उत्तर प्रदेश के कौशांबी से समाजवादी पार्टी के सांसद 53 वर्षीय शैलेंद्र कुमार संसद के अधिवेशन के दौरान रोज सुबह 8 बजे लोकसभा की लाइब्रेरी में पहुंच जाते हैं. दो घंटे तक अखबारों की कतरनों, पत्रिकाओं में छपे लेखों को पढऩे के बाद उस दिन की कार्रवाई के लिए निर्धारित मुद्दों पर नोट्स तैयार करते हैं.
फिर उन्हें प्रश्नकाल के लिए तैयार फाइल में रख लेते हैं. उसके बाद वे दिनभर हताश बैठे देखते रहते हैं क्योंकि एक के बाद एक सत्र हंगामे की भेंट चढ़ जाता है. विभिन्न पार्टियों के वरिष्ठ नेता एक-दूसरे का मुंह बंद कराने के लिए चीखते-चिल्लाते सदन के बीच में पहुंच जाते हैं
2009 से 2014 के दौरान शैलेंद्र कुमार की उपस्थिति 97 फीसदी रही. उन्होंने 342 बहसों में हिस्सा लिया, 162 सवाल पूछे और तीन गैर-सरकारी विधेयक पेश किए. वे उन सांसदों में से हैं, जो इस बात से बेहद हताश हैं कि राजनैतिक पार्टियों ने विधान के इस मंदिर को नौटंकी के मंच में तब्दील कर दिया है.

(यूपी विधानसभा में आरएलडी विधायकों ने कपड़े उतार सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया)
वैसे तो संसद की छवि पिछले दो दशक से लगातार गिरती जा रही है, लेकिन 15वीं लोकसभा में यह अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है. दिल्ली स्थित थिंक टैंक पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च ने साबित किया है कि यह भारत के अब तक के इतिहास में सबसे बदतर लोकसभा है. इसमें 74 प्रमुख बिल विचाराधीन हैं और 20 बिल महज पांच मिनट से भी कम समय की चर्चा में पारित हो गए.
इसने सिर्फ 13 फीसदी समय विधायी कामकाज में लगाया है. मजे की बात यह है कि 2010 में सांसदों ने अपना वेतन 200 फीसदी बढ़ा लिया था, जिससे यह अब तक की सबसे महंगी संसद रही. 1952 से 1957 तक पहली लोकसभा को उम्मीद और संभावना के प्रतीक के तौर पर याद किया जाएगा. 1991 से 1996 तक 10वीं लोकसभा ने ऐसी नीतियां बनाईं, जिन्होंने भारत के दरवाजे दुनिया के लिए खोले. अपने अंतिम पड़ाव पर खड़ी 15वीं लोकसभा को निष्क्रियता की मूरत ही कहा जा सकता है.

(राज्यसभा में आंध्र प्रदेश विभाजन पर हंगामा)
पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह नौ बार से सांसद हैं. वे कहते हैं, ‘‘मैंने इससे बदतर लोकसभा कभी नहीं देखी है और यह बात मैं अपने दिल पर पत्थर रखकर कह रहा हूं. संसद अब सुनती बहुत कम है और विरोध का शोर बहुत ज्यादा मचने लगा है. यह हमारे समाज में पहले से ज्यादा फैल चुकी उथल-पुथल और असंतोष का भी प्रतीक है, लेकिन 15वीं लोकसभा के नेतृत्व में भी भयंकर गिरावट आई है.’’
लोकसभा के भीतर ऐसी बहसें सुनने को मिली हैं, जिसने लोगों को हैरत में डाल दिया और आने वाले समय में देश की राह तैयार की. 1996 में अपनी 13 दिन की सरकार के प्रति अविश्वास प्रस्ताव के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था, ‘‘इस जनादेश के पीछे 40 साल का संघर्ष और उथल-पुथल है.

