हर सुबह जब दुर्गा कवर की नींद खुलती है तो सामने के बागीचे में उन्हें पांच मोर नाचते नजर आते हैं. झडिय़ों, कलकल करती झीलों और मलेशियाई आर्किड के बीच जॉंगिंग करने के बाद ही वे अपने प्राइवेट योग सेशन के लिए जाती हैं. बंगलुरू की रहने वाली मैनेजमेंट की छात्रा 19 वर्षीया दुर्गा इसके बाद जिस भव्य डाइनिंग हॉल में नाश्ता करने पहुंचती हैं, वह कांच के क्रिस्टल के झूमर, ओक की टेबल और हाथ की कलाकारी से सजाई गई सीलिंग का बना है जो हैरी पॉटर सीरीज की किताबों में बताए गए जादू के स्कूल हॉगवार्ट्स जैसा है. फेसबुक पर उनकी तस्वीरों को देखकर उनके दोस्त बमुश्किल से इस बात पर यकीन कर पाते हैं कि ये बॉलीवुड के सेट नहीं बल्कि राजस्थान के शेखावाटी स्थित मोदी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ऐंड साइंस (एमआइटीएस) की तस्वीरें हैं, जहां दुर्गा पढ़ रही हैं.
चाहे छह मंजिला मॉल हो, फाइव स्टार होटल, लग्जरी सॉना, डिजाइनर लाउंज या फिर कक्षाओं में टचस्क्रीन, भारत की प्राइवेट यूनिवर्सिटीज आज अपने छात्रों के लिए बेहतरीन और आधुनिक सुविधाओं को मुहैया कराने की जरूरत को बखूबी समझ रही हैं. विदेशी यूनिवर्सिटियों में छात्रों को भेजने में मदद करने वाली एजेंसी ईजीई एजुकेशन कंसल्टेंसी के सीईओ राजीव गुप्ता कहते हैं, ‘‘डेढ़ दशक पहले तक प्राइवेट यूनिवर्सिटियों में पढऩा खराब माना जाता था. आज माता-पिता नए विकल्प खोजने को लेकर ज्यादा खुल चुके हैं. भव्य कैंपस, प्लेसमेंट की उच्च दर, बेहतरीन सुविधाओं और आक्रामक प्रचार ने इन यूनिवर्सिटियों को देखने के हमारे नजरिए में बदलाव ला दिया है.’’
हालांकि सारा मामला चमक-दमक तक सीमित नहीं है. यहां बनाए गए कैंपस प्लेसमेंट सेल और अकसर लगने वाले रिक्रूटमेंट फेयर सुनिश्चित करते हैं कि बच्चे पढ़ाई के बाद बेरोजगार न रह जाएं. एमआइटीएस और फगवाड़ा की लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी में पिछले साल सौ फीसदी प्लेसमेंट हुई थी. माइक्रोसॉफ्ट आइटी के एचआर डायरेक्टर राजीव बर्मन कहते हैं, ‘‘देशभर की प्राइवेट यूनिवर्सिटियों में भी अच्छी प्रतिभाएं मौजूद हैं.’’
अगर आपका प्रकृति से जुडऩे, डांस नाइट्स, फूड फेस्टिवल, आरामदायक हॉस्टल, बड़े-बड़े खेल के मैदान और आरामदेह सुविधाएं पाने का मन है तो आपको बस इतना करना है कि देशभर में खुलीं प्राइवेट यूनिवर्सिटी में से किसी एक में नाम लिखवा लीजिए. अकसर ऐसे इंस्टीट्यूट में अंडरग्रेजुएट कोर्स की ट्यूशन और लिविंग फीस दो-तीन लाख रु. सालाना आती है. भुवनेश्वर की केआइआइटी यूनिवर्सिटी में पढऩे वाले एक छात्र की मां 43 वर्षीया मालिनी नायर कहती हैं, ‘‘कुछ लोग इसे महंगा कह सकते हैं लेकिन मुझे लगता है कि एक-एक पैसा वसूल हो रहा है.’’
