चीन के प्रधानमंत्री ली केकियांग 20 मई को जब नई दिल्ली पहुंचेंगे तो उनका चेहरा संपन्नता और राष्ट्रीय गौरव के तथाकथित चीनी सपने की दिशा में अग्रसर नए ऊर्जावान देश के नेता का होगा.
अगले दशक के लिए चीन का शीर्ष नेतृत्व अपनी जड़ें मजबूती के साथ जमा चुका है और दुनिया की यह दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था खुद को विश्व नेता के रूप में स्थापित करने और अमेरिका से दूरी कायम रखने को बेताब है. आज चीन की नजर अपने आस-पड़ोस के देशों पर है—पहले मॉस्को, जहां राष्ट्रपति शी जिनपिंग पिछले महीने पहली सरकारी यात्रा पर गए और अब पारंपरिक क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी नई दिल्ली जहां चीन राजनैतिक मतभेदों की लंबी सूची के बावजूद आर्थिक सहयोग बढ़ाना चाहता है.
फिर भी चीन ने ऐसी ऐतिहासिक सरकारी यात्रा के लिए इतनी अपारंपरिक शुरुआत चुनी और इसे कई दशकों में दोनों देशों के बीच सबसे गंभीर सीमा विवाद के साए में ढक दिया. 15 अप्रैल को चीन की सेना की एक प्लाटून लद्दाख के दौलत बेग ओल्दी इलाके में 19 किमी भीतर तक घुस आई जबकि भारत इसे अपने शासन के अंतर्गत मानता है. फिर हेलीकॉप्टर की मदद से उन्होंने वहां तंबू भी लगा लिए.
इधर भारत के टेलीविजन चीनी अतिक्रमण की चेतावनियां बरसाते रहे और उधर बीजिंग में सरकार ने असाधारण चुप्पी साध ली. सरकारी मीडिया छोटी-मोटी खबरें देता रहा और अधिकारी इस बात से इनकार करते रहे कि सैनिक चीन की कथित सीमा के दायरे से बाहर निकले हैं.
उसके बाद वहां पहुंची भारतीय सेना और पीपल्स लिबरेशन आर्मी के बीच गतिरोध करीब तीन हफ्ते चला, फिर घबराए प्रतिनिधि एक साथ पीछे हटने पर राजी हुए. यह फैसला भारत के विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की चीन की निर्धारित यात्रा शुरू होने से ऐन पहले हुआ.
अब भी यह जाहिर नहीं है कि चीन की सेना ने यह अतिक्रमण क्यों किया? क्या ये फुकचे और चुमार में भारतीय निर्माण पर चीन की चिंता का प्रतीक था या चीन याद दिलाना चाहता था कि सीमा वार्ता फिर शुरू की जाए? प्रधानमंत्री ली राजनैतिक पद संभालने के बाद से अपनी पहली विदेश यात्रा की तैयारी कर रहे हैं और उसके लिए भारत को चुना जाना चीन की विदेश नीति में भारत के महत्व और दुनिया में उसका प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने में भारत की भूमिका के प्रति चीन की उम्मीदों का प्रतीक है.
चीन की सरकार से जुड़े शोध संस्थान नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्ट्रेटजी के डायरेक्टर ली शियांगयांग का कहना है, ''चीन और भारत के बीच सीमा को लेकर विवाद अब भी है. सीमा का स्पष्ट निर्धारण न होने की वजह से चीन-भारत संबंधों के लिए यह स्थायी खतरा है, लेकिन मेरा मानना है कि दोनों देशों के बीच सामान्य सहयोग पर इस विवाद का कोई असर नहीं पड़ेगा.” यह इंस्टीट्यूट चीन की सोशल साइंसेज एकेडमी का अंग है. ली के शब्दों में, ''भारत भी उतना ही चिंतित है, जितना चीन. आर्थिक विकास हो या क्षेत्रीय घटनाएं भारत के लिए भी चीन एक पैमाना है. दोनों के बीच विश्वास का अभाव है, लेकिन चीन को भारत की उतनी फिक्र नहीं है.”
सरकार समर्थित चाइना डेली अखबार ने 13 मई को प्रकाशित संपादकीय में भी कुछ ऐसी ही बातें कही हैं, ''इतना अधिक उछलने के बाद सीमा विवाद इतनी जल्दी सुलझाने से संकेत मिलता है कि दोनों पड़ोसी अपने विवाद निबटाने में अधिक परिपक्व हो रहे हैं. चीन और भारत नई शुरुआत कर रहे हैं और अपने संपर्कों में अनुकूल ऊर्जा डालकर वे आपसी संबंधों को और ऊंचाई दे सकते हैं. जब तक वे आपसी विश्वास बढ़ाते रहेंगे और मतभेदों का रचनात्मक समाधान करते रहेंगे तब तक शेष दुनिया को दिखाते रहेंगे कि, 'ड्रैगन-हाथी’ की बहुचर्चित दुश्मनी कोरी कल्पना के सिवाय और कुछ नहीं है.”
