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योगश्वर दत्त और मैं जय और वीरू से भी ज्यादा गहरे दोस्त हैं: सुशील कुमार

सुशील कुमार जहां योगश्वर से अपनी दोस्ती को जहां जय और वीरू से भी गहरी बताते हैं वही योगेश्वर कहते हैं कि वे दोनों एक-दूसरे की कार्बन-कॉपी हैं.

अपडेटेड 30 दिसंबर , 2013
उन दोनों ने कुश्ती को लेकर भारत का नजरिया ही बदल दिया है और कुश्ती एक लोकप्रिय देहाती शगल से अब 2016 रियो ओलंपिक में हमारी प्रमुख पदक संभावनाओं में से एक हो गई है. एसोसिएट एडिटर जी.एस. विवेक के साथ एक गुफ्तगू में दो बार व्यक्तिगत ओलंपिक पदक जीतने वाले भारत के एकमात्र खिलाड़ी 30 वर्षीय सुशील कुमार और लंदन 2012 के कांस्य पदक विजेता 31 वर्षीय योगेश्वर दत्त ने दोस्ती, बलिदान और कामयाबी के बारे में बातचीत की.


आप दोनों इस बात के लिए मशहूर हैं कि आप एक ही सिक्के के दो पहलुओं की तरह हैं. आखिर कितना पुराना है यह आपका दोस्ताना?
सुशील कुमार
(दिमाग पर जोर डालते हुए से) 1995?
योगेश्वर दत्त नहीं...नहीं, 1997. इस साल हमारी दोस्ती को 16 साल हो जाएंगे. इतने समय से हम साथ हैं.
सुशील सच यार, मुझे बिलकुल याद नहीं. हम छोटे-छोटे बच्चे थे. हम भाई तो नहीं, मगर किसी भी मायने में सगे भाइयों से कम भी नहीं हैं. एक-दूसरे की कामयाबियों और नाकामियों को हमने एक साथ देखा और उनसे पार पाया है. हम जय और वीरू से भी ज्यादा गहरे दोस्त हैं.

फिर तो एक साथ बड़े होने और साथ-साथ भिड़ंत की तमाम प्यारी यादें भी तो होंगी आप दोनों के पास?
सुशील
क्या-क्या नहीं किया हम दोनों ने साथ मिलकर. हर तरह की शरारतें. कुश्ती के लिए जाने कितनी बार लोकल बसों में बैठकर रोहतक का सफर किया है. एक दफा अमरीका में एक टूर्नामेंट के दौरान मैंने हांफते हुए योगेश्वर से कहा, ‘‘भाई, आज तो शायद जान ही निकल जाएगी.’’ इस पर इसने कहा, ‘‘जब तक मैं हूं ना, कुछ नहीं होगा.’’ उसने कहा कि वह मुझे इतनी आसानी से निबट जाने नहीं देगा. इस बंदे ने मुझको हमेशा अपने से आगे रखा है.
योगेश्वर हम हमेशा एक ही कमरे में ठहरते रहे हैं और टूर्नामेंट्स में साथ-साथ पदक जीतते रहे हैं. और तो और, हमारी आदतें भी एक जैसी हैं. आप कह सकते हैं कि हम एक-दूसरे की कार्बन-कॉपी हैं. एक ही सिक्के के दो पहलू. 2008 बीजिंग ओलंपिक एक अपवाद था जहां सुशील जीता मगर मैं नहीं जीत पाया. लेकिन लंदन में फिर से गाड़ी ढर्रे पर आ गई.

बीजिंग में सबको योगेश्वर से पदक जीतने की उम्मीद थी. मगर पदक जीता सुशील ने.
सुशील
सच पूछो तो इस बात का मुझे गहरा अफसोस था. योगेश्वर अच्छे पूल में था मगर किस्मत ही खराब थी. जब मैं उससे मिला तो वह मेरी कामयाबी पर बहुत खुश था और मुझे भी अच्छा लगा कि चलो, कम-से-कम इस बात से तो उसे खुशी मिली.
योगेश्वर हां, मैं खुद से तो निराश था मगर सुशील के जीतने की मुझे खुशी थी. उसके पदक ने एक खेल के रूप में कुश्ती को और खास तौर पर पहलवानों को देखने का भारत का नजरिया ही बदल दिया. उसने पहलवानों की पूरी बिरादरी के लिए सम्मान अर्जित किया. उसने अकेले दम पर इस खेल चेहरा ही बदल दिया.
सुशील इसका सारा श्रेय मैं अकेले नहीं ले सकता. मेरे लिए बहुत-से लोग परदे के पीछे रहकर काम करते रहे हैं. मगर मैं मानता हूं कि बीजिंग के बाद काफी कुछ बदला है. और लंदन में जहां हम दोनों ने एक-एक पदक जीता, उसके बाद तो कुश्ती ने भारतीय लोगों के दिमाग में एक बिलकुल अलग ही जगह बना ली. अब हमारे पास विदेशों में टूर्नामेंट जीतने वाले कई नाम हैं और वे अपने-अपने कटेगरी में अव्वल हैं.