हमने इसके लिए कड़ी मेहनत की है, हम जबरदस्त संघर्ष की राह से गुजरे हैं. जनता का दिल जीता है. हमने एक पार्टी के नाते हर साल 365 दिन पसीना बहाया है.’’ यह भाषण पहली बार दूरदर्शन पर सीधे प्रसारित हुआ था, जिससे सांसदों का आचरण सीधे लोगों के ड्राइंगरूम तक पहुंच गया. खाने की मेज से लेकर वॉटर कूलर तक के पास हर जगह लोगों का झुंड, इसी भाषण के बारे में बातचीत करता.
राम मनोहर लोहिया ने 1963 में संसद में उस समय हड़कंप मचा दिया था, जब उन्होंने एक पर्चा लिखा था कि देश की अधिकांश आबादी रोजाना तीन आने में गुजारा करती है, लेकिन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर रोजाना 25,000 रु. खर्च होते हैं. नेहरू ने जवाब दिया कि योजना आयोग के अनुसार, यह रकम 15 आने यानी आज के एक रुपए से कुछ कम है.
लोहिया ने इस पर विशेष बहस की मांग की और जब वे बोलने के लिए खड़े हुए तो एक के बाद एक अनेक सदस्यों ने अपना बोलने का समय लोहिया को दे दिया और उन्होंने पूरी चतुराई से योजना आयोग के आंकड़ों की धज्जियां उड़ा दीं.
आज वैसी बहसें नहीं होतीं, बल्कि उसकी जगह एक-दूसरे को धक्का देना, थप्पड़ मारना और चिल्लाना संसदीय आचरण का सामान्य-सा दस्तूर बन गया है. हद तो तब हो गई, जब 13 फरवरी को आंध्र प्रदेश से एक सांसद ने अपने आसपास के लोगों पर मिर्च का पाउडर स्प्रे कर दिया.
हफ्ते भर बाद टेलीविजन प्रसारण में तेलुगु देशम पार्टी के एक सांसद को कागज छीनने की कोशिश में राज्यसभा के महासचिव शमशेर के. शरीफ के साथ धक्का-मुक्की करते हुए देखा गया. इससे तंग आकर ओडिसा के केंद्रपाड़ा से बीजू जनता दल के सांसद बिजयंत ‘‘जय’’ पांडा ने ट्विटर पर लिखा कि वे अपने निर्वाचन क्षेत्र वापस जा रहे हैं क्योंकि संसद में तो समय बर्बाद हो रहा है.

(टीडीपी सांसदों ने 13 फरवरी को स्पीकर की मेज से बिल लेकर फाड़ दिया)
यह सिर्फ संसद की गरिमा पर ही दाग नहीं लगा है बल्कि पीआरएस के पास मौजूद आंकड़े बताते हैं कि सदन में कामकाज की अवधि और गुणवत्ता दोनों में गिरावट आ रही है. 1950 के दशक में भारतीय लोकसभा की बैठक साल में औसतन 127 दिन चलती थी. लेकिन 2000 से यह औसतन 72 दिन रह गई है.
1952 से 1989 तक लोकसभा ने हर साल करीब 65 बिल पारित किए. अब यह संख्या गिरकर करीब 40 बिल सालाना की रह गई है. 1962 से 1991 तक हर लोकसभा ने लगातार शत-प्रतिशत काम किया यानी उनकी बैठकें निर्धारित समय के बाद भी चलीं. लोकसभा का समय सुबह 11 बजे से शाम 6 बजे तक और राज्यसभा का समय सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक होता है, लेकिन 15वीं लोकसभा में सिर्फ 63 फीसदी काम हुआ.
जसवंत सिंह बताते हैं, ‘‘उन दिनों की बात अलग थी. मुझे याद है कि मारुति के राष्ट्रीयकरण बिल पर पूरी रात बहस हुई और सरकार को हर बात का जवाब देना पड़ा था. इस लोकसभा में रक्षा मंत्रालय और विदेश नीति के बारे में एक भी सार्थक बहस नहीं हुई. ऐसी परंपरा थी कि प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री जब भी विदेश यात्रा पर जाते थे तो लौटकर संसद को रिपोर्ट दिया करते थे.

