जब डॉक्टर यह बताते हैं कि आपके बच्चे को गठिया यानी आर्थराइटिस है तो आपको विश्वास ही नहीं होता क्योंकि आपने कभी उसकी सूजी हुई उंगलियों या सुबह-सुबह होने वाली कमजोरी को कोई खास तवज्जो नहीं दी थी.
गठिया को बुजुर्गों को होने वाली बीमारी के रूप में जाना जाता है, बच्चे को गठिया हो जाए तो यह मां-बाप के लिए सदमे से कम नहीं.
चिंता की बात यह है कि लोगों में किशोरों को होने वाले गठिया (जुवेनाइल रूमेटाइड आर्थराइटिस-जेआरए) के बारे में जागरूकता नहीं है. अध्ययनों के मुताबिक औसतन 1,000 में से एक बच्चा गठिया से पीड़ित है.
सबसे बड़ी परेशानी इस बीमारी के इलाज की कमी नहीं बल्कि इलाज में होने वाली देरी है. नोवा सर्जरी सेंटर में हड्डी रोग के सीनियर कंसल्टेंट रमणीक महाजन कहते हैं, ''हर माह कम-से-कम दो मामले ऐसे आते हैं जिनमें बच्चों में जेआरए बहुत बढ़ चुका होता है.
इस रोग के इलाज के लिए जरूरी है कि जल्द से जल्द इसकी पहचान हो जाए”
जेआरए की शुरुआत जोड़ों में सूजन, जलन और दर्द के साथ होती है. बच्चों को अपनी चपेट में लेने वाले गठिया के लक्षण अधिक गंभीर हैं. इसकी वजह का पता नहीं चल पाया है. मैक्स हॉस्पिटल में रूमेटॉलजी विशेषज्ञ डॉ. अमित शर्मा का कहना है, ''यह किन वजहों से होता है, अभी कुछ पता नहीं.
इलाज के बाद भी यह दोबारा हो सकता है. यह जेनेटिक वजहों से हो सकता है या पर्यावरण में मौजूद वायरस और बैक्टीरिया से. जेआरए कई तरह के होते हैं जो सही इलाज नहीं होने पर जोड़ों, हड्डियों और अंगों को हमेशा के लिए नुकसान पहुंचा सकते हैं.”
डॉ. महाजन कहते हैं, ''इंटरनेशनल लीग एसोसिएशन फॉर रूमेटॉलजी की टर्मिनोलॉजी के अनुसार इसे अब जुवेनाइल इडियोपैथिक आर्थराइटिस कहते हैं.”
यह टीबी नहीं
जेआरए के साथ सबसे बड़ी परेशानी यह है कि इसे अकसर हड्डियों की टीबी समझ लिया जाता है. डॉ. महाजन कहते हैं, ''कोई भी रोग जिसका पता नहीं चल पाता, उसे टीबी मान लिया जाता है. हालांकि टीबी के कई लक्षण जेआरए से मिलते हैं.”
बच्चों की जोड़ों में जकडऩ की शिकायत को उम्र बढऩे के दौरान होने वाले दर्द, मौसमी तकलीफ, संक्रमण या चोट मानकर मां-बाप नजरअंदाज कर देते हैं जबकि असल में यह जेआरए का संकेत हो सकता है.
जेआरए पूरे शरीर को प्रभावित करता है जिससे जोड़ों में सूजन, बुखार या दाने हो जाते हैं. रॉकलैंड हॉस्पिटल में आर्थोपेडिक के प्रमुख डॉ. पी.के. दवे कहते हैं, ''अकसर जेआरए के शुरुआती लक्षण जोड़ों में दर्द या सूजन हैं. जोड़ों की तकलीफ जितनी बढ़ती है, लक्षण उतने ही गंभीर होते जाते हैं.”
इलाज के तरीके
जेआरए के इलाज में मरीज को दर्द से राहत दिलाने, संभावित तकलीफों को कम करने और उसकी जिंदगी में सुधार लाने पर ध्यान दिया जाता है. इलाज का तरीका बीमारी की स्टेज और उसके लक्षणों की गंभीरता पर निर्भर करता है.