अक्सर लोग कहते हैं कि ‘‘पहलवान है तो दिमाग कम होगा.’’ इस तरह के तंज पर आपकी क्या प्रतिक्रिया होती है?
सुशील
अजी, कुश्ती में ताकत के मुकाबले दिमाग ज्यादा चाहिए होता है. आपको फटाफट फैसले लेने होते हैं. आपको दिमाग लगाना होता है कि सामने वाले के दिमाग में क्या चल रहा है, उसका विश्लेषण कर उसे नाकाम करना होता है और अपने हमले की योजना बनानी होती है.

पहलवानों से जुड़ा एक और मिथक यह है कि वे बहुत ज्यादा खाते हैं. इसमें कितनी सचाई है?
योगेश्वर
भई, पहलवान एक संतुलित खुराक लेते हैं. बस. हम दोनों ही शाकाहारी हैं. हम स्वस्थ भोजन करते हैं और हमें हमेशा अपने वजन का संतुलन बनाए रखना पड़ता है. हम नियमित अंतराल पर बादाम, दूध, सलाद और दही लेते रहते हैं.

कुश्ती में टेक्नॉलॉजी के इस्तेमाल के बारे में हमने नहीं सुना है. आप लोग रणनीतियां कैसे तैयार करते हैं?
योगेश्वर सुशील
मेरे थिंक टैंक हैं. हर टूर्नामेंट के पहले और उसके दौरान हम काफी चर्चा करते हैं. हम ताल ठोकने वाले लगभग सभी लोगों को, उनके मजबूत और कमजोर पहलुओं को जानते हैं.

क्या आपमें से किसी ने मनीष पहलवान के बारे में सुना है?
योगेश्वर
कौन मनीष? (हंसते हैं)
सुशील मैं जानता हूं उसे.
योगेश्वर मेरा ही नाम है मनीष. मेरे गांव में और अखाड़े में भी लोग मुझे इसी नाम से जानते हैं. स्कूल में दाखिला लेते वक्त मेरा नाम योगेश्वर लिखा दिया गया. इस तरह मैं सिर्फ बाहरी दुनिया के लिए ही योगेश्वर हूं, उन लोगों के लिए जिन्होंने मुझे राष्ट्रीय पहलवान बन जाने के बाद जाना.

लंदन के बाद हर कोई रियो में आप दोनों से स्वर्ण पदक से कम की उम्मीद नहीं कर रहा. इतनी उम्मीदों को साथ लेकर चलते हुए आप अपना फोकस कैसे बनाए रख पाते हैं?
सुशील
उम्मीदें बढ़ेंगी, यह तो बहुत सीधी-सी बात है. मैं उसी तरह तैयारी में यकीन करता हूं जैसे कोई छात्र किसी प्रतियोगी परीक्षा के लिए करता है. ओलंपिक इसी तरह की परीक्षा है. मुझे पूरा भरोसा है कि भारत के पहलवान रियो में कम से कम तीन पदक जरूर जीतेंगे. शुक्र है कि हमारे कोचों ने हमें हमेशा जमीन पर बनाए रखा है. शोहरत के शोर में बह जाना  खिलाडिय़ों की प्रवृत्ति होती है लेकिन अपने आस-पास अच्छे लोगों की मौजूदगी और उनसे बात करते रहने से काफी मदद मिलती है.

कुश्ती के दायरे से बाहर बात करें तो, एक-दूसरे की ऐसी कौन-सी एक खूबी है, जिसके आप मुरीद हैं?
सुशीलयोगेश्वर
बड़े ही मददगार स्वभाव का है. ऐसा सिर्फ मेरे लिए ही नहीं है. उससे कोई भी मदद मांगे तो वह हमेशा आगे बढ़कर उसकी मदद करता है. इसके अलावा वह हमेशा सीखने के लिए तैयार रहता है. किसी तरह का गुरूर पाले बगैर वह अपने पास आने वाले सबसे कम उम्र और सबसे अनुभवहीन पहलवानों से भी सीखने की कोशिश करता है.
योगेश्वर सुशील बहुत ही मजाकिया स्वभाव का है. अपने चुटकुलों से वह किसी को भी हंसा सकता है. हालांकि आपके सामने, कम से कम रिकॉर्ड पर (हंसते हुए) मैं उसके चुटकुले आपको नहीं सुना सकता. सोचता हूं कि मैं इस मामले में उसका आधा भी होता तो कोई बात होती. वह बोलता भी अच्छा है. इधर-उधर की हांकने की बजाए वह संजीदा ढंग से बात कर सकता है जो कि बड़ी खूबी है.
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