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कैंपस में अस्मत के लुटेरे शिक्षकों का बोलबाला

देश के विश्वविद्यालय बने यौन शोषण के बड़े ठिकाने. छात्राओं के अलावा अस्थायी महिला कर्मचारी भी शिक्षकों के निशाने पर. मामलों के सामने आने से सांसत में आई शिकारी प्रोफेसरों की जान.

अपडेटेड 10 दिसंबर , 2013
एक युवती तेज कदमों से इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के अपने डिपार्टमेंट की ओर जा रही है. उम्र होगी यही कोई 24 साल. पीएचडी के लिए इनरोल हुए उसे सात महीने हुए हैं. पूरब का ऑक्सफोर्ड कही जाने वाली इस यूनिवर्सिटी को लेकर उसके सपने जैसे हकीकत से टकराकर हर दिन चकनाचूर हो रहे हैं. वह कहती है, “यूनिवर्सिटी में अपने ही विभाग में आना हर रोज किसी युद्ध के मैदान में आने की तरह है.” और उसे इस स्थिति में किसी दुश्मन ने नहीं, उसके अपने रिसर्च गाइड और प्रोफेसर ने डाला है. उसके गाइड एक सम्मानित विद्वान हैं और देश-दुनिया के सेमिनारों में भाषण देते हैं, लेकिन छात्राओं के पास होते ही उनका एक और चेहरा सामने आता है. वह बताती है, “वे मुझे सेक्स का खुला प्रस्ताव दे चुके हैं. इस आकर्षण के साथ कि पीएचडी जल्दी और अच्छी होगी और वे लेक्चररशिप के लिए सिफारिश भी कर देंगे.” साथ ही यह छिपी धमकी भी कि अगर वह राजी नहीं हुई तो करियर चैपट समझे.

एक और केंद्रीय यूनिवर्सिटी काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पीएचडी की एक छात्रा ने तीन महीने पहले अपने रिसर्च गाइड के खिलाफ गलत तरीके से शरीर को छूने और अश्लील इशारे करने का आरोप लगाया. उसकी शिकायत थी कि प्रोफेसर ने गले लगाने के बहाने उसके सीने पर हाथ रख दिया. शिकायत विवि के जेंडर सेल तक पहुंची, लेकिन यौन उत्पीडऩ रोकने के लिए बने इस विभाग ने कोई कार्रवाई करने की जगह लड़की को समझ-बुझकर और थोड़ा डराकर मामले को दबा दिया. और लड़की को समझने और डराने की जिम्मेदारी विवि की महिला प्रोफेसरों ने उठाई.

क्या भारतीय विश्वविद्यालय और उच्च शिक्षा संस्थान देश में यौन उत्पीडऩ के सबसे बड़े ठिकानों में तब्दील हो गए हैं, जहां शिक्षकों की यौन लिप्सा छात्राओं पर कहर ढा रही है? यह असहज करने वाली बात है, लेकिन सच यही है कि गुरु-शिष्य के पवित्र कहे जाने वाले रिश्तों में कुछ भी पवित्र नहीं है. ऐसे मामलों पर लगातार नजर रखने वाली मुंबई के टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइसेंज की प्रोफेसर आशा वाजपेयी कहती हैं, “शिक्षा परिसरों में यौन उत्पीडऩ के बहुत गंभीर मामले भी कभी-कभार ही सामने आ पाते हैं. रोजमर्रा की जिंदगी में बड़े पैमाने पर यह सब हो रहा है, लेकिन लड़कियां अक्सर मुंह नहीं खोलतीं और जब कभी ऐसा कोई मामला सामने आ भी जाता है तो जांच कमेटी बिठाकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश होती है.” दरअसल यह मान लिया गया है कि यौन उत्पीडऩ उतना बुरा नहीं है, जितना कि मामले का सामने आना क्योंकि इससे बदनामी फैल जाती है.

कैंपस के कुकर्मी
हाल ही में प्रोफेसर आयशा किदवई के नेतृत्व में दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में छात्राओं पर किए गए एक सर्वे से पता चला कि 96 फीसदी छात्राएं कैंपस के भीतर किसी-ने-किसी रूप में यौन उत्पीडऩ का शिकार हुई हैं. सबसे खतरनाक बात यह है कि 63 फीसदी छात्राओं ने पुरुष शिक्षकों पर सेक्सुअल हैरसमेंट और महिलाओं के खिलाफ अभद्र टिप्पणी करने का आरोप लगाया है.

