हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने 22 जनवरी को राकेश खुराना को हार्वर्ड कॉलेज का अगला डीन नियुक्त करने का ऐलान किया. यह ऐलान बेशक खास था लेकिन नई बात नहीं क्योंकि पिछले कुछ समय से ऐसी नियुक्तियां हो रही हैं.
हाल के वर्षों में भारत में जन्मे कई विद्वान किसी शोर-शराबे और चकाचौंध के बिना अमेरिका की कई प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज के शीर्ष पदों पर नियुक्त हुए हैं. इसके जरिये उन्हें करोड़ों डॉलर के बजट के साथ ही कुछ खास तरह की सुविधाएं भी मिल जाती हैं.
रेणु खटोर प्राइवेट डिनर में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिलीं और उन्होंने पॉप स्टार बेयोन्से के साथ अपनी तस्वीर ट्विटर पर डाली; जमशेद भरूचा का कहना है कि न्यूयॉर्क के पूर्व मेयर और अरबपति कारोबारी माइकल ब्लूमबर्ग के साथ उनकी दोस्ती कमाल की है; सौमित्र दत्ता ने नैनो पर रतन टाटा और उद्यमिता पर एन.आर. नारायण मूर्ति से चर्चा की है; और सुनील कुमार पिछले दिनों आरबीआइ के गवर्नर रघुराम राजन से मिले और बताया कि उन्हें अपना ''नया काम पसंद आ रहा है.”
पिछले तीन साल में आधा दर्जन प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज ने भारतीय मूल के अमेरिकी विद्वानों को अपना प्रमुख चुना है. यह सिलसिला रेणु खटोर से शुरू हुआ, जो जनवरी, 2008 में ह्यूस्टन यूनिवर्सिटी की प्रेसिडेंट बनीं और 1.3 अरब डॉलर के यूनिवर्सिटी ऑफ ह्यूस्टन सिस्टम की चांसलर भी हैं.
उसके बाद सतीश के. त्रिपाठी न्यूयॉर्क में बफैलो यूनिवर्सिटी के प्रेसिडेंट बने; जमशेद भरूचा न्यूयॉर्क सिटी की कूपर यूनियन के प्रेसिडेंट बने; आर. सुब्बास्वामी कुंबले एम्हर्स्ट की मैसाचुसेट्स यूनिवर्सिटी के चांसलर नियुक्त हुए; प्रदीप खोसला सैन डिएगो में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के चांसलर चुने गए; विस्तास्प करभरी अर्लिंग्टन में टेक्सास यूनिवर्सिटी के प्रेसिडेंट चुने गए; और सुब्रा सुरेश ने पिट्सबर्ग में कारनेगी मेलन यूनिवर्सिटी के प्रेसिडेंट का कार्यभार संभाला.

(कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी के प्रेसिडेंट 57 वर्षीय सुब्रा सुरोश)
यूनिवर्सिटी में कॉलेजों और ग्रेजुएट स्कूलों के भारतीय-अमेरिकी डीन तो तादाद में और भी ज्यादा हैं. हाल ही में हुई नियुक्तियों में हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के डीन नितिन नोहरिया, कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में सैमुअल कर्टिस जॉनसन ग्रेजुएट स्कूल ऑफ मैनेजमेंट के डीन सौमित्र दत्ता शामिल हैं. सुनील कुमार को जिस सर्च कमेटी ने शिकागो यूनिवर्सिटी के बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस का डीन चुना है, उसमें रघुराम राजन फैकल्टी मेंबर हैं.
अमेरिकी यूनिवर्सिटीज में करीब 8 फीसदी फैकल्टी सदस्य भारत सहित एशियाई अमेरिकी बताए जाते हैं. बिजनेस और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में इनकी तादाद ज्यादा है. अनेक बिजनेस स्कूलों में एक चौथाई फैकल्टी सदस्य मूल रूप से भारत के हैं.
