कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजे विजेता और परास्त किसी भी पक्ष को खास राहत नहीं दे पाए हैं. हैरानी की बात यही रही कि जिस राज्य ने बीजेपी को दक्षिण में पांव जमाने का ऐतिहासिक अवसर दिया था वहीं उसे इतनी बुरी तरह धूल चाटनी पड़ी. दिल्ली में कांग्रेस कर्नाटक चुनाव में इतनी शानदार जीत का जश्न नहीं मना पाई क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने करोड़ों रु. के कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले में कानून मंत्री अश्विनी कुमार के झूठ की पोल खोल दी और प्रधानमंत्री के रक्षा कवच को तार-तार कर दिया. कुल मिलाकर बंगलुरू और दिल्ली ने बुधवार को एक ही खट्ठे-मीठे दिन में अपने ही जाल में उलझी बीजेपी और साख गंवा चुके यूपीए की त्रासद कथा बयान कर दी.
अपने भीतर की मुसीबतों से जूझते भारत के इस दक्षिणपंथी दल में कांग्रेस के सबसे कमजोर पलों से फायदा उठाने की न तो ताकत है और न समझ. उसके पास अगर कुछ है तो बस एक से बढ़कर एक नामवर राष्ट्रीय और कुछ बराएनाम नेताओं की जमात जिनका अहंकार उनके जनाधार से बड़ा है और जिनकी महत्वाकांक्षाएं उनकी उपलब्धियों से कहीं मेल नहीं खातीं. आज के दौर में भारत एक भ्रष्ट सरकार से त्रस्त और ठगा हुआ महसूस कर रहा है और एक विश्वसनीय तथा एकजुट विकल्प के लिए तरस रहा है, कल तक औरों से अलग होने का दावा करने वाली बीजेपी देश की बागडोर थामने के लिए आगे आने की बजाए अपने ही अंतर्विरोधों और भीतरी सत्ता संघर्ष में आकंठ डूबी हुई है.
अगर बीजेपी अब भी खुद को औरों से अलग बताती है तो उसके कारण भी कुछ अलग या गलत हैं. पार्टी के अध्यक्ष कहने को तो देश के हृदय प्रदेश के जुझारू नेता हैं लेकिन अभी तक नेतृत्व क्षमता का कोई संकेत नहीं दे पाए हैं. वे अभी तक कोई ऐसा विचार या नारा नहीं दे पाए हैं जो जनाधार को प्रेरित और विपक्ष को डरा सके. उनकी वरिष्ठता या उनके प्रति सम्मान सिर्फ उनके पद की देन है, व्यक्तित्व की नहीं. दूसरे नेता ज्यादा दिखाई और सुनाई पड़ते हैं. राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली बेशक धुरंधर सांसद हैं जिनके तर्कों के बाण सत्ता पक्ष को निरुत्तर कर देते हैं. लेकिन वे सड़क की राजनीति में पसीना बहाने और धूल फांकने की बजाए परदे के पीछे की चालों में ज्यादा सहज दिखते हैं. लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज जनता की नब्ज पहचानती हैं और तीखे स्वर में जोरदार भाषण देती हैं. लालकृष्ण आडवाणी परिवार के पितामह और सम्माननीय सांसद, संतों जैसे एकांत में जीते हैं और अपनी सूझबूझ की बजाए रूठने के लिए चर्चा में रहते हैं. उन सबके ऊपर मंडराता साया नरेंद्र मोदी का है, जो पार्टी के सबसे ज्यादा बिकाऊ ब्रांड हैं. राष्ट्रवाद और विकास का नशीला मेल-मोदीत्व आज हिंदुत्व से ज्यादा विकराल रूप ले चुका है.
