जैसे बीजेपी राम का नाम जपती है, वैसे ही मुलायम सिंह यादव समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया का. लोहिया परिवारवाद के सख्त खिलाफ थे और नेहरू की इस मोर्चे पर जमकर आलोचना करते थे. मुलायम खिलाफ तो छोड़िए आज की तारीख में इसके सबसे बड़े पोषक बन गए हैं. इस कहानी में हम आपको मुलायम सिंह यादव के परिवार के हर उस शख्स के बारे में बताएंगे जो नेताजी की नसैनी लगाकर सत्ता की ऊंचाइयां नाप रहा है. इसमें उनके चाचा से लेकर पोते तक सब शामिल हैं.
सबसे छोटे बेटे भी आए कतार में
अप्रैल में जब समाजवादी पार्टी (सपा) सरकार के कैबिनेट मंत्री और आजमगढ़ लोकसभा क्षेत्र से पार्टी के प्रत्याशी बलराम यादव ने चुनाव लडऩे की अनिच्छा जाहिर की तो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के छोटे बेटे, 25 वर्षीय प्रतीक यादव की राजनैतिक उड़ान शुरू होने की चर्चा ने तेजी पकड़ी. लेकिन 31 मई को मुलायम ने बलराम का टिकट काटकर आजमगढ़ में पार्टी के जिलाध्यक्ष हवलदार सिंह को थमाने के साथ यह संकेत दे दिया कि प्रतीक का सियासी सफर शुरू करने का समय नहीं आया है.
प्रतीक का सियासी सफर शुरू होने में भले ही अभी वक्त है लेकिन 12 फरवरी को सपा के मुखिया मुलायम के परिवार का एक और बेटा सियासत के रास्ते राजनैतिक कुर्सी पर बैठा. मुलायम के सबसे छोटे भाई और प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री शिवपाल सिंह यादव के पुत्र 25 वर्षीय आदित्य यादव उर्फ अंकुर उत्तर प्रदेश प्रादेशिक कोऑपरेटिव फेडरेशन (यूपीपीसीएफ) के निर्विरोध अध्यक्ष निर्वाचित हुए. सफेद कुर्ता-पाजामा से इतर पैंट, शर्ट, कोट और हाथ में महंगी रोलेक्स घड़ी पहने बीटेक डिग्रीधारी आदित्य समाजवाद के बदलते चेहरे की ओर इशारा कर रहे थे. राजनीति में सफलता की पहली सीढ़ी चढऩे के लिए आदित्य ने अपने पिता शिवपाल सिंह यादव के पद चिन्हों पर चलते हुए सहकारिता का सहारा लिया है. खुद शिवपाल सिंह ने भी इटावा जिले के सहकारी बैंक के अध्यक्ष पद से सियासी पारी की शुरुआत की थी.
यूपीपीसीएफ का अध्यक्ष बनने के साथ ही आदित्य का नाम मुलायम सिंह परिवार के उन सदस्यों की सूची में 13वें नंबर पर शुमार हो गया है, जो राजनीति में एंट्री कर चुके हैं. हालांकि आदित्य तीन वर्षों से राजनीति में सक्रिय हैं और 2010 में वे जसवंतनगर ब्लॉक से इटावा जिला विकास परिषद का चुनाव भी लड़े पर पहली बार में बाजी हार गए.
मामूली शुरुआत
आदित्य को भले ही पहले चुनावी संग्राम में हार का मुंह देखना पड़ा हो, लेकिन मुलामय सिंह ने पहले ही प्रयास में सफलता पाई थी. समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया के संपर्क में आने के बाद 60 के दशक में राजनीति में प्रवेश करने वाले मुलायम सिंह यादव पहली बार 1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर जसवंतनगर विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए और यहीं से उस पटकथा की नींव पड़ी, जिसमें सैफई गांव के एक छोटे-से परिवार के देश का सबसे बड़ा सियासी परिवार बनने के सफर की शुरुआत हुई. उस वक्त तक उनके अलावा परिवार का कोई सदस्य राजनीति में नहीं था. मुलायम सिंह के सबसे बड़े भाई 85 वर्षीय रतन सिंह यादव 60 के दशक में सेना में नौकरी करते थे. राजनैतिक जीवन के शुरुआती दौर में मुलायम सिंह को अपने बड़े भाई रतन सिंह का ही साथ मिला.
इटावा के सैफई गांव में बने पैतृक घर में रह रहे रतन सिंह काफी दिनों से बीमार चल रहे हैं और उनकी याददाश्त भी अब कमजोर हो चली है. चलने-फिरने के लिए भी अब व्हील चेयर का ही सहारा है, लेकिन 1967 में मुलायम सिंह यादव के पहले चुनाव से जुड़ी यादें साझ करने की बात सुनते ही उनकी आंखों में चमक आ जाती है. रतन सिंह कहते हैं, ‘‘1967 के पहले चुनाव में मैं, दर्शन सिंह ‘प्रधान’ और बाबू राम ‘सेठ जी’ के साथ साइकिल पर बैठकर मंत्री जी (मुलायम के नजदीकी उन्हें ‘‘नेताजी’’ न कहकर ‘‘मंत्री जी’’ नाम से पुकारते हैं) का चुनाव प्रचार करने जाते थे.
परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण चुनाव खर्च के लिए चंदा भी बटोरते थे.’’ रतन सिंह के अलावा मुलायम सिंह के अन्य सगे भाई 68 वर्षीय अभयराम सिंह यादव अब भी सैफई में खेती संभालते हैं. छोटे भाई 64 वर्षीय राजपाल सिंह यादव इटावा वेयर हाउस में नौकरी करते थे और अब रिटायर हो चुके हैं. मुलायम के पांच भाइयों में सबसे छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव ने ही सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया. शिवपाल का नाम लेते ही रतन तपाक से बोलते हैं, ‘‘शिवपाल तो बड़े तेज-तर्रार रहे. उनको छोड़कर अन्य किसी भाई का राजनीति में जाने का इरादा नहीं था. हम लोग ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे.’’
‘‘70 के दशक में चंबल के बीहड़ जिले इटावा में राजनीति की राह आसान नहीं थी. 1967 में जसवंतनगर से विधानसभा चुनाव जीतने के बाद मुलायम सिंह के राजनैतिक विरोधियों की संख्या काफी बढ़ चुकी थी. राजनैतिक द्वेष के चलते कई बार विरोधियों ने मुलायम सिंह पर जानलेवा हमला भी कराया. यही वह समय था, जब शिवपाल सिंह और चचेरे भाई रामगोपाल यादव मुलायम सिंह के साथ आए. शिवपाल ने मुलायम सिंह की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाली.
शिवपाल मुलायम सिंह के जीवन पर लिखी अपनी किताब लोहिया के लेनिन में लिखते हैं, ‘‘नेता जी जब भी इटावा आते, मैं अपने साथियों के साथ खड़ा रहता. हम लोगों को काफी सतर्क रहना पड़ा, कई रातें जागना पड़ा.’’ मुलायम सिंह के नजदीकी रिश्तेदारों में सबसे बुजुर्ग रामगोपाल यादव के सबसे बड़े भाई 90 वर्षीय अतर सिंह यादव सैफई में खेती संभालते हैं. अतर सिंह बताते हैं कि रामगोपाल इटावा डिग्री कॉलेज में केमिस्ट्री पढ़ाते थे. इसीलिए लोग इन्हें ‘‘प्रोफेसर’’ कहने लगे. वे कहते हैं, ‘‘सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे होने के कारण रामगोपाल रणनीति बनाने और कागजी लिखा-पढ़ी में मुलायम सिंह की मदद करते थे.’’
1988 में रामगोपाल और शिवपाल सिंह ने एक साथ राजनीति में कदम रखा. रामगोपाल इटावा के बसरेहर ब्लॉक के अध्यक्ष निर्वाचित हुए तो शिवपाल इटावा के जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष चुने गए. इसके बाद 1992 में रामगोपाल राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए तो शिवपाल पहली बार 1996 में जसवंतनगर से जीतकर विधानसभा पहुंचे. इसके बाद रामगोपाल लगातार राज्यसभा पहुंच रहे हैं और शिवपाल ने भी अपनी विधायकी बरकरार रखी हुई है.
सहकारिता के सहारे
शिवपाल ही नहीं, उनकी पत्नी 48 वर्षीया सरला यादव और बेटे अंकुर ने भी सहकारिता के माध्यम से ही सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया. इसकी वजह जानने के लिए थोड़ा पृष्ठभूमि में जाना होगा. 1977 में यूपी में राम नरेश यादव के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी. उस सरकार में मुलायम सिंह यादव को पहली बार सत्ता सुख मिला और वे सहकारिता मंत्री बने. वहीं से प्रदेश में सहकारिता आंदोलन की शुरुआत हुई. मुलायम सिंह ने सहकारिता को नौकरशाही के चंगुल से निकालकर आम जनता से जोड़ा. उसी दौरान यूपी में सहकारी बैंक की ब्याज दर को 14 फीसदी से घटाकर 13 फीसदी और फिर 12 फीसदी कर दिया गया.
मुलायम सिंह यादव के सहकारिता मंत्री रहते हुए पहली बार ‘‘77-78 में किसानों को एक लाख क्विंटल और अगले वर्ष 2.60 लाख क्विंटल बीज बांटे गए. उनके कार्यकाल में प्रदेश में दूध का उत्पादन तो बढ़ा ही, साथ ही पहली बार सहकारिता में दलितों और पिछड़ों के लिए आरक्षण की भी व्यवस्था की गई. सहकारिता आंदोलन में मुलायम के बढ़े प्रभाव ने ही शिवपाल के लिए राजनीति में प्रवेश का मार्ग खोला.
1988 में शिवपाल पहली बार जिला सहकारी बैंक, इटावा के अध्यक्ष बने. 1991 तक सहकारी बैंक का अध्यक्ष रहने के बाद दोबारा 1993 में शिवपाल ने यह कुर्सी संभाली और अभी तक इस पर बने हुए हैं. शिवपाल की पत्नी सरला भी इसी वर्ष जिला सहकारी बैंक की राज्य प्रतिनिधि के रूप में 2007 के बाद लगातार दूसरी बार चुनी गई हैं.