सैन डिएगो में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रदीप खोसला के अनुसार, ''1970 के दशक के मध्य और 1980 के दशक में अमेरिका आ गए लोग अब उपलब्धियों और उम्र के उस पड़ाव पर हैं, जहां वे यूनिवर्सिटीज में ऊंचे पद हासिल कर सकते हैं. इससे साबित होता है कि हम सब अमेरिका में नाम कमाने का सपना सच कर सकते हैं.”
अमेरिकी यूनिवर्सिटीज को भी उनके भारतीय लीडर्स के अनूठे कौशल का फायदा मिलता है. कॉर्नेल के सौमित्र दत्ता कहते हैं, ''इन पदों पर आपको विविधता भरे हालात से दो-चार होना पड़ता है क्योंकि आप दुनिया भर के छात्रों और फैकल्टी के साथ काम करते हैं. विविधता भारतीयों के खून में है. अंग्रेजी में बात करने की ह्नमता से बहुत फर्क पड़ता है.”
अमेरिकी यूनिवर्सिटीज भी ज्यादा ग्लोबल नजरिया अपनाने की कोशिश कर रही हैं. बोस्टन एरिया में टफ्ट्स यूनिवर्सिटी के फ्लेचर स्कूल में इंटरनेशनल बिजनेस एंड फाइनेंस के सीनियर एसोसिएट डीन भास्कर चक्रवर्ती कहते हैं, ''लीडरशिप से जुड़े पदों पर भारत और अन्य उभरते देशों के लोगों की उपस्थिति से प्राइवेट सेक्टर या पब्लिक पॉलिसी के दायरे में प्रवेश करके फैसले लेने वालों को विश्व के उन हिस्सों की दिशा में सोचने का मौका मिलता है, जहां ग्रोथ की अपार संभावनाएं मौजूद हैं.”

(राकेश खुराना, 46 वर्ष, डीन, हार्वर्ड कॉलेज, हावर्ड यूनिवर्सिटी, प्रभावी जुलाई 2014 से )
अमेरिकी यूनिवर्सिटीज में ऊंचे पदों पर भारतीयों के आने से भारत में हायर एजुकेशन को भी फायदा मिल सकता है. सुनील कुमार का कहना है, ''जैसा सब जानते हैं कि अमेरिकी यूनिवर्सिटीज की नजर हमेशा दुनिया के बाकी हिस्सों पर लगी रहती है, इसकी वजह न सिर्फ छात्रों को आकर्षित करना है बल्कि रिसर्च को अंजाम देना और सहयोग स्थापित करना है.
ऐसी स्थिति में भारत से जुड़े लोगों के यूनिवर्सिटीज में आने से वे इस तरह की गतिविधियों का मुंह उस तरफ कर सकेंगे.” सौमित्र दत्ता कॉर्नेल और बंगलुरू के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के बीच सहयोग की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं, ''इस तरह का सहयोग इस बात से और आसान हो जाता है कि मैं भारत से हूं और आइआइएम-बंगलुरू के डायरेक्टर को अच्छी तरह जानता हूं.”
इस समय प्रमुख अमेरिकी स्कूलों के लगभग सभी भारतीय प्रमुख भारत में ही पढ़े हैं और उन सब के बीच इस बात पर सहमति है कि भारत हायर एजुकेशन की फील्ड में क्यों पिछड़ रहा है. न्यूयॉर्क के प्राइवेट कॉलेज कूपर यूनियन के अध्यक्ष जमशेद भरूचा ने कहा, ''तेजी से विस्तार पाती इस फील्ड में योग्य फैकल्टी की कमी है.”
अमेरिका में भारतीय विद्वानों का कहना है कि फैकल्टी के सदस्यों को अच्छा वेतन देने में लचीले रुख की कमी और रिसर्च की प्रवृत्ति का अभाव काबिल लोगों को भारत से बाहर ले जा रहा है. सुनील कुमार कहते हैं, ''अगर आपके यहां तनख्वाह की ऐसी व्यवस्था है जहां हर किसी को लगभग समान वेतन ही मिलता है तो यह उन क्षेत्रों में काफी नुकसानदायक हो सकता है, जहां वास्तव में टैलेंट की कमी है.”