ऐसा भी नहीं है कि मामला हमेशा दबा-छिपा रहता है. जब पानी सिर से गुजर जाए तो कई बार लड़कियों को मजबूरन शिकायत करनी पड़ती है. चंद मामलों में प्रोफेसर साहबों को नौकरी छोडऩी भी पड़ी है तो कुछ मामलों में गिरफ्तारी तक की नौबत आई है (देखें बॉक्स). लेकिन ऐसा कम ही होता है. पटना विवि में डेढ़ साल पहले एक सेक्सुअल हैरसमेंट कंप्लेन कमेटी बनी है. इसकी अध्यक्ष प्रोफेसर भारती एस. कुमार गर्व से बताती हैं कि उनके पास यौन उत्पीडऩ की अब तक कोई शिकायत नहीं आई है. तो क्या पटना यूनिवर्सिटी में छात्राओं को साथ ऐसा कुछ नहीं होता. लड़कियों से बात करते ही यूनिवर्सिटी की दूसरी ही सच्चाई सामने आती है. हिंदी से एमए कर रही छात्रा आरती (बदला हुआ नाम) कहती हैं, “टीचर क्लास रूम में ही लड़कियों को अजीब तरह से घूरते रहते हैं. निराला या किसी भी कवि को पढ़ाते हुए जाने कहां से सेक्स की बातें निकाल लेते हैं. उन्हें साहित्य के नाम पर एक ही रस पढ़ाना आता है- शृंगार रस.” एमए सेकेंड ईयर की एक छात्रा अपना नाम न बताने की शर्त पर कहती है, “टीचर ऐसे समय में ऑफिस में बुलाते हैं, जब वहां कोई न हो और फिर गंदी-गंदी बातें करते हैं. हमें डर लगता है लेकिन शिकायत किससे करें. घर वालों तक बात पहुंची तो पढ़ाई छुड़वाकर शादी कर देंगे.”

इसी यूनिवर्सिटी से मास कम्युनिकेशंस में ग्रेजुएशन कर रही 24 वर्षीया दिव्या गौतम गुस्से में कहती हैं, “अव्वल तो लड़कियां डरी रहती हैं. फिर वे चाहें भी तो शिकायत कहां करें. सेक्सुअल हैरसमेंट कंप्लेन कमेटी का न तो कोई ऑफिस है न फोन नंबर. छात्राओं को तो यह भी नहीं बताया गया है कि ऐसी कोई कमेटी भी है.”

तुम्हारी शिकायत—तुम्हीं दोषी
अगर सेक्सुअल हैरेसमेंट की कोई शिकायत आ भी जाए तो पूरा जोर मामले को रफा-दफा करने पर होता है. शिक्षकों की मानसिकता ऐसी है कि दोष तो लड़कियों का ही होता है और उन्हें ही बच-बचाकर चलना चाहिए. मगध कॉलेज की जेंडर सेल की सदस्य डॉ. सुहेली मेहता कहती हैं, “छात्राओं को खुद ही लिमिट में रहना चाहिए. मगध कॉलेज की छात्राओं को पटना कॉलेज में घूमने की भला क्या जरूरत है?” यह मानसिकता देश भर के विश्वविद्यालयों में है. इलाहाबाद विवि से पीएचडी कर रही 28 वर्षीया दुर्गेश चौहान कहती हैं, “किसी छात्रा का अगर कोई ब्वॉयफ्रेंड है या लड़कों से वह सहजता से बात करती है तो यौन उत्पीडऩ की शिकायत करने का उसका अधिकार खत्म समझिए. टीचर ताने कसेंगे कि इस लड़की की चार लड़कों से दोस्ती है, इसका तो खुद का ही कैरेक्टर ठीक नहीं है.” इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में हाल तक प्रॉक्टर रहे एक प्रोफेसर ऐसी किसी भी शिकायत पर लड़कियों को ही भगा देते थे कि तुम लोग तो लड़कों के साथ घूमती हो, हालांकि वे अपनी सफाई में कहते हैं कि “मैं तो हमेशा लड़कियों की मदद करता था.”

