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यूपी में अब लौट आया जंगलराज

उत्तर प्रदेश में नए नियम और अपराध एक ही अनुपात में बन और बढ़ रहे हैं. लेकिन इतने कानूनों के बावजूद बेखौफ हैं अपराधी. गैंगवार की वापसी और महिलाओं के खिलाफ हिंसा चरम पर.

अपडेटेड 5 अगस्त , 2013
उत्तर प्रदेश में 14 मार्च को समाजवादी पार्टी सरकार का एक वर्ष पूरा होते ही मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि सूबे में कानून व्यवस्था को दुरुस्त करना उनकी पहली प्राथमिकता है. इस दिशा में एक बड़ा फैसला लेते हुए सरकार ने 12 अप्रैल को पुलिस महकमे के मुखिया को बदलकर देवराज नागर की नए डीजीपी के रूप में ताजपोशी की. पर इस ताशपोशी के एक माह के भीतर ही 5 मई को पूर्वी यूपी में गैंगवॉर की वापसी कर अपराधियों ने अपने हौसलों की झलक दिखा दी. वे आठ वर्षों से खामोश थे.

चंदौली जिले के धानापुर से जिला पंचायत सदस्य और तिहाड़ जेल में बंद पूर्वांचल के माफिया बृजेश सिंह के करीबी अजय सिंह उर्फ खलनायक और उनकी पत्नी पर वाराणसी के कैंट इलाके में रात आठ बजे कुछ बाइकसवार बदमाशों ने ताबड़तोड़ गोलियां बरसाईं. पुलिस मामले की तफ्तीश कर ही रही थी कि 3 जुलाई को वाराणसी के चौबेपुर इलाके में बृजेश सिंह के चचेरे भाई सतीश सिंह की सुबह दस बजे सरेआम हत्या कर दी गई. मृतक के बेटे की तहरीर पर पुलिस ने आगरा जेल में बंद बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी समेत चार लोगों पर हत्या का मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई शुरू की. इन दोनों वारदातों में फरार शूटर इंद्रदेव सिंह उर्फ बीकेडी को पकडऩे में नाकाम पुलिस का सिरदर्द लगातार बढ़ता ही जा रहा था  कि 19 जुलाई को एक बार फिर आजमगढ़ में बदमाशों ने बड़ी वारदात कर पुलिस के होश उड़ा दिए.

बदमाशों ने सुबह साढ़े नौ बजे आजमगढ़ के सगड़ी विधानसभा क्षेत्र से पूर्व बीएसपी विधायक 35 वर्षीय सर्वेश सिंह उर्फ सीपू और उनके साथी 38 वर्षीय भरत राय की जीयनपुर थाने से महज 300 मीटर की दूरी पर गोली मारकर हत्या कर दी. इस घटना के बाद जनता गुस्से में सड़क पर उतर आई और पुलिस वाहन समेत कई गाडिय़ों को आग के हवाले कर दिया. बदमाशों से निबटने में नाकाम पुलिस ने लोगों पर फायरिंग की, जिससे दो लोगों की मौके पर ही मौत हो गई और 12 घायल हो गए. मामला बढ़ता देख सरकार ने थाना जीयनपुर प्रभारी कोतवाल विजय सिंह को निलंबित कर ‘स्पेशल टास्क फोर्स’ को जांच का आदेश दिया, लेकिन आरोपी अब भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं. तफ्तीश के नाम पर पुलिस ने इस हत्याकांड के तार वाराणसी जेल में बंद कुंटू सिंह से जोड़े हैं, जिसकी ब्लॉक प्रमुख के चुनाव के दौरान सर्वेश सिंह से दुश्मनी हो गई थी.