(विस्तास्प करभरी, 52 वर्ष, प्रेसिडेंट टेक्सास यूनिवर्सिटी, अर्लिंग्टन)
प्रधानमंत्री की ग्लोबल एडवायजरी काउंसिल की सदस्य खटोर का मानना है कि मौजूदा सरकारी यूनिवर्सिटीज को प्राइवेट सेक्टर का सहारा मिलने पर भारतीय शिक्षा व्यवस्था की हालत बेहतर हो सकेगी. उन्होंने बताया कि अमेरिका में अधिकतर छात्र सरकारी इंस्टीट्यूट्स में पढ़ते हैं और ह्यूस्टन यूनिवर्सिटी को हर साल प्राइवेट सेक्टर से 12 करोड़ डॉलर मिलते हैं.
खटोर कहती हैं, ''दिल्ली यूनिवर्सिटी, बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी जैसे इंस्टीट्यूट और आइआइटी और आइआइएम के पास कम से कम एक क्षेत्र में नॉलेज और उत्कृष्टता का भंडार है, और वह अध्यापन है. अगर प्राइवेट सेक्टर अलग यूनिवर्सिटी बनाने की बजाए इन यूनिवर्सिटीज को रिसर्च के लिए मदद करे तो सोचिए, ये कितनी जल्दी और कितनी आगे जा सकती हैं.”
फिलहाल तो भारतीय छात्रों के लिए अमेरिका एक प्रमुख पसंदीदा ठिकाना है. करीब 1,00,000 भारतीय छात्र अमेरिका में हैं. इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल एजुकेशन की नवंबर, 2013 की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में 10 फीसदी अंतरराष्ट्रीय छात्र भारत के हैं. भविष्य में वे अमेरिका या भारत में से किसकी यूनिवर्सिटी का टैलेंट बनेंगे, यह कुछ हद तक इस बात पर निर्भर है कि आने वाले वर्षों में भारत में हायर एजुकेशन व्यवस्था की दशा-दिशा क्या होगी.
हाल के वर्षों में भारत में जन्मे कई विद्वान किसी शोर-शराबे और चकाचौंध के बिना अमेरिका की कई प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज के शीर्ष पदों पर नियुक्त हुए हैं. इसके जरिये उन्हें करोड़ों डॉलर के बजट के साथ ही कुछ खास तरह की सुविधाएं भी मिल जाती हैं.
रेणु खटोर प्राइवेट डिनर में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिलीं और उन्होंने पॉप स्टार बेयोन्से के साथ अपनी तस्वीर ट्विटर पर डाली; जमशेद भरूचा का कहना है कि न्यूयॉर्क के पूर्व मेयर और अरबपति कारोबारी माइकल ब्लूमबर्ग के साथ उनकी दोस्ती कमाल की है; सौमित्र दत्ता ने नैनो पर रतन टाटा और उद्यमिता पर एन.आर. नारायण मूर्ति से चर्चा की है; और सुनील कुमार पिछले दिनों आरबीआइ के गवर्नर रघुराम राजन से मिले और बताया कि उन्हें अपना ''नया काम पसंद आ रहा है.”
पिछले तीन साल में आधा दर्जन प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज ने भारतीय मूल के अमेरिकी विद्वानों को अपना प्रमुख चुना है. यह सिलसिला रेणु खटोर से शुरू हुआ, जो जनवरी, 2008 में ह्यूस्टन यूनिवर्सिटी की प्रेसिडेंट बनीं और 1.3 अरब डॉलर के यूनिवर्सिटी ऑफ ह्यूस्टन सिस्टम की चांसलर भी हैं.