आदर्श स्थिति में ये पंज प्यारे हो सकते हैं. विविध संगठनात्मक क्षमता से लेकर रणनीतिक सोच और सुशासन तक, इनकी सामूहिक प्रतिभा पार्टी के लिए वरदान हो सकती है और इससे विपक्षियों की नींद हराम हो सकती है. पर सच तो यह है कि आम चुनाव की आसन्न छाया में ये पांचों पार्टी के भविष्य के लिए घातक साबित हो रहे हैं. ये सिर्फ महत्वाकांक्षांओं की डोर से बंधे हैं, जो राजनीति में कोई बुरी बात नहीं है. पर मुश्किल यह है कि बीजेपी में किसी एक के सपने सच होने का मतलब दूसरे के सपनों का चूर-चूर होना है.
फिर भी एक आदमी बाकियों पर भारी हो चुका है. मोदी न सिर्फ पहली पंक्ति में सबसे आगे खड़े हैं बल्कि भारत के लिए उनका अभियान ऐसी राजनैतिक ताकत बन चुका है जैसी देश में पहले शायद ही कभी देखी गई है. उन्होंने ठान लिया है कि खुद को भारत के लिए न सही, पार्टी के लिए तो अपरिहार्य बनाना ही है. पार्टी अब भी यह तय नहीं कर पा रही कि इस आंधी का सामना कैसे किया जाए. मोदी के उदय से सबसे ज्यादा बेचैन आडवाणी हैं, जिन्होंने बीजेपी को सत्ता में लाने के लिए सबसे ज्यादा पसीना बहाया और सबसे ज्यादा लंबा फासला तय किया था. सत्ता सुख के उन पांच वर्षों में वे अटल बिहारी वाजपेयी के नंबर दो थे. आज 85 साल की उम्र में वे जीवन में कम से कम एक बार तो नंबर वन बनने को बेताब हैं. लेकिन समस्या यह है कि उनके पुराने चेले उनकी इस पीड़ा को नहीं समझ रहे क्योंकि वे खुद नंबर वन के दावेदार हैं.
अहम का टकराव
वाजपेयी-आडवाणी की जुगलबंदी से मुक्त होकर बीजेपी अब इन पांच सितारों की टकराती महत्वाकांक्षाओं के प्रपंच राग के शोर में फंस गई है. आडवाणी, जेटली, सुषमा और राजनाथ अच्छी तरह समझते हैं कि पार्टी के कार्यकर्ता मोदी को कप्तान बनाने के लिए बेताब हैं लेकिन वे चाहेंगे कि इसे जितना हो सके, टाला जाए या कम-से-कम प्रचार समिति के अध्यक्ष पद पर मोदी की नियुक्ति को यथासंभव कमजोर किया जाए. वे मोदी की लोकप्रियता को तो भुनाना चाहेंगे लेकिन मोदी की जिस बेरहम और बेलौस कार्यशैली का डर पाले बैठे हैं, उसके सामने घुटने नहीं टेकेंगे.
सुषमा और जेटली, दोनों को आडवाणी दो दशक से भी पहले से राजनीति का ककहरा सिखा रहे हैं और दोनों की अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं. सुषमा आज भी आडवाणी का पूरा सम्मान करती हैं पर आरएसएस की प्रिय पात्र बनने को भी आतुर हैं. आडवाणी के एक करीबी सूत्र की मानें तो आडवाणी इस बात से सबसे अधिक आहत होते हैं पर वे यह भी समझते हैं कि सुषमा को अपने भविष्य की बात भी सोचनी है. लेकिन आडवाणी जेटली को कभी माफ नहीं कर सकते जिन्होंने खुलेआम मोदी का साथ दिया. जेटली मानते हैं कि सुषमा हमेशा आडवाणी की लाडली रही हैं. बीजेपी जब नितिन गडकरी का उत्तराधिकारी तलाश रही थी तब आडवाणी ने सुषमा के नाम का प्रस्ताव रखा था. आडवाणी इस बात से खफा हैं कि जेटली पार्टी अध्यक्ष पद के लिए समर्थन पाने की खातिर आरएसएस नेता सुरेश सोनी की शरण में गए थे.
