भारतीय उपभोक्ताओं की सोने की बढ़ती चाहत से वित्त मंत्री पी. चिदंबरम की पेशानी पर बल पड़ रहे हैं. 2012 की आखिरी तिमाही में देश का करंट एकाउंट डेफिसिट यानी आयात और निर्यात के मूल्य के बीच का अंतर बढ़ते हुए जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) के 5.4 फीसदी के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया. इस अंतराल में करीब एक-तिहाई का योगदान सोने के आयात का ही है. वही सोना जिसे खरीदकर अक्सर आप अपनी तिजोरी में रख लेते हैं. तुलनात्मक रूप से देखें तो 1991 के संकट के दौर में भी देश का करंट एकाउंट डेफिसिट जीडीपी का 3 फीसदी ही था और तब देश का सोना गिरवी रखने की नौबत आ गई थी. हालांकि, तब के विपरीत अब घाटे की भरपाई विदेशी निवेश से की जा सकती है. लेकिन यूपीए सरकार के कुशासन के दौर ने इसमें अनिश्चितता ही पैदा की है.
वित्त मंत्री के पास घाटे को काबू में लाने के लिए तीन विकल्प हैं: निर्यात में तेजी लाएं, जो फिलहाल वैश्विक आर्थिक मंदी को देखते हुए मुश्किल है; कच्चे तेल का आयात घटाएं, अगर भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना है तो यह असंभव है; या सोने के आयात पर अंकुश लगाया जाए जो तेल के बाद दूसरी सबसे ज्यादा आयात होने वाली वस्तु है और यह सबसे आसान विकल्प है. 2 जनवरी को सरकार का करंट एकाउंट डेफिसिट आंकड़ा जारी होने के तुरंत बाद चिदंबरम ने कहा, ‘‘हमारे सामने इसके अलावा और कोई विकल्प शायद न बचे कि सोने के आयात को थोड़ा महंगा किया जाए.’’ चिदंबरम से पहले वित्त मंत्री रहे प्रणब मुखर्जी ने करीब एक साल पहले 2012 के बजट में सोने पर आयात शुल्क को 2 से बढ़ाकर 4 फीसदी किया था. दुर्भाग्य से जिस तरह सोने के आयात पर अंकुश लगाने की मुखर्जी की कोशिश काफी हद तक नाकाम रही है, ऐसा लग रहा है कि चिदंबरम की कोशिशों का भी वही हश्र हो सकता है. अगर उन्हें इसमें सफल होना है तो भारत की फल-फूल रही गोल्ड इकॉनमी के पक्ष में बने मजबूत जनमत को परास्त करना होगा-जिसकी संभावना दूर तक नजर नहीं आती.
हरदिल अजीज सोना
यह आम धारणा एकदम गलत है कि भारतीय ज्यादा सोना गहनों के रूप में खरीदते हैं. हकीकत यह है कि पिछले पांच साल में सोना भारत में निवेश का पसंदीदा जरिया बन गया है. पांच साल (जनवरी 2008 से जनवरी 2013) में सोने पर 170 फीसदी का जबरदस्त रिटर्न मिला है. इसकी तुलना में इसी अवधि में शेयर बाजार में पैसा लगाने वालों को औसतन 4 फीसदी का घाटा हुआ. यहां तक कि तीन साल के अंतराल में भी सोने ने इक्विटी के मुकाबले बेहतर मुनाफा दिया है. जनवरी 2010 से जनवरी 2013 के बीच सोने से जहां 80 फीसदी का रिटर्न हासिल हुआ है, वहीं इस दौरान शेयर बाजार से सिर्फ 3 फीसदी का ही रिटर्न मिल सका है. मीडियम टर्म में गारंटीशुदा रिटर्न के मामले में सोने को पछाडऩे में यदि कोई एसेट सफल रहा है तो वह एक और चमकदार धातु चांदी है.