19 जुलाई को हुई इस घटना से 10 घंटे पहले मुख्यमंत्री के गृह जिले इटावा के ग्रामीण आयुर्विज्ञान एवं चिकित्सा संस्थान, सैफई के बर्न वॉर्ड में 90 फीसदी से ज्यादा जल चुकी एक 20 वर्षीया युवती ने नौ दिन तक मौत से लडऩे के बाद दम तोड़ दिया. इटावा के थाना एकदिल के देसरमऊ गांव में बीए दूसरे वर्ष की इस छात्रा का कसूर सिर्फ इतना था कि उसने गांव में ही रहने वाले एक दबंग फरमान का शादी का प्रस्ताव ठुकरा दिया था. इसके बाद फरमान ने 10 जुलाई को अपने साथियों के साथ उस लड़की का रेप कर उसे जिंदा जला दिया.

बदमाशों ने 11 जुलाई को प्रतापगढ़ के थाना जेठवारा के नौबस्ता गांव में रहने वाली एक 20 वर्षीया युवती की जीभ काट ली ताकि वह उनके खिलाफ मुंह न खोल पाए. उसके साथ प्रतापगढ़ के हरिहरपुर बाघराय गांव में रहने वाले लवलेश ने जनवरी में उस वक्त रेप किया था, जब वह किसी काम से गांव के बाहर जा रही थी. वह दोषियों को सजा दिलाने के लिए कोर्ट में लड़ाई लड़ रही थी, लेकिन उसे गवाही देने से रोकने के लिए लवलेश ने अपने साथियों के साथ एक धारदार हथियार से उसकी जीभ काट दी.

जुलाई में हुई ये सनसनीखेज और भयावह घटनाएं कानून व्यवस्था के मुद्दे पर सपा सरकार की विफलता को साबित करती हैं. सूबे के पुलिस मुख्यालय के आंकड़ों पर गौर करें तो स्थिति और भी साफ हो जाती है. पिछले साल हत्या के 4,966 और रेप के 1,936 मामले सामने आए थे. शुरुआती छह माह यानी जून तक ये आंकड़े क्रमश: 2,680 और 841 पर थे. इस वर्ष जून तक सूबे में हत्या के कुल 2,988 मामले दर्ज हुए तो 993 मामले रेप से जुड़े हुए थे. इन आंकड़ों की 2012 में जून तक के आंकड़ों से तुलना करने पर साफ पता चलता है कि हत्या में अगर 11 फीसदी का इजाफा हुआ है तो रेप की घटनाएं भी 18 फीसदी तक बढ़ चुकी हैं. रिटायर्ड पुलिस महानिदेशक आइ.सी. द्विवेदी क्राइम बढऩे की तीन वजहें बताते हैं, ‘‘राज्य सरकार जिस वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रही है, वह उच्छृंखल प्रवृत्ति का है. सरकार ने कोई सख्ती नहीं दिखाई है, जिससे अपराधियों में भय का संदेश जाए. बाकी कसर पुलिस की कार्यप्रणाली ने पूरी कर दी है.’’
 
अपराधियों की मददगार पुलिस
पिछले एक माह के दौरान यूपी पुलिस भले ही किसी बड़े मामले का पर्दाफाश न कर पाई हो, लेकिन ऐसे कई मौके आए जब उसने अपराधियों की मदद करने की कोशिश की. 7 जुलाई को लखनऊ के गोमतीनगर थाने के तहत आने वाले विवेक खंड-3 में कुछ ऐसा ही हुआ. दरिंदों ने पुलिस थाने से 300 मीटर दूरी पर अपनी मां और बड़ी बहन के साथ सो रही एक चार वर्षीया बच्ची के साथ बलात्कार कर बेरहमी से हत्या कर दी. उसका जला हुआ शव पास में एक झाड़ी से बरामद हुआ. पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में कुत्तों के नोचने से बच्ची की मौत होने का जिक्र किया, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद मामला उलट गया. पुलिस के इस रवैए से महिला संगठन सड़क पर उतर आए और सरकार ने गोमतीनगर थाने के एसओ देवेंद्र दुबे को निलंबित कर दिया.