यौन उत्पीडऩ से बचने का दायित्व भी अक्सर लड़कियों पर ही डाल दिया जाता है. शिक्षा संस्थानों में छात्राओं के साथ होने वाले सेक्सुअल हैरसमेंट पर रिसर्च करने वाली मुंबई की एसएनडीटी यूनिवर्सिटी की डॉ. वीना पुनाचा कहती हैं “कोई भी शहर हो या कोई भी शिक्षा संस्थान, सेक्लुअल हैरसमेंट की शिकायत करने वाली छात्रा का चरित्र ही सबसे पहले संदेह के दायरे में होता है. छात्रा अगर आजादख्याल है और फेमिनिस्ट है या जींस पहनती है, अगर उसका ब्वॉयफ्रेंड है या वह तलाकशुदा है तो यौन उत्पीडऩ करने वाले की जगह छात्रा को ही अपराधी मान लिया जाता है.”

भारतीय विश्वविद्यालयों में ऐसे मामले अब लगातार सामने आ रहे हैं, लेकिन न्याय व्यवस्था या विश्वविद्यालय की आंतरिक व्यवस्था कोई ऐसा उदाहरण नहीं पेश कर पा रही है, जिससे यौन पिपासु प्रोफेसरों को कोई सबक मिले. मामला दबाए न दबे और दुनिया में थू-थू होने लगे तो ऐसे मास्टरों को अधिकतम अनिवार्य सेवानिवृत्ति की सजा भुगतनी पड़ती है. दिल्ली यूनिवर्सिटी में एक छात्रा का यौन उत्पीडऩ करने के आरोप में प्रोफेसर अजय तिवारी को अनिवार्य सेवानिवृत्ति पर भेज दिया गया, वहीं बीएचयू के एसोसिएट प्रोफेसर नरेंद्र कुमार की सेवा खत्म करने की जगह उन्हें सिर्फ सस्पेंड किया गया. बीएचयू के ही बाल चिकित्सा विभाग के प्रोफेसर बीडी भाटिया को भी एक छात्रा की शिकायत के बाद जबरन रिटायर करने का फैसला किया गया. जेएनयू में भी अपनी स्टुडेंट का यौन उत्पीडऩ करने के आरोपी प्रफेसर के.आर. नायर को जबरन सेवानिवृत्ति पर भेज दिया गया. जबरन सेवानिवृत्ति के रूप में विश्वविद्यालयों ने एक ऐसा रास्ता निकाल लिया है, जिसमें विश्वविद्यालय की इज्जत भी बच जाती है और शिक्षक को रिटायरमेंट के बाद के सारे बेनिफिट भी आराम से मिलते रहते हैं.

छात्र बदल गए-मास्टर नहीं बदले
भारतीय विश्वविद्यालयों में हाल के वर्षों में भारी बदलाव आया है. बड़ी संख्या में लड़कियां अब उच्च शिक्षा में आ रही हैं. कई विश्वविद्यालयों में पीएचडी स्कॉलर्स की संख्या को देखें तो लड़कियां अब लड़कों से आगे निकल चुकी हैं. मिसाल के तौर पर लखनऊ विश्वविद्यालय में वर्ष 2011-12 में कुल 475 विद्यार्थियों को पीएचडी की डिग्री दी गई, जिनमें से 249 लड़कियां और 226 लड़के हैं.

जिस तरह शिक्षा में पीएचडी तक पहुंचने वाली लड़कियों का आंकड़ा बदल गया, क्या उसी तरह क्या शिक्षकों के आंकड़े में भी कोई बदलाव आया है? आंकड़े बताते हैं कि विश्वविद्यालयों के टीचर्स स्टाफ रूम अभी भी पुरुषों के अड्डे हैं. इसी विश्वविद्यालय में 276 पुरुष शिक्षकों के मुकाबले सिर्फ 120 महिला शिक्षक हैं. स्टाफ रूम में महिलाओं की कम संख्या की वजह से पुरुष शिक्षकों में मर्दवादी अश्लील चुटकुले सुनने-सुनाने और गालियां बकने आदि का चलन खत्म नहीं हो रहा है.

जब तक शिक्षक और छात्र दोनों पुरुष होते रहे, तब तक कैंपस में यौन उत्पीडऩ की घटनाएं या तो कम होती थीं या फिर दबी-ढकी रहती थीं. अब छात्राओं की संख्या बढऩे के साथ स्थिति निर्णायक रूप से बदली है. चूंकि अपवादों को छोड़कर, यौन उत्पीडऩ के लगभग सभी मामले दबे-छिपे रह जाते हैं, इसलिए आंकड़ों का कोई तुलनात्मक अध्ययन संभव नहीं है. लेकिन इतना तो साफ है कि अब छात्राओं में शिकायत करने का हौसला बढ़ा है. यौन उत्पीडऩ के खिलाफ देश में बन रहे व्यापक माहौल का असर भी कैंपस में हुआ है और इस बारे में अब खुलकर बात होने लगी है. ज्यादातर विश्वविद्यालयों ने जेंडर सेल बनाए हैं और औपचारिकता के लिए ही सही, पर उन्होंने काम करना शुरू कर दिया है.

