अगले साल लोकसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के प्रति कुछ नामी-गिरामी मुसलमानों की राय भी बदलने लगी है. गुजरात में जन्मे इंग्लैंड के देवबंदी मुस्लिम नेता एडम पटेल इस साल जनवरी में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने आए थे.
हाउस ऑफ लॉर्ड्स के सदस्य ये वही पटेल हैं, जिन्होंने 2003 में मोदी के लंदन दौरे के समय उनकी 'मुस्लिम विरोधी राजनीति’ के खिलाफ प्रदर्शन किया था. पटेल की ताजा यात्रा अगर लोगों को चौंकाने वाली थी, तो महीने भर बाद उन्होंने जो कुछ किया, वह मोदी विरोधियों को सकते में डालने वाला था.
मार्च में उन्होंने अमेरिका में पेनसिलवेनिया यूनिवर्सिटी के व्हार्टन स्कूल की इस बात के लिए कड़ी आलोचना की कि उसने इंडिया इकोनॉमिक फोरम में भाषण देने के लिए पहले तो मोदी को मुख्य वक्ता के तौर पर बुलाया पर बाद में न्यौता वापस ले लिया था.
मुसलमानों को अपनी ओर खींचने की मोदी की कोशिशों का असर कुछ हद तक दिखने लगा है. करीब महीने भर पहले दिल्ली के इंडिया इस्लामिक सेंटर में मशहूर मुस्लिम मौलवियों और बुद्धिजीवियों का एक सम्मेलन हुआ. जिसका विषय था, ''राजनैतिक गुलामी, कब तक?”
संदेश साफ था: कांग्रेस 2014 के लोकसभा चुनावों में मुसलमानों को हल्के में नहीं ले सकती है और न ही पूरी तरह से अपने साथ मानकर चल सकती है. साथ ही अब स्थिति वैसी नहीं रही कि मोदी को इस समुदाय के लिए अछूत माना जाए. अगले साल लोकसभा चुनावों तक इस तरह के करीब 40 सम्मेलन आयोजित करने की योजना बनाई गई है.

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआइएमपीएलबी) के मौजूदा सदस्य और दारुल उलूम देवबंद के प्रवक्ता रह चुके मुफ्ती एजाज अरशद और एआइएमपीएलबी के महासचिव और प्रतिष्ठित इस्लामिक विद्वान मौलाना वली रहमानी 'कांग्रेस की राजनैतिक गुलामी’ के खिलाफ प्रचार अभियान में जुटे हैं.
गुजरात में 2002 के सांप्रदायिक दंगों में कथित भूमिका के लिए कठघरे में खड़े किए गए मोदी के प्रति मुस्लिम नेताओं और संगठनों का रवैया नरम होता जा रहा है. इस बदलाव के पीछे मोदी के तथाकथित मुस्लिम दूतों का हाथ बताया जाता है, जो बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार मोदी के प्रति मुसलमानों की धारणा को बदलने की कोशिश कर रहे हैं.
मोदी की छवि सुधारने की कोशिश करने वाले इन लोगों में सबसे चर्चित नाम 52 वर्षीय देवबंदी मुस्लिम और अहमदाबाद स्थित कारोबारी जफर सरेशवाला का है. ये वही शख्स हैं जो एडम पटेल को मोदी के दरवाजे पर लेकर आए थे. उन्होंने ही अरशद और रहमानी को 'राजनैतिक गुलामी’ के खिलाफ प्रचार अभियान के लिए राजी किया था.
सरेशवाला पहले कभी मोदी के कट्टर आलोचक हुआ करते थे. जब 2002 के दंगों में अहमदाबाद स्थित उनका कारखाना फूंक दिया गया था, तो वे लंदन चले गए थे. वहां उन्होंने मोदी विरोधी प्रदर्शनों में हिस्सा लिया और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में उनके खिलाफ अपील करने की भी योजना बनाई थी. लेकिन 2003 में उनके कुछ मित्रों ने मोदी के साथ उनकी मुलाकात कराई, जिसके बाद मोदी के बारे में उनकी राय बदल गई.
मोदी के कहने पर ही 2005 में सरेशवाला गुजरात लौट आए और उन्होंने अहमदाबाद में बीएमडब्लू की डीलरशिप ले ली. हालांकि मीडिया में मोदी का बचाव करते हुए वे यह भी बताना नहीं भूलते कि वे मोदी के अंधभक्त नहीं हैं. सरेशवाला कुछ इस अंदाज में मुसलमानों को मोदी से जुडऩे की पैरवी करते हैं, ''मैं मुसलमानों से कभी नहीं कहता कि वे मोदी को वोट दें.