उसके बाद सतीश के. त्रिपाठी न्यूयॉर्क में बफैलो यूनिवर्सिटी के प्रेसिडेंट बने; जमशेद भरूचा न्यूयॉर्क सिटी की कूपर यूनियन के प्रेसिडेंट बने; आर. सुब्बास्वामी कुंबले एम्हर्स्ट की मैसाचुसेट्स यूनिवर्सिटी के चांसलर नियुक्त हुए; प्रदीप खोसला सैन डिएगो में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के चांसलर चुने गए; विस्तास्प करभरी अर्लिंग्टन में टेक्सास यूनिवर्सिटी के प्रेसिडेंट चुने गए; और सुब्रा सुरेश ने पिट्सबर्ग में कारनेगी मेलन यूनिवर्सिटी के प्रेसिडेंट का कार्यभार संभाला.

(कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी के प्रेसिडेंट 57 वर्षीय सुब्रा सुरोश)
यूनिवर्सिटी में कॉलेजों और ग्रेजुएट स्कूलों के भारतीय-अमेरिकी डीन तो तादाद में और भी ज्यादा हैं. हाल ही में हुई नियुक्तियों में हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के डीन नितिन नोहरिया, कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में सैमुअल कर्टिस जॉनसन ग्रेजुएट स्कूल ऑफ मैनेजमेंट के डीन सौमित्र दत्ता शामिल हैं. सुनील कुमार को जिस सर्च कमेटी ने शिकागो यूनिवर्सिटी के बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस का डीन चुना है, उसमें रघुराम राजन फैकल्टी मेंबर हैं.
अमेरिकी यूनिवर्सिटीज में करीब 8 फीसदी फैकल्टी सदस्य भारत सहित एशियाई अमेरिकी बताए जाते हैं. बिजनेस और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में इनकी तादाद ज्यादा है. अनेक बिजनेस स्कूलों में एक चौथाई फैकल्टी सदस्य मूल रूप से भारत के हैं.
सैन डिएगो में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रदीप खोसला के अनुसार, ''1970 के दशक के मध्य और 1980 के दशक में अमेरिका आ गए लोग अब उपलब्धियों और उम्र के उस पड़ाव पर हैं, जहां वे यूनिवर्सिटीज में ऊंचे पद हासिल कर सकते हैं. इससे साबित होता है कि हम सब अमेरिका में नाम कमाने का सपना सच कर सकते हैं.”
अमेरिकी यूनिवर्सिटीज को भी उनके भारतीय लीडर्स के अनूठे कौशल का फायदा मिलता है. कॉर्नेल के सौमित्र दत्ता कहते हैं, ''इन पदों पर आपको विविधता भरे हालात से दो-चार होना पड़ता है क्योंकि आप दुनिया भर के छात्रों और फैकल्टी के साथ काम करते हैं. विविधता भारतीयों के खून में है. अंग्रेजी में बात करने की ह्नमता से बहुत फर्क पड़ता है.”
अमेरिकी यूनिवर्सिटीज भी ज्यादा ग्लोबल नजरिया अपनाने की कोशिश कर रही हैं. बोस्टन एरिया में टफ्ट्स यूनिवर्सिटी के फ्लेचर स्कूल में इंटरनेशनल बिजनेस एंड फाइनेंस के सीनियर एसोसिएट डीन भास्कर चक्रवर्ती कहते हैं, ''लीडरशिप से जुड़े पदों पर भारत और अन्य उभरते देशों के लोगों की उपस्थिति से प्राइवेट सेक्टर या पब्लिक पॉलिसी के दायरे में प्रवेश करके फैसले लेने वालों को विश्व के उन हिस्सों की दिशा में सोचने का मौका मिलता है, जहां ग्रोथ की अपार संभावनाएं मौजूद हैं.”

(राकेश खुराना, 46 वर्ष, डीन, हार्वर्ड कॉलेज, हावर्ड यूनिवर्सिटी, प्रभावी जुलाई 2014 से )
अमेरिकी यूनिवर्सिटीज में ऊंचे पदों पर भारतीयों के आने से भारत में हायर एजुकेशन को भी फायदा मिल सकता है. सुनील कुमार का कहना है, ''जैसा सब जानते हैं कि अमेरिकी यूनिवर्सिटीज की नजर हमेशा दुनिया के बाकी हिस्सों पर लगी रहती है, इसकी वजह न सिर्फ छात्रों को आकर्षित करना है बल्कि रिसर्च को अंजाम देना और सहयोग स्थापित करना है.