सोने को महंगाई के जोखिम से बचने का भी अच्छा साधन माना जाता है क्योंकि महंगाई कीमती धातुओं के मुकाबले कागजी एसेट की वैल्यू में ज्यादा गिरावट लाती है. अपनी वास्तविक वैल्यू की वजह से सोना भारत और दुनिया भर में आर्थिक वृद्धि की चाल सुस्त पडऩे के दौर में सुरक्षित एसेट साबित हुआ है. यह रुपए के कमजोर पडऩे के दौर में भी अच्छी ढाल साबित होता है. अहम बात यह है कि कोई इन्वेस्टर अगर इस पीली धातु में निवेश करना चाहता है तो यह जरूरी नहीं है कि वह सीधे सोना खरीदे. एक्सचेंज ट्रेड फंड(ईटीएफ) के उभार ने सोने को रखने के झंझट के बिना उसमें इन्वेस्ट करने को सुविधाजनक बनाया है.
कागज का सोना
दिल्ली के 24 वर्षीय प्रतीक गोयल का ही उदाहरण लें, उन्होंने 19 वर्ष की उम्र में अपना पहला डीमैट एकाउंट खोला था और अपनी पॉकेट मनी का एक हिस्सा शेयर बाजार में लगाना शुरू किया था. वे बताते हैं, ‘‘मैं नया था, इसलिए मैं सभी विकल्पों पर बारीकी से गौर करता था और उसके बाद ही इन्वेस्ट करता था.’’ करीब ढाई साल पहले उन्हें शेयर बाजार से भी बेहतर इन्वेस्टमेंट का ठिकाना मिल गया. वह ठिकाना था सोने में इन्वेस्ट करने का. उन्होंने ईटीएफ के माध्यम से पेपर गोल्ड में इन्वेस्ट करने का विकल्प अपनाया. इस उद्यमी ने बताया, ‘‘जब मैंने ईटीएफ खरीदना शुरू किया तो कीमत 12,000 से 13,000 रु. प्रति दस ग्राम थी. अब यह करीब 30,000 रु. के आसपास चल रही है. बाकी गणित आप ही लगाएं! ’’ फिलहाल तो वे ईटीएफ और सोने के बिस्किट में इन्वेस्टमेंट जारी रखना चाहते हैं. उन्होंने कहा, ‘‘मैं खरीदारी तब ही बंद करूंगा, जब अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में सुधार आ जाएगा. तब तक तो मेरा सोने में ही भरोसा है.’’
जो लोग अब भी ईटीएफ जैसे जटिल साधनों से बचना चाहते हैं, उनके लिए जूअलरी कंपनियों की अनूठी इन्वेस्टमेंट योजनाएं सोने में निवेश का कारगर रास्ता साबित हो रही हैं. केरल के थोडुपुझ में फार्मेसी चलाने वाले 55 वर्षीय राधाकृष्णन ने पहले कभी भी सोने को इन्वेस्टमेंट विकल्प बनाने के बारे में नहीं सोचा था, लेकिन दो साल पहले जब कीमतें तेजी से बढऩी शुरू हुईं तो उन्होंने इसका इरादा बनाया. शादी के लायक हो चुकी उनकी 21 वर्षीया बेटी नीनू कृष्णन, जो इंजीनियरिंग की छात्रा भी हैं, को देखकर उन्हें इसके लिए प्रेरणा मिली. उन्होंने केरल के कुछ जूअलरी ग्रुप्स के गोल्ड इनवेस्टमेंट प्लान के बारे में विचार करना शुरू किया. राधाकृष्णन ने बताया, ‘‘मेरी पत्नी बिंदु ने मीडिया में कुछ विज्ञापन देखे थे जिसमें कई जूअलर्स के सोने की खरीद के लिए किस्तों में पैसा जमा करने की योजनाएं थीं. एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति होने के नाते मैंने मालाबार गोल्ड और भीमा जूअलरी की ऐसी ही इंस्टालमेंट योजनाओं में पैसा लगा दिया.’’ उन्होंने मालाबार गोल्ड की एक वर्ष की किस्त वाली योजना में पैसा लगाया और अवधि पूरी होने पर उसके बदले गहने खरीदे. फिलहाल उन्होंने भीमा जूअलरी की एक स्कीम में पैसे लगा रखे हैं. राधाकृष्णन ने कहा, ‘‘अगर मैं आज 2,000 रु. का निवेश करता हूं तो वे सोने की कीमत आज के हिसाब से लगाते हैं और उतने
का सोना मेरे नाम से अलॉट कर देते हैं. इस तरह साल के अंत में मुझे किस्त में मिले सोने के कुल वजन के बराबर गहने मिल जाते हैं.’’ उन्होंने कहा कि सोने की कीमतें हर दिन बढ़ रही हैं. पहले ऐसी योजनाएं उपलब्ध नहीं थीं. उन्होंने बताया, ‘‘अब तो मैंने अपनी आमदनी का करीब 20 फीसदी हिस्सा इसमें लगाया हुआ है.’’
