अपनी शिक्षा और पेशे से इंजीनियर नीतीश कुमार के लिए यह महत्वपूर्ण क्षण है. बिहार के माथे से आखिरकार यह कालिख हट गई कि उसके अपने बिजलीघरों से शून्य मेगावाट उत्पादन होता है. 10 साल बाद ही सही, लेकिन बिहार सरकार के एक बिजलीघर की चिमनी धुआं उगल रही है.
ऐसा लगता है कि नीतीश बिजली में आत्मनिर्भरता का अपना चुनावी वादा पूरा करने की ओर बढ़ रहे हैं.
अक्तूबर, 2003 से ही बिहार की राजधानी पटना से करीब 90 किलोमीटर दूर एनएच-28 के किनारे स्थित कांटी थर्मल पावर स्टेशन में बिजली का उत्पादन ठप था. इसका परिसर मवेशियों के लिए चारागाह बनकर रह गया था और इसके चालू होने की उम्मीद दम तोड़ चुकी थी.
लेकिन 17 नवंबर को 10 साल बाद यहां शुरू हुए बिजली के रिकॉर्ड उत्पादन ने इस पुराने पावर स्टेशन को रोशनी से सराबोर कर दिया. पहले चरण में जीर्णोद्धार और आधुनिकीकरण के बाद चालू एक पुरानी यूनिट से निर्धारित 110 मेगावाट की क्षमता से दो मेगावाट अधिक बिजली उत्पादन हो रहा है, जबकि इससे पहले कांटी की दोनों पुरानी यूनिट से कभी भी पूरी क्षमता भर बिजली उत्पादन नहीं हुआ था.
बिहार की जरूरत के हिसाब से कांटी में शुरू हुआ बिजली उत्पादन मामूली है. लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उत्पादन शुरू करवाकर लोगों का भरोसा कायम रखने की कोशिश की है. कांटी में यूनिट के उद्घाटन समारोह में उन्होंने कहा, ''मैंने 2005 में कांटी की सभा में वादा किया था कि सरकार बनी तो थर्मल पावर से धुआं निकलेगा.
मैंने अपना वादा पूरा किया.” मुख्यमंत्री ने कहा कि वे 2015 तक 6,000 मेगावाट बिजली का उत्पादन करवाना चाहते हैं, जिसके लिए काम चल रहा है. अकेले कांटी पावर स्टेशन से अगले साल के अंत तक 610 मेगावाट बिजली उत्पादन की योजना है.
इससे पहले अक्तूबर माह में एनटीपीसी के बाढ़ पावर स्टेशन की एक यूनिट से बिहार को 330 मेगावाट बिजली की आपूर्ति शुरू हो चुकी है और चार अन्य यूनिट बनाया जाना है. यहां दो चरणों में 660 मेगावाट की पांच यूनिट बननी हैं जिसमें राज्य की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए दबाव बढ़ाया गया है.
बिहार के ऊर्जा मंत्री विजेंद्र प्रसाद यादव कहते हैं, ''हमने 10 साल से बंद पड़े कांटी पावर स्टेशन को चालू कराया. सरकार अपने वादे को पूरा करने के लिए भी सक्रिय है.”
हालांकि मुख्यमंत्री मानते हैं कि बिजली उत्पादन में रुकावटें भी हैं. पावर स्टेशन के निर्माण में जमीन अधिग्रहण, पर्यावरण विभाग से मंजूरी और कोल लिंकेज लेने पड़ते हैं. लेकिन उन्होंने दोहराया कि 2015 तक उनका लक्ष्य राज्य के हर गांव में बिजली पहुंचाना है.
अगर ऐसा नहीं हुआ तो वे वोट मांगने नहीं जाएंगे. करीब एक साल पहले ही 15 अगस्त को उन्होंने यह बात कही थी. ऊर्जा मंत्री विजेंद्र प्रसाद यादव लोगों से कह चुके हैं कि मुख्यमंत्री के वादे को कोई मंत्री पूरा नहीं करता तो उसे बने रहने का अधिकार नहीं है.
सरकार अपने वादे को पूरा करने के लिए बेगूसराय जिले के बरौनी में ढाई सौ मेगावाट क्षमता की दो नई यूनिट के निर्माण का काम शुरू कर चुकी है. इसे 2015-16 में चालू करने का लक्ष्य है.
पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के तहत भी चौसा (बक्सर), पीरपैंती (भागलपुर) और कजरा (लखीसराय) में 660 मेगावाट क्षमता के पावर स्टेशन बनाने की प्रक्रिया जारी है. इनके लिए कोल ब्लॉक भी मिल चुका है. औरंगाबाद के नवीनगर में एनटीपीसी और रेलवे की साझेदारी में बन रहे पावर स्टेशन में भी राज्य को हिस्सा मिलेगा.
2016-17 तक यहां एनटीपीसी की ओर से 458 मेगावाट और रेलवे से सौ मेगावाट बिजली मिलेगी. अडानी समूह से भी हजार मेगावट बिजली खरीदने के लिए समझौता किया गया है. नीतीश ने कहा है कि केंद्र से राज्य को 12,000 करोड़ रु. विशेष सहायता के रूप में मिले हैं.
