यूपीए सरकार का दूसरा कार्यकाल मई 2014 में खत्म हो रहा है. उसने भारतीय अर्थव्यवस्था को मिली-जुली हालत में छोड़ा है. पहले पांच साल में जितना अच्छा काम हुआ था, अगले पांच साल में नीतिगत निष्क्रियता, भ्रष्टाचार, घटते निवेश और बढ़ती मुद्रास्फीति के कारण सब बेकार हो गया. कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सरकार के राज में भारत की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 2003-04 की 8.3 प्रतिशत से बढ़कर 2006-07 में 9.6 प्रतिशत हो गई थी. उसे वैश्विक आर्थिक उफान का भी लाभ मिला. यूपीए के सत्ता में आने पर शेयर बाजार सहम गया था और सेंसेक्स 10 प्रतिशत नीचे गिर गया था, लेकिन अक्तूबर, 2007 में इसने 20,000 का आंकड़ा छू लिया. लगता था कि भारत सुपर पावर बनने की गोल्डमैन सैक्स की भविष्यवाणी को सच कर देगा.
लेकिन खुशी के दिन ज्यादा नहीं टिके. 2008 में दुनिया के वित्तीय बाजार ढह गए. भारतीय बाजार को वैश्विक अर्थव्यवस्था के पतन से बचाने के लिए एक विस्तारित सहायता पैकेज की घोषणा हुई, जिससे मुद्रास्फीति बढ़ी और अगस्त, 2013 में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 68.75 के रिकॉर्ड स्तर तक गिर गया. भारत सोनाऔर तेल, दोनों का भारी आयात करता है. उनके बढ़ते दामों ने मुसीबतें और बढ़ा दीं. फिर 2जी स्पेक्ट्रम और कोयला खनन घोटाले सामने आए और निर्णय लेने की प्रक्रिया थम-सी गई. सारी मार घरेलू निवेश पर पड़ी. प्रस्तावित निवेश 2010-11 में 17.3 लाख करोड़ रु. से घटकर 2012-13 में 5.6 लाख करोड़ रु. रह गया. 2012-13 में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 4.5 प्रतिशत रह गई और सरकार ने अनुमान लगाया कि 2013-14 में यह मामूली बढ़त के साथ 4.9 प्रतिशत रहेगी. आदित्य बिरला ग्रुप के प्रमुख अर्थशास्त्री अजीत रानाडे कहते हैं, ‘‘जहां एक ओर पिछले 10 वर्षों से औसत विकास दर महज 7.7 फीसदी रही है, वहीं पिछले कुछ वर्षों में आई गिरावट भी बहुत निराशाजनक है.’’
यूपीए सरकार को शुरुआती वर्षों के आर्थिक लाभ को लुटाने और भारतीय विकास कथा के यूं ढह जाने के लिए याद किया जाएगा. इस विरासत ने कैसे आकार लिया. 


यूपीए की आर्थिक विरासत: ठप हो गई विकास की गाड़ी
यूपीए सरकार का दूसरा कार्यकाल मई 2014 में खत्म हो रहा है. दूसरे कार्यकाल में नीतिगत निष्क्रियता, भ्रष्टाचार, घटते निवेश और बढ़ती मुद्रास्फिति हावी रहे हैं.

अपडेटेड 25 फ़रवरी , 2014
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