आसानी से खरीद-फरोख्त वाली धातु
2007 से पहले मुथूट और मणप्पुरम को केरल से बाहर बहुत कम लोग जानते थे. लेकिन आज केरल आधारित ये गोल्ड लोन गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) भारत के गोल्ड लोन सेक्टर का नेतृत्व कर रही हैं. 2012 में इन दोनों कंपनियों के प्रबंधन के तहत एसेट (एयूएम) 37,000 करोड़ रु. तक के हो चुके थे. इन गलाकाट कारोबारी प्रतिद्वंद्विता वाली कंपनियों की 2007 के बाद बढ़त हैरत में डालने वाली है. सोने को नकद लोन के लिए जमानत के रूप में स्वीकार कर उन्होंने उन रूढ़िवादी बैंकों की खाली छोड़ी गई जगह पर कब्जा जमा लिया जो गरीबों को लोन देने से बचते थे. यहां तक कि उन्होंने स्थानीय साहूकारों की भी जगह लेनी शुरू कर दी जो छोटे कर्जों के लिए बहुत ज्यादा ब्याज वसूलते थे.
मुथूट फाइनेंस का सालाना राजस्व 2008 के 369 करोड़ रु. से बढ़कर 2012 तक 4,459 करोड़ रु. तक पहुंच गया. इस दौरान इसका मुनाफा 63 करोड़ रु. से बढ़कर 892 करोड़ रु. तक पहुंच गया. इस अवधि में कंपनी की शाखाओं की संख्या 500 से बढ़कर 3,600 तक पहुंच गई जो 75,000 ग्राहकों की जरूरतें पूरी कर सकती हैं. मणप्पुरम फाइनेंस का राजस्व 2008 के 78 करोड़ रु. से बढ़ते हुए 2010 तक 477.88 करोड़ रु. तक पहुंच गया और 2012 में इसने 2,560 करोड़ रु. का आंकड़ा पार कर लिया. 2008 से 2012 के बीच कंपनी का मुनाफा 21 करोड़ रु. से बढ़कर 591 करोड़ रु. तक पहुंच गया जबकि उसके कुल बकाया गोल्ड लोन की वैल्यू 11,000 करोड़ रु. के आंकड़े को छू चुकी है.
इसी दौरान मुथूट का बकाया गोल्ड लोन 2,179 करोड़ रु. से बढ़कर 20,767 करोड़ रु. तक पहुंच गया और उसके पास जमानत के रूप में जमा सोने की मात्रा 30.1 से 126 टन तक पहुंच गई. मुथूट के चेयरमैन 63 वर्षीय एम.जी. जॉर्ज को 2011 से ही लगातार फोर्ब्स पत्रिका की अरबपतियों की सूची में शामिल किया जा रहा है क्योंकि उनकी व्यक्तिगत संपत्ति बढ़कर 1.14 अरब डॉलर तक पहुंच गई है. जॉर्ज ने कहा, ‘‘हमारी सफलता की कुंजी बहुत साधारण है. हम जरूरतमंदों को आसानी से लोन देते हैं. बैंकों के विपरीत हमारी प्रक्रिया बहुत सामान्य होती है. इसी तरह, गांवों के साहूकारों के विपरीत हमारी शर्तें शोषण करने वाली नहीं थीं. इस खाई को भरने की वजह से ही हमें सफलता मिली.’’