इसका यह मतलब कतई नहीं है कि चीन की सैनिक महत्वाकांक्षाओं के प्रति भारत की चिंताएं निराधार हैं. उसके बढ़ते राष्ट्रीय गौरव की झलक लद्दाख में उसके अतिक्रमण से कहीं दूर तक फैली घटनाओं में उसकी सैनिक क्षमता में दिखाई पड़ती है. चीन का रक्षा बजट 2003 से अब तक करीब 175 फीसदी बढ़ा है और अब अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर है. क्षेत्रीय स्तर पर देखें तो पिछले कुछ महीनों में चीन और जापान के जहाज टकराते-टकराते बचे हैं. चीन, जापान के नियंत्रण वाले द्वीपों को दियाओयू कहकर अपना बताता है, जबकि जापान उन्हें सेनकाकू द्वीप कहता है. पूर्वी चीन सागर को लेकर फिलीपिंस और विएतनाम के साथ भी चीन विवाद में उलझा है.
पाकिस्तान के साथ चीन के घनिष्ठ रिश्ते भी भारत के लिए सिरदर्द हैं. दोनों एक-दूसरे को सुख-दुख का साथी मानते हैं. चीन अपने पड़ोसी को सैन्य और परमाणु टेक्नोलॉजी देता है; दोनों के बीच मजबूत आर्थिक संबंध हैं. चीन मानता है कि पाकिस्तान भविष्य में उसकी पश्चिमी सीमा से निर्यात का रास्ता बनेगा और वह पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से आयात कर सकेगा. इस रिश्ते में भी कुछ पेंच हैं. चीन को यह आशंका भी है कि उसके पश्चिमी इलाके, खासकर मुस्लिम बहुल शिनजियांग क्षेत्र में बढ़ती उग्रवादी गतिविधियां शायद पाकिस्तान की देन हैं. पाकिस्तान के भीतर उसके कुछ श्रमिकों पर भी हमले हुए हैं क्योंकि उन्हें आधुनिक उपनिवेशवाद का प्रतीक माना जाता है.
फिर भी चीन को अपना सपना सच करने के लिए पड़ोसियों का आर्थिक सहयोग चाहिए, चाहे संबंध कितने भी उलझे हुए क्यों न हों. नए समृद्ध चीन के निर्माण के लिए उसे अपने पश्चिमी इलाकों को खोलना होगा जो आर्थिक रूप से संपन्न पूर्वी तटवर्ती शहरों की तुलना में पिछड़ गए हैं. चीन ने सीमा के ताजा अतिक्रमण से बेशक भारत को रक्षात्मक रवैया अपनाने पर मजबूर कर दिया हो लेकिन उसके रणनीतिक महत्व को वह बखूबी समझता है.
ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी में कॉलेज ऑफ एशिया ऐंड पैसिफिक में विजिटिंग फेलो सेंडी गॉर्डन का कहना है, ''भारत के पास दो विशेषताएं हैं: एक तो हिंद महासागर में उसकी महत्वपूर्ण स्थिति और दूसरी अमेरिका के साथ बनते महत्वपूर्ण संबंध. चीन को इस बात की भी बहुत चिंता है कि अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते और सामरिक दृष्टि से उसकी महत्वपूर्ण स्थिति भविष्य में प्रतिद्वंद्वी के रूप में भारत का कद बड़ा कर सकते हैं.”
पेकिंग यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर इंटरनेशनल ऐंड स्ट्रेटजिक स्टडीज के डिप्टी डायरेक्टर झू फेंग को लगता है कि इस यात्रा से भविष्य में टकराव टालने के तरीकों के बारे में नए सिरे से बातचीत शुरू करने के लिए किसी तरह के नए माहौल की शुरुआत हो सकती है. उनके शब्दों में, ''असली महत्व इस बात का है कि वे भारत सरकार पर किस तरह छाप छोड़ पाते हैं. आने वाले 10 साल में प्रधानमंत्री ली भारत सरकार के बहुत महत्वपूर्ण सहयोगी होंगे.”