मैं उनसे यही कहता हूं कि वे मोदी के कामों पर गौर करें और फिर कोई फैसला करें. मोदी ने मुसलमानों से कहा है कि अगर विकास के कार्यक्रमों में उनकी सरकार की ओर से किसी भी तरह का भेदभाव किया जाता है तो वे उनसे सीधा सवाल कर सकते हैं.”
गुजरात बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चे के अध्यक्ष 38 वर्षीय महबूब अली बावासाहेब भी सूफी बरेलवी मुसलमानों में मोदी का प्रचार करते हैं. सूरत में मशहूर अतलादारा दरगाह के संरक्षक महबूब अली ने मुसलमानों में मोदी की छवि को सुधारने के मकसद से 2011 में मोदी के सद्भावना मिशन की कमान संभाली थी.
इंग्लैंड में बावासाहेब के समर्थक एक गुजराती व्यापारी आरिफ आलम के नेतृत्व में एक टीवी चैनल 'उम्मा’ चलाते हैं, जिसे 165 देशों में प्रसारित किया जाता है. यह चैनल सांप्रदायिक सद्भाव का प्रचार करने के लिए जाना जाता है. बावासाहेब इस साल देश भर में करीब दर्जन भर जगहों का दौरा कर चुके हैं, ताकि मोदी के लिए मशहूर सूफी नेताओं का समर्थन हासिल किया जा सके.
वे मुसलमानों के बीच गुजरात के विकास के आंकड़ों को रखते हैं. उनके शब्दों में, ''मोदी जब यह कहते हैं कि विकास में मुसलमानों को बराबर का भागीदार बनाया जाएगा, उनका तुष्टिकरण नहीं किया जाएगा तो बड़ी संख्या में मुसलमान उन्हें सुनना चाहते हैं.”
इस साल की शुरुआत में आंध्र प्रदेश के मुस्लिम नेता अकबरुद्दीन ओवैसी ने जब हिंदुओं के खिलाफ नफरत भरा भाषण दिया था, तो बावासाहेब ने हैदराबाद जाकर एक अभियान चलाया था. इस अभियान को नाम दिया गया, ''ओवैसी की दुर्भावना के खिलाफ मोदी की सद्भावना.”

वे किछौछा शरीफ के मौलाना मोहम्मद अशरफी, दरगाह निजामुद्दीन औलिया के मुज्जमिल निजामी, दरगाह कुतुबशाह शरीफ के मौलवी गयासुद्दीन, दरगाह मजारेशरीफ के सैयद अमीन मियां और बरेलवी स्कूल के सभी धार्मिक नेताओं से मिल चुके हैं.
वे गुजराती मुसलमानों की टीम बना रहे हैं, जो अगले साल लोकसभा चुनावों से पहले देश की महत्वपूर्ण मुस्लिम हस्तियों से मिलकर मोदी के लिए समर्थन मांगेगी. यह टीम वोट बैंक की राजनीति की मुखालफत और सबके लिए समान विकास की मोदी नीति को मुस्लिम समुदाय के सामने रखेगी.
सरेशवाला और बावासाहेब के अलावा 45 वर्षीया आसिफा खान टीवी पर मुस्लिम युवाओं और महिलाओं में मोदी की अच्छी छवि पेश करने में लगी हैं. सौम्य और अंग्रेजी भाषी आसिफा को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल ने 2009 में गुजरात में कांग्रेस पार्टी की प्रवक्ता के तौर पर चुना था. लेकिन 2012 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले वे बीजेपी में चली गई थीं.
आसिफा बताती हैं कि मोदी सरकार के विकास कार्यों से प्रभावित होकर ही उन्होंने कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल होने का अपना मन बनाया था. पेशे से पत्रकार रह चुकीं आसिफा खासकर अपने शहर भरूच में एक पुराने और जर्जर पड़े सरकारी अस्पताल को फिर से चालू करने के मोदी के प्रयासों से प्रभावित हुईं.
वे कहती हैं, ''मुझे यह बात अच्छी लगी कि किसी भेदभाव के बिना विकास किया गया था, जो मुसलमानों के लिए बहुत जरूरी है. कांग्रेस की दिखावे वाली तुष्टीकरण की नीति से कुछ नहीं होने वाला.” मुसलमानों के बीच आसिफा के प्रभाव को देखते हुए उन्हें राज्य बीजेपी इकाई से उठाकर हाल ही में बीजेपी के अल्पसंख्यक मोर्चे की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भेज दिया गया है.
मुसलमानों तक पहुंचने के मोदी के इन प्रयासों से भले बीजेपी को इस समुदाय का बहुत ज्यादा वोट न मिले, लेकिन पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को अपनी मुस्लिम विरोधी छवि को दुरुस्त करने और 2002 के दंगों के भूत से छुटकारा पाने में मदद तो जरूर मिलेगी.