साहूकारों की छुट्टी
मणप्पुरम के एमडी और सीईओ 58 वर्षीय, वी.पी. नंदकुमार सफलता का श्रेय अपनी कंपनी और मुथूट के लाए गए बुनियादी बदलावों को देते हैं. एक समय था जब कर्ज देने के धंधे में साîकारों का बोलबाला था. गोल्ड लोन कंपनियों ने इसे बदला है, क्योंकि इनका तरीका लोगों को साफ-सुथरा लगता है. मणप्पुरम की स्थापना उनके पिता ने 1949 में त्रिसूर में एक छोटी-सी वित्तीय और गोल्ड लोन फर्म के रूप में की थी. नंदकुमार ने कंपनी को संभालने के लिए 1986 में बैंक अधिकारी की अपनी नौकरी छोड़ दी थी. इसके बाद से ही इस फर्म के आधुनिक कॉपोर्रेट तरीकों से रू-ब-रू होने के सफर की शुरुआत हुई. 1999 में कॉर्पोरेट स्वरूप धारण कर चुकी कंपनी केरल की ऐसी पहली एनबीएफसी बन गई जिसने क्रेडिट रेटिंग करवाई और 1995 में आइपीओ यानी शेयर भी लेकर आई. अपना ध्यान गोल्ड लोन पर केंद्रित करने वाली मणप्पुरम ने 2007 में विदेशी संस्थागत फंड भी हासिल किया. 2010 में मणप्पुरम ने क्यूआइपी (क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट) से इच्छित 1,000 करोड़ रु. की राशि चंद घंटों में ही जुटा ली. इसमें नोमुरा, मेरिल लिंच कैपिटल मार्केट, इंडिया कैपिटल फंड, मॉर्गन स्टैनले म्युचुअल फंड और एसबीआइ म्युचुअल फंड जैसे 12 उच्चस्तरीय इन्वेस्टरों से मिली 245 करोड़ रु. की राशि भी शामिल थी.
गोल्ड लोन कारोबार में बेहद तेज बढ़ोतरी और इससे अर्थव्यवस्था को हो सकने वाले जोखिम को देखते हुए पिछले साल रिजर्व बैंक का इस ओर ध्यान गया. रिजर्व बैंक ने सोने को जमानत के रूप में रखने के लिए लोन-टु-वैल्यू यानी सोने के मूल्य के कितने हिस्से तक कर्ज दिया जा सकता है, इसके लिए कुछ नियम-कायदे तय कर दिए. इसके पहले कंपनियां गिरवी रखे गए सोने की वैल्यू तय करने के लिए आजाद थीं. कंपनियों ने यह माना है कि इस तरह के अंकुश से उनके मुनाफा कमाने की क्षमता पर असर पड़ा है. फिर भी, दिसंबर, 2012 में खत्म तिमाही में मुथूट का शुद्ध मुनाफा 7 फीसदी (270 करोड़ रु.) और कुल आय 11 फीसदी (1,365 करोड़ रु.) बढ़ गई. कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर जॉर्ज अलेक्जेंडर ने बताया, ‘‘पिछली दो तिमाहियों से हमारा कारोबार नहीं बढ़ा है, जिसकी मुख्य वजह इस उद्योग पर अंकुश लगना है. लेकिन ऐसी सीमाओं को देखते हुए इस तरह का प्रदर्शन संतोषजनक है.’’
उफान पर कारोबार
बंगलुरू की कंपनी राजेश एक्सपोर्ट के चेयरमैन 49 वर्षीय राजेश मेहता 2011 में भारत के पहले स्वर्ण अरबपति (डॉलर में) बने. 2012 में उनकी कुल संपत्ति 1.1 अरब डॉलर तक पहुंच गई थी. उनकी कंपनी ने 2011-12 में 24,000 करोड़ रु. का कारोबार किया जिसमें से 80 फीसदी से ज्यादा हिस्सा जूअलरी निर्यात से हुआ था. भारत में वह शुभ ब्रांड नाम से जूअलरी की रिटेल बिक्री करते हैं. अंतरराष्ट्रीय मंदी और भारत में आर्थिक सुस्ती के दौर में भी मेहता ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है. पिछले पांच साल में उनकी कंपनी की कमाई दोगुनी हो गई है.