तालीम का नखलिस्तान
मोदी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ऐंड साइंस, लक्ष्मणगढ़
कुछ साल पहले तक राजस्थान के सीकर जिले का लक्ष्मणगढ़ सिर्फ बंजर इलाका था. आज 80 से ज्यादा किस्म के पक्षी, 14 फव्वारे, पांच डिजाइनर इमारतें, 400 पेड़ और 8,000 छात्रों ने इस जगह की तस्वीर बदल डाली है. कोलकाता के कारोबारी आर.पी. मोदी ने इस इंस्टीट्यूट की स्थापना की थी. यहां एक बार आने के बाद माता-पिता और बच्चों का एमआइटीएस की हरी-भरी सुविधाओं को छोड़कर जाने का मन ही नहीं होता है.
पहली बार 1998 में स्टेट प्राइवेट यूनिवर्सिटी के तौर पर स्थापित एमआइटीएस सिर्फ लड़कियों के लिए थी. जहां अंडरग्रेजुएट स्तर पर इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, आर्ट्स, साइंस, कॉमर्स और लॉ की पढ़ाई होती थी. इसी के साथ कैंपस में मोदी ने मोदी स्कूल भी खड़ा कर दिया. यह भी सिर्फ लड़कियों का स्कूल है जो सीबीएसई से मान्यता प्राप्त है और नेशनल बोर्ड ऑफ एजुकेशन ऐंड ट्रेनिंग से मान्यता प्राप्त राज्य का पहला स्कूल है. 500 एकड़ में फैले इस कैंपस में 150 से ज्यादा फैकल्टी सदस्य और 2,000 छात्राएं रहती हैं. गुजरात की रहने वाली और यहां लॉ की पढ़ाई कर रही 20 वर्षीया अनुकृति राय बताती हैं, ‘‘एमआइटी’’ होटल कैलिफोर्निया जैसा है-आप यहां कभी भी आ सकतीं हैं लेकिन जा नहीं सकतीं. खाने से लेकर लाइब्रेरी तक यह दुनिया का बेहतरीन कैंपस है.’’ जाहिर है, उनकी बात गलत नहीं कही जा सकती, वे यहां किंडरगार्टेन (केजी) से ही पढ़ रही हैं.
इससे बड़ा और कहां
लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (एलपीयू), फगवाड़ा
पंजाबी शादियों में गरम जलेबियां छानने से लेकर लुधियाना-जालंधर हाइवे पर 900 एकड़ की जमीन पर यूनिवर्सिटी चलाने तक लवली ग्रुप को हर काम को बड़े और भव्य स्तर पर करने की आदत है. बलदेव मित्तल ने 1961 लवली स्वीट्स नाम की मिठाई की दुकान खोली थी. आज एलपीयू के डिप्टी डायरेक्टर अमन मित्तल बताते हैं, ‘‘कुछ साल बाद हमने बजाज ऑटो का एक शोरूम खोल लिया. हम चाहते थे कि समाज में कोई योगदान दें, इसलिए हमने यूनिवर्सिटी भी खोल ली. हमारे दूसरे कामों की ही तरह इस यूनिवर्सिटी को भी भव्य होना था.’’ यहां यूनिवर्सिटी के भीतर उनकी अपनी ट्राम चलती है. पंजाब का सबसे बड़ा ओपन एयर थिएटर भी यहीं है. एक शॉपिंग मॉल है जिसे छात्र खुद चलाते हैं. यहां तीस से ज्यादा एटीएम, 90 रेस्तरां, 15 हॉस्टल, आठ निजी अपार्टमेंट और एक लग्जरी जिम है. कुल 40,000 छात्र और कर्मचारी इस कैंपस में रहते हैं.
केरल से यहां बीटेक करने आए 21 वर्षीय बिबिन बाबू कहते हैं, ‘‘मेरा दाखिला पहले चेन्नै यूनिवर्सिटी में हो गया था लेकिन मेरे माता-पिता ने जब एलपीयू के बारे में सुना तो मुझे यहां भेज दिया. मुझे ब्लूमबर्ग इंस्टीट्यूट से जॉब ऑफर मिला है. मैं इस साल सैन फ्रांसिस्को में होने जा रही दुनिया की सबसे बड़ी टेक्नोलॉजी कॉन्फ्रेंस गूगल आइ/ओ में भारत का प्रतिनिधित्व करूंगा. एलपीयू के बगैर यह नामुमकिन होता.’’