आर्थिक दृष्टि से प्रतिद्वंद्वी होने के बावजूद ब्रिक्स के इन दो सदस्यों के बीच कई तरह की समानताएं भी हैं. दो सबसे तेजी से बढ़ती इन अर्थव्यवस्थाओं में दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी रहती है. दोनों देशों में तेजी से बढ़ते शहरीकरण की सामाजिक और बुनियादी ढांचे की मांग जबरदस्त है; दोनों भ्रष्टाचार और सबसे गरीब नागरिकों में सामाजिक असंतोष से जूझ रहे हैं और दोनों को अपनी ग्रामीण आबादी को गरीबी के दलदल से निकालना ही होगा.
लद्दाख की घटनाओं के बावजूद बीजिंग से ऐसे अनेक संकेत मिल रहे हैं कि चीन आर्थिक और क्षेत्रीय मुद्दों पर बात करना पसंद करेगा. खुर्शीद की यात्रा के समय ही भारत के बारे में चीन का अब तक का पहला ब्लू बुक नीतिपत्र जारी हुआ. इसे मुख्य रूप से येनान यूनिवर्सिटी के विद्वानों ने चीनी भाषा में लिखा है और भारत के बारे में चीन के सरकारी रुख की संदर्भ पुस्तिका माना जाता है. पुस्तिका में चेतावनी दी गई कि भारत की गठबंधन सरकार भीतरी मतभेदों और भ्रष्टाचार के घोटालों के कारण संकट में है. लेकिन इसमें सीमा संबंधी मुद्दों पर संपादकीय राय देने से काफी हद तक बचा गया है.
वार्ता के इस दौर में असली गांठ तिब्बत की होगी. भारत, कुछ हिस्सों में आलोचना के बावजूद उसे चीन का हिस्सा मान चुका है. फिर भी चीन धर्मशाला में दलाई लामा की निर्वासित सरकार की उपस्थिति से नाखुश है.
एक साल से कुछ पहले जब तत्कालीन राष्ट्रपति हूं जिनताओ भारत यात्रा की तैयारी कर रहे थे तब कई साल से दिल्ली में रह रहे तिब्बती युवक जामफेल येशी ने आत्मदाह कर लिया था. 27 साल के इस युवक की मौत की खौफनाक तस्वीरें शहर की दीवारों और फेसबुक के पन्नों पर चस्पा हो गई थीं. हालांकि चीन में हमेशा की तरह इनका प्रवेश वर्जित था.
प्रधानमंत्री ली की यात्रा के दौरान फिर ऐसा कोई विरोध हुआ तो उसकी खबरें तो चीन में प्रसारित नहीं होंगी लेकिन उसे अपमान का घूंट जरूर पीना पड़ेगा, जिससे चीन अपने नेतृत्व को हर कीमत पर बचाना चाहता है.
राजनैतिक मुद्दों के अलावा इन दोनों देशों में एक बड़ी समानता विश्व अर्थव्यवस्था में बढ़ती भूमिका की है. दोनों में वृद्धि की तेजी से बढ़ती दरों में सुस्ती आई है. अमेरिका और यूरोप में भारत और चीन के निर्यात की मांग घटने की वजह से दोनों देशों को नए बाजार तलाश करने की जरूरत है.
चीन क्षेत्रीय व्यापार समझौता करने और चीन की कंपनियों को भारत में स्थापित होने से रोकने वाले व्यापार नियमों में ढील की मांग कर रहा है. बताया जाता है कि विदेश मंत्री खुर्शीद ने चीन से भारत में चीनी कंपनियों के लिए एक औद्योगिक पार्क की संभावना पर विचार करने को कहा है. सीमा विवादों के बावजूद कारोबार करने का चीन का यह व्यावहारिक संदेश तो कम-से-कम भारतीय नेतृत्व के कानों तक अवश्य पहुंचेगा.
प्रधानमंत्री ली इसके बाद पाकिस्तान और यूरोप जाएंगे. जानकारों का मानना है कि नई दिल्ली को पहला पड़ाव चुनने का फैसला महज एक संयोग नहीं है. ली शियांगयांग का मानना है कि इससे दोनों उभरती महाशक्तियों के बीच नई साझेदारी का आधार तैयार होना चाहिए.
हिमालय क्षेत्र में इतने गरमागरम गतिरोध के बावजूद क्या मनमोहन सिंह और सलमान खुर्शीद भरोसा कर सकते हैं कि खूंखार चीनी ड्रैगन अपनी फुफकार से आग नहीं उगलेगा?
लेखक बीजिंग की फ्रीलांस कॉरस्पोंडेंट हैं जो द ग्लोब ऐंड मेल के लिए लिखती हैं.

