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डार्क मोड

अपने ही घर में बेगाने हो बैठे हैं हैदराबादी

अलग तेलंगाना की लड़ाई की जड़ में असल मुद्दा हैदराबाद पर विवाद है. इससे 87 लाख आबादी वाले शहर में सबको बताना पड़ रहा है कि वे तेलंगाना वाले हैं या सीमांध्र के.

अपडेटेड 3 मार्च , 2014
अगर किसी राज्य का मुख्यमंत्री यह प्रश्न करे ‘‘मैं कौन हूं?’’ तो अजीब लगता है, लेकिन एन. किरण कुमार रेड्डी ने यही कहा था. उन्होंने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से 19 फरवरी को इस्तीफा दिया. उनका कहना था कि वे हैदराबाद में जन्मे, बेगमपेट में हैदराबाद पब्लिक स्कूल में पढ़े और अंडर-22 टीम में हैदराबाद की तरफ  से क्रिकेट खेले.

महज इसलिए कि उनका निर्वाचन क्षेत्र चित्तूर जिले में है, जो रायलसीमा क्षेत्र में आता है और उनके पुरखे वहां से आए थे इसलिए वे तेलंगाना में बाहरी व्यक्ति हो गए हैं.

करीमनगर के मूल निवासी 70 वर्ष के पी. भीमैया दशकों पहले हैदराबाद में आकर बस गए थे और आज इस अपमान से आहत हैं. उनका कहना है, ‘‘हम उन्हें हैदराबाद से जाने को नहीं कह रहे, पर वे हमारे शहर पर दावा क्यों कर रहे हैं? क्योंकि उनका निहित स्वार्थ है.’’

कुल मिलाकर ‘‘हम’’ बनाम ‘‘तुम’’ की ये लड़ाई आंध्र प्रदेश के विभाजन की देन है. अलग तेलंगाना राज्य की मांग की शुरुआत 1956 में आंध्र प्रदेश के गठन के बाद सीमांध्र के शासकों के हाथों भेदभाव की भावना से शुरू हुई. तटवर्ती आंध्र प्रदेश के उद्योगपति हावी रहे और वहीं के फिल्म निर्माताओं ने खूब मजाक भी उड़ाया. तेलुगु बनाम तेलुगु की इस लड़ाई में हैदराबाद की बलि हो रही है.
अलग तेलंगााना के विरोध में नारोबाजी
राजधानी की 87 लाख की आबादी में से करीब 35 फीसदी सीमांध्र यानी रायलसीमा और तटवर्ती आंध्र क्षेत्र की है. तेलंगाना के लोग उन्हें रहवासी कहते हैं. साफ जाहिर है कि मामूली-सी चिंगारी दावानल का रूप ले सकती है. हैदराबाद नगर निगम के सेवानिवृत्त अधिकारी 71 वर्ष के हीरा सिंह अलग तेलंगाना राज्य के प्रबल पक्षधर हैं और सीमांध्र क्षेत्र के दूसरे वरिष्ठ नागरिकों के बगल में खड़े होकर बेखौफ कहते हैं, ‘‘हम इतने साल साथ रहे हैं, लेकिन अब कड़वाहट इतनी बढ़ गई है कि मारपीट की नौबत आ सकती है.’’

साफ जाहिर है कि तेलंगाना का नाम आते ही सिकंदराबाद में मोहल्ले के इस पार में हमजोली दोस्तों के बीच की दरार एकदम उजागर हो जाती है. जरा गहराई से कुरेदते ही बरसों के घाव रिसने लगते हैं. अपमान और गुलामी का दर्द असली हो या काल्पनिक लेकिन उसकी भावना साफ  दिखाई देती है. उत्तेजित भीमैया गुस्से से फूट पड़ते हैं, ‘‘60 साल से मैं यह सब झेल रहा हूं. मैंने पीएचडी की है, पर नौकरी में मेरे साथ बुरा सुलूक हुआ है.