अब वे परंपराएं नहीं रहीं.’’ संसद में कामकाज ठप होने का असर राज्यों पर भी दिखाई देने लगा है. वाशिंगटन पोस्ट के भारत ब्यूरो के प्रमुख रह चुके साइमन डेनयर ने अपनी किताब रोग एलिफेंट में लिखा है कि अरुणाचल प्रदेश में 2000 से 2010 के बीच विधानसभा की बैठक औसतन सिर्फ 8 दिन और हरियाणा में सिर्फ 14 दिन हुई.
इस पतन से क्या इशारा मिलता है? पीआरएस के सह-संस्थापक सी.वी. मधुकर का तर्क है कि इसकी एक बड़ी वजह 1985 में पारित दल-बदल निरोधक कानून है. इसके बाद सांसदों के लिए सदन में तैयारी करके आना जरूरी नहीं रह गया है क्योंकि वे चाहे कुछ भी सोचें, उन्हें पार्टी व्हिप का पालन करना ही होगा. दूसरी वजह गठबंधन की राजनीति का उदय है. छोटी पार्टियों की उपस्थिति की वजह से यह अंदाजा लगा पाना नामुमकिन हो गया है कि कब कौन-सा मुद्दा कैसे उठेगा.
तीसरी वजह जो हाल में ज्यादा प्रासंगिक हो गई है, वह है राष्ट्रीय टेलीविजन के साथ संसद का नाता. लगातार प्रसारण के आकर्षण में बंधे सांसदों ने सदन को तमाम तरह के मुद्दे उठाने और सियासी बाजी का मंच बना डाला है.

इसे इस बात से समझा जा सकता है कि 18 फरवरी को तीसरे पहर लंबे सत्र के बाद जब लोकसभा ने तेलंगाना विधेयक को मंजूरी दी तो टेलीविजन पर उसका प्रसारण नहीं हुआ. पहले चार मिनट तक लोकसभा टीवी के पर्दे पर लिखा रहा कि संसद की कार्यवाही स्थगित है, जबकि वास्तव में कार्यवाही चल रही थी.
प्रसारण रुकने की खबर विपक्ष के सांसदों तक पहुंचते ही उन्होंने कथित सेंसरशिप का नारा लगाते हुए बवाल मचा दिया. 3:04 बजे लिखकर दिखाया जाने लगा कि सीधा प्रसारण जल्द शुरू होगा. लेकिन सीधा प्रसारण एक घंटे बाद शुरू हुआ. लोकसभा सचिवालय ने सफाई दी कि तकनीकी खराबी से प्रसारण नहीं हो सका. एक वरिष्ठ मंत्री का कहना है, ‘‘पहले अखबारों में हर संसदीय बहस की विस्तार से चर्चा होती थी, जिससे शायद सांसद अपनी बात कहने के लिए उत्साहित होते थे.