महिलाएं भी मैदान में
सरला सियासत में पांव रखने वाली मुलायम सिंह के खानदान की पहली महिला नहीं हैं. उनसे पहले मुलायम सिंह के सगे भाई राजपाल यादव की पत्नी 45 वर्षीया प्रेमलता यादव 2005 में इटावा के जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर निर्वाचित हुईं और दूसरी बार 2010 में भी इसी पद पर चुनी गईं. उनके बाद अखिलेश यादव की पत्नी 34 वर्षीया डिंपल यादव ने भी 2009 में फिरोजाबाद से लोकसभा उपचुनाव लड़ा, लेकिन कांग्रेस प्रत्याशी और कभी मुलायम सिंह के करीबी रहे फिल्म अभिनेता राज बब्बर से हार गईं. हार का यह जख्म पिछले साल जून में भरा, जब अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद डिंपल खाली हुई कन्नौज लोकसभा सीट से निर्विरोध निर्वाचित होकर संसद पहुंचीं.
पीढ़ी दर पीढ़ी
मुलायम सिंह परिवार की दूसरी पीढ़ी में सबसे पहले राजनीति में आने वाले रतन सिंह यादव के इकलौते पुत्र रणवीर सिंह यादव (अब दिवंगत) थे. वे 35 वर्ष की उम्र में 1994-95 में सैफई ब्लॉक के पहले अध्यक्ष बने थे. उनके बाद मुलायम सिंह के पुत्र अखिलेश यादव राजनीति में आए. 1999 में उन्होंने कन्नौज से लोकसभा उपचुनाव जीता. यह सीट मुलायम सिंह यादव ने खाली की थी. 1999 के लोकसभा चुनाव में मुलायम संभल और कन्नौज से निर्वाचित हुए. इसके बाद 2004 के लोकसभा उपचुनाव में मुलायम सिंह के छोटे भाई अभयराम सिंह यादव के पुत्र 32 वर्षीय धर्मेंद्र यादव ने मैनपुरी से चुनाव जीता. मैनपुरी लोकसभा सीट मुलायम सिंह ने खाली की थी. उस समय मुलायम सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और पद पर रहते हुए उन्होंने 2004 के लोकसभा चुनाव में मैनपुरी से जीत हासिल की और बाद में सीट खाली कर दी.
मैनपुरी से लोकसभा उपचुनाव जीतने वाले धर्मेंद्र यादव महज 25 वर्ष की आयु में सांसद बन गए. धर्मेंद्र इससे पहले 2003 में सैफई ब्लॉक प्रमुख के पद पर निर्वाचित हुए थे. 13 नवंबर, 2002 को रणवीर सिंह की मृत्यु के बाद यह सीट खाली हुई थी. 2004 में धर्मेंद्र के सांसद बनने के बाद मुलायम के राजनीतिक सहयोगी नत्थू सिंह यादव के पुत्र 32 वर्षीय अरविंद यादव सैफई ब्लॉक प्रमुख बने और 2011 में रणवीर सिंह के पुत्र 27 वर्षीय तेज प्रताप सिंह यादव उर्फ तेजू सैफई ब्लॉक प्रमुख निर्वाचित हुए.
इंग्लैंड की लीड्स यूनिवर्सिटी से मैनेजमेंट साइंस में एमएससी करके लौटे तेज प्रताप सिंह सक्रिय राजनीति में उतरने वाले मुलायम सिंह के परिवार की तीसरी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं. हालांकि मुलायम सिंह की इकलौती सगी बहन 66 वर्षीया कमला देवी के दो बेटों व दो बेटियों में से कोई भी राजनीति में नहीं आया, लेकिन मुलायम की चचेरी बहन और रामगोपाल यादव की सगी बहन 72 वर्षीया गीता देवी के पुत्र 32 वर्षीय अरविंद यादव ने 2006 में सक्रिय राजनीति में कदम रखा और मैनपुरी के करहल ब्लॉक में ब्लॉक प्रमुख के पद पर निर्वाचित हुए. 2011 में करहल ब्लॉक प्रमुख की सीट सुरक्षित हो गई और अरविंद चुनाव नहीं लड़ पाए. इस समय वे मैनपुरी लोकसभा सीट के तहत आने वाले करहल ब्लॉक में सपा की मजबूती के लिए काम कर रहे हैं.
दूसरी ओर रामगोपाल यादव के पुत्र 25 वर्षीय अक्षय यादव भी सक्रिय राजनीति में कूद पड़े हैं. सपा ने फिरोजाबाद लोकसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी और फिल्म अभिनेता राज बब्बर के खिलाफ अक्षय यादव को टिकट दिया है. फिरोजाबाद लोकसभा सीट से अक्षय का पुराना नाता है. 2009 के लोकसभा चुनाव में अक्षय ने यहां से चुनाव लड़ रहे अखिलेश यादव के चुनावी प्रबंधन की कमान संभाली थी. इसके बाद 2012 में कन्नौज लोकसभा उपचुनाव में भी अक्षय ने डिंपल यादव के चुनाव प्रबंधन का जिम्मा संभाला, जिसमें डिंपल निर्विरोध निर्वाचित हुईं.
