पानगरियाभारत और चीन द्विपक्षीय व्यापार संबंधों में एक दूसरे को 1984 में ही सबसे पसंदीदा राष्ट्र का दर्जा दे चुके थे, लेकिन दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय कारोबार 16 साल के बाद 2000 में मामूली 2.9 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच सका. लेकिन जैसे ही भारत में विकास दर तेज होते हुए 8-9 फीसदी के पायदान पर पहुंची और औद्योगिक शुल्कों को घटाया गया, आपसी व्यापार दिन दूनी, रात चौगुनी रफ्तार से बढ़कर 2011 तक 74 अरब डॉलर पर पहुंच गया.
ऐसे में आम तौर पर यही ख्याल आता है कि इस तरक्की से चीन और भारत, दोनों देश अपनी जनता की भरपूर वाहवाही बटोरेंगे. लेकिन ऐसा नहीं है. भारत के सरकारी हलकों और प्रेस की सुर्खियों में बस यही रट लगी है कि इस रिश्ते में कहीं कुछ तो गड़बड़ है. भारत चीन को जितना निर्यात करता है, चीन उसका दो से तीन गुना ज्यादा निर्यात भारत को करता है. यह आम अवधारणा है कि चीन अपने यहां तैयार चीजों को बड़े पैमाने पर खपाने के लिए भारत के तेजी से बढ़ते बाजार का इस्तेमाल कर रहा है जिससे भारत को नुकसान हो रहा है. यही ख्याल मानो मुखर होकर भारत की ओर से चीन के खिलाफ 1995 में दायर 154 एंटी डंपिंग मामलों के रूप में सामने आया जो वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन में एक सदस्य के दूसरे के खिलाफ उठाए गए अब तक के मामलों की सबसे बड़ी संख्या है.
क्या यह नजरिया उचित विश्लेषण पर आधारित है? बिलकुल नहीं. शुरू से देखें तो अमेरिका चीन से भारत के मुकाबले पांच गुना ज्यादा माल मंगा रहा है और उसका द्विपक्षीय व्यापार घाटा भारत की तुलना में 10 गुना अधिक है. फिर भी 1995 से अब तक चीन के खिलाफ एंटी डंपिंग मामलों को उठाने के लिहाज से 112 की संख्या के साथ अमेरिका दूसरे नंबर पर है.
अर्थशास्त्र का सबक है कि आपको हमेशा अपने चालू खाते के संतुलन पर ध्यान रखना चाहिए. मैक्रोइकोनॉमिक नजरिए से देखें तो सेवाओं के बदले माल का निर्यात या आयात के लिए रेमिटेंस (पैसा भेजना) में कुछ भी खास नहीं है. मैक्रोइकोनॉमिक स्थिरता के लिए ज्यादा जरूरी है कि लंबे समय तक कुल चालू खाते का संतुलन बरकरार रहे न कि हर खास व्यापार भागीदार का साथ. अगर भारत को अपने सामान और सेवाओं के लिए अमेरिका और यूरोप में ज्यादा कीमत मिल रही है तो उसे वहां के बाजारों के लिए निर्यात करना चाहिए. और अगर उसे अपनी जरूरत की चीजें और सेवाएं चीन में सबसे सस्ती मिल रही हैं तो उन्हें वहीं से खरीदना चाहिए.
दरअसल, चीन से आयात को सीमित करने से कुल चालू खाते के घाटे का हल निकालने में कोई खास मदद नहीं मिलने वाली. इससे यही होगा कि वे ज्यादा मंहगे सप्लायर की ओर रुख कर लेंगे जिससे हमारी खरीद-क्षमता और वास्तविक आय पर असर पड़ेगा. जब तक देश में हो रहे विदेशी निवेश और बाहरी वाणिज्यिक उधारी (एक्सटर्नल कॉमर्शियल बॉरोइंग) के रूप में बड़ी मात्रा में शुद्ध पूंजी आ रही है, उसी आकार के चालू खाता घाटे से नहीं बचा जा सकता.
एक आम शिकायत रही है कि भारत के चीन के साथ कारोबारी रिश्ते में एक औपनिवेशिक पैटर्न झलकता है: यह चीन में बने माल का आयात करता है, लेकिन उसके लिए कच्चा माल खुद ही उसे निर्यात करता है. यह निश्चित रूप से चिंता की बात है क्योंकि भारत तुलनात्मक रूप से फायदे की इस स्थिति का इस्तेमाल नहीं कर सका, लेकिन यह एक तरह से देश के अंदर पैदा हुई समस्या है. चीन मजदूरों की भयंकर कमी और बढ़ती मजदूरी के दबाव का सामना कर रहा है जबकि भारत में अनौपचारिक क्षेत्र में श्रमिकों की एक विशाल आबादी मौजूद है, जिसे बिना खास मजदूरी बढ़ाए संगठित क्षेत्र में इकट्ठा कर उनकी मेहनत से गुणवत्तापूर्ण उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं जो चीनी सामानों को अंगूठा दिखा सकें.
लेकिन हमारे कठोर श्रम-कानूनों ने हमारे हाथ बांध दिए हैं और हमें चीन के संगठित क्षेत्र में तैयार उत्पादों को खरीदने के अलावा कोई चारा नहीं सूझता जिन्हें वह बेतहाशा निर्यात कर रहा है. हद तो यह है कि अब चीनी कपड़े भी बाजार में छाने लगे हैं. आज, चीन भारत के निर्यात की बनिस्बत 10 गुना ज्यादा कपड़े निर्यात करता है. अफसोस है कि भारत के कपड़ों का कुल निर्यात 1993-94 के 12 फीसदी से तेजी से फिसलता हुआ 2011-12 में 5 फीसदी तक लुढ़क चुका है.
भारत को चीन से सबसे बड़ी शिकायत यह है कि उसने भारतीय दवाइयों और सॉफ्टवेयर उत्पादों के निर्यात में अड़चनें पैदा कीं. यह जायज शिकायत है और चीनी बाजार में बेहतर पहुंच बनाने के लिए भारत के प्रधानमंत्री को चीनी प्रधानमंत्री के भारत दौरे के समय इसी बात पर जोर देना चाहिए.
लेखक कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं.