(15वीं लोकसभा के कुल समय का महज 39 फीसदी ही प्रश्नकाल को दिया जा सका)
टेलीविजन समाचार के इस दौर में सिर्फ उन्हीं खबरों पर नजर रहती है, जिनसे सनसनी पैदा हो.’’
अब सवाल यह पैदा होता है कि संसद की यह बिगड़ी हुई हालत आखिर कैसे सुधरे और इसे वापस पटरी पर कैसे लाया जाए? संविधान ने संसद को सरकार पर नजर रखने की जिम्मेदारी सौंपी है, जिसका विपरीत प्रावधान यह है कि सिर्फ सरकार के पास ही संसद की बैठक बुलाने का अधिकार है.
पीआरएस में जनसंपर्क के मुखिया चक्षु रॉय कहते हैं, ‘‘कई अन्य देशों में अगर दो तिहाई सांसदों की सहमति हो तो संसद का सत्र बुलाया जा सकता है. हम भी शायद यह बदलाव करने की सोच सकते हैं.’’ 2011 में राज्यसभा सांसद राजीव चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री को इसी तरह का सुझाव लिखकर भेजा था.
उनका कहना था कि हर साल संसद के तीन विशेष सत्र पांच-पांच दिन के हों, जिनमें देश के प्रमुख मुद्दों पर बहस की जाए. प्रधानमंत्री कार्यालय ने अब तक उसका कोई जवाब नहीं दिया है.
इसी तरह दल-बदल निरोधक कानून में भी संशोधन किया जा सकता है. उप-राष्ट्रपति सुझाव दे चुके हैं कि सांसदों को पार्टी की राय के अनुसार वोट तभी देना चाहिए, जब सरकार दांव पर हो. अन्य मुद्दों पर बहस के दौरान उन्हें अपनी इच्छा से वोट देने का अधिकार होना चाहिए.
2010 में कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने एक गैर-सरकारी विधेयक पेश करके संविधान में इसी तरह के संशोधन की मांग की थी. संसद के 60 वर्ष के कार्यकाल में उसकी कार्यशैली को बदलने की कोई कोशिश नहीं हुई है. सच तो यह है कि सब जानते हैं क्या करना चाहिए, पर उस सुधार के लिए राजनैतिक संकल्प या सहमति का अभाव है.
इस बीच हो-हल्ले की राजनीति ने संसद को ठप कर रखा है. 2012 में तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने कहा था कि संसद में हर बार बाधा पडऩे पर ढाई लाख रु. प्रति मिनट का नुकसान होता है. नीतिगत फैसले न लेने वाली विधायिका की दृष्टि से असली नुकसान तो अरबों रुपयों का होता होगा.
1970 के दशक में स्वतंत्र पार्टी के संस्थापकों में से एक पीलू मोदी संसद के प्रखर वक्ता थे. इंदिरा गांधी सरकार ने उनके बाजार समर्थक विचारों की वजह से उन्हें वाशिंगटन का एजेंट करार दिया था. ताने और तंज इस हद तक बढ़ गए कि वे एक बड़ा-सा बैज लगाकर संसद में आए, जिस पर लिखा था, ‘‘मैं सीआइए का एजेंट हूं.’’ अध्यक्ष ने जब उनसे बैज उतारने के लिए कहा तो उन्होंने यह कहते हुए उसे उतार दिया, ‘‘अब मैं सीआइए का एजेंट नहीं रहा.’’ उस समय हाजिरजवाबी थी, अब सिर्फ बकवास.
फिर उन्हें प्रश्नकाल के लिए तैयार फाइल में रख लेते हैं. उसके बाद वे दिनभर हताश बैठे देखते रहते हैं क्योंकि एक के बाद एक सत्र हंगामे की भेंट चढ़ जाता है. विभिन्न पार्टियों के वरिष्ठ नेता एक-दूसरे का मुंह बंद कराने के लिए चीखते-चिल्लाते सदन के बीच में पहुंच जाते हैं
2009 से 2014 के दौरान शैलेंद्र कुमार की उपस्थिति 97 फीसदी रही. उन्होंने 342 बहसों में हिस्सा लिया, 162 सवाल पूछे और तीन गैर-सरकारी विधेयक पेश किए. वे उन सांसदों में से हैं, जो इस बात से बेहद हताश हैं कि राजनैतिक पार्टियों ने विधान के इस मंदिर को नौटंकी के मंच में तब्दील कर दिया है.

(यूपी विधानसभा में आरएलडी विधायकों ने कपड़े उतार सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया)
वैसे तो संसद की छवि पिछले दो दशक से लगातार गिरती जा रही है, लेकिन 15वीं लोकसभा में यह अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है. दिल्ली स्थित थिंक टैंक पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च ने साबित किया है कि यह भारत के अब तक के इतिहास में सबसे बदतर लोकसभा है. इसमें 74 प्रमुख बिल विचाराधीन हैं और 20 बिल महज पांच मिनट से भी कम समय की चर्चा में पारित हो गए.
इसने सिर्फ 13 फीसदी समय विधायी कामकाज में लगाया है. मजे की बात यह है कि 2010 में सांसदों ने अपना वेतन 200 फीसदी बढ़ा लिया था, जिससे यह अब तक की सबसे महंगी संसद रही. 1952 से 1957 तक पहली लोकसभा को उम्मीद और संभावना के प्रतीक के तौर पर याद किया जाएगा. 1991 से 1996 तक 10वीं लोकसभा ने ऐसी नीतियां बनाईं, जिन्होंने भारत के दरवाजे दुनिया के लिए खोले. अपने अंतिम पड़ाव पर खड़ी 15वीं लोकसभा को निष्क्रियता की मूरत ही कहा जा सकता है.