रामगोपाल यादव के बड़े भाई 75 वर्षीय रामदास यादव कहते हैं, ‘‘अक्षय में नेता बनने के सारे गुण हैं लेकिन वह रामगोपाल जितना होशियार नहीं है, हालांकि वह अभी छोटा है.’’ मुलायम परिवार की नई पीढ़ी के नेताओं में सैफई में सबसे ज्यादा लोकप्रिय अखिलेश यादव ही हैं. मुलायम सिंह के सबसे बड़े ताऊ छेदालाल यादव के पुत्र 80 वर्षीय शैतान सिंह कहते हैं, ‘‘अखिलेश, मंत्री जी (मुलायम सिंह) से भी ज्यादा होशियार है. उसकी याददाश्त गजब की है.’’
यदि आने वाले वर्षों में यादव परिवार के कुछ और सदस्य सक्रिय राजनीति में आते दिखें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए. मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई राजपाल यादव के पुत्र 26 वर्षीय अंशुल यादव भी राजनीति का ककहरा सीख रहे हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में अंशुल ने जसवंतनगर विधानसभा क्षेत्र के तहत आने वाले ताखा ब्लॉक में अपने चाचा शिवपाल सिंह यादव के चुनाव प्रचार की कमान संभाली थी.
परिवारवाद के पोषक?
मुलायम सिंह परिवार से इस वक्त कुल 13 सदस्य राजनीति में सक्रिय हैं. इस आंकड़े ने समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया की नीतियों के झंडाबरदार के रूप में मुलायम पर सवाल खड़े किए हैं. ‘‘नेता जी’’ ने भी अपनी राजनीति के शुरुआती दौर में कांग्रेस पार्टी के परिवारवाद के खिलाफ आवाज बुलंद की थी. 1991 में प्रकाशित डॉ. राम सिंह की पुस्तक क्रांतिदूत मुलायम सिंह में स्पष्ट उल्लेख है कि मुलायम सिंह लोकतांत्रिक गणतंत्र में सत्ता का एक परिवार विशेष में सिमटकर रह जाना लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं. कांग्रेस में राजवंश स्थापित करने की प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हुए मुलायम सिंह कहते थे, ‘‘कांग्रेसी नेताओं में भाई-भतीजावाद के साथ अपनी औलाद और कुटुंब को आगे बढ़ाने की आश्चर्यजनक मनोवृत्ति बढ़ रही है, जिसके कारण लोकतंत्र पुश्त-दर-पुश्त शासन करने वालों का स्वार्थ साधन बन गया है.’’
अब खुद मुलायम सिंह के परिवार के एक दर्जन से अधिक सदस्य भले ही सक्रिय रूप से राजनीति में उतर आए हों, लेकिन गांधी परिवार का परिवारवाद अब भी उनके निशाने पर है. इसी साल 6 फरवरी को लखनऊ में सपा के प्रदेश मुख्यालय में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए मुलायम सिंह ने कहा, ‘‘कांग्रेस सिर्फ एक परिवार की पार्टी है. यहां केवल गांधी परिवार का शासन चलता है और इसकी कोई नीति नहीं है.’’ कभी मुलायम सिंह के साथी रहे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विवेक सिंह कहते हैं, ‘‘सोनिया और राहुल गांधी ने कभी सत्ता की राजनीति नहीं की, जबकि मुलायम सिंह यादव एक-एक करके अपने परिवार के सदस्यों को सत्ता-सुख देते जा रहे हैं. इनका परिवारवाद जनता की सेवा के लिए नहीं, बल्कि सत्ता में भागीदारी के लिए है.’’
परिवारवाद के नाम पर आलोचना झेल रहे मुलायम सिंह को ‘छोटे लोहिया’ नाम से जाने जाने वाले समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र का साथ मिला था. उन्होंने ही अखिलेश को राजनीति में लाने की वकालत की थी. जनेश्वर मिश्र पर लिखी गई पुस्तक में एक अध्याय अखिलेश ने भी लिखा है. इस संस्मरण में अखिलेश लिखते हैं, ‘‘1999 में जब मैंने पहली बार कन्नौज से लोकसभा चुनाव लड़ा तो कन्नौज में चुनाव प्रचार के दौरान जनेश्वर मिश्र से मीडिया के लोगों ने पूछा था कि आप तो परिवारवाद के विरोधी रहे हैं. फिर अखिलेश को राजनीति में बढ़ावा क्यों दे रहे हैं? जवाब में जनेश्वर जी ने कहा कि यह संघर्ष का परिवारवाद है, सत्ता का परिवारवाद नहीं.’’
लेकिन विपक्ष के नेता समाजवादी मुलायम सिंह पर घोर वंशवाद चलाने का आरोप लगाते हैं. बीएसपी विधानमंडल दल के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य कहते हैं, ‘‘अगर डॉ. राम मनोहर लोहिया जीवित होते तो मुलायम सिंह के परिवारवाद को देखकर या तो आत्महत्या कर लेते या फिर मुलायम सिंह के समाजवाद का नाम लेने पर आजीवन प्रतिबंध लगा देते.’’
मुलायम के पुराने सहयोगी रहे और वर्तमान में केंद्र की यूपीए सरकार में वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा कहते हैं, ‘‘मुलायम सिंह को जब भी मौका मिला, उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों को ही आगे बढ़ाया.’’ इटावा में सपा के एक नेता से मुलायम सिंह और उनके परिवारवाद पर टिप्पणी मांगी तो तपाक से उनके मुंह से निकला, ‘‘परिवार रहे शासन में, कार्यकर्ता रहें अनुशासन में.’’ अचानक नेता को गलती का एहसास हुआ. दांतों से जीभ दबाई और नाम न छापने का आग्रह करते हुए चलते बने. मतलब तो साफ है.
