scorecardresearch

अलवर में सूखे पेड़ की डाल गिरने से हुई मौत में मुख्य सचिव समेच चार अधिकारी दोषी

राजस्थान के अलवर में सूखे पेड़ की डाल गिरने से डॉक्टर की मौत के मामले में मुख्य सचिव समेत चार अधिकारी दोषी, एक करोड़ रु. से ज्यादा का मुआवजा.

अपडेटेड 17 फ़रवरी , 2014
तारीख 31 जनवरी, 2014. स्थान: राजस्थान के अलवर जिले के महल में स्थित जिला व सेशन जज कैलाश चंद्र शर्मा की अदालत, जहां रजवाड़ों के जमाने में महाराजा अलवर का जनता दरबार सजा करता था. मध्यान करीब 12 बजे जिला न्यायाधीश ने जैसे ही डॉ. ललित किशोर झालानी की मौत के लिए राजस्थान सरकार के मुख्य सचिव, प्रमुख शासन सचिव, अलवर जिला कलेक्टर और पीडब्लूडी विभाग के स्थानीय अधिशासी अभियंता की लापरवाही को जिम्मेदार ठहराया,.

कोर्ट रूम में मौजूद मृतक डॉ. ललित किशोर झालानी के 30 वर्षीय बेटे डॉ. ऋषि की आंखें अपने पिता को याद करते हुए नम हो उठीं. वे अपने दिल के उस एहसास को इंडिया टुडे से साझा करते हैं, ''जज ने जैसे ही फैसला सुनाया, मुझे लगा- आखिर न्याय मिल गया. लड़ाई लंबी रही, लेकिन लड़ाई अभी और बाकी है.”

डॉ. झालानीक्या था मामला
दरअसल इस ऐतिहासिक फैसले की पृष्ठभूमि में 2 अप्रैल, 2008 को अलवर जिले के कंपनी बाग में हुआ एक हादसा है, जिसमें 56 वर्षीय डॉ. झालानी की मौत हो गई थी. हमेशा की तरह उस दिन भी आंखों के डॉ. झालानी अपनी पत्नी प्रतिभा झालानी और अन्य डॉक्टर दोस्तों के साथ अलवर के मशहूर कंपनी बाग में सुबह की सैर कर रहे थे.

अचानक पीपल के सूखे पेड़ की एक बड़ी डाल झालानी के सिर पर गिरी. गंभीर चोट की वजह से उन्हें शहर के सोलंकी अस्पताल ले जाया गया. हालत खराब होने की वजह से उन्हें गुडगांव के पारस अस्पताल रेफर कर दिया गया. मगर इलाज में देरी की वजह से डॉ. झालानी की उसी दिन मौत हो गई.

हादसे के वक्त एमडी की पढ़ाई कर रहीं और झालानी की बेटी डॉ. मानसी बताती हैं, ''लापरवाही का आलम इस कदर था कि उस दिन पार्क का मेन गेट बंद था और कोई गार्ड नहीं था. इसलिए गंभीर रूप से घायल पिता को पार्क से बाहर निकालने में ही करीब 45 मिनट का वक्त लग गया. अगर देरी नहीं होती तो शायद उन्हें बचाया जा सकता था.”  

फैसले में क्या
इस मामले में करीब पांच साल की लड़ाई के बाद अलवर के जिला व सेशन जज कैलाश चंद्र शर्मा ने माना कि झालानी की मौत की वजह सरकारी कर्मचारियों की लापरवाही है. जिला अदालत ने अपने आदेश में न सिर्फ कंपनी बाग के रखरखाव में लापरवाही के लिए स्थानीय अधिशासी अभियंता (एक्सईएन) को जिम्मेदार ठहराया, बल्कि शासन की श्रृंखला में आने वाले अधिकारियों अलवर कलेक्टर, पीडब्लूडी के प्रमुख शासन सचिव और मुख्य सचिव को भी इस लापरवाही का जिम्मेदार मानते हुए दोषी ठहराया.

डॉ. झालानी के परिवार ने आयकर रिटर्न के आधार पर 5.32 करोड़ रु. के मुआवजे की मांग की थी, लेकिन कोर्ट ने एक करोड़ 76 हजार रु. का मुआवजा देने का आदेश दिया. जिला अदालत ने फैसले में इस राशि पर 28 जनवरी, 2009 से 31 जनवरी, 2014 तक 12 फीसदी के हिसाब से और उसके बाद का कुल रकम पर 6 फीसदी ब्याज का सालाना भुगतान करने निर्देश दिया है.
पीडि़त झालानी परिवार का घर और अस्पताल
अफरशाही पर कितना होगा असर
जिस कोर्ट रूम में न्यायमूर्ति शर्मा फैसला सुना रहे थे, उससे महज चंद कदम की दूरी पर उसी परिसर में जिला कलेक्टर का भी दफ्तर है और कोर्ट के फैसले में वे भी एक पक्ष हैं. लेकिन फैसले पर कलेक्टर आर.एस. जाखड़ से प्रतिक्रिया मांगने पर भड़कते हुए कहते हैं, ''पहले फाइल आने दीजिए, फिर हम टिप्पणी करेंगे. हवा में चल रही बातों पर टिप्पणी नहीं करेंगे.”