अविश्वास की खाई बहुत गहरी हो चुकी है. जेटली मीडिया से काफी दूरी रख रहे हैं जो उनका स्वभाव नहीं है. चुनाव प्रभारी के नाते वे सप्ताहांत में कर्नाटक दौरों में व्यस्त रहे. पार्टी के कोर ग्रुप की बैठक में शामिल हुए उन्हें महीना बीत चुका है जिसमें सुषमा, राजनाथ, गडकरी और आरएसएस के नुमाइंदे रामलाल शामिल हैं. पार्टी के सभी अहम फैसले आडवाणी के घर पर कोर ग्रुप की बैठक में होते हैं. कयास लगाया जा रहा है कि अगर मोदी की स्वीकार्यता पर सवाल उठे तो वे प्रधानमंत्री पद के लिए जेटली के नाम का प्रस्ताव रख सकते हैं. और फिर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और बीजू जनता दल के नेता नवीन पटनायक के साथ जेटली के संबंध खासे मधुर हैं. आरएसएस को भले ही पसंद न हो पर अगर कोई विकल्प न हो तो वह भी शायद अरुण जेटली के नाम पर मुहर लगा दे.
सुषमा भी चुपचाप अपनी पैठ बढ़ाने में लगी हैं. जानकार सूत्र बताते हैं कि पिछले कुछ हफ्तों में वे शिवसेना के अध्यक्ष उद्धव ठाकरे और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के संपर्क में रही हैं. 1 मई को शिवसेना पार्टी बैठक में उद्धव ने कहा भी था कि बीजेपी को प्रधानमंत्री पद के दावेदार की घोषणा करने से पहले सहयोगियों से सलाह करनी चाहिए. उद्धव ने पार्टी को याद दिलाया कि उनके पिता दिवंगत बालासाहेब ठाकरे ने कहा था कि सुषमा में प्रधानमंत्री पद के लिए सभी गुण हैं. एनडीए के प्रमुख सहयोगी जनता दल-यूनाइटेड जेडीयू के प्रति उनका सहज स्नेह है. संसद के केंद्रीय कक्ष में सुषमा अकसर एनडीए के संयोजक और अपने पुराने समाजवादी सहयोगी शरद यादव के साथ दिखती हैं. महत्वपूर्ण मुद्दों पर वे जान-बूझकर आरएसएस के साथ खड़ी रहती हैं. आरएसएस जब गडकरी को दूसरा कार्यकाल दिलाने में जुटा था तो सुषमा ने बड़ी सफाई से बीच का रास्ता अपनाए रखा. उनकी पूरी कोशिश थी कि अगर कांटा फंस गया तो प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के लिए वे सुरक्षित उम्मीदवार के तौर पर उभर सकती हैं.
नागपुर का खेल
मुश्किल तो यह है कि राजनाथ भी सुरक्षित दावेदारी के जुगाड़ में हैं. जब बाकी सब नेता अध्यक्ष पद की दौड़ से हटा दिए गए तब उनकी ताजपोशी हुई. हकीकत यह है कि आरएसएस उन्हें पसंद करता है और इससे उनका पलड़ा भारी रहा है. राजनाथ को उम्मीद है कि जिस सितारे ने उन्हें पार्टी के अध्यक्ष की कुर्सी दिलाई वही शायद 2014 की दौड़ में भी साथ दे जाए. अब उनकी नजर प्रधानमंत्री की गद्दी पर है और हौसला तो देखिए कि वे खुद को अटल बिहारी वाजपेयी के बाद बताने की जुगत में लगे हैं. जनवरी में उनके अध्यक्ष बनने के बाद से कम से कम उनके वफादार तो यही साबित करने में लगे हैं. एक करीबी का कहना था कि वे भी वाजपेयी की तरह हिंदी प्रदेश यानी उत्तर प्रदेश के हैं, हिंदी भाषा पर उनकी पकड़ और वाक्पटुता भी वाजपेयी जैसे ही है.