सूजन कम करने वाली स्टेरॉयड रहित दवाइयां: दर्द और सूजन कम करने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं. ये दवाइयां जेआरए की शुरुआती स्टेज में ही उस पर रोक लगा सकती हैं.
रोग को फैलने से रोकने वाली एंटी-रूमेटिक दवाइयां: ये बीमारी को फैलने नहीं देतीं, जोड़ों की जकडऩ, सूजन और दर्द से राहत दिलाती हैं.
बायोलॉजिक्स: ये एंटीबॉडीज और कृत्रिम प्रोटीन से बनाए जाते हैं जिन्हें 'टार्गेटेड ट्रीटमेंट’ कहा जाता है. यह इलाज ऐसे गंभीर गठिया के लिए है जब अन्य इलाज तरह बेअसर हो चुके होते हैं.
रीप्लेसमेंट: जब ओरल दवाइयां बेअसर होने लगती हैं तो आराम पाने का एक ही उपाय रह जाता है—हिप रीप्लेसमेंट. हालांकि डॉक्टर सलाह देते हैं कि जब तक मरीज खुद को संभाल सकता है, हिप रीप्लेसमेंट से बचना चाहिए.
लाइफस्टाइल में बदलाव से आराम
गठिया से पीड़ित बच्चों के लिए लाइफस्टाइल में बदलाव, सेहतमंद आहार और वर्जिश बहुत जरूरी है. डॉ. शर्मा कहते हैं, ''वजन घटाना बहुत जरूरी है. दवाइयों से वजन घट सकता है पर इसका सामना करने को रोजाना सही कैलोरीयुक्त खाना बहुत मायने रखता है. साथ ही नियमित एक्सरसाइज से लंबे समय तक राहत पाई जा सकती है.”
19 वर्ष में ही आए चपेट में
एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम कर रहे 26 वर्षीय शिव छेत्री 19 वर्ष की उम्र में ही गठिया की चपेट में आ गए. उस समय वे कॉलेज में थे. सीढिय़ां चढऩे या लंबे समय तक बैठ पाने में असमर्थ छेत्री को अपनी पढ़ाई बीच में ही छोडऩी पड़ी. वे कहते हैं, ''हॉस्पिटलों के कई चक्कर लगाने के बाद भी डॉक्टरों को मेरे असहनीय दर्द की वजह का पता नहीं चल पा रहा था.” गठिया काफी बढ़ जाने से मेरे कूल्हे बुरी तरह से खराब हो गए. कूल्हों को बचाने के लिए जॉइंट रीप्लेसमेंट सर्जरी की गई. छेत्री कहते हैं, ''सर्जरी के छह माह बाद मैं ठीक से
चलने लगा.”
गर्भावस्था में एक्सरसाइज से बच्चा रहेगा तंदुरुस्त
वही अमेरिका और जर्मनी में की गई नई रिसर्च से पता चला है कि गर्भावस्था के दौरान जो माताएं एक्सरसाइज करती हैं उनके शिशु के ब्लड वेसेल्स (रक्त वाहिनियां) वयस्क होने पर भी ज्यादा स्वस्थ रहती हैं. वे दिल समेत अन्य कई बीमारियों से सुरक्षित रहते हैं. अमेरिका की कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी और जर्मनी की ग्रीफ्स्वाल्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के अध्ययन में पहली बार यह बात सामने आई कि गर्भावस्था के दौरान किया गया एक्सरसाइज शिशु के खून के प्रवाह पर अच्छा असर डालता है जो बड़े होने पर भी बना रहता है. एक्सरसाइज से बच्चों की आर्टरीज समेत कई हिस्से बीमारियों से बचाव करने में सक्षम हो जाते हैं. यह रिसर्च गर्भवती सूअरों पर किया गया जिन्हें हफ्ते में पांच दिन 20-45 मिनट के लिए ट्रेडमिल पर एक्सरसाइज कराई गई और पाया गया कि एक्सरसाइज करने वाली मादाओं के बच्चे बड़े होने पर भी सेहतमंद थे. यह स्टडी एक्सपेरिमेंटल फिजियोलॉजी जर्नल में प्रकाशित हुई है. डॉक्टरों के मुताबिक हल्की एक्सरसाइज फायदेमंद है.