ग्लोबल इच्छाएं
केआइआइटी, भुवनेश्वर
भुवनेश्वर के कलिंग इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी (केआइआइटी) में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में आखिरी साल के छात्र 22 वर्षीय सरबजीत पॉल ने जो अपने पहले साल से ही लगातार अच्छे अंक लाते रहे हैं जब पिछले साल कैंपस प्लेसमेंट के माध्यम से एक आइटी कंपनी में मिली नौकरी न कर के इस साल की शुरुआत में पेंटिंग करने का फैसला किया तो उन्हें बस ज्वाइंट रजिस्ट्रार (स्टुडेंट वेल्फेयर) सुचेता प्रियवदिनी को एक मेल करना पड़ा. हालांकि इस इंस्टीट्यूट में ऐसा कोई कोर्स नहीं चलाया जाता, लेकिन सुचेता की कोशिश से गुवाहाटी के पॉल को स्वीडन में फाइन आर्ट्स की रेजिडेंसी स्कॉलरशिप मिल गई.
लगभग 25 वर्ग किलोमीटर के कैंपस में फैले केआइआइटी में वाइ-फाइ सेवा वाले 20 कैंपस हैं जिनमें दो में सोलर एनर्जी से बनी बिजली मौजूद है, मल्टीमीडिया क्लासरूम हैं जो लगभग 75 लाख वर्ग फुट एरिया में बने हैं. चमकदार फ्लोर, कांच के प्रवेश द्वार, रेन वाटर हार्वेस्टिंग, स्विमिंग पूल, कई एकड़ का हरित क्षेत्र, कैफेटेरिया और फूड कोर्ट भी हैं.
भुवनेश्वर में महर्षि कॉलेज में केमिस्ट्री पढ़ाकर 5,000 रु. का वेतन पाने वाले केआइआइटी के संस्थापक 47 वर्षीय अच्युत सामंत ने 1992 में शहर में किराये के दो कमरों में इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट खोला था. सरकारी बैंक से 1997 में 25 लाख रु. का कर्ज मिलने पर सामंत ने केआइआइटी की स्थापना की. उनके मुताबिक, इंस्टीट्यूट की कुल परिसंपत्ति 4,000 करोड़ रु. की हैं और यह अपनी स्थापना के बाद से लगातार फैल रहा है. इस प्राइवेट यूनिवर्सिटी में भारत और 22 अन्य देशों से 18,000 छात्र, 1,500 फैकल्टी सदस्य और 2,500 सहायक कर्मचारी हैं.
सिर्फ कारोबार
यूनिवर्सल बिजनेस स्कूल, करजात
महाराष्ट्र के करजात के यूनिवर्सल बिजनेस स्कूल (यूबीएस) में बीबीए प्रथम वर्ष के भारतीय मूल के अमेरिकी छात्र 17 वर्षीय तेज प्रताप कैंपस स्थित चार कमरों वाले पॄकस ईस्टमैन डिजाइन वाले मकान से अपना निजी उद्यम शेक्सपियर किचन चलाते हैं. वे अकेले यह काम करते हैं. अपनी छोटी-सी रसोई में इंडक्शन स्टोव पर वे पास्ता और सैंडविच बनाते हैं. यही उनका हफ्तावार मेन्यु होता है. वे छात्रों के कमरे तक इसे पहुंचाने का भी काम करते हैं. यूबीएस के सह-संस्थापक 39 वर्षीय तरुणदीप सिंह आनंद, उनके पिता 71 वर्षीय गुरदीप सिंह आनंद और 45 वर्षीय रियल्टर बाबूलाल वर्मा इसी किस्म के उद्यमी उत्साह की कामना करते हैं: एकेडमिक कौंसिल के छह अन्य सदस्यों के साथ मिलकर तरुणदीप किसी छात्र के पूरे करियर को देखते हैं ताकि सिर्फ एक इम्तहान के बल पर उसका प्रवेश न हो जाए. मसलन, यूबीएस ने एक ऐसी लड़की को अपने यहां दाखिला दिया जिसने अपनी कॉलेज की मार्केटिंग कैंपेन में दो लाख रु. जुटाए थे. यूबीएस को शुरू हुए एक साल हुआ है.
यह बिजनेस स्कूल 1,000 करोड़ रु. की लागत से बना है. यह एआइसीटीई से मान्यता प्राप्त तीन साल का बीबीए और 15 माह का एमबीए कोर्स चलाता है. जिसमें यूके की कार्डिफ मेट्रोपोलिटन यूनिवर्सिटी से भी डिग्री लेने का विकल्प शामिल है.