मेरी एक रिश्तेदार की योग्यता और अनुभव दोनों के बावजूद पदोन्नति नहीं होगी. उससे जूनियर और और कम योग्य लोग आगे बढ़ जाएंगे क्योंकि वे तेलंगाना से नहीं हैं. यह थोपी गई गुलामी है. हैदराबाद में राज्य सचिवालय में तेलंगाना के कर्मचारी कम संख्या में हैं और यह तेलंगाना का इलाका है. कभी-न-कभी तो ये सब बंद होना था और आज वह दिन आ गया है.’’

तेलंगाना की जड़ में ज्यादा विवाद हैदराबाद को लेकर है. 2000 में बने तीन नए राज्यों की तुलना में इस नए राज्य को राजधानी शहर हैदराबाद मिल रहा है और मूल राज्य को अपनी राजधानी नए सिरे से बनानी होगी. लेकिन हैदराबाद की लड़ाई सिर्फ  पुलों, इमारतों, उद्योगों और शहर में मौजूद शिक्षा और रोजगार के अवसरों की नहीं है, इसका भावनाओं से गहरा ताल्लुक है.

( मूल रूप से तटीय आंध्र की 38 वर्षीय वर्षा भार्गवी कहती हैं वे अब भी हैदराबाद में ही रहना चाहेंगी)

सीमांध्र के लोगों का तर्क है कि उन्होंने अपनी पूंजी और मेहनत से हैदराबाद शहर खड़ा किया है. तेलंगाना वालों का जवाब है कि उनके संसाधन जमीन और लोगों के पसीने को चूसकर ऐसा किया गया है. उनका मानना है कि तेलंगाना राज्य का गठन करके अतीत में हुई भूलों को सुधारने की तरफ कदम बढ़ाया गया है और अब उन्हें अपने शासन की अनुमति मिली है.

इसीलिए संसद में तेलंगाना के गठन को रोकने के लिए हर मुमकिन कोशिश करते सीमांध्र के सांसदों की तस्वीरों को अलग तेलंगाना राज्य के समर्थक उनके हक को रोकने की नाकाम कोशिश बता रहे हैं. गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा है. लोक सत्ता पार्टी के अध्यक्ष जयप्रकाश नारायण को 11 फरवरी को दिल्ली में आंध्र भवन में तेलंगाना समर्थक एक कार्यकर्ता ने सरे आम उनकी टाई से पकड़कर घसीट लिया.

इसलिए जब 38 साल की वर्षा भार्गवी इन दिनों डर नाम की भावना का बार-बार जिक्र करती हैं तो कोई हैरत नहीं होती. हैदराबाद की टूर ऑपरेटर भार्गवी का कहना है कि हैदराबाद को भले ही अगले 10 साल के लिए तेलंगाना और शेष आंध्र राज्यों की साझ राजधानी घोषित किया गया है, फिर भी अब शहर में काम करना सुरक्षित नहीं होगा. उनकी जड़ें सीमांध्र में हैं और वे जिस ढंग से तेलुगु बोलती हैं, उससे साफ  पकड़ी जाएंगी.

भार्गवी का कहना है, ‘‘हम आज दोराहे पर खड़े हैं, मालूम नहीं किधर जाएं. हम हैदराबाद में रहना चाहते हैं और उसका हिस्सा बनकर शहर को बढ़ते देखना चाहते हैं. मेरी आंखों के सामने फ्लाइओवर बने हैं, सड़कें फैली हैं, नया हवाई अड्डा बना है, लेकिन अब मेरे भीतर डर बैठ गया है, क्योंकि लोग भीड़ से संचालित हैं.

जब चार विद्यार्थी मेरे दफ्तर में घुसकर बोले की आज बंद है और तुमने दफ्तर क्यों खोल रखा है, तो मैं कुछ नहीं कर सकी.’’ भार्गवी जिस अंदाज में यह  कहती हैं उससे अपने ही घर में अजनबी होने की हताशा साफ  झलकती है.