ऐसी स्थिति में भारत से जुड़े लोगों के यूनिवर्सिटीज में आने से वे इस तरह की गतिविधियों का मुंह उस तरफ कर सकेंगे.” सौमित्र दत्ता कॉर्नेल और बंगलुरू के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के बीच सहयोग की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं, ''इस तरह का सहयोग इस बात से और आसान हो जाता है कि मैं भारत से हूं और आइआइएम-बंगलुरू के डायरेक्टर को अच्छी तरह जानता हूं.”
इस समय प्रमुख अमेरिकी स्कूलों के लगभग सभी भारतीय प्रमुख भारत में ही पढ़े हैं और उन सब के बीच इस बात पर सहमति है कि भारत हायर एजुकेशन की फील्ड में क्यों पिछड़ रहा है. न्यूयॉर्क के प्राइवेट कॉलेज कूपर यूनियन के अध्यक्ष जमशेद भरूचा ने कहा, ''तेजी से विस्तार पाती इस फील्ड में योग्य फैकल्टी की कमी है.”
अमेरिका में भारतीय विद्वानों का कहना है कि फैकल्टी के सदस्यों को अच्छा वेतन देने में लचीले रुख की कमी और रिसर्च की प्रवृत्ति का अभाव काबिल लोगों को भारत से बाहर ले जा रहा है. सुनील कुमार कहते हैं, ''अगर आपके यहां तनख्वाह की ऐसी व्यवस्था है जहां हर किसी को लगभग समान वेतन ही मिलता है तो यह उन क्षेत्रों में काफी नुकसानदायक हो सकता है, जहां वास्तव में टैलेंट की कमी है.”

(विस्तास्प करभरी, 52 वर्ष, प्रेसिडेंट टेक्सास यूनिवर्सिटी, अर्लिंग्टन)
प्रधानमंत्री की ग्लोबल एडवायजरी काउंसिल की सदस्य खटोर का मानना है कि मौजूदा सरकारी यूनिवर्सिटीज को प्राइवेट सेक्टर का सहारा मिलने पर भारतीय शिक्षा व्यवस्था की हालत बेहतर हो सकेगी. उन्होंने बताया कि अमेरिका में अधिकतर छात्र सरकारी इंस्टीट्यूट्स में पढ़ते हैं और ह्यूस्टन यूनिवर्सिटी को हर साल प्राइवेट सेक्टर से 12 करोड़ डॉलर मिलते हैं.
खटोर कहती हैं, ''दिल्ली यूनिवर्सिटी, बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी जैसे इंस्टीट्यूट और आइआइटी और आइआइएम के पास कम से कम एक क्षेत्र में नॉलेज और उत्कृष्टता का भंडार है, और वह अध्यापन है. अगर प्राइवेट सेक्टर अलग यूनिवर्सिटी बनाने की बजाए इन यूनिवर्सिटीज को रिसर्च के लिए मदद करे तो सोचिए, ये कितनी जल्दी और कितनी आगे जा सकती हैं.”
फिलहाल तो भारतीय छात्रों के लिए अमेरिका एक प्रमुख पसंदीदा ठिकाना है. करीब 1,00,000 भारतीय छात्र अमेरिका में हैं. इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल एजुकेशन की नवंबर, 2013 की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में 10 फीसदी अंतरराष्ट्रीय छात्र भारत के हैं. भविष्य में वे अमेरिका या भारत में से किसकी यूनिवर्सिटी का टैलेंट बनेंगे, यह कुछ हद तक इस बात पर निर्भर है कि आने वाले वर्षों में भारत में हायर एजुकेशन व्यवस्था की दशा-दिशा क्या होगी.