सबसे छोटे बेटे भी आए कतार में
अप्रैल में जब समाजवादी पार्टी (सपा) सरकार के कैबिनेट मंत्री और आजमगढ़ लोकसभा क्षेत्र से पार्टी के प्रत्याशी बलराम यादव ने चुनाव लडऩे की अनिच्छा जाहिर की तो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के छोटे बेटे, 25 वर्षीय प्रतीक यादव की राजनैतिक उड़ान शुरू होने की चर्चा ने तेजी पकड़ी. लेकिन 31 मई को मुलायम ने बलराम का टिकट काटकर आजमगढ़ में पार्टी के जिलाध्यक्ष हवलदार सिंह को थमाने के साथ यह संकेत दे दिया कि प्रतीक का सियासी सफर शुरू करने का समय नहीं आया है.
प्रतीक का सियासी सफर शुरू होने में भले ही अभी वक्त है लेकिन 12 फरवरी को सपा के मुखिया मुलायम के परिवार का एक और बेटा सियासत के रास्ते राजनैतिक कुर्सी पर बैठा. मुलायम के सबसे छोटे भाई और प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री शिवपाल सिंह यादव के पुत्र 25 वर्षीय आदित्य यादव उर्फ अंकुर उत्तर प्रदेश प्रादेशिक कोऑपरेटिव फेडरेशन (यूपीपीसीएफ) के निर्विरोध अध्यक्ष निर्वाचित हुए. सफेद कुर्ता-पाजामा से इतर पैंट, शर्ट, कोट और हाथ में महंगी रोलेक्स घड़ी पहने बीटेक डिग्रीधारी आदित्य समाजवाद के बदलते चेहरे की ओर इशारा कर रहे थे. राजनीति में सफलता की पहली सीढ़ी चढऩे के लिए आदित्य ने अपने पिता शिवपाल सिंह यादव के पद चिन्हों पर चलते हुए सहकारिता का सहारा लिया है. खुद शिवपाल सिंह ने भी इटावा जिले के सहकारी बैंक के अध्यक्ष पद से सियासी पारी की शुरुआत की थी.
यूपीपीसीएफ का अध्यक्ष बनने के साथ ही आदित्य का नाम मुलायम सिंह परिवार के उन सदस्यों की सूची में 13वें नंबर पर शुमार हो गया है, जो राजनीति में एंट्री कर चुके हैं. हालांकि आदित्य तीन वर्षों से राजनीति में सक्रिय हैं और 2010 में वे जसवंतनगर ब्लॉक से इटावा जिला विकास परिषद का चुनाव भी लड़े पर पहली बार में बाजी हार गए.
मामूली शुरुआत
आदित्य को भले ही पहले चुनावी संग्राम में हार का मुंह देखना पड़ा हो, लेकिन मुलामय सिंह ने पहले ही प्रयास में सफलता पाई थी. समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया के संपर्क में आने के बाद 60 के दशक में राजनीति में प्रवेश करने वाले मुलायम सिंह यादव पहली बार 1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर जसवंतनगर विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए और यहीं से उस पटकथा की नींव पड़ी, जिसमें सैफई गांव के एक छोटे-से परिवार के देश का सबसे बड़ा सियासी परिवार बनने के सफर की शुरुआत हुई. उस वक्त तक उनके अलावा परिवार का कोई सदस्य राजनीति में नहीं था. मुलायम सिंह के सबसे बड़े भाई 85 वर्षीय रतन सिंह यादव 60 के दशक में सेना में नौकरी करते थे. राजनैतिक जीवन के शुरुआती दौर में मुलायम सिंह को अपने बड़े भाई रतन सिंह का ही साथ मिला.
इटावा के सैफई गांव में बने पैतृक घर में रह रहे रतन सिंह काफी दिनों से बीमार चल रहे हैं और उनकी याददाश्त भी अब कमजोर हो चली है. चलने-फिरने के लिए भी अब व्हील चेयर का ही सहारा है, लेकिन 1967 में मुलायम सिंह यादव के पहले चुनाव से जुड़ी यादें साझ करने की बात सुनते ही उनकी आंखों में चमक आ जाती है. रतन सिंह कहते हैं, ‘‘1967 के पहले चुनाव में मैं, दर्शन सिंह ‘प्रधान’ और बाबू राम ‘सेठ जी’ के साथ साइकिल पर बैठकर मंत्री जी (मुलायम के नजदीकी उन्हें ‘‘नेताजी’’ न कहकर ‘‘मंत्री जी’’ नाम से पुकारते हैं) का चुनाव प्रचार करने जाते थे.
परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण चुनाव खर्च के लिए चंदा भी बटोरते थे.’’ रतन सिंह के अलावा मुलायम सिंह के अन्य सगे भाई 68 वर्षीय अभयराम सिंह यादव अब भी सैफई में खेती संभालते हैं. छोटे भाई 64 वर्षीय राजपाल सिंह यादव इटावा वेयर हाउस में नौकरी करते थे और अब रिटायर हो चुके हैं. मुलायम के पांच भाइयों में सबसे छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव ने ही सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया. शिवपाल का नाम लेते ही रतन तपाक से बोलते हैं, ‘‘शिवपाल तो बड़े तेज-तर्रार रहे. उनको छोड़कर अन्य किसी भाई का राजनीति में जाने का इरादा नहीं था. हम लोग ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे.’’
‘‘70 के दशक में चंबल के बीहड़ जिले इटावा में राजनीति की राह आसान नहीं थी. 1967 में जसवंतनगर से विधानसभा चुनाव जीतने के बाद मुलायम सिंह के राजनैतिक विरोधियों की संख्या काफी बढ़ चुकी थी. राजनैतिक द्वेष के चलते कई बार विरोधियों ने मुलायम सिंह पर जानलेवा हमला भी कराया. यही वह समय था, जब शिवपाल सिंह और चचेरे भाई रामगोपाल यादव मुलायम सिंह के साथ आए. शिवपाल ने मुलायम सिंह की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाली.
शिवपाल मुलायम सिंह के जीवन पर लिखी अपनी किताब लोहिया के लेनिन में लिखते हैं, ‘‘नेता जी जब भी इटावा आते, मैं अपने साथियों के साथ खड़ा रहता. हम लोगों को काफी सतर्क रहना पड़ा, कई रातें जागना पड़ा.’’ मुलायम सिंह के नजदीकी रिश्तेदारों में सबसे बुजुर्ग रामगोपाल यादव के सबसे बड़े भाई 90 वर्षीय अतर सिंह यादव सैफई में खेती संभालते हैं. अतर सिंह बताते हैं कि रामगोपाल इटावा डिग्री कॉलेज में केमिस्ट्री पढ़ाते थे. इसीलिए लोग इन्हें ‘‘प्रोफेसर’’ कहने लगे. वे कहते हैं, ‘‘सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे होने के कारण रामगोपाल रणनीति बनाने और कागजी लिखा-पढ़ी में मुलायम सिंह की मदद करते थे.’’
1988 में रामगोपाल और शिवपाल सिंह ने एक साथ राजनीति में कदम रखा. रामगोपाल इटावा के बसरेहर ब्लॉक के अध्यक्ष निर्वाचित हुए तो शिवपाल इटावा के जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष चुने गए. इसके बाद 1992 में रामगोपाल राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए तो शिवपाल पहली बार 1996 में जसवंतनगर से जीतकर विधानसभा पहुंचे. इसके बाद रामगोपाल लगातार राज्यसभा पहुंच रहे हैं और शिवपाल ने भी अपनी विधायकी बरकरार रखी हुई है.
सहकारिता के सहारे
शिवपाल ही नहीं, उनकी पत्नी 48 वर्षीया सरला यादव और बेटे अंकुर ने भी सहकारिता के माध्यम से ही सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया. इसकी वजह जानने के लिए थोड़ा पृष्ठभूमि में जाना होगा. 1977 में यूपी में राम नरेश यादव के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी. उस सरकार में मुलायम सिंह यादव को पहली बार सत्ता सुख मिला और वे सहकारिता मंत्री बने. वहीं से प्रदेश में सहकारिता आंदोलन की शुरुआत हुई. मुलायम सिंह ने सहकारिता को नौकरशाही के चंगुल से निकालकर आम जनता से जोड़ा. उसी दौरान यूपी में सहकारी बैंक की ब्याज दर को 14 फीसदी से घटाकर 13 फीसदी और फिर 12 फीसदी कर दिया गया.
मुलायम सिंह यादव के सहकारिता मंत्री रहते हुए पहली बार ‘‘77-78 में किसानों को एक लाख क्विंटल और अगले वर्ष 2.60 लाख क्विंटल बीज बांटे गए. उनके कार्यकाल में प्रदेश में दूध का उत्पादन तो बढ़ा ही, साथ ही पहली बार सहकारिता में दलितों और पिछड़ों के लिए आरक्षण की भी व्यवस्था की गई. सहकारिता आंदोलन में मुलायम के बढ़े प्रभाव ने ही शिवपाल के लिए राजनीति में प्रवेश का मार्ग खोला.
1988 में शिवपाल पहली बार जिला सहकारी बैंक, इटावा के अध्यक्ष बने. 1991 तक सहकारी बैंक का अध्यक्ष रहने के बाद दोबारा 1993 में शिवपाल ने यह कुर्सी संभाली और अभी तक इस पर बने हुए हैं. शिवपाल की पत्नी सरला भी इसी वर्ष जिला सहकारी बैंक की राज्य प्रतिनिधि के रूप में 2007 के बाद लगातार दूसरी बार चुनी गई हैं.