इसी तरह 2 जुलाई को झांसी में चार वर्षीया बच्ची का अपहरण कर बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर दी गई. थाना नवाबाद पुलिस ने असल हत्यारे को पकडऩे की बजाए बच्ची के पिता सलीम पर दबाव बनाकर कोरे कागज पर हस्ताक्षर करा लिए और स्थानीय युवक कमलेश अहिरवार को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

जब बच्ची के परिवारवालों ने इस पुलिसिया कार्रवाई पर आपत्ति की तो लोगों का गुस्सा फूट पड़ा. बात बिगड़ती देख सरकार ने जांच का जिम्मा पुलिस अधीक्षक के. एजिलसरन को सौंप दिया. ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वीमेंस एसोसिएशन (एडवा) की राज्य अध्यक्ष मधु गर्ग कहती हैं, ‘‘पुलिस अपराध की गलत तफ्तीश कर अपराधियों को फायदा पहुंचा रही है.’’

रक्षक भी बन रहे भक्षक
5 अप्रैल को प्रतापगढ़ के रानीगंज कस्बे में रहने वाली रेप पीड़ित 22 वर्षीया युवती के साथ पुलिस लाइन में तैनात सिपाही वीर सिंह ने रेप किया. इस सनसनीखेज घटना के बाद सिपाही को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. इसके दो हफ्ते बाद 18 अप्रैल को अलीगढ़ के बन्ना देवी इलाके में पांच वर्षीया बच्ची की रेप के बाद हत्या की वारदात से क्रोधित लोगों ने जब पुलिस की लापरवाही के खिलाफ प्रदर्शन शुरू किया तो अलीगढ़ के क्षेत्राधिकारी (सीओ) एस.के. सिंह ने न केवल बुजुर्ग प्रदर्शनकारी महिलाओं पर लाठी चलाई, बल्कि उनकी देखादेखी मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने पीड़ित बच्ची के मां-बाप की भी पिटाई कर दी. बाद में मामले को शांत करने के लिए सरकार ने सीओ समेत दो कांस्टेबलों को निलंबित कर दिया. पूर्व पुलिस महानिरीक्षक एस.एस. दारापुरी कहते हैं, ‘‘यह पहली बार है कि पुलिसकर्मी इतनी बड़ी संख्या में अपराध में शामिल पाए गए हैं.’’ अब तक 100 से ज्यादा पुलिसकर्मियों को  विभिन्न मामलों में निलंबित किया जा चुका है.

पुलिस पर भारी अपराधी
एक ओर पुलिस अपराधियों पर नकेल कसने में असहाय साबित हो रही है वहीं दुस्साहसी अपराधी पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों को भी निशाना बनाने से नहीं चूक रहे. प्रतापगढ़ के कुंडा में मार्च में सीओ जियाउल हक की हत्या कर दी गई. पिछले दो माह में ऐसे कुल 17 मामले सामने आए हैं, जिसमें पुलिस अधिकारी और कर्मचारी बदमाशों की गोलियों का शिकार हुए हैं. पुलिस मुख्यालय की ओर से मई में सूबे के 19 जिलों में तैनात पुलिस अधीक्षकों को पत्र लिखकर इन्वेस्टीगेशन ऑफिसर और अपराधियों के बीच गठजोड़ की जांच का आदेश दिया गया है. 30 इन्वेस्टीगेशन ऑफिसर पुलिस मुख्यालय के निशाने पर हैं.

अप्रैल, 2012 से मार्च, 2013 के बीच इन अधिकारियों की गलत तफ्तीश से कई खतरनाक अपराधी जेल से छूट गए. इन अपराधियों में 39 हत्या, 46 डकैती और एक बदमाश बलात्कार के मामले में जेल में बंद थे. हाइकोर्ट की लखनऊ पीठ में वकील शैलेंद्र सिंह चौहान कहते हैं, ‘‘कई बड़े मामलों में अधिकारी घटना स्थल पर मौजूद साक्ष्यों का बेहद लचर ढंग से संकलन कर रहे हैं. इसी के चलते अपराधी छूट जाते हैं. पिछले कुछ वर्षों में यूपी में ऐसा एक भी मामला नहीं है, जिसमें पुलिस की तफ्तीश से किसी बड़े अपराधी को सजा मिली हो.’’