नवनियुक्त महासचिव वरुण गांधी ने शायद इसी प्रचार से प्रेरणा लेकर 1 मई को बरेली में एक चुनाव सभा में राजनाथ की तुलना वाजपेयी से की थी. फिलहाल राजनाथ भी वरुण को उत्तर प्रदेश में पार्टी का चेहरा बता रहे हैं. राजनाथ और वरुण का यह परस्पर प्रशंसा अभियान हिंदुत्व के मुद्दे पर पार्टी की दुविधा भी दिखाता है. बीजेपी अब तक यह पूरी तरह तय नहीं कर पाई कि वह हिंदुत्व के साथ खड़ी है या राष्ट्रवाद की आग में तपे प्रशासन के साथ है.
राजनाथ जानते हैं कि मोदी के रथ को घुमाने में ही अकलमंदी है. उत्तर प्रदेश में पार्टी का सर्वे बताता है कि अगर मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना दिया जाए तो पार्टी के 22 प्रतिशत वोट शेयर में 12 प्रतिशत इजाफा हो जाएगा. लेकिन औरों की तरह राजनाथ भी मातृभूमि का कर्ज चुकाने के गुजरात के मुख्यमंत्री के जुनून से घबराते हैं. गुजरात की एक अनकही राजनैतिक सच्चाई यह भी है कि मोदी ने बीजेपी में अपने कद के आसपास का भी कोई नेता नहीं छोड़ा है. संघ परिवार उनसे इसलिए परेशान है कि उन्होंने राज्य में आरएसएस की उपस्थिति बड़ी चतुराई से कम कर दी है. उन्होंने आरएसएस के संजय जोशी को गुजरात से भगाकर ही दम लिया और राज्य में विश्व हिंदू परिषद के नेता प्रवीण तोगडिय़ा को मानो अवांछित बना दिया. आरएसएस को उनका तानाशाही अंदाज तनिक नहीं सुहाता फिर भी उसने बेमन से मान लिया है कि बीजेपी की सरकार बनने की सबसे ज्यादा उम्मीद तभी है जब नरेंद्र मोदी एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हों.
आरएसएस अगर किसी व्यक्ति को कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता तो वे हैं आडवाणी. वे भले ही अपनी उम्मीदवारी खुलेआम पेश न कर रहे हों पर अपने लिए ऐसी हैसियत तो अवश्य चाहते हैं कि इस मामले में उनकी बात सुनी जाए. पार्टी के निर्माता के रूप में अपने कद के मुताबिक रचनात्मक भूमिका निभाने की बजाए वे खुद को ऐसा शहीद साबित करने में जुटे हैं जिसे उसकी सही हैसियत से महरूम किया गया है. वे जेटली को गिराने के लिए सुषमा का नाम उछाल देते हैं और अगर मोदी की उपलब्धियां छोटी करनी हों तो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का नाम ले लेते हैं. आरएसएस के एक नेता का कहना है कि उनके कद के नेता को सबको बांटने की बजाए एकजुट करना चाहिए.
आरएसएस से आडवाणी का संघर्ष पुराना है. एक जमाने में हिंदुत्व के प्रतीक आडवाणी ने 2005 में बीजेपी अध्यक्ष के नाते पाकिस्तान यात्रा के दौरान मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ करके आरएसएस का समर्थन खो दिया. उन्हें कुर्सी छोडऩी पड़ी और आरएसएस ने राजनाथ को उनका उत्तराधिकारी चुन लिया. बीजेपी के साथ आरएसएस के रिश्तों में यह अहम मोड़ था. उसने पार्टी के मामलों की लगाम अपने हाथ में ले ली और केंद्रीय स्तर पर संगठन मंत्री के रूप में अपने प्रतिनिधियों की संख्या एक से छह करके पार्टी में अपनी पकड़ मजबूत कर ली.