महिलाएं भी मैदान में
सरला सियासत में पांव रखने वाली मुलायम सिंह के खानदान की पहली महिला नहीं हैं. उनसे पहले मुलायम सिंह के सगे भाई राजपाल यादव की पत्नी 45 वर्षीया प्रेमलता यादव 2005 में इटावा के जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर निर्वाचित हुईं और दूसरी बार 2010 में भी इसी पद पर चुनी गईं. उनके बाद अखिलेश यादव की पत्नी 34 वर्षीया डिंपल यादव ने भी 2009 में फिरोजाबाद से लोकसभा उपचुनाव लड़ा, लेकिन कांग्रेस प्रत्याशी और कभी मुलायम सिंह के करीबी रहे फिल्म अभिनेता राज बब्बर से हार गईं. हार का यह जख्म पिछले साल जून में भरा, जब अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद डिंपल खाली हुई कन्नौज लोकसभा सीट से निर्विरोध निर्वाचित होकर संसद पहुंचीं.
पीढ़ी दर पीढ़ी
मुलायम सिंह परिवार की दूसरी पीढ़ी में सबसे पहले राजनीति में आने वाले रतन सिंह यादव के इकलौते पुत्र रणवीर सिंह यादव (अब दिवंगत) थे. वे 35 वर्ष की उम्र में 1994-95 में सैफई ब्लॉक के पहले अध्यक्ष बने थे. उनके बाद मुलायम सिंह के पुत्र अखिलेश यादव राजनीति में आए. 1999 में उन्होंने कन्नौज से लोकसभा उपचुनाव जीता. यह सीट मुलायम सिंह यादव ने खाली की थी. 1999 के लोकसभा चुनाव में मुलायम संभल और कन्नौज से निर्वाचित हुए. इसके बाद 2004 के लोकसभा उपचुनाव में मुलायम सिंह के छोटे भाई अभयराम सिंह यादव के पुत्र 32 वर्षीय धर्मेंद्र यादव ने मैनपुरी से चुनाव जीता. मैनपुरी लोकसभा सीट मुलायम सिंह ने खाली की थी. उस समय मुलायम सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और पद पर रहते हुए उन्होंने 2004 के लोकसभा चुनाव में मैनपुरी से जीत हासिल की और बाद में सीट खाली कर दी.
मैनपुरी से लोकसभा उपचुनाव जीतने वाले धर्मेंद्र यादव महज 25 वर्ष की आयु में सांसद बन गए. धर्मेंद्र इससे पहले 2003 में सैफई ब्लॉक प्रमुख के पद पर निर्वाचित हुए थे. 13 नवंबर, 2002 को रणवीर सिंह की मृत्यु के बाद यह सीट खाली हुई थी. 2004 में धर्मेंद्र के सांसद बनने के बाद मुलायम के राजनीतिक सहयोगी नत्थू सिंह यादव के पुत्र 32 वर्षीय अरविंद यादव सैफई ब्लॉक प्रमुख बने और 2011 में रणवीर सिंह के पुत्र 27 वर्षीय तेज प्रताप सिंह यादव उर्फ तेजू सैफई ब्लॉक प्रमुख निर्वाचित हुए.
इंग्लैंड की लीड्स यूनिवर्सिटी से मैनेजमेंट साइंस में एमएससी करके लौटे तेज प्रताप सिंह सक्रिय राजनीति में उतरने वाले मुलायम सिंह के परिवार की तीसरी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं. हालांकि मुलायम सिंह की इकलौती सगी बहन 66 वर्षीया कमला देवी के दो बेटों व दो बेटियों में से कोई भी राजनीति में नहीं आया, लेकिन मुलायम की चचेरी बहन और रामगोपाल यादव की सगी बहन 72 वर्षीया गीता देवी के पुत्र 32 वर्षीय अरविंद यादव ने 2006 में सक्रिय राजनीति में कदम रखा और मैनपुरी के करहल ब्लॉक में ब्लॉक प्रमुख के पद पर निर्वाचित हुए. 2011 में करहल ब्लॉक प्रमुख की सीट सुरक्षित हो गई और अरविंद चुनाव नहीं लड़ पाए. इस समय वे मैनपुरी लोकसभा सीट के तहत आने वाले करहल ब्लॉक में सपा की मजबूती के लिए काम कर रहे हैं.
दूसरी ओर रामगोपाल यादव के पुत्र 25 वर्षीय अक्षय यादव भी सक्रिय राजनीति में कूद पड़े हैं. सपा ने फिरोजाबाद लोकसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी और फिल्म अभिनेता राज बब्बर के खिलाफ अक्षय यादव को टिकट दिया है. फिरोजाबाद लोकसभा सीट से अक्षय का पुराना नाता है. 2009 के लोकसभा चुनाव में अक्षय ने यहां से चुनाव लड़ रहे अखिलेश यादव के चुनावी प्रबंधन की कमान संभाली थी. इसके बाद 2012 में कन्नौज लोकसभा उपचुनाव में भी अक्षय ने डिंपल यादव के चुनाव प्रबंधन का जिम्मा संभाला, जिसमें डिंपल निर्विरोध निर्वाचित हुईं.
रामगोपाल यादव के बड़े भाई 75 वर्षीय रामदास यादव कहते हैं, ‘‘अक्षय में नेता बनने के सारे गुण हैं लेकिन वह रामगोपाल जितना होशियार नहीं है, हालांकि वह अभी छोटा है.’’ मुलायम परिवार की नई पीढ़ी के नेताओं में सैफई में सबसे ज्यादा लोकप्रिय अखिलेश यादव ही हैं. मुलायम सिंह के सबसे बड़े ताऊ छेदालाल यादव के पुत्र 80 वर्षीय शैतान सिंह कहते हैं, ‘‘अखिलेश, मंत्री जी (मुलायम सिंह) से भी ज्यादा होशियार है. उसकी याददाश्त गजब की है.’’