पुलिस का राजनीतिकरण
सपा सरकार में कानून व्यवस्था की खराब हालत के पीछे पुलिस बल का राजनीतिकरण भी जिम्मेदार है. प्रदेश सरकार ने जून, 2002 में हर जिले में 20 प्रतिशत थानों में अनुसूचित जाति व जनजाति के थानेदारों को तैनात करने का आदेश दिया था. आरटीआइ एक्टिविस्ट नूतन ठाकुर को सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी के मुताबिक इस वक्त लखनऊ रेंज के कुल 152 थानों में सिर्फ 12 थानेदार ही अनुसूचित जाति के हैं. इनमें लखनऊ के 43 थानों में एक, उन्नाव में 19 में से 3, हरदोई में 25 में 3, सीतापुर में 26 में 2 और खीरी में 23 में से केवल एक थाने में ही अनुसूचित जाति-जनजाति के थानेदार तैनात हैं.

वहीं दूसरी ओर सपा सरकार पर विपक्ष का आरोप है कि इन थानों में एक खास जाति के कई थानेदार तैनात किए गए हैं. कांग्रेस विधानमंडल दल के नेता प्रदीप माथुर कहते हैं, ‘‘प्रदेश में नई सरकार बनने के बाद यहां के पुलिस विभाग में एक खास जाति के दारोगाओं और पुलिस अधिकारियों का वर्चस्व हो गया है. ये अपने अधिकारियों की भी नहीं सुन रहे हैं. इस वजह से भी कानून व्यवस्था बिगड़ी है.’’

महिला अत्याचार समेत कानून व्यवस्था के मोर्चे पर कमजोर साबित हो रही यूपी पुलिस ने अब थानों को दुरुस्त करने की योजना पर काम शुरू कर दिया है. इसके तहत प्रदेश के सभी थानों में स्टेशन ऑफिसर (एसओ) की जगह इंस्पेक्टर की तैनाती की जाएगी. इसके लिए करीब 1,900 सब इंस्पेक्टर को प्रमोट कर इंस्पेक्टर बनाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है. डीजीपी देवराज नागर कहते हैं, ‘‘थानों में वरिष्ठ अधिकारी के तैनात होने से इनकी कार्यप्रणाली में सुधार आएगा.’’

प्रदेश में अपराधों के बढ़ते मामलों से निबटने के लिए सरकार अब कड़ी कार्रवाई कर अपनी छवि सुधारने के मूड में है.
जुलाई में अचानक अपराध बढऩे के बाद विपक्षी पार्टियों ने एक बार फिर अखिलेश सरकार को घेर लिया. 12 जुलाई को बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी के नेतृत्व में महिला मोर्चा की नेताओं ने प्रदेश सचिवालय का घेराव किया. बाजपेयी कहते हैं, ‘‘सपा सरकार अपराधियों को संरक्षण दे रही है.’’ वहीं बीएसपी ने अगले महीने से शुरू होने वाले विधानसभा के मानसून सत्र में अखिलेश सरकार को घेरने की रणनीति बनाई है.

बीएसपी विधानमंडल दल के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य कहते हैं, ‘‘सपा सरकार बनते ही पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष बहन मायावती ने आशंका जाहिर कर दी थी कि आने वाले दिनों में अपराध के बढऩे से तंग आकर जनता बीएसपी के सुशासन को याद करेगी. बहनजी की भविष्यवाणी सही साबित हुई है.’’ वहीं सपा के प्रदेश प्रवक्ता और कैबिनेट मंत्री राजेंद्र चौधरी कहते हैं ‘‘जहां भी अपराधिक मामले सामने आए हैं, तुरंत सख्त कार्रवाई की गई है.’’

लैपटॉप बांटकर पीठ थपथपाने वाली प्रदेश सरकार के लिए यह मंथन का समय है. यदि उसने अपराधों पर समय रहते काबू नहीं पाया तो कई लुभावनी योजनाओं के चलते सपा सरकार के पक्ष में बने माहौल पर पानी भी फिर सकता है.           
    -साथ में सिराज कुरैशी, संतोष पाठक,  सुधीर सिंह और राहुल यादव
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