उसमें से 9,200 करोड़ रु. बिजली पर खर्च किए जा रहे हैं. लेकिन राज्य में बिजली की मांग तेजी से बढ़ रही है. मार्च 2014 में यह बढ़कर 2,600 मेगावाट हो जाएगी. यानी सफर अभी लंबा है.
ऐसा लगता है कि नीतीश बिजली में आत्मनिर्भरता का अपना चुनावी वादा पूरा करने की ओर बढ़ रहे हैं.
अक्तूबर, 2003 से ही बिहार की राजधानी पटना से करीब 90 किलोमीटर दूर एनएच-28 के किनारे स्थित कांटी थर्मल पावर स्टेशन में बिजली का उत्पादन ठप था. इसका परिसर मवेशियों के लिए चारागाह बनकर रह गया था और इसके चालू होने की उम्मीद दम तोड़ चुकी थी.
लेकिन 17 नवंबर को 10 साल बाद यहां शुरू हुए बिजली के रिकॉर्ड उत्पादन ने इस पुराने पावर स्टेशन को रोशनी से सराबोर कर दिया. पहले चरण में जीर्णोद्धार और आधुनिकीकरण के बाद चालू एक पुरानी यूनिट से निर्धारित 110 मेगावाट की क्षमता से दो मेगावाट अधिक बिजली उत्पादन हो रहा है, जबकि इससे पहले कांटी की दोनों पुरानी यूनिट से कभी भी पूरी क्षमता भर बिजली उत्पादन नहीं हुआ था.
बिहार की जरूरत के हिसाब से कांटी में शुरू हुआ बिजली उत्पादन मामूली है. लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उत्पादन शुरू करवाकर लोगों का भरोसा कायम रखने की कोशिश की है. कांटी में यूनिट के उद्घाटन समारोह में उन्होंने कहा, ''मैंने 2005 में कांटी की सभा में वादा किया था कि सरकार बनी तो थर्मल पावर से धुआं निकलेगा.
मैंने अपना वादा पूरा किया.” मुख्यमंत्री ने कहा कि वे 2015 तक 6,000 मेगावाट बिजली का उत्पादन करवाना चाहते हैं, जिसके लिए काम चल रहा है. अकेले कांटी पावर स्टेशन से अगले साल के अंत तक 610 मेगावाट बिजली उत्पादन की योजना है.
इससे पहले अक्तूबर माह में एनटीपीसी के बाढ़ पावर स्टेशन की एक यूनिट से बिहार को 330 मेगावाट बिजली की आपूर्ति शुरू हो चुकी है और चार अन्य यूनिट बनाया जाना है. यहां दो चरणों में 660 मेगावाट की पांच यूनिट बननी हैं जिसमें राज्य की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए दबाव बढ़ाया गया है.
बिहार के ऊर्जा मंत्री विजेंद्र प्रसाद यादव कहते हैं, ''हमने 10 साल से बंद पड़े कांटी पावर स्टेशन को चालू कराया. सरकार अपने वादे को पूरा करने के लिए भी सक्रिय है.”
हालांकि मुख्यमंत्री मानते हैं कि बिजली उत्पादन में रुकावटें भी हैं. पावर स्टेशन के निर्माण में जमीन अधिग्रहण, पर्यावरण विभाग से मंजूरी और कोल लिंकेज लेने पड़ते हैं. लेकिन उन्होंने दोहराया कि 2015 तक उनका लक्ष्य राज्य के हर गांव में बिजली पहुंचाना है.
अगर ऐसा नहीं हुआ तो वे वोट मांगने नहीं जाएंगे. करीब एक साल पहले ही 15 अगस्त को उन्होंने यह बात कही थी. ऊर्जा मंत्री विजेंद्र प्रसाद यादव लोगों से कह चुके हैं कि मुख्यमंत्री के वादे को कोई मंत्री पूरा नहीं करता तो उसे बने रहने का अधिकार नहीं है.
सरकार अपने वादे को पूरा करने के लिए बेगूसराय जिले के बरौनी में ढाई सौ मेगावाट क्षमता की दो नई यूनिट के निर्माण का काम शुरू कर चुकी है. इसे 2015-16 में चालू करने का लक्ष्य है.
पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के तहत भी चौसा (बक्सर), पीरपैंती (भागलपुर) और कजरा (लखीसराय) में 660 मेगावाट क्षमता के पावर स्टेशन बनाने की प्रक्रिया जारी है. इनके लिए कोल ब्लॉक भी मिल चुका है. औरंगाबाद के नवीनगर में एनटीपीसी और रेलवे की साझेदारी में बन रहे पावर स्टेशन में भी राज्य को हिस्सा मिलेगा.
2016-17 तक यहां एनटीपीसी की ओर से 458 मेगावाट और रेलवे से सौ मेगावाट बिजली मिलेगी. अडानी समूह से भी हजार मेगावट बिजली खरीदने के लिए समझौता किया गया है. नीतीश ने कहा है कि केंद्र से राज्य को 12,000 करोड़ रु. विशेष सहायता के रूप में मिले हैं.
उसमें से 9,200 करोड़ रु. बिजली पर खर्च किए जा रहे हैं. लेकिन राज्य में बिजली की मांग तेजी से बढ़ रही है. मार्च 2014 में यह बढ़कर 2,600 मेगावाट हो जाएगी. यानी सफर अभी लंबा है.