यह महत्वपूर्ण बदलाव है कि छात्राएं अब छात्रों से कहीं बड़ी संख्या में पीएचडी करने लगी हैं. इसका असर शिक्षकों की संख्या पर पडऩा चाहिए. लेकिन यह नहीं हो पा रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि शिक्षकों के दबाव की वजह से उनकी रियाटरमेंट एज बढ़ाकर 65 साल कर दी गई है और रिटारमेंट के बाद भी रीइंप्लॉयमेंट और यहां तक कि एमरिटस प्रोफेसर जैसे कई तरीकों से शिक्षक विश्वविद्यालयों से जुड़े रहते हैं. इस वजह से नए पद नहीं आ रहे हैं और जो पद आ भी रहे हैं, उन्हें भरने की जगह विवि टेंपररी और एडहॉक शिक्षकों से काम चला रहे हैं.

टेंपररी, एडहॉक और लाचार
शिक्षा संस्थानों में टेंपररी तौर पर की जाने वाली नियुक्तियां यौन शोषण की बड़ी वजह हैं. राजधानी दिल्ली के ही बी.आर. आंबेडकर कॉलेज में बतौर लैब असिस्टेंट कार्यरत पवित्रा भारद्वाज ने बीती 30 सितंबर को सचिवालय के सामने खुद को आग लगा ली. वजहः वह कॉलेज के प्रिंसिपल जी.के. अरोड़ा के यौन शोषण से तंग आ चुकी थी. उसे मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया, जहां हफ्ते भर बाद उसकी मौत हो गई. थाने से लेकर दिल्ली यूनिवर्सिटी के सेक्सुअल हैरेसमेंट कंप्लेन सेल ‘एपेक्स कमेटी’ तक ऐसा कोई दरवाजा नहीं बचा था, जो उसने न खटखटाया हो पर कहीं सुनवाई न हुई. अंत में उसने यह कदम उठाया.

जमीनी सच्चाई यह है कि टेंपररी शिक्षक और कर्मचारी अपनी नौकरी जारी रखने के लिए विवि प्रशासन और प्रोफेसरों पर बुरी तरह निर्भर होते हैं. उनके बीच का संबंध बेहद अलोकतांत्रिक होता है और इसका लाभ कई पुरुष शिक्षक उठाते हैं. मिसाल के तौर पर दिल्ली यूनिवर्सिटी और संबंधित कॉलेजों में तकरीबन 6,500 स्थायी शिक्षकों के मुकाबले 4,000 टेंपररी टीचर्स हैं. टेंपररी टीचर्स को प्रतिमाह 40,000 से 45,000 रुपए तक पर काम करते हैं, लेकिन इसके अलावा उन्हें और कोई सुविधा मेडिकल और छुट्टियां आदि नहीं मिलतीं.

उनका कॉन्ट्रैक्ट सिर्फ 4 महीने का होता है और कॉन्ट्रेक्ट रिन्युअल भी कॉलेज की दया पर निर्भर होता है. लखनऊ यूनिवर्सिटी में कुछ सेल्फ फाइनेंस कोर्स में 35 के करीब शिक्षक एडहॉक पर हैं, जिन्हें 25,000 से 35,000 रुपए तनख्वाह मिलती है. इसके अलावा कुछ टीचर असाइनमेंट कॉन्ट्रैक्ट पर भी होते हैं, जिन्हें 250 से 500 रुपए प्रति लेक्चर दिए जाते हैं. आगे चलकर कभी परमानेंट होने की संभावना भी इन महिला शिक्षकों को झुककर सबकुछ सह लेने को मजबूर करती है. यह तमाम किस्म के शोषण का कारण बन जाता है. दरअसल छात्राओं और एडहॉक महिला टीचरों के साथ संबंधों में मौजूद अलोकतांत्रिक ताकत के समीकरण पुरुषों को शोषण का खुला मैदान मुहैया करा रहे हैं. (कई नाम पहचान छिपाने के लिए बदल दिए गए हैं).
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