(राज्यसभा में आंध्र प्रदेश विभाजन पर हंगामा)
पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह नौ बार से सांसद हैं. वे कहते हैं, ‘‘मैंने इससे बदतर लोकसभा कभी नहीं देखी है और यह बात मैं अपने दिल पर पत्थर रखकर कह रहा हूं. संसद अब सुनती बहुत कम है और विरोध का शोर बहुत ज्यादा मचने लगा है. यह हमारे समाज में पहले से ज्यादा फैल चुकी उथल-पुथल और असंतोष का भी प्रतीक है, लेकिन 15वीं लोकसभा के नेतृत्व में भी भयंकर गिरावट आई है.’’
लोकसभा के भीतर ऐसी बहसें सुनने को मिली हैं, जिसने लोगों को हैरत में डाल दिया और आने वाले समय में देश की राह तैयार की. 1996 में अपनी 13 दिन की सरकार के प्रति अविश्वास प्रस्ताव के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था, ‘‘इस जनादेश के पीछे 40 साल का संघर्ष और उथल-पुथल है.

हमने इसके लिए कड़ी मेहनत की है, हम जबरदस्त संघर्ष की राह से गुजरे हैं. जनता का दिल जीता है. हमने एक पार्टी के नाते हर साल 365 दिन पसीना बहाया है.’’ यह भाषण पहली बार दूरदर्शन पर सीधे प्रसारित हुआ था, जिससे सांसदों का आचरण सीधे लोगों के ड्राइंगरूम तक पहुंच गया. खाने की मेज से लेकर वॉटर कूलर तक के पास हर जगह लोगों का झुंड, इसी भाषण के बारे में बातचीत करता.
राम मनोहर लोहिया ने 1963 में संसद में उस समय हड़कंप मचा दिया था, जब उन्होंने एक पर्चा लिखा था कि देश की अधिकांश आबादी रोजाना तीन आने में गुजारा करती है, लेकिन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर रोजाना 25,000 रु. खर्च होते हैं. नेहरू ने जवाब दिया कि योजना आयोग के अनुसार, यह रकम 15 आने यानी आज के एक रुपए से कुछ कम है.
लोहिया ने इस पर विशेष बहस की मांग की और जब वे बोलने के लिए खड़े हुए तो एक के बाद एक अनेक सदस्यों ने अपना बोलने का समय लोहिया को दे दिया और उन्होंने पूरी चतुराई से योजना आयोग के आंकड़ों की धज्जियां उड़ा दीं.
आज वैसी बहसें नहीं होतीं, बल्कि उसकी जगह एक-दूसरे को धक्का देना, थप्पड़ मारना और चिल्लाना संसदीय आचरण का सामान्य-सा दस्तूर बन गया है. हद तो तब हो गई, जब 13 फरवरी को आंध्र प्रदेश से एक सांसद ने अपने आसपास के लोगों पर मिर्च का पाउडर स्प्रे कर दिया.
हफ्ते भर बाद टेलीविजन प्रसारण में तेलुगु देशम पार्टी के एक सांसद को कागज छीनने की कोशिश में राज्यसभा के महासचिव शमशेर के. शरीफ के साथ धक्का-मुक्की करते हुए देखा गया. इससे तंग आकर ओडिसा के केंद्रपाड़ा से बीजू जनता दल के सांसद बिजयंत ‘‘जय’’ पांडा ने ट्विटर पर लिखा कि वे अपने निर्वाचन क्षेत्र वापस जा रहे हैं क्योंकि संसद में तो समय बर्बाद हो रहा है.