उन्होंने इस फैसले की जानकारी पर छपी खबरों को भी हल्के में लेते हुए कहा कि मीडिया में खबरें छपती ही रहती हैं. हालांकि जब इंडिया टुडे ने इस फैसले की बाबत जज कैलाश चंद्र शर्मा से बात की तो उन्होंने नियमों का हवाला देकर इनकार कर दिया. लेकिन उन्होंने कहा, ''हमारा काम फैसला देना था, सो दे दिया.”

यह फैसला देखने-सुनने में भले कड़ा लग रहा हो, लेकिन इस फैसले में किसी अधिकारी को निजी तौर पर जिम्मेदार ठहराए जाने की बजाए पद को दोषी माना गया है. मुआवजे की रकम का भुगतान भी सरकारी खजाने से होगा. इसलिए इस फैसले का असर सरकारी अधिकारियों पर तब तक नहीं पडऩे वाला, जब तक कि सरकार सख्ती न दिखाए.

अगर सरकार इस फैसले की भावना को समझते हुए मुआवजे की रकम तात्कालीन अधिकारियों के वेतन या पेंशन से वसूलने की नीति बना ले तो निश्चित तौर से बाकी अफसरशाही को जिम्मेदारी का एहसास कराएगा.

झालानी परिवार के वकील अनिल गुप्ता और अलवर में उनके सहायक वकील राजेश्वर नंद शर्मा कहते हैं, ''इस मामले में किसी व्यक्ति को नहीं बल्कि पद को दोषी माना गया है, इसलिए घटना के वक्त रहे अधिकारियों के करियर पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा.”

जिला अदालत ने अपने 11 पन्ने के फैसले में विस्तार से सरकार की सारी दलीलों को खारिज कर लापरवाही को माना है. सरकार की ओर से अदालत में पेड़ की डाल के सूखी होने को भी झुठलाने की कोशिश की गई, पेड़ को हरा-भरा बताया.

लेकिन पीडि़त पक्ष ने पुरानी खबरों के आधार पर साबित कर दिया कि तमाम शिकायतों के बावजूद प्रशासन ने लापरवाही दिखाई. पुलिस की जांच रिपोर्ट में 30 फुट लंबी सुखी डाल को डॉ. झलानी की मौत की वजह बताया गया था.

झालानी परिवार के वकील अनिल गुप्ता कहते हैं, ''हमने डॉ. झलानी की आय के आधार पर मुआवजा मांगा था. अब कोर्ट ने सरकारी लापरवाही को मान लिया है लेकिन मुआवजे की राशि बढ़ाने के लिए हम ऊपरी अदालत में अपील करेंगे.” सरकारी पक्ष ने अदालत में इस दुर्घटना को एक्ट ऑफ गॉड बताया, लेकिन गुप्ता कहते हैं कि सरकारी पक्ष इस दलील को साबित करने के लिए कोई साक्ष्य पेश नहीं कर पाया.

अलवर जिला अदालत के फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दी जा सकती है, लेकिन यह फैसला न सिर्फ उन सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों के लिए खतरे की घंटी है जो जिम्मेदारी से काम करने की बजाए दिन काटते हैं, बल्कि देश के उन आम नागरिकों को भी राह दिखाने वाला है जो आम तौर पर ऐसी घटनाओं को महज हादसा या नियति मानकर चुपचाप बैठ जाते हैं.

झालानी परिवार भी शुरू में इसे नियति मान बैठा था, लेकिन उसे अचानक मालूम पड़ा कि जिस पेड़ की डाल ने डॉ. झालानी की जिंदगी लील ली उसके लिए सरकार की लापरवाही और अकर्मण्यता जिम्मेदार है. इस लापरवाही पर मानसी का गुस्सा फूट पड़ता है, ''मुकदमे के दौरान कभी-कभी लगता था कि ऐसा सिर्फ भारत में ही हो सकता है क्योंकि बाहर के देशों में मानव जीवन को काफी अहमियत दी जाती है.”
Advertisement
Advertisement