गठिया को बुजुर्गों को होने वाली बीमारी के रूप में जाना जाता है, बच्चे को गठिया हो जाए तो यह मां-बाप के लिए सदमे से कम नहीं.
चिंता की बात यह है कि लोगों में किशोरों को होने वाले गठिया (जुवेनाइल रूमेटाइड आर्थराइटिस-जेआरए) के बारे में जागरूकता नहीं है. अध्ययनों के मुताबिक औसतन 1,000 में से एक बच्चा गठिया से पीड़ित है.
सबसे बड़ी परेशानी इस बीमारी के इलाज की कमी नहीं बल्कि इलाज में होने वाली देरी है. नोवा सर्जरी सेंटर में हड्डी रोग के सीनियर कंसल्टेंट रमणीक महाजन कहते हैं, ''हर माह कम-से-कम दो मामले ऐसे आते हैं जिनमें बच्चों में जेआरए बहुत बढ़ चुका होता है.
इस रोग के इलाज के लिए जरूरी है कि जल्द से जल्द इसकी पहचान हो जाए”
जेआरए की शुरुआत जोड़ों में सूजन, जलन और दर्द के साथ होती है. बच्चों को अपनी चपेट में लेने वाले गठिया के लक्षण अधिक गंभीर हैं. इसकी वजह का पता नहीं चल पाया है. मैक्स हॉस्पिटल में रूमेटॉलजी विशेषज्ञ डॉ. अमित शर्मा का कहना है, ''यह किन वजहों से होता है, अभी कुछ पता नहीं.
इलाज के बाद भी यह दोबारा हो सकता है. यह जेनेटिक वजहों से हो सकता है या पर्यावरण में मौजूद वायरस और बैक्टीरिया से. जेआरए कई तरह के होते हैं जो सही इलाज नहीं होने पर जोड़ों, हड्डियों और अंगों को हमेशा के लिए नुकसान पहुंचा सकते हैं.”
डॉ. महाजन कहते हैं, ''इंटरनेशनल लीग एसोसिएशन फॉर रूमेटॉलजी की टर्मिनोलॉजी के अनुसार इसे अब जुवेनाइल इडियोपैथिक आर्थराइटिस कहते हैं.”
यह टीबी नहीं
जेआरए के साथ सबसे बड़ी परेशानी यह है कि इसे अकसर हड्डियों की टीबी समझ लिया जाता है. डॉ. महाजन कहते हैं, ''कोई भी रोग जिसका पता नहीं चल पाता, उसे टीबी मान लिया जाता है. हालांकि टीबी के कई लक्षण जेआरए से मिलते हैं.”
बच्चों की जोड़ों में जकडऩ की शिकायत को उम्र बढऩे के दौरान होने वाले दर्द, मौसमी तकलीफ, संक्रमण या चोट मानकर मां-बाप नजरअंदाज कर देते हैं जबकि असल में यह जेआरए का संकेत हो सकता है.
जेआरए पूरे शरीर को प्रभावित करता है जिससे जोड़ों में सूजन, बुखार या दाने हो जाते हैं. रॉकलैंड हॉस्पिटल में आर्थोपेडिक के प्रमुख डॉ. पी.के. दवे कहते हैं, ''अकसर जेआरए के शुरुआती लक्षण जोड़ों में दर्द या सूजन हैं. जोड़ों की तकलीफ जितनी बढ़ती है, लक्षण उतने ही गंभीर होते जाते हैं.”
इलाज के तरीके
जेआरए के इलाज में मरीज को दर्द से राहत दिलाने, संभावित तकलीफों को कम करने और उसकी जिंदगी में सुधार लाने पर ध्यान दिया जाता है. इलाज का तरीका बीमारी की स्टेज और उसके लक्षणों की गंभीरता पर निर्भर करता है.
सूजन कम करने वाली स्टेरॉयड रहित दवाइयां: दर्द और सूजन कम करने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं. ये दवाइयां जेआरए की शुरुआती स्टेज में ही उस पर रोक लगा सकती हैं.