यदि आने वाले वर्षों में यादव परिवार के कुछ और सदस्य सक्रिय राजनीति में आते दिखें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए. मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई राजपाल यादव के पुत्र 26 वर्षीय अंशुल यादव भी राजनीति का ककहरा सीख रहे हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में अंशुल ने जसवंतनगर विधानसभा क्षेत्र के तहत आने वाले ताखा ब्लॉक में अपने चाचा शिवपाल सिंह यादव के चुनाव प्रचार की कमान संभाली थी.
परिवारवाद के पोषक?
मुलायम सिंह परिवार से इस वक्त कुल 13 सदस्य राजनीति में सक्रिय हैं. इस आंकड़े ने समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया की नीतियों के झंडाबरदार के रूप में मुलायम पर सवाल खड़े किए हैं. ‘‘नेता जी’’ ने भी अपनी राजनीति के शुरुआती दौर में कांग्रेस पार्टी के परिवारवाद के खिलाफ आवाज बुलंद की थी. 1991 में प्रकाशित डॉ. राम सिंह की पुस्तक क्रांतिदूत मुलायम सिंह में स्पष्ट उल्लेख है कि मुलायम सिंह लोकतांत्रिक गणतंत्र में सत्ता का एक परिवार विशेष में सिमटकर रह जाना लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं. कांग्रेस में राजवंश स्थापित करने की प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हुए मुलायम सिंह कहते थे, ‘‘कांग्रेसी नेताओं में भाई-भतीजावाद के साथ अपनी औलाद और कुटुंब को आगे बढ़ाने की आश्चर्यजनक मनोवृत्ति बढ़ रही है, जिसके कारण लोकतंत्र पुश्त-दर-पुश्त शासन करने वालों का स्वार्थ साधन बन गया है.’’
अब खुद मुलायम सिंह के परिवार के एक दर्जन से अधिक सदस्य भले ही सक्रिय रूप से राजनीति में उतर आए हों, लेकिन गांधी परिवार का परिवारवाद अब भी उनके निशाने पर है. इसी साल 6 फरवरी को लखनऊ में सपा के प्रदेश मुख्यालय में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए मुलायम सिंह ने कहा, ‘‘कांग्रेस सिर्फ एक परिवार की पार्टी है. यहां केवल गांधी परिवार का शासन चलता है और इसकी कोई नीति नहीं है.’’ कभी मुलायम सिंह के साथी रहे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विवेक सिंह कहते हैं, ‘‘सोनिया और राहुल गांधी ने कभी सत्ता की राजनीति नहीं की, जबकि मुलायम सिंह यादव एक-एक करके अपने परिवार के सदस्यों को सत्ता-सुख देते जा रहे हैं. इनका परिवारवाद जनता की सेवा के लिए नहीं, बल्कि सत्ता में भागीदारी के लिए है.’’
परिवारवाद के नाम पर आलोचना झेल रहे मुलायम सिंह को ‘छोटे लोहिया’ नाम से जाने जाने वाले समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र का साथ मिला था. उन्होंने ही अखिलेश को राजनीति में लाने की वकालत की थी. जनेश्वर मिश्र पर लिखी गई पुस्तक में एक अध्याय अखिलेश ने भी लिखा है. इस संस्मरण में अखिलेश लिखते हैं, ‘‘1999 में जब मैंने पहली बार कन्नौज से लोकसभा चुनाव लड़ा तो कन्नौज में चुनाव प्रचार के दौरान जनेश्वर मिश्र से मीडिया के लोगों ने पूछा था कि आप तो परिवारवाद के विरोधी रहे हैं. फिर अखिलेश को राजनीति में बढ़ावा क्यों दे रहे हैं? जवाब में जनेश्वर जी ने कहा कि यह संघर्ष का परिवारवाद है, सत्ता का परिवारवाद नहीं.’’
लेकिन विपक्ष के नेता समाजवादी मुलायम सिंह पर घोर वंशवाद चलाने का आरोप लगाते हैं. बीएसपी विधानमंडल दल के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य कहते हैं, ‘‘अगर डॉ. राम मनोहर लोहिया जीवित होते तो मुलायम सिंह के परिवारवाद को देखकर या तो आत्महत्या कर लेते या फिर मुलायम सिंह के समाजवाद का नाम लेने पर आजीवन प्रतिबंध लगा देते.’’
मुलायम के पुराने सहयोगी रहे और वर्तमान में केंद्र की यूपीए सरकार में वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा कहते हैं, ‘‘मुलायम सिंह को जब भी मौका मिला, उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों को ही आगे बढ़ाया.’’ इटावा में सपा के एक नेता से मुलायम सिंह और उनके परिवारवाद पर टिप्पणी मांगी तो तपाक से उनके मुंह से निकला, ‘‘परिवार रहे शासन में, कार्यकर्ता रहें अनुशासन में.’’ अचानक नेता को गलती का एहसास हुआ. दांतों से जीभ दबाई और नाम न छापने का आग्रह करते हुए चलते बने. मतलब तो साफ है.