आरएसएस ने जिला और मंडल स्तर तक पार्टी में अपनी पैठ बना ली है. राजनाथ का कार्यकाल पूरा होने पर आरएसएस ने अपने एक और चहेते गडकरी को चुना. पूर्ति कंपनी समूह पर वित्तीय घोटालों के आरोप लगने के बाद भी गडकरी को एक और बार अध्यक्ष बनाने की आरएसएस की जिद से भ्रष्टाचार से लड़ाई में बीजेपी के नैतिक आधार को बहुत चोट लगी. आडवाणी के नेतृत्व में पार्टी के भीतर मिनी बगावत और गडकरी की कंपनियों पर आयकर के छापों ने आरएसएस को हाथ खींचने पर मजबूर कर दिया. वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने बीजेपी अध्यक्ष के चुनाव में गडकरी के मुकाबले दावेदारी भी पेश कर दी थी.
रणनीतिक गलतियां
संघ राजनाथ सिंह को दोबारा पार्टी का अध्यक्ष बनवाकर आडवाणी का कद छांटने में कामयाब रहा. वह अब भी बीजेपी को राजनाथ और संगठन मंत्रियों के माध्यम से मैनेज कर रहा है. आरएसएस के कुछ लोगों जैसे प्रभात झा और ओम माथुर को तो राज्यसभा में भेजा जा चुका है. बीजेपी के एक नेता चेताते हैं, ‘‘संघ अब पाश्व में रहकर काम करने वाले राष्ट्रवादी संगठन से सक्रिय राजनैतिक संगठन में तब्दील हो रहा है. यह चिंताजनक बदलाव है.” पार्टी के वरिष्ठ नेता अब भी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए जूझ रहे हैं, हालांकि इस पर आखिरी फैसला आरएसएस को ही करना है.
बीजेपी के नेताओं को एक-दूसरे को छोटा दिखाने के लिए खुसुर-फसुर करना ज्यादा भाता है बजाय इसके कि एक साथ बैठ कर वे यूपीए को हराने की कोई रणनीति तैयार कर पाते. पार्टी के एक नेता कहते हैं, “बीजेपी इस खामखयाली में है कि यूपीए अपने आप ही हार जाएगी और केंद्र में अगली सरकार तो उसी की बननी है. अगर वे ऐसे ही लड़ते-झगड़ते बिना तैयारी के लोकसभा चुनाव में उतरे तो उन्हें बड़ा झटका लग सकता है.” अब तक पार्टी ने अपना घर दुरुस्त करने की न कोई कवायद की है, न ऐसा कोई संकेत ही दिया है. संसद के भीतर भी उन्हें रोड़ा अटकाने वाला ही माना जाता है. बीजेपी नेता कहते हैं, ‘विधेयकों को पारित होने से रोकना और संसदीय राजनीति को बाधित करने में दिक्कत नहीं है लेकिन उन्हें स्पष्ट तौर पर बताना होगा कि जनता के लिए उनके पास विकल्प के तौर पर क्या है. पार्टी अपने स्वाभाविक समर्थक मध्य वर्ग का भरोसा भी खोने के कगार पर खड़ी है.” इसे दुरुस्त करने के लिए उसके पास कोई योजना नहीं है.
असल मसला अर्थव्यवस्था का है
सत्ता हासिल करने में बीजेपी इतनी ज्यादा उलझ गई है कि उसने नीति तैयार करने का काम तकरीबन भुला ही दिया है. उसका आर्थिक एजेंडा धुंधला है. सरकार में 1998 से 2004 के बीच रहते हुए बीजेपी आर्थिक सुधारों की कट्टर समर्थक थी. वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने ही मल्टीब्रांड रीटेल में 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश जैसे उपायों का प्रस्ताव किया था. एक दशक बीता नहीं कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने अवसरवादी रुख अपनाते हुए सितंबर 2012 में रीटेल में एफडीआइ का विरोध कर डाला जबकि खुद मोदी जैसे अपने कुछ मुख्यमंत्रियों के साथ वह इस मसले पर टकराव में आ गई. उसके कुछ मुख्यमंत्रियों ने सभी क्षेत्रों में एफडीआइ का स्वागत किया है. अब पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व इंश्योरेंस सेक्टर में एफडीआइ की सीमा को बढ़ाने का विरोध कर रहा है जबकि उसने पारंपरिक रूप से इसका हमेशा समर्थन किया है.