जनवरी, 2010 में तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के नेताओं ने तो यहां तक कह दिया था कि तटवर्ती आंध्र प्रदेश के जो लोग संक्रांति का उत्सव मनाने के लिए अपने गांव गए हैं, उन्हें स्थानीय निवासी वापस हैदराबाद में प्रवेश न करने दें. हैदराबाद से कांग्रेस के विधायक शशिधर रेड्डी का कहना है, ‘‘उस सख्त और डरावने अंदाज ने बहुत ज्यादा तनाव और दुश्मनी को जन्म दिया. वे घाव अभी भरे नहीं हैं.’’ तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष के. चंद्रशेखर राव ने उन्हीं दिनों ‘‘आंध्र वाले भागो’’ का जो नारा दिया था, उससे जाहिर हो गया कि इस आंदोलन में अब सहनशीलता नहीं है.

चंद्रशेखर राव के विरोधियों ने उनके इस नारे के बहाने हैदराबाद में बसे क्षेत्र के लोगों में डर फैलाने की कोशिश की और उन लोगों के खिलाफ एकजुट होकर डटे रहने का आह्वान किया, जो उन्हें अपने घर से निकाल देना चाहते हैं. अगर तेलंगाना वालों के लिए अलग राज्य का गठन दोयम दर्जे के नागरिक होने से छुटकारा पाने का अवसर है, तो संयुक्त आंध्र प्रदेश के समर्थक ब्रांड कंसलटेंट परकला प्रभाकर का कहना है कि इस विभाजन से जितनी नफरत और कड़वाहट पैदा हुई है.

उसे देखते हुए लगता है कि तेलंगाना बनने के बाद दूसरे लोग हैदराबाद में खुद को दोयम दर्जे का नागरिक महसूस करने लगेंगे. प्रभाकर का कहना है, ‘‘अंदेशा गलत नहीं है. लोगों को डर है कि विभाजन के बाद उनके जान-माल और कारोबार के लिए खतरा पैदा हो जाएगा.’’  

दो साल पहले चंद्रशेखर राव के भतीजे, टीआरएस नेता हरीश राव एक आंदोलन के दौरान एहतियातन हिरासत में ले लिए गए थे. गिरफ्तारी के वीडियो में राव एक सिपाही पर अत्यंत भद्दी भाषा में गुस्सा उतारते दिख रहे थे और उसे ‘‘आंध्र का कांस्टेबल’’ कह रहे थे.

वह क्षण तो सिनेमाई जादू-सा ही था जब सिपाही मरियल सी आवाज में उन्हें बताता है कि वह तेलंगाना के खम्मम जिले का है. आंध्र के लोगों को ‘‘दुश्मन’’ के रूप में पेश करना इस लड़ाई में टीआरएस का अकसर इस्तेमाल किया गया एक हथियार रहा है.

यही कारण है कि हैदराबाद परेशान है, इस बात से डरा हुआ कि आगे क्या होने वाला है. हैदराबाद आंध्र प्रदेश की संस्कृति की कई किस्मों के मिलन-स्थल के रूप में पहचाना जाता है. यह शहर कहीं ज्वालामुखी में न बदल जाए. इस अंदेशे की पड़ताल के लिए शहर में विरोध-प्रदर्शनों के मुख्य केंद्र उस्मानिया यूनिवर्सिटी का एक चक्कर काफी जानकारी दे सकता है.

यहां  तेलंगाना समर्थक छात्र नेता एम. कृशांक कहते हैं, ‘‘अगर यहां नौकरियों और निवेशों में सीमांध्र का प्रभुत्व जारी रहा और अगर तेलंगाना प्रदेश में भी तेलंगाना के लोगों को अवसरों का उनका वाजिब हिस्सा नहीं दिया गया तो स्थानीय लोगों की भावना निश्चित रूप से सीमांध्र की जनता के खिलाफ चली जाएगी.’’

पिछले चार साल में तीनों क्षेत्रों की जनता ने तकलीफें सही हैं. हैदराबाद की मनोचिकित्सक डॉ. पूर्णिमा नागराज कहती हैं, ‘‘चार साल पहले जब तेलंगाना संघर्ष पूरे जोरों पर था तो बहुत से रोगी यूनिवर्सिटी के ऐसे छात्र होते थे जो आंदोलन से गहरे जुड़े थे. उनमें से कुछ एंग्जाइटी डिसऑर्डर और पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर से ग्रस्त होते थे. अब मेरे पास सीमांध्र के मरीज आते हैं खासकर ऐसे माता-पिता जो अपने बच्चों के भविष्य को लेकर परेशान हैं.’’