2008 के मध्य में जब ग्लोबल आर्थिक मंदी का दौर चल ही रहा था, अंतरराष्ट्रीय बाजार में अचानक सोने की मांग में भारी तेजी आ गई. मेहता ने बताया, ‘‘हमने आगे बढऩे का फैसला लिया और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ ही पूंजीगत खर्च भी बढ़ा दिए. हमने यह काम काफी सावधानी और व्यवस्थित तरीके से किया. ग्लोबल आर्थिक मंदी के बावजूद इस फैसले ने हमें आगे बढऩे में मदद की.’’ वे अपनी मेज पर रखी गणेश की मूर्तियों के एक संग्रह की ओर संकेत करते हुए कहते हैं, ‘‘निंश्चित रूप से गणेशजी की वजह से यह सब हुआ है.’’ ऊंचा आयात कर लगाकर चिदंबरम मेहता और दिल्ली के पीसी जूअलर्स जैसे कई बड़े जूअलर्स के कारोबार को सिकोड़ कर रख देंगे.
दिल्ली के करोल बाग स्थित बैंक स्ट्रीट पर कतार से गहनों की दुकानें ही दिखती हैं, लेकिन इन सब के बीच पीसी जूअलर्स का स्टोर ध्यान खींच लेता है. विशाल पांच मंजिला इमारत के सामने का हिस्सा बिल्कुल सफेद है जो इसे यूरोपीय लुक देता है और इसमें प्रवेश करने के लिए 10 फुट ऊंचा विशाल दरवाजा है. स्टोर का भीतरी हिस्सा भी इसी तरह से शानदार है. इस जूअलरी कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर बलराम गर्ग ने कहा, ‘‘हमारी योजना काफी बड़ा और जितना हो सके, विस्तार करने की है.’’
कभी करोल बाग में एक स्टोर से शुरू करने वाली इस फर्म के आज 23 शहरों में 30 शोरूम हो गए हैं. यही नहीं, यह जूअलरी चेन 2012 में 609 करोड़ रु. जुटाने के लिए अपना आइपीओ भी लेकर आई. इसका इश्यू ओवरसब्सक्राइब्ड हो गया और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज पर इसकी लिस्टिंग तय दायरे से बहुत ऊंची कीमत पर हुई. इस जुटी रकम से कंपनी वित्त वर्ष 2014 में 20 नए शोरूम खोलने की योजना बना रही है. गर्ग ने कहा, ‘‘वह दिन गए जब जूअलर सोने को तिजोरियों में बंद रखते थे. खरीदार भी अब ऐसे बड़े स्टोर चाहते हैं जहां सैकड़ों विकल्प मौजूद हों, न कि उन खानदानी जूअलरों को जहां विकल्प बहुत सीमित होते हैं.’’
छोटे जूअलर भी सोने की तेजी को लेकर उत्साहित हैं. दिल्ली के मुल्तानी जूअलर्स के पुनीत दत्ता बताते हैं, ‘‘अभी कुछ समय तक सोने में तेजी बरकरार रहेगी. जब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कुछ स्थिरता नहीं आती लोगों को निश्चित रूप से सोने में अच्छा रिटर्न मिल सकता है.’’ दत्ता ने सोने की बुकिंग के लिए एक लचीली और व्यवस्थित योजना पेश की है जिसे वे फ्लेक्सी सिप कहते हैं. यह एक साल तक बचत करने वाली एक लचीली योजना है जिसमें खरीदार महीने की किसी भी तारीख को किसी भी राशि का सोना बुक कर सकता है. साल के अंत में उसके बदले जूअलरी ली जा सकती है और उस पर मेकिंग चार्ज में भी दस फीसदी की छूट दी जाती है.
सैकड़ों सफल कारोबारियों और लाखों संतुष्ट निवेशकों की इस सफलता पर अंकुश के लिए एक साहसी और निडर वित्त मंत्री की जरूरत है. चिदंबरम ने आर्थिक वृद्धि दर तय करने पर ध्यान केंद्रित करके बेहतर काम किया है. यही एक टिकाऊ तरीका है जिससे लोगों को सोने को निवेश का सुरक्षित स्वर्ग समझने से रोका जा सकता है.
-साथ में एम.जी. राधाकृष्णन, जे. बिंदुराज, सौम्या अजि, सारण्या चक्रपाणि और राजेश शर्मा