हाउस ऑफ लॉर्ड्स के सदस्य ये वही पटेल हैं, जिन्होंने 2003 में मोदी के लंदन दौरे के समय उनकी 'मुस्लिम विरोधी राजनीति’ के खिलाफ प्रदर्शन किया था. पटेल की ताजा यात्रा अगर लोगों को चौंकाने वाली थी, तो महीने भर बाद उन्होंने जो कुछ किया, वह मोदी विरोधियों को सकते में डालने वाला था.
मार्च में उन्होंने अमेरिका में पेनसिलवेनिया यूनिवर्सिटी के व्हार्टन स्कूल की इस बात के लिए कड़ी आलोचना की कि उसने इंडिया इकोनॉमिक फोरम में भाषण देने के लिए पहले तो मोदी को मुख्य वक्ता के तौर पर बुलाया पर बाद में न्यौता वापस ले लिया था.
मुसलमानों को अपनी ओर खींचने की मोदी की कोशिशों का असर कुछ हद तक दिखने लगा है. करीब महीने भर पहले दिल्ली के इंडिया इस्लामिक सेंटर में मशहूर मुस्लिम मौलवियों और बुद्धिजीवियों का एक सम्मेलन हुआ. जिसका विषय था, ''राजनैतिक गुलामी, कब तक?”
संदेश साफ था: कांग्रेस 2014 के लोकसभा चुनावों में मुसलमानों को हल्के में नहीं ले सकती है और न ही पूरी तरह से अपने साथ मानकर चल सकती है. साथ ही अब स्थिति वैसी नहीं रही कि मोदी को इस समुदाय के लिए अछूत माना जाए. अगले साल लोकसभा चुनावों तक इस तरह के करीब 40 सम्मेलन आयोजित करने की योजना बनाई गई है.

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआइएमपीएलबी) के मौजूदा सदस्य और दारुल उलूम देवबंद के प्रवक्ता रह चुके मुफ्ती एजाज अरशद और एआइएमपीएलबी के महासचिव और प्रतिष्ठित इस्लामिक विद्वान मौलाना वली रहमानी 'कांग्रेस की राजनैतिक गुलामी’ के खिलाफ प्रचार अभियान में जुटे हैं.
गुजरात में 2002 के सांप्रदायिक दंगों में कथित भूमिका के लिए कठघरे में खड़े किए गए मोदी के प्रति मुस्लिम नेताओं और संगठनों का रवैया नरम होता जा रहा है. इस बदलाव के पीछे मोदी के तथाकथित मुस्लिम दूतों का हाथ बताया जाता है, जो बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार मोदी के प्रति मुसलमानों की धारणा को बदलने की कोशिश कर रहे हैं.
मोदी की छवि सुधारने की कोशिश करने वाले इन लोगों में सबसे चर्चित नाम 52 वर्षीय देवबंदी मुस्लिम और अहमदाबाद स्थित कारोबारी जफर सरेशवाला का है. ये वही शख्स हैं जो एडम पटेल को मोदी के दरवाजे पर लेकर आए थे. उन्होंने ही अरशद और रहमानी को 'राजनैतिक गुलामी’ के खिलाफ प्रचार अभियान के लिए राजी किया था.
सरेशवाला पहले कभी मोदी के कट्टर आलोचक हुआ करते थे. जब 2002 के दंगों में अहमदाबाद स्थित उनका कारखाना फूंक दिया गया था, तो वे लंदन चले गए थे. वहां उन्होंने मोदी विरोधी प्रदर्शनों में हिस्सा लिया और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में उनके खिलाफ अपील करने की भी योजना बनाई थी. लेकिन 2003 में उनके कुछ मित्रों ने मोदी के साथ उनकी मुलाकात कराई, जिसके बाद मोदी के बारे में उनकी राय बदल गई.
मोदी के कहने पर ही 2005 में सरेशवाला गुजरात लौट आए और उन्होंने अहमदाबाद में बीएमडब्लू की डीलरशिप ले ली. हालांकि मीडिया में मोदी का बचाव करते हुए वे यह भी बताना नहीं भूलते कि वे मोदी के अंधभक्त नहीं हैं. सरेशवाला कुछ इस अंदाज में मुसलमानों को मोदी से जुडऩे की पैरवी करते हैं, ''मैं मुसलमानों से कभी नहीं कहता कि वे मोदी को वोट दें.