(टीडीपी सांसदों ने 13 फरवरी को स्पीकर की मेज से बिल लेकर फाड़ दिया)
यह सिर्फ संसद की गरिमा पर ही दाग नहीं लगा है बल्कि पीआरएस के पास मौजूद आंकड़े बताते हैं कि सदन में कामकाज की अवधि और गुणवत्ता दोनों में गिरावट आ रही है. 1950 के दशक में भारतीय लोकसभा की बैठक साल में औसतन 127 दिन चलती थी. लेकिन 2000 से यह औसतन 72 दिन रह गई है.
1952 से 1989 तक लोकसभा ने हर साल करीब 65 बिल पारित किए. अब यह संख्या गिरकर करीब 40 बिल सालाना की रह गई है. 1962 से 1991 तक हर लोकसभा ने लगातार शत-प्रतिशत काम किया यानी उनकी बैठकें निर्धारित समय के बाद भी चलीं. लोकसभा का समय सुबह 11 बजे से शाम 6 बजे तक और राज्यसभा का समय सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक होता है, लेकिन 15वीं लोकसभा में सिर्फ 63 फीसदी काम हुआ.
जसवंत सिंह बताते हैं, ‘‘उन दिनों की बात अलग थी. मुझे याद है कि मारुति के राष्ट्रीयकरण बिल पर पूरी रात बहस हुई और सरकार को हर बात का जवाब देना पड़ा था. इस लोकसभा में रक्षा मंत्रालय और विदेश नीति के बारे में एक भी सार्थक बहस नहीं हुई. ऐसी परंपरा थी कि प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री जब भी विदेश यात्रा पर जाते थे तो लौटकर संसद को रिपोर्ट दिया करते थे.

अब वे परंपराएं नहीं रहीं.’’ संसद में कामकाज ठप होने का असर राज्यों पर भी दिखाई देने लगा है. वाशिंगटन पोस्ट के भारत ब्यूरो के प्रमुख रह चुके साइमन डेनयर ने अपनी किताब रोग एलिफेंट में लिखा है कि अरुणाचल प्रदेश में 2000 से 2010 के बीच विधानसभा की बैठक औसतन सिर्फ 8 दिन और हरियाणा में सिर्फ 14 दिन हुई.
इस पतन से क्या इशारा मिलता है? पीआरएस के सह-संस्थापक सी.वी. मधुकर का तर्क है कि इसकी एक बड़ी वजह 1985 में पारित दल-बदल निरोधक कानून है. इसके बाद सांसदों के लिए सदन में तैयारी करके आना जरूरी नहीं रह गया है क्योंकि वे चाहे कुछ भी सोचें, उन्हें पार्टी व्हिप का पालन करना ही होगा. दूसरी वजह गठबंधन की राजनीति का उदय है. छोटी पार्टियों की उपस्थिति की वजह से यह अंदाजा लगा पाना नामुमकिन हो गया है कि कब कौन-सा मुद्दा कैसे उठेगा.
तीसरी वजह जो हाल में ज्यादा प्रासंगिक हो गई है, वह है राष्ट्रीय टेलीविजन के साथ संसद का नाता. लगातार प्रसारण के आकर्षण में बंधे सांसदों ने सदन को तमाम तरह के मुद्दे उठाने और सियासी बाजी का मंच बना डाला है.

इसे इस बात से समझा जा सकता है कि 18 फरवरी को तीसरे पहर लंबे सत्र के बाद जब लोकसभा ने तेलंगाना विधेयक को मंजूरी दी तो टेलीविजन पर उसका प्रसारण नहीं हुआ. पहले चार मिनट तक लोकसभा टीवी के पर्दे पर लिखा रहा कि संसद की कार्यवाही स्थगित है, जबकि वास्तव में कार्यवाही चल रही थी.
प्रसारण रुकने की खबर विपक्ष के सांसदों तक पहुंचते ही उन्होंने कथित सेंसरशिप का नारा लगाते हुए बवाल मचा दिया. 3:04 बजे लिखकर दिखाया जाने लगा कि सीधा प्रसारण जल्द शुरू होगा. लेकिन सीधा प्रसारण एक घंटे बाद शुरू हुआ. लोकसभा सचिवालय ने सफाई दी कि तकनीकी खराबी से प्रसारण नहीं हो सका. एक वरिष्ठ मंत्री का कहना है, ‘‘पहले अखबारों में हर संसदीय बहस की विस्तार से चर्चा होती थी, जिससे शायद सांसद अपनी बात कहने के लिए उत्साहित होते थे.