यह विभाजन अब रोजमर्रा के रिश्तों को भी तय करने तक आ गया है. तेलंगाना में जन्मी विज्ञापन प्रोफेशनल शशि वडाना रेड्डी की शादी तटीय आंध्र में विशाखापत्तनम के स्वरूप से हुए 15 साल हो चुके हैं. आंदोलन के तेजी पकडऩे के पिछले चार साल में वे हर बार अपनी चाची के आने पर, जो तेलंगाना को राज्य के दर्जे को लेकर जुनूनी हैं, स्वरूप से घर न आने के लिए कहती रही हैं.

इसी तरह तेलंगाना के करीमनगर के चार्टर्ड एकाउंटेंट आर.एल.एन. मूर्ति से ब्याही तटीय आंध्र की ज्योति कहती हैं, ‘‘राजनैतिक माहौल गरमाने और क्षेत्रीय आधार पर ध्रुवीकरण शुरू होने के बाद ही मैं यह बात जान पाई कि हैदराबाद में ऐसे इलाके हैं जहां ज्यादातर तटीय लोग रहते हैं और ऐसे इलाके हैं जहां सिर्फ  तेलंगाना के लोग रहते हैं.’’

उनकी फर्म में मूर्ति के पार्टनर भी तटीय आंध्र गुंटूर के हैं और पिछले चार साल में आए दृष्टिकोण में बदलाव के भी साक्षी बने हैं. मूर्ति कहते हैं, ‘‘मुझे ऐसा लगता था कि तटीय जिलों में बोली जाने वाली तेलुगु शुद्ध और सही होती है. मुझे अपनी तेलंगाना लहजे वाली तेलुगु पर शर्म-सी आती थी इसलिए मैं सिर्फ आंध्र के लहजे से ही बोला करता था.

अब लगभग बदले की भावना से मैं यह दिखाने के लिए तेलंगाना लहजे में बोलने पर जोर देता हूं कि मैं अपनी जड़ों को लेकर शर्मिंदा नहीं हूं. बल्कि मुझे इस पर गर्व है.’’ 

चिंता की बात यह है कि दिसंबर 2009 के बाद से तीनों क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषा एक जैसी सुनाई देने लगी है - पैनी, कठोर और ठेस पहुंचाने वाली. और जब एकीकृत आंध्र और ‘‘अलगाववादी’’ एक-दूसरे को गाली देने पर आ जाते हैं तो एक राज्य की धारणा तार-तार हो जाती है. आज का आंध्र प्रदेश बाहरी और भीतरी दोनों रूप से विभाजित प्रदेश है.

मानो दो अलग राज्यों को लंबे समय से नक्शे पर एक दूसरे से गोंद की मदद से चिपका कर रखा गया हो. चुनावों के पहले के इन कुछ महीनों में जन भावनाओं को भड़काया जाएगा. यह आंध्र प्रदेश, विशेष रूप से हैदराबाद के लिए इम्तहान की घड़ी होगी. यह देश में बिलकुल नए किस्म का विवाद होगा क्योंकि हैदराबाद तो क्या दिल्ली, मुंबई और कोलकाता तीनों महानगर कहीं न कहीं अपने भीतर पूरे देश के लोगों को समाहित किए हुए हैं.

मुंबई के मामले में शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को छोड़ दें तो कहीं भी बाहरियों को बाहरी नहीं कहा जाता. देश के हर राज्य में कहीं का भी आदमी रह सकता है. हैदराबाद की इतनी तेज पृथकतावादी भावनाएं ऐसी लग रही हैं जैसे राज्य नहीं राष्ट्र बना रहा हो.

इसीलिए बीजेपी अकसर दावा करती है कि 2000 में छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड के साथ-साथ उनके मूल प्रदेशों में भी मिठाइयां बांटी गई थीं. लड्डू से काली मिर्च के स्प्रे तक तेलंगाना राज्य के सफर ने बहुत से लोगों को आंसू और भीषण खांसी ही दी है.
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