं लगा है और आप कहीं और बैठे हैं.
ऐसे में अगर किसी को बाघिन दिख भी जाए तो उसे कैसे मार या पकड़ पाएंगे, डीएफओ साहब का जवाब सुनिए, ‘‘ट्रैंक्युलाइजर करने वाली टीम को तुरंत बुला लिया जाएगा.’’ यही हाल जिम कॉर्बेट पार्क के प्रबंधन का है. पार्क के डिप्टी डायरेक्टर साकेत बडोला कहते हैं, ‘‘बाघिन के होने के कोई संकेत नहीं मिले हैं. पग मार्क भी नहीं देखे गए.’’
अधिकारी यह भी बताने की स्थिति में नहीं हैं कि बाघिन के नरभक्षी होने की संभावित वजह क्या है. शिकारी कुंवर राणा प्रताप ने बाघिन के मुंह में कोई बीमारी होने या फिर उसके पिछले बाएं पैर में चोट होने की आशंका जताई, लेकिन ठोस कुछ नहीं है.
वन विभाग की यह हीला-हवाली जैसे कुछ कम थी. सो, बिजनौर के बीएसपी विधायक महमूद गाजी अपने चितकबरे घोड़े को लेकर खेतों में बंदूक लेकर उतर गए. उनके साथ बंदूकधारियों की टुकड़ी चल रही है. गाजी यह तमाशा तब कर रहे हैं जबकि यह जाना-माना तथ्य है कि घोड़ा शेर को देखते ही भाग जाता है. यह सब ड्रामा चल ही रहा था कि 19 फरवरी को एक विशेष टीम ने अनमैन्ड एरियल वेहिकल को बिजनौर के जंगलों के ऊपर से उड़ाया.
खिलौने जैसे इस छोटे विमान में कैमरे और सेंसर लगे हैं, जो विमान की नीची उड़ान के दौरान बाघिन का सुराग दे सकते हैं. उधर, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बाघिन के हमले में मरे लोगों को एक लाख रु. की बजाए पांच लाख रु. मुआवजा देने की घोषणा की है. लाल सिंह और देवेंद्र के परिजनों को 20 फरवरी को मुआवजा दिया गया.

(बाघ के हमले में मारे गए देवेंद्र की पत्नी सुमन और दो बच्चे)
कैसे होगा खूनी खेल का अंत
लेकिन मुआवजा कोई समाधान नहीं है. बाघिन इस वसंत में तराई के जंगलों में बेखटके घूम रही है. लोग इस कदर डरे हुए हैं कि रात में बिल्ली भी अगर छप्पर के ऊपर से गुजर जाए तो समझते हैं, बाघिन आ गई. वन विभाग बातें बना रहा है. नरभक्षी को मारने का ताव रखने वाला शिकारी वापस जा चुका है. अब जंगलों की खाक वे 5 शिकारी छान रहे हैं जिन्होंने जिंदगी में एक भी बाघ नहीं मारा. अजय दुबे सवाल करते हैं, ‘‘बाघ को मारा ही क्यों जाए? ’’
वे पूछते हैं, ‘‘आखिर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद बाघों के संरक्षण के लिए विशेष फोर्स क्यों नहीं बनाई गई है. जंगलों की कटाई क्यों नहीं रुक रही.’’ देश में 1,706 बाघ ही तो बचे हैं. आदमी के साथ ही अब बाघ की जान भी अनमोल है.
बहरहाल, बाघिन जब तक जिंदा है, उसे अपना पेट भी भरना है. वन विभाग जब तक बाघिन का पता नहीं लगाता, तब तक देवेंद्र और सुमन जैसा हंसता-खेलता परिवार खूनी पंजे की चपेट में न आए, इसकी दुआ ही की जा सकती है. दुआ इसलिए भी करनी पड़ेगी क्योंकि वन विभाग ने दो महीने में कुछ भी ठोस नहीं किया है.