मैं उनसे यही कहता हूं कि वे मोदी के कामों पर गौर करें और फिर कोई फैसला करें. मोदी ने मुसलमानों से कहा है कि अगर विकास के कार्यक्रमों में उनकी सरकार की ओर से किसी भी तरह का भेदभाव किया जाता है तो वे उनसे सीधा सवाल कर सकते हैं.”
गुजरात बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चे के अध्यक्ष 38 वर्षीय महबूब अली बावासाहेब भी सूफी बरेलवी मुसलमानों में मोदी का प्रचार करते हैं. सूरत में मशहूर अतलादारा दरगाह के संरक्षक महबूब अली ने मुसलमानों में मोदी की छवि को सुधारने के मकसद से 2011 में मोदी के सद्भावना मिशन की कमान संभाली थी.
इंग्लैंड में बावासाहेब के समर्थक एक गुजराती व्यापारी आरिफ आलम के नेतृत्व में एक टीवी चैनल 'उम्मा’ चलाते हैं, जिसे 165 देशों में प्रसारित किया जाता है. यह चैनल सांप्रदायिक सद्भाव का प्रचार करने के लिए जाना जाता है. बावासाहेब इस साल देश भर में करीब दर्जन भर जगहों का दौरा कर चुके हैं, ताकि मोदी के लिए मशहूर सूफी नेताओं का समर्थन हासिल किया जा सके.
वे मुसलमानों के बीच गुजरात के विकास के आंकड़ों को रखते हैं. उनके शब्दों में, ''मोदी जब यह कहते हैं कि विकास में मुसलमानों को बराबर का भागीदार बनाया जाएगा, उनका तुष्टिकरण नहीं किया जाएगा तो बड़ी संख्या में मुसलमान उन्हें सुनना चाहते हैं.”
इस साल की शुरुआत में आंध्र प्रदेश के मुस्लिम नेता अकबरुद्दीन ओवैसी ने जब हिंदुओं के खिलाफ नफरत भरा भाषण दिया था, तो बावासाहेब ने हैदराबाद जाकर एक अभियान चलाया था. इस अभियान को नाम दिया गया, ''ओवैसी की दुर्भावना के खिलाफ मोदी की सद्भावना.”

वे किछौछा शरीफ के मौलाना मोहम्मद अशरफी, दरगाह निजामुद्दीन औलिया के मुज्जमिल निजामी, दरगाह कुतुबशाह शरीफ के मौलवी गयासुद्दीन, दरगाह मजारेशरीफ के सैयद अमीन मियां और बरेलवी स्कूल के सभी धार्मिक नेताओं से मिल चुके हैं.
वे गुजराती मुसलमानों की टीम बना रहे हैं, जो अगले साल लोकसभा चुनावों से पहले देश की महत्वपूर्ण मुस्लिम हस्तियों से मिलकर मोदी के लिए समर्थन मांगेगी. यह टीम वोट बैंक की राजनीति की मुखालफत और सबके लिए समान विकास की मोदी नीति को मुस्लिम समुदाय के सामने रखेगी.
सरेशवाला और बावासाहेब के अलावा 45 वर्षीया आसिफा खान टीवी पर मुस्लिम युवाओं और महिलाओं में मोदी की अच्छी छवि पेश करने में लगी हैं. सौम्य और अंग्रेजी भाषी आसिफा को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल ने 2009 में गुजरात में कांग्रेस पार्टी की प्रवक्ता के तौर पर चुना था. लेकिन 2012 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले वे बीजेपी में चली गई थीं.
आसिफा बताती हैं कि मोदी सरकार के विकास कार्यों से प्रभावित होकर ही उन्होंने कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल होने का अपना मन बनाया था. पेशे से पत्रकार रह चुकीं आसिफा खासकर अपने शहर भरूच में एक पुराने और जर्जर पड़े सरकारी अस्पताल को फिर से चालू करने के मोदी के प्रयासों से प्रभावित हुईं.
वे कहती हैं, ''मुझे यह बात अच्छी लगी कि किसी भेदभाव के बिना विकास किया गया था, जो मुसलमानों के लिए बहुत जरूरी है. कांग्रेस की दिखावे वाली तुष्टीकरण की नीति से कुछ नहीं होने वाला.” मुसलमानों के बीच आसिफा के प्रभाव को देखते हुए उन्हें राज्य बीजेपी इकाई से उठाकर हाल ही में बीजेपी के अल्पसंख्यक मोर्चे की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भेज दिया गया है.
मुसलमानों तक पहुंचने के मोदी के इन प्रयासों से भले बीजेपी को इस समुदाय का बहुत ज्यादा वोट न मिले, लेकिन पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को अपनी मुस्लिम विरोधी छवि को दुरुस्त करने और 2002 के दंगों के भूत से छुटकारा पाने में मदद तो जरूर मिलेगी.