आर्थिक नीतियों पर पार्टी का रूढ़िवादी रवैया कांग्रेस से उसके फर्क को मिटा देता है. जिस वक्त मतदाता एक वैकल्पिक सुधारवादी एजेंडे की तलाश में है, पार्टी सुधारों के विरोध में जा खड़ी हुई है. वह वाजपेयी की एनडीए सरकार ही थी जिसने 1999 में पहली बार विनिवेश के लिए बाकायदा एक मंत्रालय ही खोल दिया था. यूपीए ने बाद में उसे विभाग में तब्दील करते हुए 2004 में वित्त मंत्रालय के अधीन ला दिया, हालांकि एनडीए सरकार के तहत अरुण शौरी के नेतृत्व में 2000 से 2004 के बीच यह मंत्रालय काफी सक्रिय था. इसने कई बड़े विनिवेश किए, जिनमें सबसे ज्यादा मशहूर कदम भारत की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने का फैसला था. यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि आज बीजेपी आर्थिक नीतियों पर शौरी से परामर्श करने के बारे में भी नहीं सोचती है. जैसा कि एक विश्लेषक कहते हैं कि बीजेपी ने हिंदुत्व के खांचे के बाहर एक अलग आख्यान गढऩे की दिशा में कम ही काम किया है.
वे कहते हैं, “यदि आप अलग तरह की पार्टी होने का दावा करते हैं तो अलग रह कर दिखाइए भी. जैसे टोनी ब्लेयर ने न्यू लेबर पार्टी बनाई, आप भी नई बीजेपी खड़ी कीजिए.” इसके उलट होता यह है कि जब कभी पार्टी संकटग्रस्त होती है, उसे हिंदुत्व का परचम लहराने के अलावा कोई और उपाय नहीं सूझता. वह एक मामूली सी सच्चाई नहीं समझती है कि भारत अयोध्या को कब का पीछे छोड़ चुका है और पार्टी को आज धार्मिक राष्ट्रवाद की थकी हुई विचारधारा नहीं बल्कि परिवर्तनकारी विचारों की जरूरत है. उसे आरएसएस को प्रिय हिंदुत्ववाद और शहरी महत्वाकांक्षी जनता को प्रिय सुशासन के दो ध्रुवों के बीच संतुलन साधने की जरूरत है.
सिरफुटौवल में लगी पार्टी ने हालांकि रणनीति पर बहुत ध्यान नहीं दिया और इसकी कीमत भी चुकाई है. कर्नाटक की हार इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. पार्टी लंबे समय तक भ्रष्टाचार से दागदार बी.एस. येद्दियुरप्पा के खिलाफ कार्रवाई करने में टालमटोल करती रही. आडवाणी चाहते थे कि येद्दियुरप्पा नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए मुख्यमंत्री के पद से खुद इस्तीफा दें जबकि पार्टी अध्यक्ष गडकरी ने ज्यादा व्यावहारिक रवैया अपनाते हुए येद्दियुरप्पा का समर्थन किया क्योंकि उन्होंने अपने दम पर 2008 में इकलौते दक्षिण भारतीय राज्य में बीजेपी को विजय दिलाई थी. मोदी और जेटली कहीं ज्यादा महीन रणनीति में भरोसा रखते थे जबकि रेड्डी बंधुओं से अपने करीबी रिश्ते के चलते सुषमा येद्दियुरप्पा के प्रति नरम थीं. गली जनार्दन रेड्डी और सोमशेखर रेड्डी ने सुषमा की मदद की थी जब वे 1999 में बेल्लारी से सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव में खड़ी हुई थीं. वह तो तत्कालीन लोकायुक्त एन. संतोष हेगड़े ने जब जुलाई 2011 में अवैध खनन पर अपनी रिपोर्ट में रेड्डी बंधु और येदियुरप्पा को दोषी ठहराया तब जाकर इन सबको इस्तीफा देना पड़ा था. तब रेड्डी बंधु कर्नाटक सरकार में कैबिनेट मंत्री हुआ करते थे.