रोग को फैलने से रोकने वाली एंटी-रूमेटिक दवाइयां: ये बीमारी को फैलने नहीं देतीं, जोड़ों की जकडऩ, सूजन और दर्द से राहत दिलाती हैं.
बायोलॉजिक्स: ये एंटीबॉडीज और कृत्रिम प्रोटीन से बनाए जाते हैं जिन्हें 'टार्गेटेड ट्रीटमेंट’ कहा जाता है. यह इलाज ऐसे गंभीर गठिया के लिए है जब अन्य इलाज तरह बेअसर हो चुके होते हैं.
रीप्लेसमेंट: जब ओरल दवाइयां बेअसर होने लगती हैं तो आराम पाने का एक ही उपाय रह जाता है—हिप रीप्लेसमेंट. हालांकि डॉक्टर सलाह देते हैं कि जब तक मरीज खुद को संभाल सकता है, हिप रीप्लेसमेंट से बचना चाहिए.
लाइफस्टाइल में बदलाव से आराम
गठिया से पीड़ित बच्चों के लिए लाइफस्टाइल में बदलाव, सेहतमंद आहार और वर्जिश बहुत जरूरी है. डॉ. शर्मा कहते हैं, ''वजन घटाना बहुत जरूरी है. दवाइयों से वजन घट सकता है पर इसका सामना करने को रोजाना सही कैलोरीयुक्त खाना बहुत मायने रखता है. साथ ही नियमित एक्सरसाइज से लंबे समय तक राहत पाई जा सकती है.”
19 वर्ष में ही आए चपेट में
एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम कर रहे 26 वर्षीय शिव छेत्री 19 वर्ष की उम्र में ही गठिया की चपेट में आ गए. उस समय वे कॉलेज में थे. सीढिय़ां चढऩे या लंबे समय तक बैठ पाने में असमर्थ छेत्री को अपनी पढ़ाई बीच में ही छोडऩी पड़ी. वे कहते हैं, ''हॉस्पिटलों के कई चक्कर लगाने के बाद भी डॉक्टरों को मेरे असहनीय दर्द की वजह का पता नहीं चल पा रहा था.” गठिया काफी बढ़ जाने से मेरे कूल्हे बुरी तरह से खराब हो गए. कूल्हों को बचाने के लिए जॉइंट रीप्लेसमेंट सर्जरी की गई. छेत्री कहते हैं, ''सर्जरी के छह माह बाद मैं ठीक से
चलने लगा.”
गर्भावस्था में एक्सरसाइज से बच्चा रहेगा तंदुरुस्त
वही अमेरिका और जर्मनी में की गई नई रिसर्च से पता चला है कि गर्भावस्था के दौरान जो माताएं एक्सरसाइज करती हैं उनके शिशु के ब्लड वेसेल्स (रक्त वाहिनियां) वयस्क होने पर भी ज्यादा स्वस्थ रहती हैं. वे दिल समेत अन्य कई बीमारियों से सुरक्षित रहते हैं. अमेरिका की कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी और जर्मनी की ग्रीफ्स्वाल्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के अध्ययन में पहली बार यह बात सामने आई कि गर्भावस्था के दौरान किया गया एक्सरसाइज शिशु के खून के प्रवाह पर अच्छा असर डालता है जो बड़े होने पर भी बना रहता है. एक्सरसाइज से बच्चों की आर्टरीज समेत कई हिस्से बीमारियों से बचाव करने में सक्षम हो जाते हैं. यह रिसर्च गर्भवती सूअरों पर किया गया जिन्हें हफ्ते में पांच दिन 20-45 मिनट के लिए ट्रेडमिल पर एक्सरसाइज कराई गई और पाया गया कि एक्सरसाइज करने वाली मादाओं के बच्चे बड़े होने पर भी सेहतमंद थे. यह स्टडी एक्सपेरिमेंटल फिजियोलॉजी जर्नल में प्रकाशित हुई है. डॉक्टरों के मुताबिक हल्की एक्सरसाइज फायदेमंद है.