(15वीं लोकसभा के कुल समय का महज 39 फीसदी ही प्रश्नकाल को दिया जा सका)
टेलीविजन समाचार के इस दौर में सिर्फ उन्हीं खबरों पर नजर रहती है, जिनसे सनसनी पैदा हो.’’
अब सवाल यह पैदा होता है कि संसद की यह बिगड़ी हुई हालत आखिर कैसे सुधरे और इसे वापस पटरी पर कैसे लाया जाए? संविधान ने संसद को सरकार पर नजर रखने की जिम्मेदारी सौंपी है, जिसका विपरीत प्रावधान यह है कि सिर्फ सरकार के पास ही संसद की बैठक बुलाने का अधिकार है.
पीआरएस में जनसंपर्क के मुखिया चक्षु रॉय कहते हैं, ‘‘कई अन्य देशों में अगर दो तिहाई सांसदों की सहमति हो तो संसद का सत्र बुलाया जा सकता है. हम भी शायद यह बदलाव करने की सोच सकते हैं.’’ 2011 में राज्यसभा सांसद राजीव चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री को इसी तरह का सुझाव लिखकर भेजा था.
उनका कहना था कि हर साल संसद के तीन विशेष सत्र पांच-पांच दिन के हों, जिनमें देश के प्रमुख मुद्दों पर बहस की जाए. प्रधानमंत्री कार्यालय ने अब तक उसका कोई जवाब नहीं दिया है.इसी तरह दल-बदल निरोधक कानून में भी संशोधन किया जा सकता है. उप-राष्ट्रपति सुझाव दे चुके हैं कि सांसदों को पार्टी की राय के अनुसार वोट तभी देना चाहिए, जब सरकार दांव पर हो. अन्य मुद्दों पर बहस के दौरान उन्हें अपनी इच्छा से वोट देने का अधिकार होना चाहिए.
2010 में कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने एक गैर-सरकारी विधेयक पेश करके संविधान में इसी तरह के संशोधन की मांग की थी. संसद के 60 वर्ष के कार्यकाल में उसकी कार्यशैली को बदलने की कोई कोशिश नहीं हुई है. सच तो यह है कि सब जानते हैं क्या करना चाहिए, पर उस सुधार के लिए राजनैतिक संकल्प या सहमति का अभाव है.
इस बीच हो-हल्ले की राजनीति ने संसद को ठप कर रखा है. 2012 में तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने कहा था कि संसद में हर बार बाधा पडऩे पर ढाई लाख रु. प्रति मिनट का नुकसान होता है. नीतिगत फैसले न लेने वाली विधायिका की दृष्टि से असली नुकसान तो अरबों रुपयों का होता होगा.
1970 के दशक में स्वतंत्र पार्टी के संस्थापकों में से एक पीलू मोदी संसद के प्रखर वक्ता थे. इंदिरा गांधी सरकार ने उनके बाजार समर्थक विचारों की वजह से उन्हें वाशिंगटन का एजेंट करार दिया था. ताने और तंज इस हद तक बढ़ गए कि वे एक बड़ा-सा बैज लगाकर संसद में आए, जिस पर लिखा था, ‘‘मैं सीआइए का एजेंट हूं.’’ अध्यक्ष ने जब उनसे बैज उतारने के लिए कहा तो उन्होंने यह कहते हुए उसे उतार दिया, ‘‘अब मैं सीआइए का एजेंट नहीं रहा.’’ उस समय हाजिरजवाबी थी, अब सिर्फ बकवास.