कर्नाटक में बीजेपी का गढ़ ढहाने का श्रेय खराब प्रशासन को उतना नहीं जाता जितना इसके लिए खराब राजनैतिक प्रबंधन जिम्मेदार है, बिलकुल हिमाचल और उत्तराखंड की तर्ज पर. उत्तराखंड में केंद्रीय नेतृत्व ने बी.सी. खंडूड़ी को वापस बुलाने में टालमटोल बरता और आखिरकार जब मार्च, 2012 के चुनाव से बमुश्किल छह महीने पहले यह फैसला किया भी गया तब तक काफी देर हो चुकी थी. पार्टी को नहीं बचाया जा सका. हिमाचल प्रदेश के मामले में तो जेटली ने 2012 के चुनाव नतीजों के बाद खुद स्वीकार भी किया था कि बीजेपी की हार के पीछे एक वजह “पार्टी के भीतर हुई बगावत्य” थी.
यह विडंबना ही है कि जो पार्टी केंद्र में लडख़ड़ाई हुई है, वह अब भी देश के कुछ बेहतर प्रशासित राज्यों जैसे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात और गोआ में राज चला रही है तथा पंजाब और बिहार में गठबंधन सरकार का हिस्सा है. इन राज्यों में बीजेपी गुणवत्तापूर्ण राजकाज वाली पार्टी के तौर पर उभरकर सामने आई है. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह का खाद्य सुरक्षा विधेयक सोनिया गांधी के केंद्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के लिए नजीर साबित हुआ जिसे कांग्रेस संसद में पारित करवाने में जुटी है. मध्य प्रदेश ने 2012-13 में अर्थव्यवस्था में तेज वृद्धि दर हासिल की और बिहार को शीर्ष से लुढ़का दिया. मोदी ने रोजगार सृजन और उद्योगीकरण का रास्ता गुजरात में दिखाया है तो गोआ के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रीकर ने अवैध खनन को बंद करने और राजस्व कमाने के कई नए तरीके निकाले हैं.
इन राज्यों में राजकाज के क्षेत्र में सफलता के झ्ंडे गाडऩे के बावजूद बीजेपी को केंद्रीय स्तर पर इनसे कोई लाभ नहीं मिला है. इसके उलट कई क्षेत्रीय क्षत्रप प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए खयाली घोड़े दौड़ाने में जुट गए हैं. पार्टी की प्रवक्ता निर्मला सीतारमन कहती हैं कि इतने सारे नेताओं का होना पार्टी में मजबूत लोकतंत्र को दिखाता है. वे इस बात से इनकार करती हैं कि पार्टी के नेता एक साथ मिलकर काम नहीं कर रहे. वे कहती हैं, “यह कहना अब फैशन हो चला है कि बीजेपी ने संकटग्रस्त यूपीए से उपजे हालात का फायदा नहीं उठाया. अभी वक्त है. हम सही समय आने पर अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम घोषित करेंगे.”
पार्टी को ऐसे नेता की जरूरत है जिसके पास विचार हो और जो देश में आधुनिक दक्षिणपंथी पार्टी की खाली जगह को भर सके. उसे 21वीं सदी के भारत की आर्थिक और सांस्कृतिक महत्वाकांक्षाओं को समझना होगा. लोकसभा चुनाव सिर पर हैं, क्या ऐसे वक्त में बीजेपी हार की हैट्रिक को बरदाश्त कर पाएगी?

